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अशोकनामा

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13 Jun 2010
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ग़ज़ल: महका करेंगी ग़ज़लें

मेरी दर्द वाली रातों की नज़र उतार देनाये गर रहीं सलामत तो महका करेंगी ग़ज़लेंफ़स्ले बहार आलम और आंसुओं का बहनाखुश मौसमों में देखना छलका करेंगी ग़ज़लेंअपने अकेलेपन में भी कभी मुतमइन रहना कोई न कुछ कहेगा पर बातें करेंगीं ग़ज़लेंदिल से जुड़े रिश्तों के लिए न दुआ
 
अशोक जमनानी
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ग़ज़ल: वक्त

Shareबेवफ़ाई पे जब भी आता हैवक्त तेरी तरह मुस्कराता हैमेरे पर काटना वही चाहेगाउड़ना जो अभी सिखाता हैबातें करना उसे पसंद नहींख़ामोश रहो तो रूठ जाता हैसिखाता बातों की है बाज़ीगरीवादे करके मुकर वो जाता हैमेरी उम्र के सभी सफे लेकरखुद लिखता है खुद मिटाता
 
अशोक जमनानी
Jun 10 2010 09:14 PM
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ग़ज़ल: दरख़्त

Shareसूखे पत्तों को जब आकर हवा उड़ाती हैशाख के पत्तों की भी रूह कांप जाती हैदरख़्त अपने ही पत्तों का हो नहीं पाताचिड़िया पागल है वहां घोंसला बनाती हैधूप पेड़ों के सिर जमाती जब डेरा आकर ये छांव पेड़ों तले तब बस्तियां बसाती हैदरख़्त जो भी खास थे वो बन गये खुदाआम
 
अशोक जमनानी
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तीतर

Share       कुछ दिनों पहले मंत्री जी के काफिले से दो-चार होना पड़ा। आम आदमी होने के नाते मैं चुपचाप सड़क के किनारे खड़ा हो गया ताकि ‘साहब’ लोगों की गाड़ियां आराम से निकल जायें। मंत्री जी की कार के आगे पुलिस की गाड़ी थी और पीछे
 
अशोक जमनानी
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Jun 06 2010 01:17 PM
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लघु कथा: लघु कथा

Share        आजकल पथिक जी की लघु-कथाओं की तूती बोल रही है। साहित्यिक बिरादरी की प्रशंसा और ईर्ष्या मिश्रित आलोचना भी मुखर है। पथिक जी की लेखनी और ज़बान दोनों ही धारदार हैं। कोई उनसे पूछता है कि कहानी या उपन्यास के
 
अशोक जमनानी
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ग़ज़ल: दोस्त

 सुना है मेरा दिल दुखाएगा दोस्त है दोस्ती निभाएगावो आंखों में शर्म रखता है सिर झुकाकर ही कतराएगाभीड़ में वो एहसान कर देगानज़रें मिलीं; तो मुस्कराएगादर्द का मेरा जब सफ़र होगाअलविदा कहने ही वो आएगायाद रखना वो कहेगा मुझेऔर वो मुझको भूल
 
अशोक जमनानी
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कविताः महाप्रयोग

विश्व के वैज्ञानिककर रहे हैं महाप्रयोगविज्ञान चाहता है ढूंढनारहस्य महा शून्य केरहस्य उत्पत्ति केताकि बची रहे पूर्ण सृष्टि मेंयह सृष्टिनहीं हो रहा कहीं कोई प्रयोगशून्य में विलीन होतीसंवेदनाओं केरहस्य परसबने मान लिया किबची रही सृष्टि तोसंवेदना शून्य होकर
 
अशोक जमनानी
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May 31 2010 01:18 PM
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गीत:ओ पथिक तू चल अकेला

Shareओ पथिक तू चल अकेला कारवां बन जायेगातू समर पर हो समर्पित; तो अमर हो जायेगाना आंसुओं का अर्ध्य  हो न पीर की परवाह होयश की कोई कामना न पथ में शीतल छांव होतू नींव के पत्थर को अपनी आस्था का दान देनिर्माण का हर कंगूरा तुझसे ही जीवन पायेगायह
 
अशोक जमनानी
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May 30 2010 03:36 PM
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लघु कथा: पेटदर्द

Share                 मंत्री जी के पेट में रह-रह कर दर्द उठता। दिन पर दिन बीतते जा रहे थे लेकिन दवा और दुआ दोनों ही बेअसर सिद्ध हो रहीं थीं।अच्छे से अच्छा इलाज़ चल रहा था;
 
माणिक
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गजल- बादल

Shareबादल हैं आसमान में पानी लिए हुए मिटेंगे पहले इनकी उड़ान तो देखो टूटते तारों का गिरना है सच मगरटूटने वालों की रोशन शान तो देखो दो रोटियों के बदले आसीसता जहांकंगाल से फकीर का ईमान तो देखो लुटकर निभाता है साथ कहकहों कालुटे हुए का कीमती सामान तो देखो महल
 
माणिक
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लघु कथा: राजमार्ग

Share            पुरानी सड़क जिसे बस इसलिए सड़क कहा जाता था क्योंकि सरकारी रिकार्ड में वो सड़क के रूप में दर्ज थी। गढ्ढे इतने अधिक थे कि लोग बीस किलोमीटर के फेर वाला लम्बा रास्ता अपनाते थे पर उस सड़क से
 
माणिक
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(गीत)कभी सुना है गीत

Shareकभी सुना है गीत श्रमिक का जो वो रातों में गाता हैसूरज संग जल-जल जो पाया गाकर उसे भुलाता है कभी सुना है गीत पथिक का राह में जो दोहराता हैमंज़िल देती आवाज़ें ; अक्सर छूट गया भी बुलाता हैकभी सुना है गीत विरह का जो आंसू बन जाता हैशब्द न कोई सुर संगी पर सब
 
माणिक
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पुष्प की अभिलाषा --तथ्यों की जानकारी

Shareचाह नहीं मैं ; सुरबाला के गहनों में गूंथा जाऊंचाह नहीं प्रेमी की माला बिंध प्यारी को ललचाऊंचाह नहीं सम्राटों के शव पर हे हरि डाला जाऊंचाह नहीं देवों के सिर पर चढ़ूं भाग्य पर इठलाऊंमुझे तोड़ लेना वनमाली उस पथ में देना तुम फेंक !मातृ भूमि पर शीश चढ़ाने
 
माणिक
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पचमढ़ी में शरद जोशी-हरिशंकर परसाई प्रसंग

Shareअशोक जमानानी को सम्मानित करते हुए श्री त्रिभुवन नाथ शुक्ला                        सतपुड़ा पर्वत श्रंखला पर  प्रकृति की अद्भुत छटा
 
माणिक
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कहानी - बेचारा रामलाल

Share             छोटे से शहर का छोटा सा मोहल्ला ऐसी ज़गहों पर तो ख़बर आग की तरह फैलती है; बस फैल गयी। सिपाही रामलाल की लड़की किसी दूसरी जात के लड़के के साथ भाग गई। जिसने सुना वो सब काम छोड़कर दूसरे
 
माणिक
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ग़ज़ल- परिंदों लौट आना

Share परिंदों शाम को लौट आना घर ज़रा ज़ल्दी हम दीवारें इस ख़ामोशी से ऊब जातीं हैंउतने ही दानें चुनो जितनी ज़रूरत है हमें यहां कितनी चोंचें घोंसलों  में रीती आतीं हैंजुगनुओं से कह दो ना रात में चमका करें वो रोशनी महलों की इससे खीज जाती हैउनसे ना मिलना
 
माणिक
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(ग़ज़ल)साथ-साथ

Shareवो मेरे ही साथ-साथ चलता रहाआंखों में झूठा ख़्वाब पलता रहाकुछ तो मिट्टी ही अपनी गीली है बारिश में घर से मैं निकलता रहातेरा ख़्याल बहुत रेशमी मेरे हमदमउसे लेकर मैं पत्थरों पे चलता रहाकौड़ियां जोड़ने के वास्ते रहा जीता खर्च सांसों का संग संग चलता रहारेत पर
 
माणिक
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लघु कथा -'' कुछ देर ''

Share                                         धूप ऐसी
 
माणिक
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(ग़ज़ल)-बंधन

शेयरतू बांधने चला मुझे मैं बंध न पाऊंगा है प्रीत की ये रीत मैं कैसे निभाऊंगाबादलों से जो गिरी वो पहली बूँद मैं गिरके खो जाऊं कहां कैसे बताऊंगासूर्य की पहली किरण भोर का परिचयजग को रोशनी  की सौगात दे जाऊंगाजो उठी तेरे हृदय वो पहली पीर मैंतुम भूलना
 
माणिक
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(ग़ज़ल) - बाग़ी

शेयरशहर का आलम बाग़ी हो तब तो घर से बाहर निकलेंअभी तो सड़कों पर मुर्दे जाकर किससे क्या बात करेंकुछ आग जले या धूप खिले या चिंगारी ही मिल जाएअभी तो फैली धुंध ही धुंध बैठे हम हाथ पर हाथ धरेहर रोज सताए जाते जो उनकी सिसकी ही सुनाई देअभी तो सिले हुए हैं लब कुछ
 
माणिक
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(ग़ज़ल)-शायद

Shareमेरी ही तरह उदास हो शायद बीते लम्हों के साथ हो शायद कोई बातें वफ़ा की करता हो झील वो पानी पानी हो शायद उसकी छत पे मेरी छत जैसा आसमान आसमानी हो शायद रात भर बीता वक्त पढ़ना हो नींद सुबह बुलानी हो शायद टूटे ख्वाबों के कोयले लेकर दिल अंगीठी जलानी हो
 
माणिक
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(नई रचना) -देस राग

Shareचूल्हे ठंडे पड़े और पेट में आग हैवाह वाह कहो न यही देस राग हैन्याय धीमा है तो ऐसा ही चलने दोहमपे हैं कई केस हम कहां बेदाग हैंसंसद स्थगित हुई चलो आराम करें हंगामा करने में भी हुई दौड़ भाग हैसिपाही मारे गए हैं!नक्सली भाग गएजंगल में लड़ाई दिल्ली में दिमाग
 
माणिक
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मदर्स-डे पर मेरे उपन्यास ‘बूढ़ी डायरी’ का एक अंश

Share बाबूजी के चले जाने के बाद हवेली का मौन सहन करना असम्भव हो गया था।हमारी हवेली में उदासी का साम्राज्य स्थापित हो गया और हमारे बीच भी मौन आकर ठहर गया।        लेकिन हर बार की तरह तुमने एक दिन मौन को हरा ही
 
माणिक
May 10 2010 06:00 PM
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नई ग़ज़ल

  अब आंखें बंद कैसे मैं कर सकूं बताओतस्वीर देके तुम मुझे जगराते दे गए होकोई नहीं यहाँ पर फिर भी नहीं अकेलायाद आके मुझको महफिल में ले गए हो आंखों में आंसू लेके हंसना नहीं है आसांमुस्कराहटों में भी मेरी बनावट भर गए होस्याही सा बिखर जाऊं मैं किसी सफे
 
माणिक
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May 08 2010 10:55 PM
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(कविता) -तुम

Shareजीवन की कठिन दोपहरी मेंमेरे पथ की छाया तुम होगीफिर छाँव-गाँव  मिल जाएंगेवो छाँव-गाँव भी तुम होगीमंज़िल है मुझसे दूर बहुतऔर प्यासा सा चातक मनपथ पे कहीं जो नीर मिलातो नदी किनारा तुम होगीआंखों ने सपने कई देखेसपने सच तो नहीं होतेभोर स्वपन ही सच
 
माणिक
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ग़ज़ल(बूढी डायरी उपन्यास से)

Share  इस कहानी का बूढ़ा नायक दीवाली पर अपना पुराना  बक्सा खोलता है और उसमें रखा पुराना सामान देखकर उसे अपने बीते वक्त की याद आ जाती है तब वो यह ग़ज़ल अपनी डायरी में लिखता है-सोचा था जो बीत गए वो बरस नहीं फिर आएंगेआज पुराना बक्सा खोला तो देखा सब
 
माणिक
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कविता -घोड़ा

Shareमेरा दो बरस का भांजा शिवांश मुझे घोड़ा समझता हैटिक्-टिक् कहता हैमेरी पीठ पर बैठ करपक्के यकीन के साथकि मैं घोड़ा ही हूंमैं भी घुटने-हाथों केाटेक देता हूं ज़मीन परथोपी और ओढ़ी हुईपहचान से मुक्त होकरहो जाता हूं शामिलउसके इस यकीन मेंकि मैं घोड़ा ही हूंघुटने
 
माणिक
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उपन्यास ‘को अहम्’ का कथा सूत्र

Shareयदि नर्मदा तट पर मुझे सदानंद नहीं मिलता तो संभवतः इस कथा का जन्म ही नहीं होता सदानंद ने ही मुझसे कहा था-‘‘नर्मदा का नदी होना या शिव पुत्री होना एक ही बात है क्योंकि नर्मदा जब शिव पुत्री है तो शिव का विस्तार है और नर्मदा जब नदी है तो शिवत्त्व का
 
माणिक
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(कविता)-आंसू

Share ये आंसू है इसे बहने दोये दर्द बहा  ले जाएगावैसे भी दर्द तो दरिया हैगर ठहरा तो सड़ जाएगाये आंसू  है इसे रहने दोये वक्त पड़े काम आएगाजब रिश्ते रेत हो जाएंगेउस वक्त नमी दे जाएगाये आंसू है इसे कहने दोये बातें कई कह जाएगाकह न सके जो शब्द
 
माणिक
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( कविता )-धूप

( कविता )-धूप      धूप है बहुत    तुम याद मत आना    पैर जल रहें हैं    तुम याद मत आना    छाँव दूर है    तुम याद मत आना    मुश्किल भरा सफर
 
माणिक
May 01 2010 01:20 PM
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उपन्यास 'बूढ़ी डायरी'' :सृजन-कथन

Shareचिर सम्मोहिनी छवि: नर्मदानर्मदा के प्रवाह का ग्राम्य अरण्य प्रेम सदा-सदा ही विश्रुत रहा है। लेकिन मैं तो नर्मदा से पहले-पहल अपने छोटे से नगर होशंगाबाद  में ही मिला था। बचपन की न  जाने कितनी स्मृतियां हैं और स्मृतियों का कोष आज भी कुछ न कुछ
 
माणिक
Apr 30 2010 09:16 PM
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अपनी माटी पर ''काव्योत्सव'': कवितायें आमंत्रित हैं

Share  ''काव्योत्सव''अपनी माटी पर कविता प्रकाशन पाठक और ब्लॉगर साथियोंनमस्कार, पतझड़ जारी है,पूरा जेठ आषाड़ बाकी है,बरसाती मौसम भी आयेगा,मगर हाँ सावन की खुशबू भी महकेगी,इसी आलम में याद किया है आपको इस आयोजन के लिए जो आपके सहयोग से ऑनलाइन
 
माणिक
Apr 26 2010 08:09 PM
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होशंगाबाद में एक साहित्यिक आयोजन

साहित्य अकादेमी,मध्यप्रदेश द्वारा पिछले16-17 अप्रेल को होशंगाबाद में एक साहित्यिक आयोजन किया गया था. ये कार्यक्रम पंडित माखन लाल चतुर्वेदी की याद हुवा राष्ट्रीय सत्र की संघोष्टी का था.कार्यक्रम का शुभारम्भ साहित्य अकादेमी के नव-नियुक्त निदेशक डॉक्टर
 
माणिक
टैग: ashok jamnani
Apr 25 2010 11:42 PM
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छायाचित्र-1

बूढी डायरी, व्यास गादी, को अहम् नामक तीन उपन्यास लिखने बाद अभी मध्य प्रदेश सिंधी अकादमी के लिए सिंधी कविताओं पर काम करने वाले अशोक जमनानी युवा संस्कृतिकर्मी ,उनका सपर्क सूत्र 09425310588 हैं.स्पिक मैके आन्दोलन से बरसों से जुड़े रहकर होशंगाबाद में रहते हुए
 
माणिक
Apr 22 2010 08:23 AM
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आहिस्ता आहिस्ता

 सभी पाठक दोस्तों का सबसे पहले तो मेरे इस ब्लॉग तक आने के लिए धन्यवाद.बाकी आनंद है. मेरे दोस्त मानिक के कहने और दुनियादारी की तर्ज़ पर सोचा कि कुछ ब्लॉग व्लोग पर काम किया जाएँ, तो बस बना लिया है ब्लॉग. पता नहीं कितना लिख पाउँगा.मगर इरादे तो नैक हे
 
अशोक जमनानी
Jan 10 2010 06:50 PM