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नयी प्रविष्टी लिखी
29 May 2010
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कुछ सूफियाना सा..

इस बार कुछ शेर हैं, जिन से बात शुरू करता हूँ..तू सुन के मेरी इल्तिज़ा क्या करेगाजो पहले से सोचा हुआ था, करेगा ... औरआइना तुम भी हो, आइना मैं भी हूंदेखूं तो आती है लौट कर रोशनीमौला ऐसा सलीका हमें बख्श देहम लुटाते रहें उम्र भर रोशनी... ...शेर हमारे साथी
 
विवेक.
May 29 2010 05:46 PM
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तुझसे नाराज़ नहीं..

सिर मुंड़ाते ही ओले...ब्लागिंग शुरू ही की थी कि मेरे कम्प्यूटर को यह नागवार गुजरा कि वो इतनी मेहनत कर रहा है और लोग comment भी नहीं दे रहे हैं.. वो फिलहाल तो नाराज़ ही है... कुछ और दिन उसकी नाराज़गी चल सकती है.. फिर भी जल्दी मिलेंगे, मुझे भरोसा है कि मैं
 
विवेक.
May 26 2010 11:19 AM
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एक रंग जो ठहरा सा बस लगता है...

बहुत दिनों से इंतजार में हूँ, इंतजार कुछ लंबा ही होता जा रहा है. मज़ा ये भी है कि ये तक पता नहीं कि इंतज़ार किसका है. जुम्मा-जुमा कायदे से 2 पोस्ट भी नहीं लिखीं कि लगा, कि कुछ मज़ा आ जाए ऐसा कुछ समझ में आए तो पोस्ट किया जाए... ब्लॉग शुरू करने के पहले जो
 
विवेक.
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जो मार खा रोई नहीं...

. दिल्ली में झुलसाते अप्रैल में 400 घरों के राख हो जाने के बाद...(फोटो-इंडियन एक्सप्रेस से) .पेज-3 की चमकती तस्वीरों का कन्ट्रास्ट..आश्चर्य होता है और आश्वस्ति भी कि अभी भी अखबारों में इस विभीषिका के लिए, इतने दारुण दृश्य के लिए इतनी जगह सुरक्षित है...
 
विवेक श्री
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पहला ख़त..

पहला ख़त है, बहुत सोचा कि कहाँ से शुरू करूं... सोचते हुए बहुत सी बातें और बहुत से मित्र याद आए, ओम द्विवेदी मेरे पुराने मित्र हैं, पहले से ब्लाग की दुनिया में टहल-घूम कर रहे हैं, अपनी बक-झक तो मैं आगे करुंगा ही. सोचा कि आज शुरुआत क्यों न एक ब्राह्मण से
 
विवेक श्री
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सपने के पीछे ज़िद..

शीर्षक हमारा सपना था, हम यानि ओम, आशीष और मैं. ओम तब ओम पथिक हुआ करते थे, आशीष तब कुमार आशीष होते थे और मैं खुद क्षितिज विवेक हुआ करता था. ये सपना मध्यप्रदेश के रीवा में तब के हम बच्चों की आँखों में अंखुआया था.रीवा जो तब कस्बानुमा शहर था और शायद अब भी,
 
विवेक श्री