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दर्शन-प्राशन

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29 May 2010
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ये था दिव्या जी का दिव्य सूक्ष्मतम चिंतन — जिस पर बहस ज़ारी है....

वैचारिक पक्वता लिये मनोविश्लेषक दिव्या जी के विचारों ने लज्जा पर फिर से सोचने को बाध्य किया : "मेरा पूर्ण विश्वास है कि लज्जा नारी का सौन्दर्य है किन्तु यह उसकी सुरक्षा नहीं है. एक स्त्री का रक्षात्मक कवच उसकी बुद्धिमत्ता तथा सजगता है जो कि
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कब तलक रहें हम मौन कहो

कब तलक रहें हम मौन कहो.कुछ ना कह पाने की पीड़ा.इच्छा मन में करती क्रीड़ा. हो आर्तनाद बिन आहत हो. कब तलक रहें हम मौन कहो. है कौन प्रेम की परिभाषा. बिन शब्द व्यक्त होती भाषा. परिचय ही क्या कुछ शब्द ना हो. कब तलक रहें हम मौन कहो. हो आप कोई भाषा-भाषी. मुझ पर
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लज्जा के नीड़ में चपलता का बसेरा

अब टिकते नहीं फिसलते हैं मुख पर जाकर मेरे दो दृग. पहले रहती थी नीड़ बना लज्जा, अब रहते चंचल मृग.चुपचाप चहकती थी लज्जा बाहर होती थी चहल-पहल. चख चख चख चख देखा करते कोणों को करके अदल-बदल. अब नहीं रही वैसी सज्जा औ' रही न वैसी ही लाली. बस उछल-उछल घूमा करते
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ये लज्जा तो केवल संयम

बोलूँ ना बोलूँ ......सोच रही.बोलूँगी क्या फिर सोच रही.मन में बातें ...करने की है इच्छा, लज्जा पर रोक रही. कुछ है मन में थोड़ा-सा भय. संकोच शील में होता लय.पलकों के भीतर छिपे नयन मन में संबोधन का संशय. "प्रिय, नहीं आप मेरे प्रियतम मन में मेरे अब भी है
टैग: संयम
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नर की लज्जा बदरंग गाय

लज्जा नारी का नहीं कवच लज्जा तो आभूषण कहाय. लज्जा स्वाभाविक भाव नहीं लज्जा तो पहनी ओढ़ी जाय. लज्जा नारी का मूलतत्त्व फिर भी गुण आभूषण कहाय. मैंने लज्जा को कवच कहा मेरी लज्जा अब मुँह छिपाय. नारी की लज्जा आभूषण नर की लज्जा बदरंग गाय. जो दूध बहुत
टैग: आभूषण
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कवच [एक चित्र काव्य]

नयन चार करना नवीनता यही क्षणिक पहला पागलपन नहीं मिलन को आती तन्वी रेतीला होता मेरा मन मेरे आकर पास कल्पना कर देती है मुझको कायर सुरबाला को देखूँ अपलक उत्कंठित रहता है अंतर कोस रहा है कब से सच्चा नख से शिख तक तुमको निज मन लगी को आकर कौन बुझाय मिलन को
May 22 2010 03:26 PM
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लज्जा : नारी का अभेद्य कवच

यदि लज्जा ही निर्लज्ज होकर घूमेगी घर के आँगन में. तो स्वयं नयन की मर्यादा भागेगी छिपने कानन में. यदि लज्जा ही मुख चूमन को लिपटेगी अपनी काया से. तो कैसे आकर्षित होंगे 'चख'ह्री की श्रीयुत माया से. यदि लज्जा ही अवगुंठन की आलोचक बन जाए भारी. तो कौन
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विरह उदगार

मित्र विनय ने संपर्क कर ही लिया. २० मिनट बात हुयी. हम परस्पर वर्ष में एक या दो बार ही मिलने वाले मित्र थे. लेकिन जब सात वर्ष से अधिक हो गए तो रहा ना गया. सो स्वभाव के विपरीत धमकी देकर देखा. और वह कारगर हुआ. मतलब मित्रों को समय-समय पर धमकियाते रहना चाहिए.
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ढाल [चित्र काव्य]

पहले से ही दिखी भवन में आती अमा अरे! चुपचाप.होली खेल रहा था छिपकर तेल जला तम से दिव-ताप. नत थे दोनों नयन नुकीले बतलाओ थे कौन कलाप. रज्जू बिना छूटे आहत कर काजलमय हृत, करे विलाप ला वह चाप कौन-सी है, यदि कलाकार बनते हो आप. [यह कविता 'ढाल' नामक
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नयन-मर्यादा

ओ दूर-दूर रहने वाले! हमसे भी दो बातें कर लो. इतना दूर नहीं रहते जो मिलने में भी मुश्किल हो. मौन बहुत रहते हो, दूरी पहले से, ये चुप छोड़ो. कभी-कभी तो आते हैं, मिलते हैं. हमसे हँस बोलो. जितना आते पास तिहारे उतना नयन झुकाते हो. लज्जा है ये नहीं
टैग: मौन
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क्षमा करो

मुझ पर हैं दो नयन आपने तो पहले से चार किये. सोचा मैं भी चार करूँ लेकर तुझसे दो नयन पिये. चार नयन पाकर भी तुमने मेरे भी दो नयन लिये. नयनहीन होकर मैं अब कैसे पाउँगा देख पिये! दया करो मुझपर, मेरे दो नयन मुझे वापस कर दो. प्यासे तो पहले से हैं वे मर
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अभिनय

कर रहे चपल चख थिर अभिनय हैं बोल रहे द्वय विंशति वय.हो गयी हमारी, तुम बोलो — "क्या पीया आपने पावन पय."ना, नहीं अभी है संशयमय मम दशा, हलाहल अथवा पय मैं जान नहीं पाता सचमुच हैं कौन वस्तु जिससे हो जय. " 'बहुजन हिताय' विष अमृतमय 'है सुधा' वासनामयी सभय."— यह
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क्रोध

क्या हीन भाव आया मन में जो अपने से ही हुए रुष्ट.या नहीं मिला जो था मन में ये चिंता तुमको लगे पुष्ट. क्या क्रोध आपको है हम पर ये रेखाएँ  क्यूँ मस्तक पर. क्यूँ भृकुटी को है तान रखा क्या रक्त खोलता है हम पर. क्यूँ हुआ ताप तेरे मन में जो घृणित
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स्वसा-निवेदन

"स्वसा बहिन भगिनी बहना"भैया! मुझको कुछ तो कहना. बँधवा हाथों में लो भैया बहना का नेह निर्मित गहना. जब भ्रातृहीन कन्या से की जाती थी पापी की तुलना. ना बनूँ कहीं वैसी उपमा तुम छोडो ना मिलना-जुलना.क्यों भ्रातृहीन कन्या पहले समझी जाती थी भाग्यहीन. भ्राता
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वयसंधि [भेल]

यौवन शैशव का मिलन हुआ ये मिलन द्वंद्व के लिए हुआ यौवन घुसने को था तत्पर तन  में, शैशव से खेल जुआ. शैशव तो शैशव था बच्चावो द्यूत क्रीड़ में था कच्चा यौवन से सब कुछ हार रहा ये खेल कहीं होता सच्चा?यौवन ने शैशव के चंचल भावों को पग से चुरा लिया चुपचाप
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आपका विश्वास

चलो लो आ ही गया पास.आपको था इतना विश्वास—"कभी तो दो नयनों की बात समझ में आयेगी, बरसात हुवेगी, बोलेगी कोयल ह्रदय में फूटेगी कोंपल कामनाओं की, जिसमें से किरण झाँकेगी आशा की,मौनमयी मेरी भाषा की समझ आयेगी सारी बात आपका ह्रदय सारी रात करेगा मिलने की ही
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पलक-द्वार

मीन-लोचने! खींच रहा तुमको संगीत हमारा.बोलों की है डोर और भावों का कंटक-चारा.बीन बजाकर खर्च किया धन लय तानों का सारा.खोलो अब ये पलक-द्वार फँसने दो मीन हमारा.
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किसलिये?

किसलिये फूल के यौवन में कलिका का आता है पड़ाव?किसलिये धूल के मारग में चलती है मारुत पाँव-पाँव?किसलिये सूर्य ने छोड़ दिया क्रोधित होकर कर-पिय का कर?किसलिये गरम होती वसुधा निज पुत्रों पर, जो रहे विचर? किसलिये कपासी मेघों का नभ ने पहना है श्वेत-वसन? ढँकना
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श्रोतानुराग

कब बीता कविता का वितान ना तृप्त हुए मन और कान.था कैसा कविता का विमौनमैं देख रहा चुपचाप कौन आया उर में श्रोतानुराग जो छीन रहा मेरा विराग करपाश बाँध रंजित विशाल भावों का करता है शृंगार तुर चीर अमा का अन्धकार लाया उर में जो
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विपरीत से तुम सीध में आओ

विपरीत से तुम सीध में आओ.अरी! पीठ न तुम मुझको दिखाओ.मैं तुम्हें बिन देखकर पहचान लेता हूँ.कल्पना से मैं नयन का काम लेता हूँ.एक बार फिर कवि से आँख मिलाओ. अयि! मुझे तुम नेह का फिर गीत सुनाओ.कल्पना-विमान फिर से भेज देता हूँ."कंठ में आना" — तुम्हें सन्देश
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परिवर्तन है या पतन-परा?

मैं हूँ अपराधी बहुत बड़ामैं हूँ अपराधी बहुत बड़ा.निर्लज लज्जा लुटने को थी मैं देख रहा था खड़ा-खड़ा.आँखों में आँसू नहीं कहीं था उनमें इक आश्चर्य भरा.आ रही स्वयं लज्जा लुटने परिवर्तन है या पतन-परा?आँखें मरने को हैं तत्पर इक शील-भंग की घटना पर.जो रहीं अभी तक
Apr 27 2010 12:42 AM
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उडाओ ना समीर में रेत

अरी! तू सुन्दरता में छिपी, छ्लेगी कब तक ऐसे ही.कभी ना कभी दिखेगा रूप, आपका अन्दर वाला भी.करी तुमने मर्यादा भंग, किया छल अपनों के ही संग. छेड़खानी समीर के साथ करी तुमने होकर के नंग. केश उपमेय गगन की घटा, चली आई क्यों केश कटा. जिसे सहलाया करता पवन, उसे
Apr 24 2010 11:04 AM
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विषैला आलिंगन

श्वासों का हो गया समन्वय ह्रदय अनल के घेरे में हो ढूँढ रहा था शीतलता-आलंबन.अनिल दौड़ता होकर निर्भय गरम-गरम श्वासों का चलना जला रहा था ह्रदय का नंदन-वन.शीत्कार की ध्वनि, संकुचित भविष्य द्वार, होता पर-शोषित कसी जा रही थी बाँहों की जकड़न.संयम था
Apr 21 2010 11:48 PM
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कुम्भ का मेला

सभी स्वच्छ पथ उर के मेरे अब चलो आप निर्भय होकरसब तरफ आज घेरेंगी, पिय कष्टों की टोली 'हो'...'हो' कर.छिप गयीं आप क्यूँ घबराकर मेला है ये तो कुम्भ, मकर राशि में मिलने अब गुरु से आना चाहे है बस दिनकर.चख-बाण छोड़ दो तुम धनु से मन के तापों का हरण करोसब कष्ट
Apr 16 2010 12:45 AM
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स्वीकार

मुझसे तुम घृणा करो चाहे चाहे अपशब्द कहो जितनेमैं मौन रहूँ, स्वीकार करूँ.तुम दो जो तुमसे सके बने.मुझपर तो श्रद्धा बची शेष. बदले में करता वही पेश. छोडो अथवा स्वीकार करो.चाहे अपनत्व का करो लेश.
Apr 07 2010 11:06 AM
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मान्यताओं को बदलने का साहस मुझमें नहीं!

निद्रा — मेरा असमय आना द्वारपाल के लिए बुरा है. मेरा अधिक आना विद्यार्थी के लिए दोष है, ब्रह्मचर्य का नाशक है. मेरा कम आना रोगी के लिए दुःखदायक है. किन्तु, मेरा शैशव के प्रति स्नेह सभी को भाता है. क्यों? क्या मैं मात्र शिशुओं के प्रेम की अधिकारिणी हूँ?
Apr 06 2010 09:55 AM
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विचित्र बात

हे अज्ञातयौवना !मैं बन गया महात्मा. पर छूटते ही जा रहे, किस ओर से ये बाण हैं. कितनी विचित्र बात है, कितनी विचित्र बात है.इधर तुणीर रिक्त है.उस ओर का भी रिक्त है.पर क्या चला, किसको लगा और कब चला, किस पर चला?— यह पूछने की बात है.इसमें किसी का हाथ है.या
Apr 04 2010 07:04 AM
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नियोग

वर पञ्च शरों सह वनिता केउर अनल-अयन में घुसकर केनिज के प्राणों का दाँव लगातज पञ्चतत्व को सौंप गया.विधवा होकर कर सौंप जिसेदे, ऐसा कोई और मिलेदे-वर विधवा होने पर भीउत्तम-कुल का वर-बरात मिले.वह अग्रज हो वा अनुज भईया उत्तम कुल का इतर सही.उसको ही
Mar 31 2010 12:17 PM
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भ्रमर अध्ययन

कोकनद के अन्दर अलि नादकर रहा था, लेटा उपरागमृदुल शैया पर, संभवतया कोक विद्या पढ़ता था जाग.कामिनी कलियाँ किस-किस कालकाम के वश में हो शृंगारकिया करती, कलियों के पासहमारा कब होता अभिसार.मधुप क्योंकर हो जाते बंदकमल अन्तःपुर में हर रातसोचते  हैं
Mar 28 2010 10:49 AM
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अर्चना!

अर्चन करती आँखें तेरीसृजन करती कविता मेरी होवेगी नूतन उत्पत्तिमेरे ही हाथों से तेरी.नर्तन करती बाहें तेरीसुर देती आवाजें मेरीतुम ही हो मेरी संपत्तितुम ही हो मेरी कमजोरी.तुझमे मुझमे कितनी दूरीफिर भी मिलती श्वासें पूरीतुम बिन मिलकर मिल जाती होतुम हो किस
Mar 17 2010 12:57 PM
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सौंदर्य उपासना

उठ गयी आज जल्दी सजनी सब केश खुले से खुले बिखरे सो रही उसी पर थी रजनी.कर ग्रंथि केश मुख धोन चलीमद नयन भरे से भरे दिखतेधो रही शीत चख कुंद कली.(जब मैंने प्रातः उठने पर सौंदर्य को मुख धोते देखा)
Mar 14 2010 08:55 AM
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आगमन

संयम की प्रतिमा बन जाओ जितनी चाहे जड़ता खाओ आगमन हुवेगा जब उसका भूलोगे अ. आ. इ. ई. ओ. दृग फेर चाहे मुख पलटाओया निर्लज हो सम्मुख आओपहचान हुवेगी जब उसकीसूझेगा केवल वो ही वो.मन की बातें न झलकाओपीड़ा को मन में ही गाओ उदघाटित हो जाएगा जबहंसेगे सब हा. हा. हो.
Mar 13 2010 05:31 PM
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खोखली धारणा

जिसके अर्चन में दिवस रात रहती थीं निज आँखें सनाथ.जिसके आँचल में बैठ मुझे मिलता था ईहित प्यार-मात.जिसके दर्शन से नयन धन्य समझा करता खोले कपाट.जिसके चलने पर ऊंच-नीच पथ को करता था मैं सपाट.जिसके नर्तन पर कभी-कभी कवि उर में आ जाता भूचाल.कविता बेचारी इधर-उधर
Feb 22 2010 08:11 AM
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कपोल-लली

खिलने में हो लावण्य भंगदिखने में सबको लगे भली.पिय दर्शन से रतनार रंगहो जाता कनक-कपोल-लली*.नत नयन मंद मुस्कानों की अवगुंठन की कहलाति अली**.पुरषों के भ्रमर-लोचनों को लगती रसदार कपोल-कली.*कपोल-लली — लज्जा.**अली — सखी.
Feb 19 2010 07:21 AM
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ज्ञानोपनयन-3

आया बसंत पट हटा अरीचख चहक रहे "अब करो बरी"तुमने इनको कब कैद किया – है पूछ रही ऋतुराज-परी.क्यों दी इनको आजन्म कैद पिंजर खोलो, उल्लास भरो.त्राटक कर इनको रूप पुरादेना, नूतन उपचार करो.(स्वसा नूतन श्री को सादर समर्पित)
Feb 18 2010 06:56 AM
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ज्ञानोपनयन-2

"ज्ञानोपनयन देना मुझको "बोली – क्यों-क्यों-क्यों-क्यों-क्यों-क्यों."कुछ वस्तु  पुरातन देखन को "बोला मैंने उससे जब यों.वो मंद-मंद मुस्का बोली –"मैं समझ गयी तेरी बोली तुम गोल-मोल बातें करकेसूरत दिखलाते हो भोली"."तुम नहीं समझ पाए मुझको क्यों मांग रहा
Feb 16 2010 08:00 AM
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ज्ञानोपनयन-१

आर-पार दिखने वाले पर्दों को मुझसे हटा अरी.नयन-दीप जलते हैं पीछे जल जावेंगे करो घरी.मुझ नयनों के लिए एक ज्ञानोपनयन* ला करके दो.जिसे पहन हर वास्तु पुरातन नूतन-सी दिखती बस हो.(*ज्ञानोपनयन — चश्मा - ज्ञान का)प्रेरणा — ऋतुराज परी
Feb 15 2010 07:55 AM
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कहो कुछ बेशक आप नहीं

कहो कुछ बेशक आप नहीं इस जीवन की यही विषमता साफ़ कहो तो मिले विफलता हम तुमसे कुछ कहें —फेरते मुख को आप कहींकहो कुछ बेशक आप नहीं .छूट गया मिलना-जुलना सब पुनः मिलेंगे शायद न अबजितना तुमसे दूर चलूँ आ जाता लौट वहीँ कहो कुछ बेशक आप नहीं .धुरी आप मेरे चिंतन की
Feb 09 2010 07:12 AM
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3.33"

तीन दशमलव तीन-तीनइंचों की है मुस्कान छली.छले गए चख दोनों मेरे विनय-कथन हो गया बली.बली हो गए शब्द सभीअवरुद्ध हो गयी वाक् गली.जिव्हा पर जल रहीं चिताएं शब्दों की, अब ख़ाक भली.उर तक जाती अनल चिता की स्मृतियों की जब पवन चली.तीन तीन तैंतीस संचारी भावों में
Feb 09 2010 06:57 AM
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संभव नहीं

घन मेघ हों गर्जन न हो संभव नहीं. सौंदर्य हो यौवन न हो संभव नहीं. हृत पुष्प हो नवयौवना का जब खिलाअलि नाद हो मर्दन न हो संभव नहीं.चिर प्रेम हो प्रियतम न हो संभव नहीं.सुर ताल हो सरगम न हो संभव नहीं. जब हों बंधे नृत्यांगना पद में नूपुर संगीत हो नर्तन न हो
Jan 27 2010 10:08 AM