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राम कहानी

http://raamkahaani.blogspot.com/
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20 May 2010
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पौधकुमार के चाचा "शमी" को जानो

जब तक पौधकुमार अपना बढ़ा होगा, जब तक पटरीरानी  और रेलबाला किसी नयी दिशा में किसी नए अफ़साने को जन्म नहीं दे  लेंती तब तक हम वृक्ष-बिरादरी के कुछ प्रतिभाशाली पेड़ों से परिचय कर लेते हैं : हम आज केवल शमी को ही
 
प्रतुल कहानीवाला
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पौधकुमार का हैप्पी बरडे कब मनेगा?

एक बार रात में पौधकुमार की शोरगुल से नींद खुल गयी तो उन्होंने देखा कि सामने वाले फ्लैट्स नामी पेड़ की एक डाल पर चमाचम लाइटें जल रहीं थीं और बहुत सारे बच्चे वहाँ गाने-बजाने पर उछल-कूद कर रहे थे. पौधकुमार ने बराबर में खड़े शमी वृक्ष से पूछा — शमी चाचा, ये
 
प्रतुल कहानीवाला
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खेलगाँव के पिछवाड़े पौधकुमार का जन्म

पिछले साल की ही बात है, दिल्ली के अक्षरधाम के पिछवाड़े जो खेलगाँव बसने जा रहा है वहाँ पर, उसी भूमि पर एक पौधे का पुनर्जन्म हुआ. इस जन्म में उसे नीम की योनी प्राप्त हुई. आसपास के वृक्षों ने उसे खूब प्यार किया. उसके पालन-पोषण का दायित्व और शिक्षा का
 
प्रतुल कहानीवाला
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ज्योतिषी पंडित पीपल प्रसाद जी का रत्नज्ञान

एक गाँव में चौपाल के पास एक बहुत विशालकाय वृक्ष खडा था. नाम था पंडित पीपल प्रसाद जो कभी पुराने पेड़ों के बीच पंडित लाल धागे वाले के नाम से मशहूर हुआ करते थे. नयी पीढ़ी नयी सोच के लोगों में आज अपनी अहमियत कम होता देख पंडित जी ने फिर से
 
प्रतुल कहानीवाला
Apr 25 2010 10:03 AM
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पानी की गाड़ी

एक बार देश में बिजली का उत्पादन कम हुआ. सरकार ने पूरे देश में बिजली की भारी कटौती की. देश के प्रमुख बाँध भाखड़ानागल पर सरकार ने ध्यान नहीं दिया. बेचारे का जगह-जगह से पलस्तर उखड़ने लगा. दरारें पड़ने लगीं. क्योंकि वह अधिक बिजली पैदा करके नहीं दे रहा था
 
प्रतुल कहानीवाला
Apr 22 2010 10:48 AM
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जब जागो तभी सवेरा

जब तक प्रकृति की अन्य कहानियाँ जन्म लें तब तक मनुष्य समाज की सच्ची घटनाओं पर आधारित कहानियाँ सुनें — एक बड़े संत की एक बड़ी भक्तन थीं — बड़ी धार्मिक बड़ी कर्मकांडी. एक बड़े परिवार के मुखिया की मुखनी थीं. नाम था सूर्यमुखी. संत ने गुरुमंत्र देकर पूरे
 
प्रतुल कहानीवाला
Apr 16 2010 12:03 AM
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प्राकृतिक जीवन सहज है...

हिमालय पर एक संत रहते थे. प्रकृति से प्रेम था. वर्षों से विभिन्न विषयों पर शोध जारी था. नदी-नाले, पेड़-पौधे, पहाड़-झरने और जलचर-नभचर-थलचर के सभी जीवों के व्यवहारों का गूढता से निरीक्षण करना उनका रुचि का विषय था. जीवों के व्यवहारों पर चिंतन करते हुए
 
प्रतुल कहानीवाला
Apr 15 2010 10:23 AM
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बरगद शाखी

सड़क किनारे लगे बिजली के पोल ने निराश खड़े बिना नाम वाले पेड़ को कहा — "भैया, उदास क्यों हो! तुम भी बरगद की तरह आदम समाज में सम्मान पा सकते हो. इसके लिए तुम्हें एक रहस्य की बात बताता हूँ. समाज में ऐसे कई वृक्ष हैं जो महान होने और वरिष्ठता का ढ़ोंग करते
 
प्रतुल कहानीवाला
Apr 14 2010 09:23 AM
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तेल का कुआँ

डिगबोई प्रसाद एक तेल कुआँ था. प्रसाद जी हमेशा लबालब रहते. कोई 'तेल निकाल मजदूर'  उनके पास आता, बर्तन भरभर देते. प्रसाद जी का एक पाईपलाइन से गठबंधन हो चुका था. इससे वो बहुत खुश-खुश रहते. लेकिन गठबंधन के पहले वर्ष में ही लीकेज हुआ और
 
प्रतुल कहानीवाला
Apr 13 2010 12:34 PM
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कल्लोमाई को पहचानो

पटरी रानी की बात अब आगे... "इन गवर्नर साहब से अच्छी तो बस्ती की गलियाँ हैं जिनमें लगी घूरे की ढेरियाँ ऊपर ही दिख जाती हैं और रास्ता भी बनाए रखती हैं। वहाँ तो केवल मच्छर पनपते हैं जो बीमारी फैलाते हैं लेकिन इन पढ़े लिखे सभ्य शहरी मार्गों ने तो पर्यावरण को
 
प्रतुल कहानीवाला
Apr 10 2010 10:44 PM
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हमारी आवाज सुनले बेटा!

http://chitthajagat.in/अब आगे...रेलबाला जब आगे बढती है तभी उसे अपनी ओर २५-२६ साल का एक युवक आता दिखाई देता है. युवक रेलबाला पर आकर लेट गया और तनाव में काफी देर तक बडबडाता रहा. चेहरे से परेशान दिखने वाला युवक आँसू बहाता रहा. तब रेलबाला ने कहा —
 
प्रतुल कहानीवाला
Apr 10 2010 12:15 AM
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रिक्शा क़ानून क्यों तोड़ता है...

अब आगे...जब वे दोनों फाटक प्रहरियों के पास से गुजरीं जहाँ उन्हें गले मिलती एक सड़क ने रोका. दोनों फाटक प्रहरी अपने दोनों ओर गाड़ियों को रोके खड़े थे. लेकिन कुछ कार वाले अपने आगे खड़े रिक्शे वालों को बुराभला कहते धमका रहे थे. रेलबाला ने एक कार में
 
प्रतुल कहानीवाला
Apr 07 2010 01:02 PM
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तेजू भाई से मुलाक़ात

अब आगे ...रास्ते में ओवरब्रिज, पुलिया नदी-नाले तो कई मिले लेकिन उन्हें तो दिल्ली के एक घमंडी ओवरब्रिज से मिलना था। दिल्ली शहर में घुसीं और तब देखे उन्होंने मेट्रो दीक्षित के जलवे और ओवर ब्रिजों का नज़ारा।रेलबाला ने पटरीरानी को उस ओवरब्रिज से मिलवाया।
 
प्रतुल कहानीवाला
Apr 01 2010 03:25 PM
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लोहे की सड़क

एक गाँव के किनारे गेहूँ और धान के खेतों से होती हुई दो लम्बी लोहे की सड़क जाती थीं। एक का नाम था — पटरीरानी, दूसरी का नाम था — रेलबाला। उन दोनों सड़कों पर प्रतिदिन कई गाड़ियां आती-जाती थीं। गाड़ियां जब भी उन सड़कों पर आतीं, तो भागती चली जातीं।एक बार
 
प्रतुल कहानीवाला
Mar 31 2010 03:07 PM
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दो शब्द

प्रारम्भ से ही मेरी इच्छा कम बोलने वाले और चुपचाप रहने वाले साथियों से संवाद की रही। धीरे-धीरे यही इच्छा संकोचवश कविता लेखन के दौरान काल्पनिक कथोपकथन के रूप में विकसित हो चली। इसके बाद अर्थोपार्जन के समय व्यावसायिक अनवरतता न रहने से, रुचि व योग्यतानुरूप
 
प्रतुल कहानीवाला
Mar 27 2010 10:29 AM