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05 Jun 2010
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सब मन को भाया ‘टूरा रिक्शावाला’

किसी भी प्रदेश या देश के विकास में कला और संस्कृति का बहुत अहम योगदान होता है। फ़िल्में इसका आयना होती हैं और कुछ इसी की छाया मिली इस शुक्रवार(04 मई, 2010) को रिलीज़ हुई सतीश जैन निर्देशित छत्तीसगढी फिल्म ‘टूरा रिक्शावाला’ में। फ़िल्म की किसी भी आम मुंबईया
 
रवीन्द्र गोयल्
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सब मन भाया ‘टूरा रिक्शावाला’

किसी भी प्रदेश या देश के विकास में कला और संस्कृति का बहुत अहम योगदान होता है। फ़िल्में इसका आयना होती हैं और कुछ इसी की छाया मिली इस शुक्रवार(04 मई, 2010) को रिलीज़ हुई सतीश जैन निर्देशित छत्तीसगढी फिल्म ‘टूरा रिक्शावाला’ में। फ़िल्म की कहानी किसी भी आम
 
रवीन्द्र गोयल
Jun 04 2010 12:26 PM
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हिचक क्यों है ?

वर्ष 2011 की जनगणना शुरू हो चुकी है। लाखों सरकारी कर्मचारियों को इस मुहिम में लगाया गया है। लोग घर-घर जाकर आवश्यक जानकारी इकट्ठा कर रहे हैं। सभी को एक सीमित लक्ष्य दिया गया है और एक निश्चित समय में उन्हें अपना यह लक्ष्य पाना है। सरल शब्दों में कहें तो एक
 
रवीन्द्र गोयल्
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ये क्या हो रहा है ?

आज अचानक मेरा ब्लाग दिखना बंद हो गया .... फिर अचानक एक बार दिखा तो उसमें से सभी तस्वीरें गायब थी .... क्या कोई बताएगा कि ये क्या है और क्यों हो रहा है ? क्यों एक सरकार की तरह एक आम आदमी की आवाज़ दबाई जा रही है, जबकि हमारी तो किसी से कोई लडाई भी नहीं है .
 
रवीन्द्र गोयल्
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मेरा क्या कसूर ?

हक़ की हुंकार लगाते हैंहक़ का जो शोर मचाते हैंवे ज़ोर-ज़ोर चिल्लाते हैंउन मासूमों को, निर्दोषों को जन-जन को मारे जाते हैंजिन आदिवासी और दलित वर्ग के अधिकारों का युद्ध बतलाते हैंकभी उनके घर ये जाते हैं ?उन अबलाओं की, मासूमों की आंखों के निश्छल आंसूक्या इनके
 
रवीन्द्र गोयल्
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छत्तीसगढ़ फिल्म इंडस्ट्री

छत्तीसगढ फिल्म इंडस्ट्री की दशा और दिशा ? इस पर आप क्या और कितना जानते हैं ? कृपया लिखें
 
रवीन्द्र गोयल्
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मां ! तुझसा नहीं कोई रिश्ता

लो एक बार फिर से आ गया मां-दिवस एक बार फिर से सुबह सुबह दी मुबारक़बाद उन्हें फ़ोन पर और बताया, आज है मां का दिन यानि मां-दिवसजानती तो नहीं कब और क्यों शुरू हुआ ये दिन जानती बस इतना हूं, है अधूरा हर दिन, तुम बिन दूर हूं, पर तुम हो दिल में हर पल-छिन है दुआ,
 
रवीन्द्र गोयल्
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पोल खोल

आजकल आए दिन ख़बरें सुनने को मिलती हैं कि फलां जगह फलां महात्मा, साधु, संत या फ़कीर यह करते पकडा गया, सेक्स कांड का खुलासा, इतनी संपत्ति और इतने घोटालों में सांठ-ग़ांठ। आखिर देश की भोली भाली जनता की भावनाओं से खिलवाड करने वाले ऐसे लोगों को कैसे समाज से खदेडा
 
रवीन्द्र गोयल्
May 04 2010 10:01 AM
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कुछ कहें तो . . .

कृपया बतलाएं आखिर क्या है यह ग्लोबल वार्मिंग और कौन है इसका ज़िम्मेदार ? शायद आप ही हमें समझा पाएं ताकि हम उस कबूतर को कम से कम इस भारी भरकम शब्द का आसान सा मतलब बतला सकें। उसे उसकी भाषा में समझा सकें कि भईया यह होती है ग्लोबल वार्मिंगा और तुम इस तरह
 
रवीन्द्र गोयल्
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ग्लोबल वार्मिंग

पत्ते सूखे जाते हैं बादल ना अब गरजाते हैं बेटी की शादी, मुन्ने की पढाई घर का खर्चा, गेहूं की पिसाई पेट्रोल की क़ीमत, छत पे दीमकजेबें खाली, हर चीज़ की किल्लत परेशान सब नज़र आते हैं इतने पर भी हंसते गाते बिज़लरी की बोतल लिए हाथ मेंबडी बडी गाडी से उतरकर
 
रवीन्द्र गोयल्
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ज़िम्मेदार कौन . . . ?

ये बसों और ट्रकों के हार्नये लाउड स्पीकर का शोरये रिश्तों की खटपट मशीनों का शोरजल में घुलता ये ज़हरसांसों में समाता ये ज़हरकानों को चीरता ये शोरतबाही का इंतज़ार न करेंस्वच्छ वातावरण की ज़िम्मेदारी हम सब की है
 
रवीन्द्र गोयल्
May 02 2010 03:40 PM
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परी कथा

परियों के देश की वो कहानी भी ख़ूब थीजिसमें थी एक परी, नाज़ों-नखरे में पलीहाथ में जादू की छड़ी, बदलने दुनिया को चलीपर क्या जादू सच्चा होता हैऐसा सपना क्या हक़ीकत होता है। नहीं ना !पर मैने देखी है एक परीजो इस दुनिया की हक़ीकत में है पलीफिर भी रहती है
 
रवीन्द्र गोयल्
Apr 29 2010 10:50 AM
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मां

मांवो नाम जो हर बच्चे की ज़ुबां पर सबसे पहले आता है या कहें वो इंसान जो बच्चे को जीने का मतलब समझाता हैमां, बच्चे को दुनिया में आने का मौक़ा देती हैदेती हैं सांसे, धडकन और एक अहसासअहसास उसके होने काउसके वजूद कारखती है ख़्याल उसकी हर ज़रूरतहर सपने का बिना
 
रवीन्द्र गोयल्
Apr 28 2010 10:42 AM
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तुम थी . . .

कभी देखा है ?बादल को जाते, पानी की तलाश मेंसहरा को तड़पते, गर्मी की आस मेवृक्ष को खड़े, मुसाफिर की राह मेंया फिर मंजिल से दूरकिसी मोड़ पर खड़े राहगीर कोएक साथी की तलाश मेंसभी हैं इंतज़ार में, एक हमसफ़र कीजो साथ चले , चलता जाएऔर दूर क्षितिज को पा जाएहम भी
 
रवीन्द्र गोयल्
Apr 28 2010 10:41 AM
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चला जा रहा था

चला जा रहा थाज़िन्दगी की इस दौड मेंचिलचिलाती धूप मेंबेरंग और बेरूप मैं बस चला ही तो जा रहा था तभी नज़र आई उमडती हुई सी सावन की बदलीकभी चमकतीकभी फडकतीपल-पल दमकती जैसे हो बिजली घटाओं के पीछे हवाएं कह रही हैं सुकूं अब मिलेगा उम्मीद दे रही हैं कल की खुशियां कल
 
रवीन्द्र गोयल्
Apr 28 2010 10:40 AM
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गुडियों सी

दिखती हो तुम गुडियों सी पग थिरकाते प्यानों पर हाथों में पंखा पकडेकुछ जापानी गुडियों सीदिखती हो तुम गुडियों सीआंखों से जादू बिखरातीमुझको अपने पास बुलातीलाल गुलाबी पंख दिखाती उन सतरंगी परियों सीदिखती हो तुम गुडियों सीजब मैं बैठा रात निहारूंचांद को देखूं
 
रवीन्द्र गोयल्
Apr 28 2010 10:39 AM
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पाखी

जब नदी किनारे बैठा कोईअंतर्मन को खोजे फंसा कोई हो अंतर्द्वन्द में, राह ना कोई सूझे तने भवें, चेहरा गुस्से से लाल तमतमा जाएमुट्ठी भींचे, दांत पीसकरसूरज को घूरे जाएजब हो हताश, वो हो निराश और दिल घबरा जाए वो हो बेचैन, मन व्याकुल हो पर राह नज़र ना आएतब चुपके
 
रवीन्द्र गोयल्
Apr 28 2010 10:37 AM
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मानवता सिखलाएं

बिल्ली कहती म्याऊँ-म्याऊँरुक जा चूहे अब मैं आऊँतुझको मैं खा जाऊँगी अपनी भूख मिटाऊँगीफिर जल्दी से पेड़ पे चढ़केचुपके से सो जाऊँगीचूहा बोला बिल्ली मौसीतुम तो कितनी प्यारी होहमको खाकर क्या पाओगीतुम तो राजदुलारी होहमें मारकर पछताओगीवापस घर कैसे जाओगीजिस राह से
 
रवीन्द्र गोयल्
Apr 28 2010 10:35 AM
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रंग

जिंदगी है एक कैनवाससपने हैं रंगख्वाहिशों की ऊंचाईयांहक़ीकत की जंगबहुत हंसी है हर पलक्योंकि तुम हो मेरे संगतुम सांसों में, तुम धड़कन मेंतुम आंखों में, तुम ही मन मेंतुम सुबह में, तुम शामों मेंतुम बातों मे, तुम रातों मेंतुम ही तो हो जज्बातों में, तुम गीत हो,
 
रवीन्द्र गोयल्
Apr 28 2010 10:34 AM
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फुलकारी

हर वक्त मुनासिब होता हैमंज़र मनमाफ़िक होता हैबढ़ने वाले कब रुकते हैंमुश्किल जीवन का सौदा हैसुख पल दो पल का धोखा हैजो उठता है और लडता है ये वक्त उसी का होता हैलक्ष्य वही हासिल करता हैजो पहला कदम बढ़ता हैडरपोक किनारे रहता हैतैराक नदी तर जाता हैदिल बाग-बाग हो
 
रवीन्द्र गोयल्
Apr 28 2010 10:33 AM
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अर्ज़ है . . .

बस इतनी अर्ज़ हमारी है!ज़हनों से हटे झुर्री ना सही पर मन तो बच्चा हो जाए जंगल पे नहीं दावा हमको इक पेड तो सच्चा हो जाए ये सोच के नाटक करते हैंशायद कुछ अच्छा हो जाए अब चेहरा बदलो या शीशाये आपकी ज़िम्मेदारी हैअच्छा सोचो, अच्छा बोलोबस इतनी अर्ज़ हमारी है।
 
रवीन्द्र गोयल्
Apr 14 2010 04:34 PM