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रतन चंद 'रत्नेश'

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17 Jun 2010
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एक मित्र अनंत महादेवन द्वारा निर्देशित -- RED ALERT

आज से लगभग तीस वर्ष पूर्व मैं प0 बंगाल में जहां रहता था,  एक बार वहां से लगभग 30 कि.मी. दूर एक फिल्म देखने गया था---- गोविंद निहलाणी और नसीरूद्दीन शाह -ओमपुरी अभिनीत ‘आक्रोश’। इस फिल्म को देखने वहां एक ऐसा शख्स आया था जो फिल्म शुरू होने तक एक वाक्य
 
रतन चंद रत्नेश
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कविता- पेड़ से गिरे पत्ते

पेड़ पर सेजहाँ-जहाँ से गिरे थे पत्तेपतझड़  मेंवहाँ-वहाँ फूटती कोपलों से झाँक रहें हैं नन्हें -नन्हें कोमल चिकने पात ...पत्ते जो झडकर  गिरे थे पसरे थे धरती पर दूर-दूर तक कुछ जले, कुछ मिट्टी में दफ़न हुए न वे हिंदू थे, न मुसलमानफिर भी इसी मिट्टी में
 
रतन चंद रत्नेश
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चीनी लघु कथा- परस्पर सहयोग

श्रीमान ई पिछले कई वर्षों से साहित्य की दुनिया में संघर्षशील थे, पर आज तक उन्हें कोई प्रसिद्दि नहीं मिली। उन्होंने अपने सारे सम्पर्कों का लाभ उठाया, फ़िर भी शोहरत नहीं मिल पायी। एक दिन उनकी मुलाकात प्रसि्द्दआलोचक च्यांग से हुई। उन्होंने च्यांग महोदय को
 
रतन चंद रत्नेश
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Jagjit-Chitra

 
रतन चंद रत्नेश
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लघुकथा - बेबसी

अंतत: दोनों भाइयों ने बस में पांच सीटें  बुक कराई! सबसे पीछे की । दो अपने लिए और तीन मां ·के लिए। मां बहुत बीमार थी। वह लेट कर ही वापस गांव  जा सकती थी। डॉक्टरों ने जवाब दे दिया था और साथ ही यह भी कहा कि  घर पर ही जितनी सेवा हो सकती है,
 
रतन चंद रत्नेश
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लिखे हुए शब्द

लिखे हुए शब्दों का कोई अर्थ नहींअगर वे सिगरेट कीआखरी कश की तरहजमीन पर फेंककरपांव से कुचल दिए जायें।लिखे हुए शब्दों की ताकतऐसी हो कि बुझता हुआ दीयाफिर से सुलग जायअन्याय सहते किसी व्यक्ति के साथन्याय हो जायया जी जाय फिर से कोई मरता हुआ
 
रतन चंद रत्नेश
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May 23 2010 01:21 AM
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लुटेरे

लुटेरे   हम दोनों ने अपनी-अपनी पत्नियों और बच्चों को होटल में ही रहने दिया और समुद्र के किनारे आ गए। दूर-दूर तक फैला समुद्र का अनंत विस्तार। शहर की भागदौड़ भरी व्यस्त दुनिया से जुदा यह सुकून की दुनिया थी और पिछले एक सप्ताह से हम यहां के एक होटल में
 
रतन चंद रत्नेश
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कहानी- वह चली गई तो..

घर के तीनों कमरे में बारी-बारी से जाकर वे फिर से अपने पढने की मेज-कुर्सी पर लौट आए। उनके चेहरे पर झल्लाहट साफ नजर आ रही थी। छत पर पंखा मद्धम गति से घूम रहा था। उन्होंने अपनी गर्दन उठाकर एक उचटती निगाह उस पर डाली और मेज पर औंधी रखी किताब को पलटकर फिर से
 
रतन चंद रत्नेश
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Shishu-geet

ि’ा’ाु-गीतमेले से लेकर आइमुन्नी एक गुड़िया रात होते ही जोबन जाती थी बुढ़िया।हमने पूछा मुन्नी सेबुढ़िया कैसे बनती गुड़ियाकहने लगी खिलाती इसकोमैं जादू की पुड़िया।
 
रतन चंद रत्नेश
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लघुकथा- समस्या

गाँव में जाने पर सारी दिनचर्या बदल जाती है। समय से बँधे रहने के सिलसिले में भी पूर्णविराम–सा लग जाता है। न कोई आपाधापी और न कोई तनाव। यहाँ तक कि दुनिया में कहाँ क्या हो रहा है, यह जानने की भी चिन्ता नही सताती। न ही समाचारपत्रों को नियम से देखने का चाव
 
रतन चंद रत्नेश
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लघुकथा- दर्द

अभी–अभी इंटरव्यू देकर वह एक दफ्तर से निकला था। इंटरव्यू तो इस बार भी अच्छा हुआ था पर....?इसके पूर्व भी उसके कई इंटरव्यू अच्छे हुए थे पर नौकरी अभी तक हासिल नहीं कर पाया था।थका–थका–सा वह बस–स्टैंड की ओर बढ़ रहा था। भूख भी जोरों की लग आयी थी। सोचा, घर शीघ्र
 
रतन चंद रत्नेश
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लघुकथा- ठीक हैं हम

‘‘ट्रिंग.... ट्रिंग’’फोन की घंटी घनघनाई। मालती वर्मा ने कुर्सी से उठकर अपने घुटनों की मर्मांतक पीड़ा से उबरने काप्रयास किया। फिर धीरे–धीरे चलकर चोगे तक पहुँचीं।दूसरे सिरे पर दूर शहर से उनकी हमउम्र शीला थी। दोनों अब पैंसठ की उम्र तक जा पहुँची हैं।‘‘और
 
रतन चंद रत्नेश
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आजादी

बाप–बेटे शहर के चौराहे पर खड़े थे। सामने से एक मौन जुलूस जा रहा था, हाथ में बैनर–पोस्टर थामे।भावशून्य पिता जुलूस के गुजरने की प्रतीक्षा कर रहा था, पर पाँच वर्ष के अबोध बच्चे के बालसुलभ मन में पश्न कुलबुलाने लगे थे। उसने उत्सुकता से पूछा––‘‘पापा, ये लोग
 
रतन चंद रत्नेश
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हिमाचल का लघुकथा संसार

लघुकथा आज हाशिये से निकलकर साहित्य की एक सशक्त विधा के रूप में दर्जहोने के बावजूद विसंगति यह देखने में आ रही है कि इसे अंतरंगता में समझने में अभी भी की हो रही हैं।अंग्रेजी में जहां हिन्दी की कहानी विधा को ‘शार्ट स्टोरी’ कहा जाता है वहीं की लोग लघुकथा
 
प्रकाश बादल
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... बस थोड़ा इंतज़ार और !

इस ब्लॉग के निर्माण का काम चल रहा है! रतन चंद 'रत्नेश' जी के प्रशंसक कृपया धैर्य से काम लें। मैं खुद भी रतन भाई की रचनाएँ पाठकों तक पहुँचाने के लिए उत्सुक हूँ। मेरी व्यस्तताएँ मुझे कई बार बाधित कर चुकी हैं उम्मीद है कि एकाध दिनों में ब्लॉग आपको समर्पित
 
प्रकाश बादल
Apr 23 2010 09:03 PM