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13 Jun 2010
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अलविदा दोस्तों,.......... :(

अलविदा दोस्तों ,,,किसी आवश्यक कारण से आपसे दूर जाना पड़ रहा है ,,,जल्द ही लौटूंगा .... :(
 
राजेन्द्र मीणा
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दोमट पर पहली छिड़कन से !

सावन की रिमझिम बरखा ने, बिजली कोई गिराई है, जल की बूंद पड़ी उस तन पर, आँच यहाँ तक आई है। रवि तप से सुलगी वसुधा, आज भस्म है नवयौवन से, दोमट पर पहली छिड़कन से, कुछ जलने की बू छाई है।स्वधा की परतों को छुआ जो, सुर्ख लाल तप्त अधरों ने, अम्बु की शीतलता झुलसी,
 
राजेन्द्र मीणा
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जितना गाओ घिंसता जाये जीवन का धुंधला संगीत।

***** जात-पात में धुलकर आयी ढोंगी जग की जीवन-रीत,मनु बड़ा या धर्म बड़ा, या सब से बड़ी मन प्रीत।।लाख करो हठ बंध ना पाये धन भंगुर का राग-मल्हार,जितना गाओ घिंसता जाये जीवन का धुंधला संगीत।कर्म से ओछेपन को ढक लो,गीली-मिट्टी गार सांधकर,बौनेपन से ढक ना पाये,
 
राजेन्द्र मीणा
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गर्द जमी पलकों को रक्त से, मार पंछाटे धो लो !! शव जलाकर हिंद शान का , कैसे कह दूँ सो लो !!!.............{{{कविता }}}

मौन ओढ़ कर सोये भारती, अब तो आँखें खोलो,पाव बची हिन्दता गल्ले में, बांट लगाकर तोलो। गर्द जमी पलकों को रक्त से, मार पंछाटे धो लो,शव जलाकर हिंद शान का , कैसे कह दूँ सो लो।बजरंग पूछ सा बढ़ा जा रहा, झूंठी आजादी का कष्ट,एड़ी से चोटी तक सारी, जन-सरकार व्यवस्था
 
राजेन्द्र मीणा
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मुर्ख प्राणी किसान तू कब सुधरेगा, दो बूंद पसीने से क्या सारा खेत भरेगा..........(कविता}

विक्षिप्त प्राणी किसान तू कब सुधरेगा,दो बूंद पसीने से क्या सारा खेत भरेगा।कभी वो चीखते हुए बैलों को हांकता,कभी खुद रूककर हल पकड़े हांफता,कभी छाती पर हाथ रख धीरे से खांसता,उदर रोग से बीमार मनुष्य बेमौत मरेगा।विक्षिप्त प्राणी किसान तू कब सुधरेगा,दो बूंद
 
राजेन्द्र मीणा
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मुझे गर्व है की मैं भिखारी हूँ, कोई नेता या अफसर नहीं (कविता)

मैं मंदिर की सीढ़ी पर बैठा एक भिखारी,जिसे दुत्कारती ये दुनिया सारी, हर बन्दे में ईश्वर को मानता हूँ, आज खुदा से ये जवाब मांगता हूँ।सुना है तेरा घर है बड़ा सा तू यही रहता है,ये मैं भिखारी नहीं सारा जमाना कहता है,मेरा मैला कमजोर शरीर भी धूप सहता है,इन नीली
 
राजेन्द्र मीणा
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लड़की बिक गयी, इज्ज़त का पता नहीं , हाँ, इंसानियत तो लुट गयी।

उसकी की माँ की बिमारी को आज पन्द्रहवा दिन था ,पिता नाम का शख्श महीनो से शराब में डूबा मग्न था,बेटा पैदा ना करने की बदला बीस साल औरत से लेता रहा ,बेटी के जन्म के गुनाह की सजा माँ को आज तक देता रहा ।बेटी उस आदमी को ऐसा करते देख बेटा होने की कल्पना करती
 
राजेन्द्र मीणा
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काश ! हम इतने बड़े ना होते , हमें ये अहंकार विरासत में ना मिले होते

सांझ ढले , वक़्त से वक़्त मिले , दो अबोध बालक घर से चले , कुछ दूर जाकर दोनों मिले , सुन्दर सी जगह ढूंढ़ ,खेलने लगे । बहुत ही मनमोहक उनका खेल हो रहा था ,खेल के बहाने मित्रता का मेल हो रहा था । खेलते - खलेते कुछ ही वक़्त गुज़रा , तभी एक बालक बिंगड़ा
 
राजेन्द्र मीणा
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ईश्वर की अदभुत कृति 'माँ' पर रचित एक रचना - माँ की चाह : ह्रदय छू लेने वाली एक मर्मस्पर्शी कविता - हर माँ को समर्पित

यह कविता अभी कुछ दिनों पहले पोस्ट की थी परन्तु 'मदर्स डे' पर इसे एक बार फिर पेश कर रहा हूँ ...उम्मीद है आपको पसंद आएगीआज फिर वही स्वप्न आया , खुद को कुछ सुनता हुआ पाया ,माँ ने बहुत कुछ कहना चाहा , पर मैं पत्थर बन खड़ा रहा ,नींद खुली तो कुछ समझ आया ,माँ को
 
राजेन्द्र मीणा
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माँ की चाह : ह्रदय छू लेने वाली एक मर्मस्पर्शी कविता - हर माँ को समर्पित

आज फिर वही स्वप्न आया , खुद को कुछ सुनता हुआ पाया ,माँ ने बहुत कुछ कहना चाहा , पर मैं पत्थर बन खड़ा रहा ,नींद खुली तो कुछ समझ आया ,माँ को नहीं बस खुद को पाया ,दोपहर की पहली डाक से माँ की बिमारी का तार आया ।अब तक खुद को समझाता रहा ,पर आज कोई बहाना ढूंढ़ ना
 
राजेन्द्र मीणा 'नटखट'
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वो कहते है अश्क पीना मुमकिन नहीं

वो कहते है अश्क पीना मुमकिन नहीं दुनिया में ,हम तो कम्बखत जिन्दा है उसी से ।वो कहते है की हमें भुला दिया गया बुरे वक़्त की तरह ,हमें तो याद कुछ नहीं सिवा उनके ।वो कहते है की हम बदनाम हो चुके हर गली में ,हम तो कब से तरसते थे इस नाम को।वो कहते है की हमारी
 
राजेन्द्र मीणा 'नटखट'
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हे भगवान् ! मेरा चिट्ठा चोरी करा दे सवा रुपये का प्रसाद चढाऊंगा

अभी हाल की ही बात हैं , सप्ताह भर पहले हमने ' श्रद्धा जैन' जी की एक पोस्ट पढ़ी । उनकी कुछ गज़लें चोरी हुई । हमें पढ़कर बहुत अफ़सोस हुआ ....चोरी करने वालो को कुछ हसीन टिप्पणिया भी की ...चोर ने भी आभार व्यक्त किया ...वैसे कुछ भी लिखो..... टिप्पणिया तो मिलती
 
राजेन्द्र मीणा 'नटखट'
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वो कुमकुम बिंदी

आज भी लटका है तेरा दुपट्टा खूंटी पर किसी अमिट निशानी की तरह,तेरी लाल चूड़ियों के कुछ टुकड़े मेरे पैरों में चुभते है बीती ख़ुशी की तरह।लगता है जैसे छिटकती हो तेरे रूप की चाँदनी इस घर के आँगन में,आज भी खिलखिलाते है गुलमोहर के फूल छत पर पड़े तेरी हँसी के
 
राजेन्द्र मीणा
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एक अनंत सत्य की तरह

आज भी है नवनिर्मित कुछ नित्य की तरह ,बस वही सुबह , एक अनंत सत्य की तरह ।उकास का कारवां चला आ रहा है ,स्वप्न खग के परों को कुतरते हुए ।आसमां का रंग स्याह हो गया है ,भोर ने जकड़ ली है ,बाहें धुंध की ।समय की लय अनवरत कर रही है ,हवा से मिलकर गुबार की साजिश
 
राजेन्द्र मीणा
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एक अनंत सत्य की तरह

आज भी है नव निर्मित कुछ नित्य की तरह ,बस वही सुबह ,एक अनंत सत्य की तरह ।उकास का कारवां चला आ रहा है ,स्वप्न खग के परों को कुतरते हुए ।आसमां का रंग स्याह हो गया है ,भोर ने जकड़ ली है ,बाहें धुंध की ।समय की लय अनवरत कर रही है ,हवा से मिलकर गुबार की साजिश
 
राजेन्द्र मीणा
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इतनी गर्मी है की एक शब्द भी लिखा नहीं जाता

इतनी गर्मी है की एक शब्द भी लिखा नहीं जाता ,यहाँ तक की कंप्यूटर के सामने नहीं बैठा तक जाता ,ऊपर से रूम में पंखा तक नहीं ......कल लिखूंगा आज बड़ी नींद आ रही है ,,,,शुभरात्रि
 
राजेन्द्र मीणा
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झड़ की टोकरी !

मन को झिंझोड़कर हम भी कवि हो गए ,ढूंढ़कर प्रकाशकण हम भी रवि हो गए ।तोड़ कर रख दिया शब्द के दंभ को ,जोड़ कर रख दिया उस स्वप्न छिन्न को ,मोड़ कर रख दिया भय की तरंग को ,मारकर एक कलंक हम शिकारी हो गए ।काट कर रख दिया टूट चुके तान को ,छाँट कर रख दिया नम रेत से
 
राजेन्द्र मीणा
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ईश्वर दारु के ठेके पर रहता है.? .

वैसे देखा जाए तो चुटकुले हमें हँसाने का ही काम करते है ..जब कभी चेहरे पर उदासी हो ..तो एक बढ़िया चुटकुला पढ़ लो ,या सुन लो चहरे पर मुस्कान जरूर आती है। हमने किसी के मुहं से कभी सुना था की चुटकुले साहित्य की नाजायज़ औलादें है । पर कभी ये नाजायज़ औलादें बड़ी
 
राजेन्द्र मीणा
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"सरकार का बाप भी आ जाए ,टाइगरो को मरना ही होगा"

" हेल्लों सर्किट , मैं मुन्ना बोलरेला हूँ ""हाँ भाई ,बोलो कायको फ़ोन किया "?" वो टाइगर है ना .............?"ठोकना है भाई उसको ...?, अब्बी... गाडी निकलता हूँ ""अरे ! पूरी बात ...बकने तो दे , टोनी टाइगर नहीं रे ......, सच्ची वाला टाइगर ...जो जंगल में होता
 
राजेन्द्र मीणा
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इस देश का प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह ,नंबर वन चोर है।

किसी जरूरी काम से गाँव जाना था , आनन्-फानन कार्यक्रम बना ,तो आरक्षण भी नहीं करवा पाए । वैसे आरक्षण का मतलब ये नहीं की हम सामान्य कोच में सफ़र करने से डरते हैं , वो तो हम किसी और कारण से ऐसा करते है , जो आपको जल्द ही ज्ञात हो जाएगा । उलटे सामान्य डिब्बे
 
राजेन्द्र मीणा
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ये तीन शब्द

जब भी खोलता हूँ जीवन के, शब्दकोष को ,ये तीन शब्द ' कहाँ ,क्यों, कैसे ' मुहं फाड़कर चले आते हैं ।जब भी बोलता हूँ समय से ,जीवन है यहीं ,ये तीन शब्द ' कहाँ ,क्यों ,कैसे ' यूँ दौड़कर चले आते है ।जब भी तोलता हूँ स्यंव को ,सत्य की तुला से ,ये तीन शब्द ' कहाँ
 
राजेन्द्र मीणा
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भाभी तेरे इस भोले चेहरे में , मेरी माँ का चेहरा दिखता है।

मैं दिल्ली में जहाँ रहता हूँ , उसी मकान में मेरे नीचे वाली मंजिल पर एक परिवार रहता है, बहुत सभ्य लोग है , उन्ही में से एक है , ' गीता भाभी ' ...बहुत ही सुन्दर और सुशील औरत है। इतनी गरमी के दिनों में भी मेरे पास पंखा नहीं है ..इसलिए जब देखो पंखा लाने को
 
राजेन्द्र मीणा
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"सरकार का बाप भी आ जाए , टाइगर को मरना ही होगा"

" हेल्लों सर्किट , मैं मुन्ना बोलरेला हूँ ""हाँ भाई ,बोलो कायको फ़ोन किया "?" वो टाइगर है ना .............?"ठोकना है भाई उसको ...?, अब्बी... गाडी निकलता हूँ ""अरे ! पूरी बात ...बकने तो दे , टोनी टाइगर नहीं रे ......, सच्ची वाला टाइगर ...जो जंगल में होता
 
राजेन्द्र मीणा
Apr 16 2010 02:29 AM
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झड़ की टोकरी

मन को झिंझोड़कर हम भी कवि हो गए ,ढूंढ़कर प्रकाशकण हम भी रवि हो गए ।तोड़ कर रख दिया शब्द के दंभ को ,जोड़ कर रख दिया उस स्वप्न छिन्न को ,मोड़ कर रख दिया भय की तरंग को ,मारकर एक कलंक हम शिकारी हो गए ।काट कर रख दिया टूट चुके तान को ,छाँट कर रख दिया नम रेत से
 
राजेन्द्र मीणा
Apr 15 2010 03:48 PM
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चाँद कैसा लगता है ?

एक दिन मैं छत पर आया ,चाँद को चमकता हुआ पाया ,अचानक मेरे जहन में ये सवाल कौन्धां,ये चाँद कैसा लगता है ?ढूँढा तो बहुत कुछ पाया।बच्चा "मामा जैसा लगता है "शायर "शायरी जैसा लगता है"कवि "कल्पना जैसा लगता है "विद्यार्थी "पृथ्वी जैसा लगता है"चकोर "महबूब जैसा
 
राजेन्द्र मीणा
Apr 14 2010 10:30 PM
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ईश्वर कहाँ रहता है ?

वैसे देखा जाए तो चुटकुले हमें हँसाने का ही काम करते है ..जब कभी चेहरे पर उदासी हो ..तो एक बढ़िया चुटकुला पढ़ लो ,या सुन लो चहरे पर मुस्कान जरूर आती है। हमने किसी के मुहं से कभी सुना था की चुटकुले साहित्य की नाजायज़ औलादें है । पर कभी ये नाजायज़ औलादें बड़ी
 
राजेन्द्र मीणा
Apr 14 2010 06:35 PM
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माधुरी की कसम

ग्यारवी कक्षा पास कर ली , सब का विचार था की आगे की पढाई जयपुर से करनी होगी , पर मुझे जयपुर के नाम से ही रोना आ रहा था॥ पहली बार घर से दूर , कैसे रहूँगा वहां अच्छा नहीं लगा तो इतनी दूर से भाग कर भी आ पाऊंगा या नहीं , मन में कुछ डर भी , और घर छूट जाने का
 
राजेन्द्र मीणा
टैग: व्यंग
Apr 14 2010 11:54 AM