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02 Jun 2010
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"ख़ुदा लिखदूं तुम्हें" "समुंदर बूक सूं पील्यूं"

आज, बस इतना ही कि दिल का पैग़ाम  दिल तक पहुंचे…दिल की … दिल से … दिल कहे……दिल समझे … दिल ही सुने……ताकि दिलों को सुकून-ओ-राहत मिले… पेश-ए-ख़िदमत है दो ग़ज़लें एक हिंदुस्तानी में , एक राजस्थानी में ख़ुदा लिखदूं तुम्हेंकहां लिखदूं , यहां लिखदूं , जहां कहदो
 
Rajendra Swarnkar
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'मन है बहुत उदास रे जोगी !' 'झुर- झुर' रो - रो' नैण गमावूं !'

मानलें , प्रस्तुत हिंदी रचना का जोगी गौतम बुद्ध है या भर्तृहरि है ! …और , रचना में  शुरू से आख़िर तक स्वयं का परिचय दिए बिना , विरह वेदना से पीड़ित जो प्रेम पुजारिन पाठकों- दर्शकों से रूबरू है , वह यशोधरा है अथवा पिंगला है !कल्पना कीजिए… किसी
 
Rajendra Swarnkar
May 21 2010 05:45 PM
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बीकानेर स्थापना दिवस

522 वर्ष पूर्व राव बीकाजी द्वारा हुई थी बीकानेर की स्थापना विक्रम संवत् 1545 के वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को ।विश्व प्रसिद्ध चूहों के मंदिर ( जो बीकानेर से लगभग तीस किलोमीटर दूर देशनोक में स्थित है ) में जिस देवी की मूर्ति है , उनका नाम
 
Rajendra Swarnkar
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" मां " " तेरे क़दमों तले जन्नत " " गजब कमाल है मा ! "

तीन रचनाएं मातृ शक्ति को प्रणाम वंदन नमन के साथ !हमारी संस्कृति के अनुसार दिवस विशेष नहीं , हर क्षण माता-पिता के प्रति सम्मान और श्रद्धा भाव के लिए है । परंतु पश्चिम के अनुकरण में आज के लिए कोई आपत्ति नहीं । मातृ दिवस के उपलक्ष
 
Rajendra Swarnkar
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" अगर सच बोलता हूं … सर मेरे इल्ज़ाम आता है ", " पता है ; क्यों बुझाना चाहता तूफ़ां चराग़ों को " , " शकल सूं नीं

आज प्रस्तुत है तीन ग़ज़लें !  लेकिन पहले एक बात …* कृपया , सहयोग बनाए रखें ! *प्रिय मित्रों ! शस्वरं का अंतर्जाल पर शुभारंभ हुए अभी एक महीना 9 मई 2010 को होगा । पहले ग्यारह - बारह दिन में ही मेरी ब्लॉग मित्र मंडली में तीस से भी अधिक आत्मीयजन सम्मिलित
 
Rajendra Swarnkar
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"हमसे कौन लड़ाई बाबा ? " और "पोली नींवां"

आज प्रस्तुत है , संवैधानिक मान्यता के लिए संघर्ष कर रहीदो क्षेत्रीय भाषाओं में सृजित मेरी दो ग़ज़लें …             RRRRRRRRR हमसे कौन लड़ाई बाबा ? हमसे कौन लड़ाई बाबा ?हो अब तो सुनवाई बाबा !सबकी
 
Rajendra Swarnkar
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" ये हिंदू है ! ये है मुस्लिम ! " " रास्ते अपने तू चल… ! "

अंतर्जाल पर कुछ लोगों द्वारा फैलाये जा रहे वैमनस्य की तर्जुमानी नहीं ,इस पोस्ट की रचनाओं के शीर्षक हैं ये ! धार्मिक सहिष्णुता और महान् भारत की सनातन संस्कृति एवं सौहार्द की परंपरा के निर्वहन के संस्कारों से वंचित अनभिज्ञ जन को परमात्मा स द् बु द्धि
 
Rajendra Swarnkar
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वैशाख ॠतु भा गई,भर गए बाज़ार नक़ली माल से,औ के कर गई बा !?

वैशाख चल रहा है !निराली महिमा है , अलग ही ठाठ-बाट हैं वैशाख मास के । और इस बार तो एक नहीं , दो-दो वैशाख हैं ।प्रस्तुत है एक कवित्तनए भाव-बिम्ब , पुराने छंद के
 
Rajendra Swarnkar
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सुस्वागतम्

                                          &nb
 
Rajendra Swarnkar