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aradhana-आराधना का ब्लॉग

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05 Jun 2010
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सुनो… मुझे तुम्हारी ये बातें अच्छी लगती हैं.

वो शायद जुलाई की शाम थी या अगस्त की…याद नहीं. हम यूँ ही बातें करने की जगह ढूँढते-ढूँढते सरस्वती घाट पहुँच गए थे. वो जगह खूबसूरत है और हमारी मजबूरी भी क्योंकि इलाहाबाद में घूमने-फिरने के लिए इनी-गिनी जगहों में से एक है. उन दिनों मैं जबरदस्त इमोशनल
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अब सब कुछ पहले जैसा है

अब किसी पड़ोसी को इस बात की शिकायत नहीं होगी कि उसने छत पर सूखने के लिए टंगे कपड़ों को खींचकर ज़मीन पर गिरा दिया , कि उसने उनके कमरे के सामने पोटी या सुसु कर दी, अब किसी को छत पर जाने से भौंक-भौंककर कोई नहीं रोकेगा… अब मुझे भी रात में दो बजे [...]
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भागना परछाइयों के पीछे-पीछे…

छुटपन में, जब पेड़ों की परछाइयाँ धूप से लड़ते-लड़ते, शाम को थककर ज़मीन पर पसर जाती थीं, तो हम उनकी फुनगियों पर उछल-कूद मचाते थे और कहते थे “देखो, हम पेड़ की फुनगी पर हैं”—बचपन कितना मासूम होता है, परछाइयों से खेलकर खुश हो लेता है. पर,
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ज़िन्दगी का एक खराब दिन

कल रात से मूड बहुत खराब है और ये पोस्ट मैं अपनी फ़्रस्टेशन निकालने के लिये लिख रही हूँ. रात में “रोड, मूवी” नाम की एक फ़िल्म देखी. फ़िल्म अच्छी लगी या बुरी, पता नहीं. पर उसे देखकर मन बड़ा खराब हो गया. जाने क्यों? तीन दिन से जे.एन.यू. जाना पड़
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चलत की बेरिया

हमारा देश दार्शनिकों का देश है, दर्शन का देश है. दर्शन यहाँ के जनमानस के अन्तर्मन में समाया हुआ है, जनजीवन में प्रतिबिम्बित होता है. कुछ लोग कर्मवादी हैं, तो कुछ लोग भाग्यवादी. पर समन्वय इतना कि कर्मवादी लोग भी भाग्य पर विश्वास करते हैं…और
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अम्मा और मैं- एक अनोखा रिश्ता (2.)

मेरे और अम्मा के अघोषित युद्ध में अक्सर दीदी शान्ति-स्थापना का असफल प्रयास किया करती थीं. वो एक ओर मुझे समझाती कि अम्मा तुम्हें बहुत प्यार करती हैं, बस दिखाती नहीं हैं, दूसरी तरफ अम्मा से कहती कि ज्यादा मार-पीट से गुड्डू और ढीठ होती जायेगी. न मुझे दीदी
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अम्मा और मैं- एक अनोखा रिश्ता (1.)

मैंने जब से होश सँभाला, अपने और अम्मा के बीच एक अजीब सा तनाव पाया. शायद इसका कारण मेरा छोटा भाई रहा हो, जिसकी वजह से मैं “दुधकटही बिटिया” बन गई थी या शायद कुछ और, पता नहीं, पर हम दोनों में कभी पटी नहीं. मैं जब कुछ महीने की थी, तभी मेरा भाई
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मर रहा है गरीब आदमी…

मन व्यथित है…व्याकुल है…परेशान है…जब भी कोई ऐसी घटना होती है, तो परेशान कर जाती है…चाहे वो उड़ीसा या बुन्देलखंड में भूख से मरने वालों की खबर हो या कल की खबर…सुबह तो फिर भी कुछ ठीक था मन…पर शाम आते-आते…पता नहीं
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घर और महानगर

घर (१.) शाम ढलते ही पंछी लौटते हैं अपने नीड़ लोग अपने घरों को, बसों और ट्रेनों में बढ़ जाती है भीड़ पर वो क्या करें ? जिनके घर हर साल ही बसते-उजड़ते हैं, यमुना की बाढ़ के साथ. (२.) चाह है एक छोटे से घर की जिसकी दीवारें बहुत ऊँची न हो, ताकि हवाएँ
Apr 04 2010 06:29 AM
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उनकी ज़िन्दगी के वो रूमानियत भरे दिन (3.)

मेरी अम्मा अधिक पढ़ी-लिखी नहीं थी. सिर्फ़ पाँचवाँ पास थीं. पहले लोग अपनी लड़कियों को अक्षरज्ञान करा देते थे, जिससे कि वे चिट्ठी लिख सकें. अम्मा को भी चिट्ठी लिखने भर की शिक्षा मिली थी. पिताजी जब उन्हें साथ लेकर आये तो पढ़ाना शुरू कर दिया. अम्मा का जी
Mar 30 2010 07:29 AM
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मैं, मेरा दोस्त, कॉफ़ी और इलाहाबादी जोड़े : दो दृश्य

जो लोग मेरा ब्लॉग पिछले कुछ दिनों से पढ़ रहे हैं, उन्हें ये टॉपिक अटपटा ज़रूर लगेगा, पर मैं उन्हें आश्वस्त कर दूँ कि अम्मा-पिताजी पर मेरी श्रृँखला आगे की पोस्ट में चलती रहेगी. ये विषय परिवर्तन दरअसल, न्यायालय के एक फ़ैसले और एक विवादित फ़िल्म पर आजकल चल
Mar 27 2010 09:56 AM
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उनकी ज़िंदगी के वो रूमानियत भरे दिन (2.)

हिन्दी सिनेमा का स्वर्णकाल (पचास और साठ के दशक) पिताजी के जीवन का भी स्वर्णकाल था क्योंकि वे उस समय युवा थे और नयी-नयी शादी हुयी थी. अपने खानदान क्या, पूरे गाँव में अपनी पत्नी को अपने साथ शहर लाने वाले पिताजी पहले युवक थे. नहीं तो उस समय पिया लोग कमाने
Mar 25 2010 01:53 AM
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उनकी ज़िन्दगी के वो रूमानियत भरे दिन (1.)

पिताजी ने पढ़ाई पूरी करते ही घर छोड़ दिया था. वे वहाँ से बाहर निकलकर कुछ करना चाहते थे और अपनी ज़िन्दगी अपने ढंग से जीना चाहते थे. गाँव की कुरीतियों और अन्धविश्वासों से उनका मन भी ऊबा था. फिर तब खेती में बहुत श्रम करने पर भी कम आय होती थी और सिर्फ़ लोगों
Mar 23 2010 06:40 AM
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पिताजी का बचपन (2)

पिताजी के बचपन में देश में विद्यालयों की संख्या बहुत कम थी. उन्हें खुद लगभग दस किलोमीटर दूर पढ़ने जाना पड़ता था. रास्ते में एक नदी और उसके किनारे श्मशान पड़ता था. वापस लौटते-लौटते अंधेरा हो जाता था. पिताजी के साथ के लड़के सारे रास्ते हनुमान चालीसा पढ़ते
Mar 20 2010 06:31 AM
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पिताजी का बचपन (1)

मेरे पिताजी के बारे में लोग कहते थे कि वे अपने समय से पचास साल आगे की सोच रखने वाले इन्सान थे. बहुत ही खुले विचारों के, तार्किक, बुद्धिवादी, बेहद लोकतान्त्रिक, मस्तमौला और फक्कड़ किस्म के आदमी थे. वे नास्तिक थे. मतलब, ईश्वर में विश्वास नहीं करते थे. ये
Mar 18 2010 06:47 AM
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मेरे घर आयी एक नन्ही कली

मुझे होली में एक पामेरेनियन पपी उपहार में मिली. मैं उसकी कुछ फोटो अपलोड कर रही हूँ. मैंने उसका नाम कली रखा है. कली बहुत शैतान है. वो या तो खेलती है या फिर सोती रहती है. सोती भी है अजीब-अजीब मुद्राओं में. अभी दो महीने की भी पूरी नहीं हुई है, पर बड़ी अक्ल
Mar 04 2010 02:14 PM