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17 Jun 2010
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'आज भी जिंदा हूँ मैं'

ज़िंदगी  ने  लाख  चाहा सूख  जाए  खून  मेरा रूह  आँखे  मूँद सोये  और ज़मीर  हो  जाए बहरा
 
योगेश शर्मा
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जीवन लंबा ,लम्बे रस्ते.......

पुनः -----जीवन लंबा, लम्बे रस्ते,रस्तों की सारी धूप छांह,अपने-अपने सपनों की राह,अपनी मंजिल की लिए चाह,जीने की आस में, काटें हम,कितने ही पल मरते मरते, जीवन लंबा ,लम्बे रस्ते.......इसका हर घूँट, कभी अमृत सा, कभी कड़वाहट, विष सी पायी है, कभी एक सुरूर सा,
 
योगेश शर्मा
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'मसीहा एक आयेगा'

पुनः---- सुना है ग़म जब, हद से गुज़र जायेगा,सोखने दर्द सबका, मसीहा एक आयेगा,है उसके इंतज़ार में, कबसे ये क़ायनात ,दुनिया भी थक चुकी, होती न करामात,ये उम्मीद झूठी, ख़ुद ब ख़ुद टूटेगी एक दिन,आसमां को छोड़ ख़ुद पे नज़र, जायेगी एक दिन,जानेंगे हम ,पहल ये
 
योगेश शर्मा
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'कर चले जो फ़िदा'

कैफ़ी साहब को नमन करते हुए यह रचना लिख रहा हूँ | काश, सिपाही का वो जज़्बा, जो उनके गीत में है, वो हमारे दिलों में भी जागे |कर चले जो फ़िदा जानो तन साथियों कब  करे उनकी परवाह, वतन साथियों वो हमारे
 
योगेश शर्मा
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'मेरी आवारगी'

(पुनः )--------------------कोई फितरत से आवारा,कोई तबीयत से आवारा,किसी को आवारगी का शौक,मैं मजबूरी में आवारा,यूं थे, रास्ते बहुत,न समझा मैं, किधर जाऊं, था बस, मंजिलों का खौफ, जहाँ जाऊं, जिधर जाऊं, बचा जब कोइ न चारा,तो घूमा बन के बंजारा,किसी को आवारगी का
 
योगेश शर्मा
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हवाओं के सलाम (फिर एक बार )

जो बैठे थे चमन में हम,  बड़ा संजीदा मौसम था,उठे और चल दिए जब फिर , हवाओं के सलाम आयेमुहब्बत भी ज़माने में, बस अब सौदेबाजी है,इधर नज़राना दिल भेजा, उधर से दिल के दाम आयेबहुत था शौक़ जीने का, तो मरने की सज़ा माँगी,रहेंगे दास्ताँ बनकर, शहीदों में जो नाम
 
योगेश शर्मा
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हूँ कवि, लेकिन मुझे भी मोतियों की चाह है

हूँ कवि, लेकिन मुझे भी मोतियों की चाह हैहो मेरे घर में उजाले इसकी भी परवाह है मैं भी चाहूँ, भाग्य मेरे साथ में हर दम रहे खेती हंसी की लहलहाए, खुशियों का मौसम रहे कौन कहता है, कवि हो तो रहे फक्कड़ सदा कहने को इक घर तो हो, पर रहे घुमक्कड़ सदा कुर्ता वो पहने
 
योगेश शर्मा
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चिड़िया... तुम क्यों गाती

चिड़िया तुम क्यों गाती नहीं है सुनना मुझको कोई, प्यारा मधुर तराना कोई विचार जो सुख पहुंचाए,नहीं है मुझको लाना अनुभूति क्यों प्रेम की नाहक, मेरे मन में जगाती चिड़िया तुम क्यों गाती गीत लिख रहा वियोग बिछोह का, और छेड़ रहा हूँ,राग विरह का इस अवसाद से मुझे
 
योगेश शर्मा
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'ऐसे भी मौसम थे'

ऐसे भी मौसम थे, कभी    दिन पलों में गुज़र जाते थे, चाँद टहलता था, छत पे अक्सर,सितारे ज़मीं पे, रोज़ बिखर जाते थे, चलते चलते, पांव ख़ुद ही, खिंच जाते, तेरे घर की तरफ, और चुप चाप, गली से तेरी,बगैर आहट गुज़र जाते थे,रोज़ नुक्कड़ पर पर
 
योगेश शर्मा
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'ये हौसले कभी कम न हों'

पुनः संपादित  ----------------------------------------वक्त के चलने का सारा खेल है, जब ज़िन्दगी ,कैसे हो सकता है भला, खुशियाँ मिलें पर गम न हों,ज्यादा क्या मांगू मैं तुझसे, तूने ख़ुदा सब है दियाइतना कर एहसान बस, ये हौसले कभी कम न
 
योगेश शर्मा
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'अन्दर का शैतान कह रहा'

कैसे  मुमकिन  है  कि  हम तुम,साथ  में  जिंदा  रहें, साथ  खेले मुस्कुराएं, हम  कदम  हम  दम  रहें, जिंदा है रहना मुझको जो, फिर
 
योगेश शर्मा
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तुम मुझको, मैं तुम्हें सुलाऊँ

तुम मुझको, मैं तुम्हें सुलाऊँ भाग्य रूठ कर कहीं पड़ा हो जग, बिसरा कर दूर खड़ा हो तेरे नयनों की बाती से मन का दीप जलाऊँ तुम मुझको, मैं तुम्हें सुलाऊँ जब अनजाने भय से मन धड़के कहीं कोई पत्ता न खड़के नींद कहे मैं हुई पराई, वापस कभी ना आऊँ तुम मुझको, मैं
 
योगेश शर्मा
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'तुम मुझको, मैं तुम्हें सुलाऊँ'

तुम  मुझको  मैं  तुम्हें  सुलाऊँ भाग्य रूठ कर कहीं पड़ा हो जग, बिसरा कर दूर खड़ा हो तेरे नयनों की बाती से मन का दीप जलाऊँ तुम मुझको, मैं तुम्हें सुलाऊँ
 
योगेश शर्मा
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'बावरा सा घूमता है'

  बावरा सा घूमता है  हर कली को चूमता है पंखुरी से लिपट कर के छोड़ देता अधर धर के उसको न रस की कामना है बस, उस कली को ढूँढना है बंद जिसकी पंखुरी में,बीती थी कल रात सारी, वो कली थी कितनी प्यारी, रूप उसका, दमक उसकी, स्पर्श औ रस गंध उसकी,
 
योगेश शर्मा
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'बावरा....वो भंवरा'

बावरा सा घूमता है हर कली को चूमता है पंखुरी से लिपट कर के छोड़ देता अधर धर के उसको न रस की कामना है बस उस कली को ढूँढना है बंद जिसकी पंखुरी मेंबीती थी कल रात सारी वो कली थी कितनी प्यारी रूप उसका, दमक उसकी स्पर्श औ रस गंध उसकी मदमस्त सी करती गयीरात ज्यों
 
योगेश शर्मा
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'ईश्वर और भूत'

न  मैंने  भूत  देखा,                देखा  ना  मैंने  ईश्वर,
 
योगेश शर्मा
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कविता, तू वापस आयेगी

पुनः सम्पादित एवं प्रकाशित ------------------------------खामोश होके दूर मुझसे, कब तक रह पायेगी,वादा ख़ुद से है मेरा, कविता तू वापस आयेगी, ख्यालों में देगी दस्तक, ख़्वाबों को जगमगाएगी, लिपटेगी कलम से फिर, मेरे होंठों से गुनगुनायेगी,कविता, तू वापस
 
योगेश शर्मा
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'कारवाँ

पुनः सम्पादित एवं प्रकाशित ------------------------------मैं चला तो था सफ़र में, कारवां के साथ साथ,थे कहीं कन्धों पे बाहें, और कहीं हाथों में हाथ,रास्ते में जाने कैसे, साथ हर छुटता गया,वक्त गुज़रता गया, काफिला घटता गया,  कुछ मेरी तेज़ी से न चल
 
योगेश शर्मा
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ये कैसा इन्क़लाब

है इन्क़लाब , ग़र लहू बहाने का ही नाम,तो इन्क़लाब और अभी आयेगा, ज़रा ठहरो तो,खाद बारूद की है,बोई हैं बंदूकें जहाँ,खेत, लाशें ही उगाएगा, ज़रा ठहरो तो,नफरत के शोलों को हवा देने वालों ,घर तुम्हारा भी जल जायेगा, ज़रा ठहरो तो,इंसान की नस्ल को बेहतर करते
 
योगेश शर्मा
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'मैं किस तरफ हूँ'

उस तरफ सिर्फ, भूख.....ग़ुरबत.....बेबसी आह !! कितना सुकून कि मैं इस तरफ हूँ दीन कर्म की बातें, सच्चाई के किस्सेलगते हैं अच्छे, क्योंकि .......  मैं इस तरफ हूँ  क्यों नीलाम होतें हैं लोग, गुनाह क्यों करते हैं
 
योगेश शर्मा
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'ओ दहशतगर्द'

किन इशारों पे नाचते हो, दिन रात, गीत नफरत के गाये जाते हो,न पता नाम, न पहचान शक्लों की,फिर भी, दुश्मनी निभाए जाते हो,रौंद के बाग़, बसा दिए मरघट,मेले, लाशों के लगाये जाते हो,ये प्यास क्या, मांगे खून, हर पल,ये कैसी भूख, कि इंसान खाए जाते हो,जानें लेकर जो
 
योगेश शर्मा
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'मैं ज़मी हूँ'

मैं ज़मी हूँ, मेरी मिटटी से तन बनते हैं,घर बनते, शहर बनते, वतन बनते हैं,खेत उगते हैं, बाग़ ओ चमन बनते हैं,बुत बनते , तो कहीं ताज महल बनते हैं,सर उठाये हुए पर्वत , सभी मुझसे हैं बने,लहलहाते हुए दरख़्त भी, मैंने हैं जने, मैं हूँ ज़िंदा, सांस लेती
 
योगेश शर्मा
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"आधे चाँद की कसम"

दोस्तों ..ब्लागिंग जगत से १० दिन की  छुट्टी एक कसम के साथ .........आधे चाँद की खाऊँ कसम मैं, और आधे की खाओ तुम,हमराही रहूँ  तुम्हारा मैं, मेरी मंजिल बन जाओ तुम, उम्र का ही हिस्सा होकर, हर पल मेरे साथ रहो,हर सांस तुम्हारी
 
योगेश शर्मा
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'बस एक दोस्त के नाम '

यह कविता एक दोस्त के नाम है जो अब शायद बहुत दिन नहीं है | यूं कहें कि उसका छोटा सा पैगाम है हम सभी को मेरी लिखाई के द्वारा   कि 'यह  जिंदगी एक नेमत है , इसका पल पल जियो ...इसे उड़ाओ मत'
 
योगेश शर्मा
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"पथ के स्वामी"

लक्ष्य दूर, भले हो कितना, पथ हो दुष्कर, चाहे जितना, फूल बिछे हों, या अंगारे ,चलना, उतना ही पड़ता हैलाख हों भय, या हो असमंजस, थका जिस्म, या हो उकताहट, श्रम से, जितना चाहे भागें, अंत में, बढ़ना ही पड़ता हैलड़ना, पहले होता है, अपने से, फिर कठिनाई से,ख़ुद को
 
योगेश शर्मा
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'रिश्तों का पिंजरा '

द्वार खुला कबसे, पिंजरे का ,पंछी, फिर भी बैठा है,"उड़ जा उड़ जा,वक्त यही है",पल पल खुद से कहता है,लाख जतन कर भी, उड़ने की,हिम्मत जुटा न पाता है,पंख भी हैं, है  मौक़ा भी फिर भी उड़ ना पाता है,है ऐसा क्या, जो रोके रस्ता कैद से मुक्ति पाने का,प्रेम है ये
 
योगेश शर्मा
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'शायरी का हुनर'

दर्द ज़माने के, ओढ़े हुए से दिखते हैं, कतरा अपनी आँख का, समुंदर सा लगे, गुजरते पल में, सही अक्स दिखें रिश्तों के, हर बुरा वक़्त, किसी आइने सा लगे, लोग वाकिफ़ है, अंदर छुपी उलझनों से अब  ,मेरा चेहरा किसी अखब़ार के पन्ने सा लगे,तराशा इसको तो,
 
योगेश शर्मा
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एक गुन्चा, एक पेड़

साए तले दरख़्त के, इक नया पौधा खिला खुश हुआ दरख़्त, चलो एक साथी तो मिला !परवान पौधा चढ़ा, उस पेड़ के ही साए में,आँधियों में लिपटा कभी, सर्दियों में सिमटा उसमे,धूप झुलसाती तो, पत्तियां पेड़ की मरहम बनतीछाँव उसकी, गुन्चे के खेल का आँगन बनती,धीरे धीरे एक दिन,
 
योगेश शर्मा
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औरत ...तेरी क्या औकात ...उर्फ़ मदर'स डे

(oops ..ग़लती से कल प्रकाशित कर दी , मदर'स डे तो आज है | पर मानो तो मदर'स डे तो रोज़ होना चाहिए  )___________________________________________________________________क्यों ? चौंक गए ना यह शीर्षक पढ़ के!!! हम मर्द बस यह शीर्षक पढ़ कर चौंक
 
योगेश शर्मा
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'हाय जवानी...तू कहाँ '

बदली शक्ल  या नज़रें ही,आईने की कमज़ोर हैं, रंग फीका हो गया,या माजरा कुछ और है,   वो रौनकें वो रंग,वो चेहरे कि लाली है कहाँ,अन्धेरा है कमरे में या,बढ़ती उम्र का ज़ोर है ये आँख
 
योगेश शर्मा
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औरत..तेरी क्या औकात .....उर्फ़ मदर'स डे

क्यों चौंक गए ना यह शीर्षक पढ़ के!!! हम मर्द  बस  यह शीर्षक पढ़ कर ही चौंक सकते हैं वरना तो हमारा सारा जीवन ही औरत को यह याद दिलाते रहने में ही बीत जाता है कि वो कितनी तुच्छ है |अमेरिका और योरप जैसे विकसित समाज में भी पुरुष अब भी
 
Yogesh Sharma
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क्या लिखूं?

( पुनः संपादित व प्रकाशित ) -------------------क्या लिखूं? ये सोचकर परेशान हूँ, क्या लिखूं? आज फिर से हैरान हूँ,क्या लिखूं, फूल, बारिश, चाँद, तारे?क्या लिखूं, खाली पेट, लम्बी होती कतारें?क्या लिखूं, जुल्फ, आँखें, होंठ...मोहब्बत के वादे ? क्या लिखूं,
 
Yogesh Sharma
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'क्या इलज़ाम दें शैतान को'

दुनिया के मिट जाने का क्या, इलज़ाम दें शैतान को, जब ख़त्म करने लगा, इंसान ही इंसान को, हर तरफ बस शोर है, मातम है, छाया है धुआं, कितनी जल्दी है पड़ी, मरने की हर इंसान को, भूख,  महेंगाई, तरक्की ,हवस दौलत और नशा, जरूरतें पैदा करी ख़ुद, दोष दें
 
Yogesh Sharma
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'माफ़ मैंने कर दिया'

इतना गुमसुम हो गया था,जैसे के बेहोश हूँ,खामोशियाँ भी पूछती थीं, इतना क्यों खामोश हूँ,कर रहा था साफ़ बस, मन की सारी मैल को,मशगूल भूलने में था,हर इक पुराने बैर को नाग ढेरों बरसों से, दिल में थे पाले हुए,रंज के बेताल कितने, ख़ुद पे थे डाले हुए,भूत ये करते थे
 
Yogesh Sharma
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'धरा तुम भी ख़ूब हो' (पुनः प्रकाशित )

अपनी धुरी पे घूमती,प्रचंड अग्नि चूमती, अनादि काल से अनंत, अंतरिक्ष तोलती, कर्त्तव्य से जुड़ी सदा, युगों-युगों से डोलती, सृष्टि के नए-नए,रहस्यों को खोलती धरा तुम भी ख़ूब हो, कभी भी कुछ न बोलती, धरा तुम भी ख़ूब हो, कभी भी कुछ न मांगती, तुमने बदलते
 
Yogesh Sharma
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"सपनों की दुनिया"

दूर कहीं, जहाँ ज़मीं,आस्मां से मिलती है,जिस जगहखुशियाँ सभी ,क्यारियों में खिलती है,कदम कदम पे इन्द्रधनुष,जहाँ रौशनी लुटाते हैं, हर तरफ बस, मुस्कुराते,चेहरे ही नज़र आते हैं,काश, एक ही दिन को,मैं भी वहां जा पाता,उस रौशनी की बारिश में,मैं भी गर नहा पाता, जो,
 
Yogesh Sharma
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'मिलन '

रात, मिलने का वादा कर जाने लगी,पंखुरी, फूल बन के  मुस्कुराने लगी, उजाले लिए गुलाबी, धरे पाँव सुबह ने, बूँदें ओस की, फिर झिलमिलाने लगी,पत्तों की छन्नी से, रौशनी जो गुज़री है,घास के फर्श पे, तस्वीरें सी संवरी हैं,दूर, चोटी से बर्फ, पिघली है सालों
 
Yogesh Sharma
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'ख़ुद से अजनबी '

लगता कभी है जैसे, किसी और से सुने हैं, अक्सर ये लफ्ज़ मेरे, अपने से नहीं लगते,        तहरीर तो है मेरी,       तजुरबे ख़ुद किये हैं,       ख्याल क्यों न जाने,
 
Yogesh Sharma
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'वो कुम्हार'

झुकी कमर लिए, गर्दन टेढ़ी किये,दिखी एक काया, कांपते हाथों से,जिसे, मिटटी को,प्यालों का आकार देते पाया, गौर से देखने पर, मैंने, जब उन प्यालों को, थोड़ा टेढ़ा पाया, तो ख़ुद को रोक ना पाया, ठिठोली से पूछ बैठा, "बाबा, इतनी उम्र हो गयी, अब तक यह काम न
 
Yogesh Sharma
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'फ़लसफ़े'

अब लड़कपन से पूछें क्या, गलतियों की वजह,नादानियां करने की, कोई उम्र होती ही नहींतजुर्बों का, नाकामी से गहरा बहुत है वास्ता, कोशिशें सारी कभी कामयाब तो होती नहीं उम्मीद के काँधे पे सर है, मायूसियों की भीड़ में, झटका हो दामन चाहे हमने, ये छोड़ कर जाती नहीं
 
Yogesh Sharma