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Voice Of Heart : पुकार - अंतर्मन की

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09 May 2010
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याद है जख्मों पे तू अक्सर मरहम लगाती थी.....

लीजिये  जनता... एक रचना.. बैठे बैठे बस बन पड़ी, ज्यादा कुछ सोचा नहीं और ना ही ज्यादा दिमाग लगाया... शब्द ढूंढे, कड़ियाँ ढूंढी उनको जोड़ा और लिख दिया...तेरी यादों को जब तलक सोचता रहा, तेरे अक्स को तब तलक खोजता रहा.पहले भी तो तन्हा ही रहा करता था,पर
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रोज की एक कविता....आखिर कैसी

मै कुछ दिनों से खुद को ढूंढ रहा हूँ.. हाँ शायद बेवकूफी है पर क्या करूं मै हूँ ही जरा सनकी व्यक्तित्व,, बस धुन लग जाती है कोई तो उसी को पकड़ के बैठ जाता हूँ.. कोई नहीं इसका अपना अलग ही मजा है.. लिखना अच्छा लगता था बहुत पहले से, लिखने लगा.. कुछ शायरी २ लाइन
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फिर एक कविता.....

कविता पे एक कविता..... क्या क्या लिख जाते हैं हम लोग कविता मे... या कविता होती कैसी है..... या कैसे बनती है... वही लिख दिया.... फिर एक कविता.....उन दर्दों को फिर आज सुनाने का दिल करता है,आज फिर एक कविता लिख जाने को दिल करता है.बारिश की बूदें हों या वो
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एक दफा फिर

लीजिये फिर से आ गया मे अपने नए नए बने शौक को ले के.. हाँ जी पेश-ए-खिदमत है एक और ग़जल... एक दफा फिर..एक दफा फिर हमे अपनों ने लूटा है,एक दफा फिर आज ये दिल टूटा है.दिल पे बहुत किया यकीं अब तक,अब पता चला की ये दिल झूठा है.कल तलक सोचा था उन को अपना,आज फिर
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बेलगाम वक़्त

सभी को पता है की वक़्त तो बस भागता ही है.. और किसी के रोके रुकता नहीं फिर भी एक कोशिश रहती है कई बार वक़्त पे विजय पाने की तो उसी कोशिश को अभिव्यक्त कर दिया है इस रचना मे.... कोशिश करता और फिर थकता हूँ,हर पल थामूं ये कोशिश करता हूँ,पर मेरी उम्मीदों से
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भुल चुक माफ़... बस ऐसे ही लिख दिया.. क्या लिखूं?

लिखने का मन कर रहा था, कुछ सूझ ही नहीं रहा था... बहुत कोशिश की, कोशिश करते करते चिढ़ सी होने लगी... तो बस ऐसे ही कुछ अपनी सोच को ही लिख डाला की क्या लिखूं...  तो बस कुछ ऐसे ही है, माफ़ करियेगा..कुछ कुछ सोचता हूँ,फिर कलम उठाता हूँ,औरफिर कुछ फाड़ता
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भुल चुक माफ़... बस ऐसे ही... क्या लिखूं?

लिखने का मन कर रहा था, कुछ सूझ ही नहीं रहा था... बहुत कोशिश की, कोशिश करते करते चिढ़ सी होने लगी... तो बस ऐसे ही कुछ अपनी सोच को ही लिख डाला की क्या लिखूं...  तो बस कुछ ऐसे ही है, माफ़ करियेगा..कुछ कुछ सोचता हूँ,फिर कलम उठाता हूँ,औरफिर कुछ फाड़ता
May 02 2010 05:32 PM
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थाम के मेरा हाथ

बस ऐसे ही कुछ सोचा... कहीं पे एक चित्र देखा तो मन मे बस ये ही बोल उठ पड़े... शायद एक स्त्री जो अपने प्रेम के लिए किसी भी हद तक जा सकती है किसी भी परेशानी का सामना कर सकती है... उसी के नाम मेरी ये रचना.. कभी किन्ही अनजानी राहों पे,कभी ऊँची नीची
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सूखे ह्रदय की प्यास

कुछ ग़ज़लों के बाद अब फिर से अपने पुराने ढर्रे पे लौट आया हूँ.. हाँ जी मेरे गीत मेरे दर्द.. असल मे जब आपके बहुत से बिखरे अरमान होते हैं तो उनको ना पा पाने का दर्द ही उन अरमानों को भुला देता है.. तकलीफें इतनी ज्यादा बढ़ जाती हैं की आप इच्छाओं को तो भुल ही
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ख्वाहिश - एक और ग़जल

मुझे कुछ इस कदर नशा सा हो गया है ग़जल लिखने का की बस हाथ थमते ही नहीं... लीजिये पेश ए खिदमत है एक और ग़जल .. दिल के बेहद करीब.. :)  तुझ से मिलने की जब कभी भी ख्वाहिश की थी,मजबूरियों ने तब कुछ रुकने की फरमाइश की थी.इक दफा फिर से तेरी यादों ने रुलाया
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एक और ग़जल

एक और ग़जल फिर से पेश करना चाहूँगा.. अजब सा नशा है कुछ ग़जल लिखने का भी.. कोई भुल चुक हुई हो तो टिपण्णी के रूप मे जरुर उसे उभरें.. अभी बस सीखने की कोशिश भर कर रहा हूँ.. आप से अच्छा कौन आंकलन कर पायेगा...  अज़ाब तेरी हाफिजाह का सह भी नहीं पाता,पर तेरे
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एक ग़ज़ल

वैसे तो ग़ज़ल मे लिखता नहीं.. और ना ही मेरी इतनी औकात है.. पर फिर भी कुछ कचोटा सा मन आज किसी बात से, तो बस एक कोशिश भर कर दी... देखें कितना सफल हुआ हूँ....   तेरे अहद-ए-तरब ने कुछ इस ढब अश्क बार किया,मेरी खरोश से तो दहर भर ने भी अश्क बार
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कैसे अपनी बेइज्जती करा लें... आखिर हमे भी नाम कमाने का शौक है भाई..

नौकरी बजाने के ही एक चक्कर मे शहर से बाहर निकले और एक गाजीपुर नमक जिले मे जा पहुंचे. आयकर विभाग मे कुछ औडिट करनी थी तो वहीँ आयकर अधिकारी जी के सामने बैठे थे. साथ मे कोई एक सज्जन और थे कुछ नेता सरीखे या शायद ठेकेदार, अब ये नहीं बता सकता की समाज के या की
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हाँ आज फिर ये दिल रोया है

लो आज फिर याद आ बैठा,की तू दूर है मुझसे कहीं,इल्म था उसका जो खोया है,हाँ आज फिर ये दिल रोया है.भूलने की नकली कोशिश,हंसी का नकाब ओढ़े चेहरा, गम को बहुत मन मे ढोया है, हाँ आज फिर ये दिल रोया है.बिखरी हुई सी ढेरों आरजू,टूटी सी हजारों
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कैसा होता है दीवाना..

अश्रुओं की धारा,ग़मों का दरिया,यादों का सागर,बस कुछ ऐसा ही....दर्द भरा दिल,सपनों भरा चेतन,चित्त मे कई मर्म,बस कुछ ऐसा ही....खामोश सी जुबान,बहकते से कदम,बुझती सी आँखें,बस कुछ ऐसा ही....प्रेम को तलाशता, पुष्पों को निहारता,सोचता सा हरदम,बस कुछ ऐसा
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खो दी मैंने तो

वक़्त भी ना मिल पाया मुझको कभी अगर माँगा भी तो ..उस एक वक़्त की कमी से पूरी जिंदगी ही खो दी मैंने तो..दोबारा जी भी सकूँगा के नहीं पता नहीं अब जिंदगी तुझे..तेरी ही चाह में हर पल की अपनी ख़ुशी ही खो दी मैंने तो..कभी यादों ने
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किराये की जिंदगी

कभी किसी कभी किसी की,हमेशा दूसरों की तर्ज पे जी,पता नहीं अपनी कब होगी,मेरी ये किराये की जिंदगी.कभी रिश्तों कभी दोस्तों की,ख्वाहिशें दूजों के मन की ही,मेरी अधूरी इच्छाओं से भरी,मेरी ये किराये की जिंदगी.मंजिलें तो तय थी खुद की,पर रास्ते दुनिया
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एक अधुरा सा लेख और एक सवाल.... जवाब आप दो..

कभी रात के अंधेरों मे तन्हाई से गुजरते हुए मन मे कई बार ये ख्याल सा आया की ये जीवन है क्या.. और क्यूँ इतना आशान्वित हैं लोग इसको लेके. जीवन तो इतने कष्ट देता है सबको, हाँ खुशियाँ भी देता है जरुर. और मौत को देखिये शांत सी पड़ी हुई सुकून देती हुई. फिर
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जिंदगी और रास्ता...

सब चलते ही तो हैं अपने जीवन मे... और ये पंक्तियाँ बस एक कठिन से जीवन के नाम...किसी रोज चलते हुए,एक ख्याल सा आया,अपने जीवन को मापा,पर सिर्फ एक शुन्य ही पाया.उलझी सी कुछ राहें,कुछ दुर्गम सा सफ़र,अनजानी सी एक मंजिल,हर मोड़ पे एक रोड़ा पाया.कहीं सरल भी था
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मन की उमंगें

कुछ बावरा सा ही होता है मन, चाहे जिस किसी का भी हो, बहुत सी उमंगें और सोचें उसमे फलांग मारती रहती हैं.. उन्ही मे से कुछ मचलती सी  भावनाओं को बस लिख भर दिया है....मन करता कभी उडूं मै,चल जाऊं उस बादल पे,सहलाऊं धीरे से उसको,दो बूँद जल की ले आऊं.मन करता
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ऊपर वाला

मजहब ... कुछ स्वार्थी लोगों ने इस शब्द को कुछ इत्ता डरवाना बना दिया है की मजहब और धर्म का नाम कुछ खून का सा पर्याय बन गया है.. तो उन्ही भावनाओं को की किस तरह से हमारे घरों मे छोटे बच्चों को क्या सिखाया जा रहा है और इतनी गहनता के साथ बच्चे उसे सीख रहे
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पगला मानुष

कभी तन्हाई मे बैठ के सोचो.. क्या हम पगले नहीं हैं.. कभी कुछ तो कभी कुछ करते हैं... कोई निश्चितता तो है ही नहीं जीवन मे.. तो हम भी तो एक पगले मानुष ही हैं...मै तो एक पगला मानुष,न जाने किस पल क्या कर जाऊं. किस पल मे मै हंस बैठूं,न जाने किस
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आज भी उतना ही जीता हूँ मै

जिंदगी कुछ तो बदल जाती है आपके सपनों के टूटने के बाद.. आप जीते तो हो पर वो बात नहीं रह जाती.. सपने तोड़ने वाले को आपका डर रहता है,पर इस बात का नहीं की आपका क्या होगा, इस बात का की आपको कुछ हो गया तो उसको कितनी आत्मग्लानी होगी..दिल मे चोटें भी हैं, मन मे
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क्यूँ बोलूं.

खामोशियों मे कभी चीखने का मन होता है बहुत, पर फिर मन सोचने लगता है की क्या फायदा चीख के.. लोग मिलते हैं तो पूरे मन की व्यथाएं, खुशियाँ सब कुछ बोल देने का मन करता है.. पर फिर सोचता हूँ की आखिर क्या बोलूं और क्यूँ बोलूं... तो इस रचना मे जो दो पंक्तियाँ
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खो चुका हूँ मै..

मधुशाला के प्यालों मे, बिखरे सपनों के टुकड़ों मे,मय मे डूबा हुआ कहीं पे, बहुत तन्हा हो चुका हूँ मै,हाँ आज खुद को खो चुका हूँ मै........भीड़ मै भी अकेला सा, यादों मे डूबा हर पल,ख्वाहिशों मे लुटा कहीं पे, बहुत रो चुका हूँ मै,हाँ आज खुद को खो चुका हूँ
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पराई सड़क..

एक एहसास है मेरे मन का, किसी एक रास्ते को खो देने का दर्द, वो रास्ता जिससे गुजरने मे कभी मुझे दिन भर की खुशियाँ एक पल मे ही मिल जाती थी.. पर आज वो ही सड़क पता नहीं क्यूँ एकदम अजनबी सी है... कदम तो अब भी उधर मुड़ते हैं पर एक अजीब से डर के साथ.. डर उस सड़क
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खडंजा..

क्या आपको याद हैं वो दिन जब ये चमकती डामर की सड़कों के बदले वो उबड़ खाबड़ खडंजे हुआ करते थे... जिंदगी कुछ अलग सी हुआ करती थी... तो यहाँ पे मैंने कुछ पुरानी जिंदगी को खडंजे से जोड़ते हुए नयी जिंदगी से तुलना करने का एक छोटा सा प्रयास किया है...ईंट पत्थर से
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क्यूँ बोलूं...

खामोशियों मे कभी चीखने का मन होता है बहुत, पर फिर मन सोचने लगता है की क्या फायदा चीख के.. लोग मिलते हैं तो पूरे मन की व्यथाएं, खुशियाँ सब कुछ बोल देने का मन करता है.. पर फिर सोचता हूँ की आखिर क्या बोलूं और क्यूँ बोलूं... तो इस रचना मे जो दो पंक्तियाँ
Apr 01 2010 09:36 AM
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Voice Of Heart : पुकार - अंतर्मन की

एक पुस्तक लिख रहा हूँ आजकल कुछ खाली वक़्त अगर मिल जाता है तो..  शीर्सक है Three Miss Calls..  उसी का एक छोटा सा सार कह लीजिये या एक परिचय.. बस आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ मेरी उस पुस्तक का एक छोटा सा अंश.. हाँ हालाकि मेरी वो पुस्तक अंग्रेजी
Mar 31 2010 11:57 AM
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वो आवारगी..

दिन भर के ऑफिस के थकान भरे काम काज के बाद कभी जब घर आ के लेटता हूँ बिस्तर पे.. तो अपनी अधूरी ख्वाहिशों के सपनों के पीछे दौड़ने लगता हूँ.. इसी दौड़ पे कभी कभी उन दर्द भरी ख्वाहिशों को फांद के और पीछे चला जाता  हूँ तो याद आता है अपना वो
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तलाश मंजिल की

मन की बहुत गहराइयों मे उतर के और ढेर सारा दर्द महसूस करते हुए ये कुछ पंक्तियाँ लिखी हैं.. जाहिर है की दिल की गहराइयों से निकली हैं तो दिल के और मेरे जीवन के बहुत ही करीब भी होंगी... ये पंक्तियाँ लिख के शायद मे अपने दर्द को कहीं न कहीं आपसे बांटना चाहता
Mar 30 2010 10:08 PM
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मेरी मजबूरी...

कुछ मर्म सा है मेरे मन मे कुछ छुट सा जाने का, या कुछ खो जाने का, शायद आपको मेरी पुरानी रचनाओं मे भी इसकी काफी झलक दिखी होगी और आगे भी दिखती रहेगी.. कुछ है जो हमेशा कचोटता  है अन्दर से.....न जाने क्यूँ मे खुद को पहचान नहीं पाता,गम को तो छुपा भी
Mar 30 2010 09:55 PM
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पापा..

माँ तो हमेशा से हमारे देश क्या पूरे विश्व मे एक महान दर्जा रखती है.. पर पाता नहीं क्यूँ कभी पिता को शायद हम बहुत प्यार तो करते हैं और इज्जत भी देते हैं.. पर दिखा नहीं पाते.. तो बस उन्ही पिताओं के लिए समर्पित है मेरी एक ये रचना...वो
Mar 30 2010 09:20 PM
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एक अनोखी मोहब्बत

तकरीबन ६ साल पहले शायद १२ अगस्त की ही तारीख थी, रेडियो पे एक उदघोसना सुनी की १५ अगस्त को देश को समर्पित कुछ रचनाएं आमंत्रित हैं श्रोताओं से.. बस लिखने का तो शौक था ही पर कुछ उट पटांग सा ही लिखा था अब तक.. तो सोचा क्यूँ न मे भी भेजूं कुछ लिख के.. बस क्या
Mar 30 2010 09:15 PM
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चक्रव्यूह - एक उलझन जहन की...

पुष्प की सुगंध को सराहूं या उसकी सुन्दरता की तारीफ़ करूं..न जाने भ्रमर को क्या लुभाता है हर पुष्प पे मंडराने को..अचेत सा है कुछ मेरा अंतर्मन, क्या भ्रमर है जो पुष्प को इठलाने का मौका देता है..या वो पुष्प है जो भ्रमर को जीवन जीने का एक अलग सा नजरिया देता
Mar 30 2010 12:05 AM
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कुछ उम्मीदें

उस दिन को कोसूं या खुद को दोष दूं,सोचा ही नहीं था की कुछ गलत सोच लिया था,पता नहीं क्या था पर इश्क तो तुझसे कर ही लिया था....सपनों पे यकीं तो था पर इस कदर करना था की नहीं,इस पर तो शायद कभी गौर ही नहीं कर पाए हम,पता नहीं क्या था पर हर सपना तो तुझको दे ही
Mar 29 2010 11:59 PM
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जीवनपथ

जीवनपथ पर बस चलता ही रहा, जो पथ दिखा मुड़ता ही रहा,कभी सोचा ही नही की कौन हूँ में, क्या अस्तित्व है मेरा,की में भी तो उसी भीड़ का हिस्सा हूँ, जिसे में भीड़ कहता हूँ,की मेरे भी तो वही कर्तव्य हैं जिनको में भीड़ में धुन्दता हूँ,पर क्या में वो हूँ जो में
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जीवन..

जिंदगी से खुसी की तलाश में घूमता एक बंजारा हूँ में......खुसियाँ हैं तो बहुत जिंदगी में पर फ़िर भी कम लगती हैं......वो कहते हैं की क्यूँ देखते हो इतने सपने जागती आंखों से.....पर आंखों में इतने सपने हैं की अब ये जिंदगी भी कम लगती है...रात का इंतज़ार अब होता
Apr 26 2009 09:49 AM