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09 Jun 2010
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आज का विचार

आज इनके बारे सोच कर देखें .क्या हम इनके साथ न्याय करते है.धरती पर सभी जीवों का अधिकार हे .पर आदमी अपनी हद बदता ही जा रहा हे .जो काम थोड़ी सी जगह में हो सकता .उसके लिए गगन चुम्भी इमारतें बन रही है .सीमेंट कंक्रीट के जंगल मत बनाइये जीवन को जमीं की जरूरत हे
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माँ का आँचल

आ चल के तुझे मै लेके चलूँ एक ऐसे गगन के तले जहाँ गम भी न हो आसूं भी न हो बस प्यार ही प्यार पले.
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आज का विचार

उस आदमी के लिए कुछ भी असम्भव नहीं है, जो दृढ़ संकल्प करे और तब उस कार्य को करे, सफलता का यही एकमात्र नियम है।’’ माईराबियन
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अचार (कहानी)स्वाति तिवारीमई की तेज धूप को देखकर याद आया कि चने की दल को धूप दिखाना है । ऑगन की धूप में पुरानी चादर बिछाकर स्टोर रूप में चले की दाल की कोठी निकालने गयी तो अचार का मर्तबान (बरनी) दिखाई दे गयी । दाल को धूप में फैलाकर पलटी तो अचार का ख्याल
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आज का विचार

प्राप्त हुए धन के उपयोग में दो भूलें अक्सर हो जाती हे जिन्हें घ्यान देना चाहिए अपात्र को धन देदेना और सुपात्र को नहीं देना । वेदव्यास
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आज का विचार

क्या आप अपने बच्चों को रेस के घोड़ों की तरह सिर्फ भागने की प्रेक्टिस तो नहीं करवा रहे हैं ? जीवन की सुन्दरता जीवनको सहजता से जीने में हे यह भी समझाना जरुरी हे .एक ही जीवन में आप अगर भागते ही रहे तो जीवन के अनमोलपल कब हाथ से निकल गए ये पता ही नहीं चलेगा
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आज आप सारा दिन कुछ इस तरह दिखें इस लिए खुश रहे ।२.आज आपको कुछइस तरह खुबसूरत विचार आते रहे .शुभ कामनाएं
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आज का विचार

‘‘हिन्दू धर्म का वर्णन एक शब्द में इस प्रकार किया जा सकता है—उचित कार्य करना।’’ डॉ. एस. राधाकृष्णन
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नव निर्माणएक विशाल जंगलजंगल में एक बरगद का पेड़पेड़ पर सुन्दर सा घोंसलाघोंसले में बसा पक्षी का संसारतेज हवा का झोंका आयाऔर ,सुन्दर घोंसला हो गया तितर-बितरपक्षी की अल्हड़ता का हुआ अंतबिखरे घोंसले को देख करनन्हा पक्षी चिंतित था अब ,नव निर्माण के लिए
May 28 2010 12:24 PM
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आज का विचार

‘‘थोड़ी सी मधुरता बड़ी कटुता को समाप्त कर ही देती है।’’जॉन कीट्स
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आज का विचार‘‘शिक्षा वह ज्ञान है जो यह बताता है कि अपने सम्पूर्ण व्यक्तित्व का उपयोग किस प्रकार किया जाए।’’हेनरी वर्ड बीचर
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आज क विचार

सफलता का रहस्य उद्देश्य की स्थिरता है।’’बेन्जमीन डीसरैली
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म.प्र. में तैयार होगा साहित्यिक गजेटियर--------------------------------------------------------------------------------भोपाल । गजेटियर की तर्ज पर अब प्रदेश के हर जिले का साहित्यिक इतिहास भी लिखा जाएगा। संस्कृति विभाग ने इसकी तैयारियाँ शुरू कर दी है। इसके
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जीवन की तीनबचपन की मेरी महत्वाकांक्षाएंबगुले के पंखों सी उज्जवल ,सुबह की कच्ची धूप सी रुपहलीऔर,मासूम कलि सी कोमल थीजो,सागर सी गहरीआकाश सी अनंतधरा सी धेर्यवानऔर ,पंछी सी नादाँ थीयोवन की मेरी महत्वाकांक्षाएंजो, दोपहर की धूप सी ज्वलंत हेंआकाश सी बिना
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एक था बचपन

गाना / Title: इक था बचपन - ik thaa bachapan चित्रपट / Film: Aashirwad संगीतकार / Music Director: Vasant Desai गीतकार / Lyricist: गुलजार-(Gulzar) गायक / Singer(s): लता-(Lata) , chorus इक था बचपन, इक था बचपनछोटा सा नन्हा सा बचपन, इक था बच्पनबचपन के इक
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आज मदर्स दे एक अनमोल रिश्ता माँ और बच्चे का -----------क्या किसी डे का मोहताज होता है -----------------------------नहीं न ?जब तक बच्चे माँ को माँ कहते है जितनी बार कहते है वो हर लम्हा माँ का मदर्स डे होता है .जब नन्हा बच्चा रोता हे ,जब वह सोता हे ,जब वह
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इश्वर की दूवा होती हे माँ

आज मदर्स डे-------------------------एक अनमोल रिश्ता माँ और बच्चे का -----------क्या किसी डे का मोहताज होता है -----------------------------नहीं न ?जब तक बच्चे माँ को माँ कहते है जितनी बार कहते है वो हर लम्हा माँ का मदर्स डे होता है .जब नन्हा बच्चा रोता
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ना ----मै --------नी -------बोलना ----जब भी सोंचती हूँअब मेँ चूप रहूंगी ,तबमन की चंचलता हिलोले ल्रती हैआदतों का बचपना पुकारने लगता हैआशाओं का स्वप्न संवरने लगता हैभावनाओं का ज्वार उफनने लगता हैआखों का जल छलकने लगता हैऔर तब ,ना चाहते हुए भीएक
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बोले रे पपिहरा

स्वाति एक नक्षत्र हे जिसकी बूंदें सिप में गिरकर अनमोल मोती बनती हें .नक्षत्र जिसके लिए चातक पक्षी वर्षभर प्यासा रहता हे स्वाति नक्षत्र की बुँदे उसके लिए अम्रत बनती हे .जिसकी बुँदे कदली के पत्तों पर गिरकर कपूर बन उड़ जाती हे .एक नक्षत्र जिसकी बूंदें शेष
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संकल्प

हम भी बुन लेते हैंसंकल्पों के जाले,ठीक उस मकड़ी की तरहजो घर का सपना देखतीउलझ जाती है ,स्वयं के बुने जालों मेंहमारे स्वप्नों के ये जालमहीन तारों से बुने होते है ,चटक रंगों ,रेशमी तारों के वावजूद,जकडन की चिपचिपाहटफंस जाने की उकताहट सेमुक्त होनेकी छात्पताहत
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जीवन उत्सवऐसे भी पल आये जीवन मेंअखिंयाँ रह गयी ठगी ठगीमन अचरज से भर आयातन लहराया गंध -सुगंध साजीवन उत्सव कहलायाऐसे भी पल आये जीवन मेंमन उपवन -सा महकायादीप्त शिखा का उज्जवलएक स्वप्न -सा उभर आयामुक्त का सीपी से हो बंधनऐसा ही बंधन बंध आयाऐसे भी पल आये जीवन
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पानी रे पानी तेरा रंग कैसा

कल ही की बात है , अपने गांव गई थी , गांव कभी साढ़े बारह तालाबों से पहचाना जाता था ,उसी गांव मे पानी आज सबसे बड़ी समस्या हो गया है .सुन्दर शीतल कुएं ,बावडियों वाला राजा भोज का धार टेंकरों से पानी लेता है .पानी अडोंसपड़ोंससे झगडे का कारणबन गया है .पानी की
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ब्रह्मकमल

गीली माटी पर बने पदचिन्ह सूख जाते हैं, मगर हिमालय की चट्टानी सतह पर नए अंकुरों का स्वागत करती है प्रकृति नभ का विस्तार सदा वैसा ही, पर धरती का श्रृंगार सदा बदला करती है प्रकृति पावस के आते ही पर्वतों के दुर्गम स्थानों मेंे सौंदर्य का नया उल्लास फटते देखा
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कहानीएक ताजा खबरडॉ.स्वाति तिवारी''हम बाजार में खड़े हैं, बाजार के लिए ही काम करते हैं, हमारे घर का चूल्हा हमारी स्टोरी के बिकने पर जलता है। क्या करें... भाभी जिस समाज का समूचा ढांचा ही दोहरे मानदण्डों पर टिका है वहां अपने आदर्श नहीं चलते..... आदेश रखने
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डर कहानी

सुहाग पड़वा का व्रत था। सुबह पूजा करके परिवार के बुजुर्ग नाते-रिश्तेदारों के यहाँ चरणस्पर्श करने की परम्परा है। मैं उसी परम्परा का निर्वाह करते हुए आशीर्वादलेने अपने पिताजी के अभिन्न मित्र के घर पहॅुंची। दरअसल इस शहर में वे मेरे मायके की भूमिका निभाते
Apr 18 2010 09:40 AM
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झूठ की बुनियादडॉ. स्वाति तिवारीमहानगर कीतेज रफ्तार वाली आपाधापी-भरी जिन्दगी में तो चारों तरफ शोर ही शोर है । शोर भी इतना कि लोगों के कान या तो कम सुनने लगे हैं या कहें ,ऊंचा सुनने के अभ्यस्त हो गए हैं । इसी ध्वनि प्रदूषण,वायु प्रदूषण से बचने के लिए हमने
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स्मृतियाँजैये नीले समंदर परउठती-गिरती उज्जवल लहरेंजैसे सुख के चमकीलें दिनऔर दुख की स्याह रातेंकितना अजीब है प्रकृति का क्रमएक रंग में से उभरता दूसरा रंगजीवन भी रंग बदलता है, हर पल,हर कदमपर तुम अकेले कहाँ, जीवनसाथी है तुम्हारे संग,मज़ा है तब जब हो आपसी
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सपने ये सपने क्षणभंगुर है साबुन के बुलकुले पल में बनते पल में टूटते हैं रेत के महल। एक कोमल हवा के झोंके से गिर जाते, इस दिल में चाह जगाकर रात के गुमनाम अँधेरों में खो जाते, ये सपने क्षणभंगुर। चोरी से आँखों के रास्ते दिल में बसकर, अचानक एक पल की करवट से
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शब्दों के अक्षत

विचारों की एक नदी हम सब के अंतस में बहती है ,प्रवाह है कि थमने को तैयार नहीं ,और थमना भी नहीं चाहिये क्यूंकि जीवन चलने का नाम है अंतस का यही प्रवाह तो अभिव्यक्ति का उदगम है .थमने मत दी जिए बस थामे रहिये इस उदगम को विचारों का मंथन जाने कब कोई रत्न उगल दे
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कहानी मुट्ठी में बंद चाकलेट

o. स्वाति तिवारीअभी ठीक से नींद खुली भी नहीं थी कि किसी ने फोन घनघना दिया। एक बार तो मन में आया, बजने दूं अपने आप बंद हो जाएगा। सुबह-सुबह कौन नींद खराब करे। सर्द रात में सुबह-सुबह ही तो अच्छी लगती है नींद, जब बिस्तर गरमा जाता है रातभर में। एक बार बाहर
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कहानी

अचारस्वाति तिवारीमई की तेज धूप को देखकर याद आया कि चने की दल को धूप दिखाना है । ऑगन की धूप में पुरानी चादर बिछाकर स्टोर रूप में चले की दाल की कोठी निकालने गयी तो अचार का मर्तबान (बरनी) दिखाई दे गयी । दाल को धूप में फैलाकर पलटी तो अचार का ख्याल आया, लगे
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achar

अचारस्वाति तिवारीमई की तेज धूप को देखकर याद आया कि चने की दल को धूप दिखाना है । ऑगन की धूप में पुरानी चादर बिछाकर स्टोर रूप में चले की दाल की कोठी निकालने गयी तो अचार का मर्तबान (बरनी) दिखाई दे गयी । दाल को धूप में फैलाकर पलटी तो अचार का ख्याल आया, लगे
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हमें भी फक्र है

आह़ाजिन्दगी ,में उस्ताद अमजद अली खां ने बड़े फक्र के साथं लिखा है किअनेक राजनीतिकपार्टियों ने मध्यप्रदेश में शासन किया ,लेकिन किसी ने भी महानसंगीतज्ञ तानसेन के नाम पर संगीत अकादमी या संगीत संस्थान बनाने पर विचार नहीं किया .संभव है कि आज कि युवा पीढ़ी
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shabdon ke akshat

बेहतर दुनिया के लिए के लिए बेहतर शब्द चाहिए .शब्द पंखों की तरह हलके ,मुलायम, सुनहरे ,उर्जावान हों जो हमें दुनियाकी सैर करादें.जो नीले गगन से लेकर खुरदुरी जमीं पे भी लायें तो खुरदुरे पन का एहसास न हो .क्या हम गढ़ सकते हैं एसे शब्द?
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बन्द मुट्ठी

आज सुबह से ही सामने वाला दरवाजा नहीं खुला था। अखबार बाहर ही पड़ा था। 'कहीं चाची....? नहीं, नहीं.....' मैं बुदबुदा उठती हूँ।एक अनजानी आशंका से मन सिहर जाता है, पर मैं इस पर विश्वास करना नहीं चाहती....। मन-ही-मन मैं सोचती हूँ, 'रात को तो बच्चों को बुला रही