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तुम किसकी माँ हो मेरी मातृभूमि

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10 Jun 2010
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हमारी नयी ज़िंदगी

शबीह ने अभी बारहवीं की परीक्षा पास की है, कविताओं से इन का नाता खून पानी का है, नौ दस साल की होंगी तब से ही शबीह ने कविता के साथ उठना बैठना शुरू कर दिया था, छोटी उम्र में ही उनकी कविताओं ने अनुभवों की निजता का परिचय दे दिया है, शबीह का पहला संकलन 'हमारी
 
आशुतोष पार्थेश्वर
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लोकमान्य की कुछ तस्वीरें

लोकमान्य बालगंगाधर तिलक और उनसे जुड़ी कुछ तस्वीरें ,,,,,,,,, (ये तस्वीरें प्रभा में 1920 में तिलक महाराज के निधन के पश्चात प्रकाशित हुई थीं, वहीं से इन्हें साभार प्रस्तुत किया जा रहा है । ये तनिक धुँधली जान पड़ सकती हैं, पर 90 वर्षों के बाद भी इनमें इतनी
 
आशुतोष पार्थेश्वर
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राजेंद्रबाबू मेरे सर-माथे पर

राजेंद्र प्रसाद की ख्याति उनके छात्र जीवन में ही सार्वदेशिक हो गई थी, प्रसिद्ध है कि उनकी उत्तरपुस्तिका पर परीक्षार्थी के परीक्षक से श्रेष्ठ होने की टिप्पणी की गई थी । पटना में हाईकोर्ट खुलने से पहले वे कलकत्ता में वकालत करते थे, वकालत में भी उन्होंने
 
आशुतोष पार्थेश्वर
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बेसन की सोंधी रोटी

बेसन की सोंधी रोटी पर खट्टी चटनी-जैसी माँ याद आती है चौका बासन चिमटा, फुकनी जैसी माँ बान की खुर्रि खाट के ऊपर हर आहट पर कान धरे आधी सोई आधी जागी थकी दोपहरी जैसी माँ चिड़ियों की चहकार में गूँजे राधा-मोहन, अली-अली मुर्गे की आवाज से खुलती घर की कुंडी जैसी
 
आशुतोष पार्थेश्वर
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जाना खुदा के पास है

के.के.दत्ता की एक किताब है, WRITINGS AND SPEECHES OF गाँधी JI RELATING TO BIHAR : FROM 1917-1947 . कुछ दूसरी चीजें तलाशते हुए यह किताब दिख गयी, उलट-पुलट कर देखा तो सबसे पहले इसमें जगह पाई तस्वीरों ने अपना ध्यान खिंचा. इस किताब में कई तस्वीरें डाली गयी
 
आशुतोष पार्थेश्वर
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'चाँद' से दो चिट्ठियाँ

'चाँद' से दो चिट्ठियाँ 'चाँद' हिंदी की एक चर्चित पत्रिका थी, साहित्यिक, सामाजिक और समकालीन राजनितिक विषय इसमें स्थान पाते थे, इसकी दृष्टि संकोचरहित थी. सुधारात्मक उत्साह के साथ यह देशोत्थान का लक्ष्य रखती थी. इसके 'मारवाड़ी' और 'फांसी' अंकों का ऐतिहासिक
 
आशुतोष पार्थेश्वर
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बेटी की विदाई

कवितायेँ जीने के लिए जरूरी हैं, दूसरों की नहीं कहता; पर अपने लिए तो यह बहुत बड़ी जरूरत है. राजेश जोशी की पहले पढ़ी एक कविता आज फिर पढ़ी, नया कुछ लगा ऐसा नहीं कहूँगा. हाँ! पुराना जरूर सिहर गया. राजेश जोशी की कविताओं में स्वाद होता है, कई किस्म के स्वाद.
 
आशुतोष पार्थेश्वर
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हार-जीत

अशोक वाजपेयी की गद्य-कविता ' हार-जीत ' हिंसा की संस्कृति को बेहद शांत रूप में उघारती है. यह कविता ताकत , वर्चश्व और हिंसा के संस्थानों के सच को सामने लाती है. यह युद्ध मात्र का सच प्रकट करती है, स्वाभाविक रूप से इससे उसके सम्बद्ध पक्षों का सच भी प्रकट हो
 
आशुतोष पार्थेश्वर
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हिंसा और प्रतिहिंसा

नक्सली हिंसा में ७४ से अधिक सिपाहियों के मरने की कीमत कौन चुका सकता है, इसके बदले में १७४ 'माओवादियों' को मार गिरा कर क्या बदला लिया जा सकता है ! कैसे संभव है यह ? जब इस तरह जवानों की लाश गिरती है तो वह केवल मातम या उत्सव का दिवस नहीं होता. क्या-क्या
 
आशुतोष पार्थेश्वर
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आचार्य रामचंद्र शुक्ल

आचार्य रामचंद्र शुक्ल शुक्लजी की आलोचना और इतिहास दृष्टि की कई विशेषताएँ गिनाई जा सकती हैं. इस पोस्ट में ऐसा कुछ नहीं किया जाएगा. हम ले चलेंगे आपको 'माधुरी' के पन्नों पर. माधुरी के वर्ष १३, खंड ६ संख्या १, में 'सम्पादकीय विचार' में शुक्लजी हो 'हिंदी
 
आशुतोष पार्थेश्वर
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नदियाँ रोती हैं

नदियाँ रोती हैं केदारनाथ सिंह के संकलन 'उत्तर कबीर और अन्य कविताएँ' में 'नदियाँ' शीर्षक से एक कविता संकलित है. मार्च महीने के इस तीसरे शनिवार को 'अर्थ आवर' मनाते हुए यह कविता कुछ बेहद ही मार्मिक, चिंतनीय और जरूरी सवाल खड़ा करती है. धरती की तबियत ठीक नहीं
 
आशुतोष पार्थेश्वर
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मातृभूमि

मातृभूमि अरुण कमल की यह कविता उनके संकलन 'पुतली में संसार' में संकलित है. कवि और कविता के विषय में कुछ कहने से बेहतर है सीधे कविता पढ़ी जाये.... आज इस शाम जब मैं भींजता खड़ा हूँ आसमान और धरती के बीच तब अचानक मुझे लगता है यही तो तुम हो मेरी माँ मेरी
 
आशुतोष पार्थेश्वर
Mar 26 2010 06:51 PM
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भगत सिंह और प्रेमचंद

भगत सिंह और प्रेमचंद भगत सिंह और गाँधी के सम्बन्ध कभी एक रैखिक रूप से व्याख्यायित नहीं किये जा सकते.गाँधी ने क्या कहा, यह महत्वपूर्ण तो हैं ही गाँधी के अनुयायिओं ने, जो देश के बौद्धिक प्रतिनिधि भी कहलाते थे, और हैं. भगत सिंह और देश के क्रन्तिकारी आन्दोलन
 
आशुतोष पार्थेश्वर
Mar 23 2010 09:35 PM
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भगत सिंह

भगत सिंह भारतीय ह्रदय की सबसे जीवंत स्मृतियों में से हैं. आज उनका बलिदान दिवस है. उनकी शहादत के बाद भारत की लगभग सभी भाषाओँ में उन पर लिखा गया, वह जन-ज्वार का प्रकटीकरण था. यहाँ 'माधुरी' के पन्नों से भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की तस्वीर दी जा रही है. ये
 
आशुतोष पार्थेश्वर
Mar 23 2010 12:34 PM
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लाल चिरैया

लाल चिरैया 80 के बाद बिहार से आने वाले एक प्रमुख हिंदी कवि सुरेन्द्र स्निग्ध की यह बेहद कोमल कविता आपको बचपन के दिनों में ले जाएँगी. लिए चोंच में घास किरन की पूरब में हर सुबह-सुबह क्यों लाल चिरैया आती है ? बैठी मेरे घर की छत पर देहरी पर फिर धीरे-धीरे
 
आशुतोष पार्थेश्वर
Mar 22 2010 08:47 PM
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जल, कविता और गोरैया

जल, कविता और गोरैया के लिए, विनोद कुमार शुक्ल की यह कविता पढ़िए. वृक्ष की सूखी वृक्ष की सूखी टहनियों के समानांतर मैंने अपनी दो सुन्न बाहें फैलाईं और फुनगी पर एकटक दृष्टि यह चाहता हूँ कि जब पानी आये तो पहले आँखें भिंगों दे फिर कोई चिड़िया मेरी बाँहों की
 
आशुतोष पार्थेश्वर
Mar 22 2010 08:27 PM