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हिंदी हैं हम..

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नयी प्रविष्टी लिखी
15 Jun 2010
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पत्र,पात्र और मित्र...

प्रिय साँझ, बरसों से तुम्हें इसी नाम से पुकारा है..संध्या नाम मेरी दादी का था|इसलिए कभी उस नाम से पुकार ही नहीं पाया|जानती हों क्यों.. क्योंकि ये नाम मैंने कभी प्रेम से सुना ही नहीं था|दादाजी की कडकती रोबदार आवाज़ में जब हमारे घर में ये नाम गूंजता,तो वो
 
आस्था "देव"
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चलो..दूर तलक..

हँस दो एक बार फिर,बादल शायद छंट जाएँ...चाँद निकल आये बदली से,चाँदनी से आँगन नहाये....हुई है बात छोटी सी,और तुम बैठे हों मुंह फुलाए,ऐसा ना हों इस गुस्से में,पूनम अमावस बन जाए...आँखों में हों जिनके सपने,नीर भूलकर ना आ पाए,इन अश्रु की बूंदों से,स्वप्न धूमिल
 
आस्था "देव"
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क्या पाया संग होकर...

वो हमेशा मेरे साथ हैं,कई बार मेरी गलतियों को बहुत कड़े शब्दों में इंगित करतें हैं,तब मैं सच में बहुत व्यथित हो जाती हूँ|मुझे बचपन से गलतियों के लिए सज़ा क्या फटकार भी अच्छे से नहीं मिल पाई|पिता के अतिशय स्नेह ने जहाँ मुझे जहाँ घर में एक विशिष्ट स्थान
 
आस्था "देव"
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उन्मुक्त..

मैंने पंखों को सहेजा है,कल के सारे सपनों को,अपने इर्द गिर्द लपेटा है...एक नन्हे सपने को देने, नई अच्छी सी जमीन,आसमान में उड़ते पंक्षी से,मैंने अपना मुंह फेरा है....रुकने से राहें रूकती नहीं,ना कारवां रुकता है यारों,मंजिलों तक पहुँचता हों,नया रास्ता मैंने
 
आस्था "देव"
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सार्थक....अंतिम भाग

फिर उस अनजानी धरती पर प्रधुमन्न का हाथ थामे,मैं बढ़ती ही गयी|कुछ अपने घर के काम और कुछ साहित्यिक जुड़ाव ने मुझे कभी खाली नहीं रखा|शादी के शुरू के तीन साल,ऐसे ही बीत गए और श्रेयसी भी मेरे पास आ गयी|एक छोटी सी गुडिया,जिसकी बहती नाक या एक छींक मुझे परेशान
 
आस्था "देव"
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सार्थक...अंतिम भाग

फिर उस अनजानी धरती पर प्रधुमन्न का हाथ थामे,मैं बढ़ती ही गयी|कुछ अपने घर के काम और कुछ साहित्यिक जुड़ाव ने मुझे कभी खाली नहीं रखा|शादी के शुरू के तीन साल,ऐसे ही बीत गए और श्रेयसी भी मेरे पास आ गयी|एक छोटी सी गुडिया,जिसकी बहती नाक या एक छींक मुझे परेशान
 
आस्था "देव"
May 29 2010 06:14 PM
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सार्थक....गतांक से आगे२

हर रिश्ता अलग होता है,दो लोगों के बीच रिश्ता उनके स्वाभाव के रंग में रंग होता है|हमारे समय में बात अलग थी.माँ का सारा समय हमारा था,इसलिए जब मैं शादी कर के पति के साथ अमेरिका जाने लगी तो माँ बहुत व्यस्त हों गयी थी|"गुड्डो,अचार नहीं ले जा सकती ना|बनाने का
 
आस्था "देव"
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सार्थक....गतांक से आगे

"हाँ,अकेले ही जा रही हूँ|बंगलोर से आ रही हूँ|मेरे कॉलेज बैच का सिल्वर जुबली फंक्सन है|"उसकी इस हड़बड़ी ने मेरे चेहरे पर बरबस एक मुस्कान ला दी थी|इस लड़की में पुरानी उत्तरा को देख कर अच्छा लगा था,या यूँ कह लूँ एक अपनापन सा लगा|वो भी अपना सामान ठीक करने
 
आस्था "देव"
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सार्थक..

सार्थक........जीवन ,बातें,परिश्रम या रचना,किसी के साथ जुड़ कर उसके साथ एक अनुभूति को जोड़ता है|वो अनुभूति है संतुष्टी|जब कोई भी बात या कार्य ,कोई अर्थ लिए हुए होता है,तो उसके सफल या असफल होने से ज्यादा उसका होना संतोष से भर देता है|जब बात सार्थक अस्तित्व
 
आस्था "देव"
May 26 2010 02:08 PM
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एक अंतराल के बाद... सबको अभिवादन!!!

ये ब्लॉग मेरे लिए एक शिशु है... जिसका उदगम मेरे ह्रदय से हुआ है|ऐसे में एक छोटा अंतराल भी लंबे विछोह सा प्रतीत हुआ|ये एक छाँव भी है, जो किसी भी अवस्था मुझे आश्रय और शीतलता दोनों प्रदान करता है|मेरे हर उदगार को,ये एक माँ के सामान आँचल में समेट लेता
 
आस्था "देव"
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राही

बैठे हुए अचानक,मन में कुछ आया ...उस एक सपने ने,मुझको कवि बनाया...होठों पर एक रेखा ,जब स्मित की आई,मन में आशा की,कली फूल बन पाई...पलकों के अंदर बंद,सपनों ने ली अंगडाई,अपने छोटे लक्ष्यों की,हमने एक सूची बने...आँखों में छुपे उजाले,चमक नई वो लाये,सारी दुनिया
 
आस्था "देव"
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रामायण... जीवन का दर्पण१

रामायण,एक महाकाव्य है,इसमें कदाचित कोई संदेह नहीं|परन्तु,ये कथा इतनी पुराणी होकर भी ना केवल प्रासंगिक है वरन जीवन का दर्पण है|हर प्रकरण,हर प्रसंग,जीवन की इतनी सारी वास्तविकता और विशेषता को स्वयं में समाहित किये रहता है कि अपने जीवन में रामायण से साम्य
 
आस्था "देव"
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नारी आत्मनिर्भरता:सच या मिथक!

आज जब चारो तरफ महिला विधेयक की वाह वाही सुनती हूँ,तो मुझे अजीब लगता है|नारी सशक्तिकरण के इस युग में,इस बैसाखी की क्या सचमुच हमें जरूरत है|जहाँ आज रेलवे में महिला कूपे नहीं रहे,वहाँ संसद में इसकी क्या आवश्यकता|भले ही ये विषय राजनैतिक हो और इसकी जड़ें समाज
 
आस्था "देव"
Apr 27 2010 09:08 PM
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नारी आत्मनिर्भरता:सच या मिथक!

आज जब चारो तरफ महिला विधेयक की वाह वाही सुनती हूँ,तो मुझे अजीब लगता है|नारी सशक्तिकरण के इस युग में,इस बैसाखी की क्या सचमुच हमें जरूरत है|जहाँ आज रेलवे में महिला कूपे नहीं रहे,वहाँ संसद में इसकी क्या आवश्यकता|भले ही ये विषय राजनैतिक हो और इसकी जड़ें समाज
 
आस्था "देव"
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प्रेम का संगीत..

"आमी अरिंदम",अचानक कुछ याद आया,"मैं अरिंदम भट्टाचार्य,किरायेदार !!!"कौन वाला किरायेदार बाबु,इन्हा त तीन ठों हैं |"दरवाज़ा खुल गया और सामने खड़ा मकान मालिक का नया नौकर बतीसी दिखाने लगा|मुझे बहुत जोर का गुस्सा आया,जी किया मुंह ही तोड़ दूँ|लेकिन इस महंगाई
 
आस्था "देव"
Apr 20 2010 08:17 PM
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एक सुख

ये अच्छा या वो है अच्छा,ये चुनाव तो करना होगा,जीवन के इस पथ में मुझको,एक रास्ता पकडना होगा...जब एक तरफ मेरी सफलता,दूसरी तरफ मेरी खुशियाँ हों,मुझको मेरे लिए मुझसे हे,कई दिनों तक लड़ना होगा...वो सफलता,जिसमें खुशी है,वो खुशी,जिसमें होगी सफलता,इन सारे
 
आस्था "देव"
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लड़ना बुरी बात नहीं!!!

छोटी बात को बड़ा करना,परेशान होकर खुद पे बिगाडना...ये तो अच्छी बात नहीं,पर सही गलत का फर्क समझकर,हक की आवाज़ उठाने में,लड़ना बुरी बात नहीं....समझौता कर लेना यूँ तो,काम कोई आसान नहीं,लेकिन भूल अपने उसूल ,झुकना अच्छी बात नहीं...क्षमा दया के भाव ह्रदय
 
आस्था "देव"
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मन का कोना

चलता है जीवन ऐसे,चलना,रुकना ,हँसना रोना,सबमें भरता रहता है,पर खाली है मन का एक कोना.....सुबह की किरणें जब,आँगन को भर जातीं हैं,खाली आँचल की टीस बेटे,मुझको बहुत सताती है...तेरे बापू यूँ तो सबके सामने,गर्व से सीना फुलातें हैं,कई बार अँधेरे कमरे में,बिना
 
आस्था "देव"
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अहम अस्मि!

जीवन कभी एक जैसा नहीं रहता, कभी बहुत अच्छा,कभी थोडा अच्छा,कभी ठीक-ठाक सा समय भी चलता है|पाठकों को किंचित आश्चर्य होगा कि मैंने बुरे समय का जिक्र नहीं किया| इसका ये मतलब नहीं कि मैं वास्तविकता की दुनिया से परे किसी काल्पनिक दुनिया में विश्वास रखती
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जिंदगी के रंग

मैंने कई बार तुम्हे, करवात बदलते देखा, कभी हँसते,कभी रोते, कभी सँवरते देखा, हाँ,मेरी जिंदगी मैंने, तुझे प्रतिपल निखरते देखा.... अक्सर जब मैंने अकेलेपन में, खामोशियों को टहलते देखा, अपने हालातों से लड़ने में, आदमी को बनते-बिगड़ते देखा.. पाने की प्रतिपल
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दुहाई

सब कहतें है रह चुप,उन बातों पर,जिन्हें तू जानती नहीं,जिन्हें देखा नहीं तू ने,जिन्हें तू नहीं पहचान पाई है..नहीं जानती लाल विचारधारा,देखी नहीं मैंने बंदूकें,इस नफरत को पहचानती नहीं,मैं तो घर में बैठे थी चुप चाप,पर इन विचारों ने द्वन्द मचाई है...लाशें छाई
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तरक्की और नारी?

जिंदगी में कई बार हम परीक्षा देतें हैं,इन मौकों पर हम तैयारी करतें हैं ,कभी समझते कभी रट्टे लगा लेतें हैं|इस तरह ,हर बार हम तैयारी के साथ परीक्षा देतें हैं|हमें वो सवाल अच्छे भी लागतें हैं,जिनके उत्तर विकल्पों में छुपे होतें हैं|इस तरह साल दर साल हम आगे
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एक और ब्लॉग..

जीवन के हर रंग को उतारना चाह मैंने अपने इस ब्लॉग में..अभी दो महीने भी नहीं हुए,लगता है ये मेरी सबसे अच्छी सहेली हो|जिसे मैं अपने दिल कि कोई भी बात किसी भी रूप में कह देती हूँ और वो उसे और संवार कर सबके सामने प्रस्तुत करती है|इस ब्लॉग पर मैं अपने भाई के
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नया घर बनाएँ...

आओ थामो मेरे हाथों को,हम दूर तलक जाएँ,बंद कर ले पलकें,आँसू और ख्वाब दोनों छुपाएँ,हम दुनिया नयी सजाएं...रात और दिन दोनों है,जिंदगी के झोले में मगर,दिन से रौशनी ,रात से शबनम चुराएं,अलग सा शमा लगाएं....पहाड़ों घाटियों से जो गुजरें,उनकी ऊँचाइयों में गहरे,उन
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आपके साथ

यूँ तो ज़िन्दगी के अपने कुछ मायने थे,कहने को दोस्त थे, चाहतें भी थी...सपने थे बहुत कुछ करने के,फिर भी इंतज़ार था उनका....जब वो मेरे साथ नहीं थे...मैं तो गूम थी अपनी मस्रुफियतों में ,एक जिद थी ज़िन्दगी सवारने की,सपने दिल में कई थे यूँ तो,समझ कहाँ थी
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मेरा भाई..

जब मैं थी छोटी ,तुम बड़े थे,समय आसान हों या मुश्किल,तुम यूँ ही मेरे संग खड़े थे...आसमान में थी धुप तो,छाँव तुमने खोज ली थी,बारिश की बौछारों में,जब रास्ते टूटे पड़े थे,तब भी बचा मुझको,गंतव्य तक ले चले थे|बचपने में हम दोनों भी,दुश्मन सा ही लड़े थे,एक दूसरे
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बालकनी

आँख खुलते ही मेरी नज़र शांतनु के चेहरे पर पड़ी.. खुली खिडकी से सूरज कि किरणें उनके चेहरें पर आ रही थी| आज भी उनका चेहरा किसी बच्चे सा निष्पाप लगता है| कल रात ,उन्हें बहुत देर तक नींद नहीं आई थी, बाप बेटे जब भी एक मत नहीं होते तो शांतनु का यहीं हाल होता
Mar 20 2010 07:05 PM
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एक विराम...

अगले शनिवार तक के लिए,एक विराम ले रहीं हूँ|अगले रविवार तक फिर संस्मरण ,अनुभव और कल्पना को कविता,लेख या किस्से का रूप देकर आप सबके सामने प्रस्तुत करुँगी| आप सबने जो प्रोत्साहन दिया है अपनी टिप्पणियों के रूप में उसके लिए मैं आभार व्यक्त करती हूँ|आभार उनका
Mar 20 2010 06:51 PM
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अच्छा आदमी...अंतिम भाग.

"पाता है आशु,दिसम्बर में चेन्नई वो चेन्नई नहीं रहता,जो अक्सर हम जानतें हैं|तब वहाँ बादल छातें हैं,ठंडी हवा भी चलती हैं,अक्सर वहाँ से जब ट्रेन गुजरती थी तो मैं सोचता था इतनी उमस में लोग कैसे रह पातें हैं|लेकिन,समुद्र तट पर जब मैं गया तो लगा, वो उफनती
Mar 20 2010 05:52 PM
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अच्छा आदमी.....गतांक से आगे३

"ओह तो वो जो गिटार बजा रही थी" मैंने पूछा|अप्पू की आँखों में असमंजस आया, फिर अचानक वो मुस्करा दिया"गिटार तो मानस बजाता है,मानस याद है ना,अरे FIDO DIDO!!!""अच्छा तो फ़ीडो बोल ना,वो 7'UP का कार्टून... हाहाहाहा..."समाने खड़े मानस को देख मेरी हँसी में ब्रेक
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अच्छा आदमी

धुप बहुत कड़ी हो गयी थी| मैं वातानुकूलित कार में भी मानो झुलसा जा रहा था| मुझे अपने उस दोस्त पर गुस्सा भी आया ,जिसने मुझे किसी चैरिटी फंक्सन में बुलाया था| मेरी जिंदगी बहुत आरामतलब रही है|ये नहीं कह सकता कि बहुत ऐशो आराम का बचपन रहा पर जैसे जैसे बड़ा
Mar 19 2010 10:29 AM
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अच्छा आदमी.....गतांक से आगे२

ये आवाज़ घर के पीछे से आ रही थी|मेरे कदम बरबस उसी दिशा की तरफ बढ़ने लगे|वहाँ २०-२५ बच्चो ने किसी को घेर रखा था और वो गिटार बजा रहा था और सब झूम के गा रहे थे| ये वही धुन थी,जो बचपन में मैं बहुत जोश से गाता था.."हम होंगे कामयाब, हम होंगे कामयाब, हम होंगे
Mar 18 2010 06:21 PM
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पहचान

मैं पौधा था छोटा,अभी कुछ बरस पहले,नया नया वृक्ष मैं,अभी तो बना था....कुछ फूल खिले थे,डालियों पर मेरी,भवरो ने रस लेकर,उनको था गिराया...तब आए थे फल कुछ,मेरे भी तने पर,जो हवा के तेज झोंके,से गिर पड़े थे..एक बार थी आई,यूँ जोरो कि आंधी,मेरी टहनियों को भी,उड़ा
Mar 15 2010 07:52 PM
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छोटा बच्चा जान के...

एक शेर,एक बच्चा :)
Mar 15 2010 02:39 PM
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ताजमहल और जोधामहल

मैंने एक ही दिन में जोधा का महल और ताजमहल दोनों देखा|सच बातों तो लोगों को भले ही ताजमहल प्रेम का प्रतीक लगे पर मुझे जोधा के महल और उस पुरे किले में भी वो ही प्रेम मिला जो ताज महल में दिखा|२८ फ़रवरी की सुबह ही हम मथुरा से निकले,कहना ही होगा की रास्ता कुछ
Mar 15 2010 01:57 PM
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हम होंगे कामयाब

जिंदगी बदलती थी,बदलती है और बदलती रहेगी|काश,हम इस बात को जैसे जानते हैं वैसे मान भी पाते|पर हम तो परेशान होने में अपनी खुशी समझतें हैं| कुछ हुआ नहीं कि हो गए परेशान| परेशान होना सुलझाने से आसान काम जो ठहरा|सुलझाने के भैया सौ लफड़े होंगे, पहले दिमाग भिड़ा
Mar 12 2010 04:19 PM
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संगी साथी.....

कुछ था चंचल बचपन,कुछ दोस्त थे दुश्मन,जो हमको हराते थे,हर खेल में लड़ जाते थे,वही तो संगी साथी कहलाते थे..जिनसे माँ नंबर मिलाती थी,कम होने पर डाट पिलाती थी,पापा को देखकर राह में,हम दोनों छिप जाते ,पतंग लूटनी हो तो वो,धक्का दे दूजे को गिराते,वही संग बैठ
Feb 24 2010 07:39 AM
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वो धुप और वो चांदनी

जिंदगी अजीब है,हम जितने आगे बढतें हैं, उतने पीछे छुटते भी है|हमारा वजूद एक पल के लिए ना होकर कई पलों से बनता है..ये वजूद के हिस्से , अपने आप में कई हिस्से समेटे रहतें हैं|जिंदगी का मकसद जैसी फिलोस्फिकल बातें मुझे समझ नहीं आती,मुझे भावनाएं समझ आती हैं पर
Feb 22 2010 12:30 PM