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18 Jun 2010
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रचना भी एक साधना

रचना चाहे कोई भी हो, आसान नहीं होती। किसी नयी रचना के लिए कुछ पुराना तोड़ना पड़ता है। जब कुछ ध्वस्त होता है तो रचना की जमीन बनती है। इसे दूसरी तरह से भी कह सकते हैं कि जब रचना होती है तो कुछ ध्वस्त होता है। अंकुर बाहर निकले, इसके लिए बीज को नष्ट होना होता
 
डा.सुभाष राय
Jun 18 2010 01:53 PM
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पाखंड का भंडाफोड़

भोपाल गैस कांड को लेकर कांग्रेस, उसकी सरकार और उसके मंत्रियों के पाखंड प्रलाप का भंडाफोड़ हो गया है। अमेरिका की एमोरी यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर गार्डन स्ट्रीब के एक बयान से कैबिनेट के वरिष्ठ सदस्य प्रणव मुखर्जी के उस तर्क की धज्जियां उड़ गयीं हैं, जो हाल
 
डा.सुभाष राय
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अर्जुन चुप क्यों हैं

आखिर अर्जुन सिंह ने अपने होठ क्यों सिल रखे हैं? वे बोलते क्यों नहीं, बताते क्यों नहीं कि सच क्या है? भोपाल गैस त्रासदी के अपराधी वारेन एंडरसन को सुरक्षित बाहर निकालने में उनकी भूमिका क्या थी? ऐसा उन्होंने किसी के निर्देश पर किया या अपने बुद्धिकौशल के
 
डा.सुभाष राय
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मेरे भीतर तुम उपस्थित रहोगे

ओ मेरे पिता! तुम्हारा अंश हूँ मैं सम्पूर्ण मां के गर्भ में रचा तुमने मुझे अपने लहू से तुमसे मुक्त कैसे हो पाऊंगा कभी कैसे वापस लौटा सकूँगा तुझे उसका अंश भी जो तुमने दिया है मुझे सब कुछ निछावर करके भी अपने आंसुओं के साथ रखा तुमने मुझे जो करुणा और
 
डा.सुभाष राय
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गाँव से आगे, गाँव के पीछे

गाँव खतरे में हैं. शहर धीरे-धीरे उन्हें निगल रहे हैं. शहरों में अंग्रेजी है, बड़े बाज़ार हैं, खूब पैसा है. लोग वैभव भरी जिंदगी में मस्त हैं. कुछ भी खरीद सकते हैं. अच्छे से अच्छा फोन, बड़ी से बड़ी गाड़ी, खूबसूरत कपडे. मजदूर भी. शहर में केवल वैभव ही है, ऐसा
 
डा.सुभाष राय
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द रेड साड़ी पर भारी बवाल

स्पेनिश लेखक जेवियर मोरो की पुस्तक द रेड साड़ी ने दिल्ली के राजनीतिक क्षेत्र में हलचल मचा रखी है। यह पुस्तक सोनिया गांधी की जीवनी पर आधारित है और स्पेन तथा इटली में पहले ही प्रकाशित हो चुकी है। देश के कई हिस्सों में किताब में लिखे गये अंशों की होली चलायी
 
डा.सुभाष राय
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योर फ्रीडम इन्ड्स, ह्वेयर माई नोज बिगिन्स

एक सवाल है आखिर आजादी के मायने क्या हैं? चूंकि हम एक आजाद मुल्क में रहते हैं, इसलिए आम तौर पर लोग समझते हैं कि उनकी आजादी असीमित है। वे कुछ भी बोल सकते हैं, कुछ भी लिख सकते हैं, कुछ भी कर सकते हैं। जो लोग कुछ भी कर सकने की आजादी को अपना अधिकार मानते हैं,
 
डा.सुभाष राय
Jun 05 2010 08:56 AM
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व्यंग्य पर व्यंग्य

लिखना ही है तो टिप्पड़ियां लिखिए बड़ी दर्दनाक बात है. मन दहल जाता है सुनकर. मुल्क में तमाम समस्याएं है. गरीबी की समस्या, महंगाई की समस्या, सरकार बनाने की समस्या और सरकार बन गयी तो उसे चलाने की समस्या. समस्याओं का अम्बार है. लगता है जैसे हम सब किसी समस्या
 
डा.सुभाष राय
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लाल किले को ममता का धक्का

पश्चिम बंगाल के क्रांतिकारी वामपंथी ममता बनर्जी की रेल के नीचे आ गये हैं। उनका कचूमर निकल गया है लेकिन वे धूल झाड़कर फिर खड़े होने की कोशिश कर रहे हैं। बहाने बना रहे हैं। अब भी हकीकत से आमना-सामना करने की जगह एक नया झूठ गढ़ने में जुट गये हैं। कह रहे हैं कि
 
डा.सुभाष राय
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राजनीति के असली चेहरे

प्रकाश झा की नयी फिल्म राजनीति बनकर तैयार है। एक-दो दिन में रिलीज होने वाली है। इस पर तमाम तरह की बातें कही जा रही हैं। कुछ लोगों ने इसका प्रदर्शन रोकने के लिए हाई कोर्ट में याचिकाएं भी दायर की थीं मगर अदालत ने उनकी बात सुनी नहीं। छुटभैये कांग्रेसियों का
 
डा.सुभाष राय
Jun 01 2010 05:23 PM
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नजर राजेश की नजर में

हाँ, मित्रवर राजेश उत्साही अपने बारे में कहते हैं--जीवन की सार्थकता की तलाश जारी है। 26 साल तक एकलव्‍य संस्‍था में होशंगाबाद, भोपाल में काम। बाल विज्ञान पत्रिका चकमक का सत्रह साल तक संपादन। स्रोत,संदर्भ,गुल्‍लक,पलाश,प्रारम्‍भ के संपादन से जुड़ा रहा।
 
डा.सुभाष राय
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विनाश का द्वार दिखता ही नहीं

आदमी अकेला नहीं जी सकता। उसकी जिंदगी धरती के अन्य प्राणियों से बेतरह जुड़ी हुई है। वह बहुत खतरनाक समय होगा, जब धरती पर केवल आदमी बच जायेगा। यद्यपि इस तरह की कल्पना की अभी कोई गुंजाइश नहीं दिखती लेकिन हम धीरे-धीरे उसी दिशा में बढ़ रहे हैं। दरअसल आदमी बहुत
 
डा.सुभाष राय
May 31 2010 05:18 PM
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नजर एटवी के जाने का मतलब

(शाहिद नदीम द्वारा प्रस्तुत) शऊर फिक्रो-अमल दूर-दूर छोड़ गया, वो जिंदगी के अंधेरों में नूर छोड़ गया. नजर एटवी साहब बिना किसी को खबर किये चुपचाप रुखसत हो गए. हम सबको आंसू बहाने का भी मौका नहीं दिया. पता नहीं कितने लोग होंगे जिनको महीनों तक खबर नहीं
 
डा.सुभाष राय
May 30 2010 10:21 AM
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जल्दी मौत चाहता है अफजल

क्या कालकोठरी में होना मौत से भी ज्यादा भयानक है? अफजल गुरु को तो ऐसा ही लगता है। वह कई साल से मौत के इंतजार में जेल में बंद है। उसकी दया याचिका पर राष्ट्रपति को फैसला करना है, पर इसमें जल्दी नहीं हो पा रही है। इस मामले को लेकर काफी राजनीतिक बहस भी हुई।
 
डा.सुभाष राय
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प्रेम की नगरी में प्रेम की बोली

भोजपुरी में पढ़ें आगरा में दो दिन का विश्व भोजपुरी सम्मेलन संपन्न हुआ। हमारे देश में हजारों बोलियां बोली और समझी जाती हैं। जो लोग जिन बोलियों में अपने को व्यक्त करते हैं, उनके पूर्वजों द्वारा इकट्ठा किये गये समस्त ज्ञान का भंडार उन बोलियों में सुरक्षित
 
डा.सुभाष राय
May 24 2010 01:15 PM
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कबीर भोजपुरी के आदिकवि

(आगरा में शनिवार से विश्व भोजपुरी सम्मेलन होने जा रहा है। दुनिया भर के तमाम देशों से और देश के कोने-कोने से भोजपुरी के विद्वान साधक ताज के शहर में आ डटे हैं। इस मौके पर हिंदी और भोजपुरी के बारे में मशहूर साहित्यकार और हिंदी के अप्रतिम विद्वान हजारी
 
डा.सुभाष राय
May 21 2010 06:38 PM
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नाटक ही तो है सब

मनुष्य के जन्म के साथ ही नाटक का जन्म हुआ होगा। भले ही हाव-भाव के प्रदर्शन और इस तरह खुद को अभिव्यक्त करने के विभिन्न तौर-तरीकों के लिए नाटक शब्द का प्रयोग बाद में हुआ हो लेकिन आदिम मनुष्य जब कभी बहुत प्रसन्न या बहुत दुखी होता रहा होगा तो अपनी मनोदशा की
 
डा.सुभाष राय
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पागल हत्यारों के हाथ तोड़ दें

दांतेवाड़ा भय की गिरफ्त में है। दांतेवाड़ा ही नहीं पूरा देश हतप्रभ है, चिंतित है, दहशत में है। भारत जैसे इतने विशाल देश की इतनी ताकतवर सत्ता शक्ति से लोगों का भरोसा उठने लगा है। सभी असुरक्षित महसूस कर रहे हैं, सबका विश्वास डगमगाने लगा है। हाल के दिनों में
 
डा.सुभाष राय
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देश का भविष्य संवारने का प्रयास

बच्चे देश के भविष्य होते हैं. अगर उनकी देखभाल ठीक से की जाय, उनके चरित्र निर्माण पर ध्यान दिया जाय और उनकी शिक्षा-दीक्षा की चिंता उचित ढंग से हो पाए तो कोई कारण नहीं कि हम एक मजबूत और संपन्न राष्ट्र का निर्माण न कर सकें. दुःख की बात है कि अपने देश में
 
डा.सुभाष राय
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वीरेंद्र हमदम की ग़ज़ल

मित्रों आइये आज वीरेंद्र हमदम की ग़ज़ल सुनते हैं. ये ग़ज़ल साहित्य की मशहूर पत्रिका अभिनव कदम में साया हो चुकी है --- कब किसी को तल्खियाँ अच्छी लगीं भूख थी तो रोटियां अच्छी लगीं जल उठे मेरी मशक्कत के चिराग पत्थरों की सख्तियाँ अच्छी लगीं क्यों रहें कमजोर
 
डा.सुभाष राय
May 15 2010 06:38 PM
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डरना क्यों

जो डरता है वह पल-पल मरता है बहुत डरावनी है मौत बताकर कभी नहीं आती चलने का न्योता नहीं देती ताकि आदमी मन बना सके घर वालों को समझा सके और कोई बहुत जरूरी काम हो तो निपटा सके इसीलिए हर कोई डरता है मौत से सब कुछ जल्दी-जल्दी कर लेना चाहता है धन-संपदा से घर भर
 
डा.सुभाष राय
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कलम के सिपाही किधर चल पड़े

आप जानते हैं समाचार क्या होता है? जब मैंने समाचार की दुनिया में दाखिला लिया था, तब मुझे पता नहीं था कि समाचार क्या होता है। समाचार लिखता था, मेरे लिखे समाचार प्रकाशित भी होते थे, प्रशंसाएं भी मिलती थीं पर न मेरे साथियों ने कभी मुझे बताया कि समाचार क्या
 
डा.सुभाष राय
May 13 2010 05:50 PM
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हिंदुस्तान इतना लाचार क्यों?

हिंदुस्तान जैसे विशाल देश के सामने पाकिस्तान की औकात क्या है? कुछ भी नहीं। न आर्थिक नजरिये से, न ताकत की दृष्टि से। यह बात कई बार साबित भी हो चुकी है। जब भी उसने सीधी रार छेड़ी, उसे मुंह की खानी पड़ी, पराजित होना पड़ा, झुक कर समझौते करने पड़े। उसकी इसी रार
 
डा.सुभाष राय
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इतने आत्मविस्मृत क्यों हैं हम

हर देशवासी चाहता है कि अपने देश के गौरव, उसकी प्रतिष्ठा पर कोई आंच न आये। भले ही वह स्वयं देश के लिए ज्यादा कुछ नहीं कर पाता हो, अपने निजी कारोबार में व्यस्त रहता हो लेकिन देश तो सबके दिल में बसा होता है, रगों में धड़कता रहता है। और फिर जो मेहनत हम अपने
 
डा.सुभाष राय
May 11 2010 06:06 PM
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संसार मृगमरीचिका के पीछे

बंशीधर मिश्र की कलम से संसार मृगमरीचिका के पीछे भाग रहा है। मृगमरीचिका अर्थात् जो है नहीं उसका पूरी तरह आभास। ऐसा आभास कि आंखें, मन, बुद्धि सब धोखा खा जाएं। इस समय पूरी दुनिया इसी धोखे का शिकार है। अपनी ताकत की चोटी पर बैठे अमेरिका का मायाजाल उसके अपने
 
डा.सुभाष राय
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जाति न पूछो साध की

जाति न पूछो साध की. यह इसी देश की परंपरा रही है. हमारे पूर्वजों ने बार-बार कहा है कि जाति का कोई मतलब नहीं है, यह बेमानी है. भगवान ने कोई जाति नहीं बनाई. उसने सिर्फ आदमी बनाया. उसे बांटा नहीं. उसे अलग-अलग दीवारों में कैद नहीं किया. आदमी-आदमी में कोई भेद
 
डा.सुभाष राय
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मंज़िल तक

सुबह हो गयी है. उठने और चल पड़ने का वक्त आ गया है, पर कहाँ, किसलिए औए क्यों? इन्हीं सवालों की छानबीन करते कुछ शब्द------ जो लीक पर चलते हैं वे पहुँचते हैं दूसरों द्वारा तलाशी गयी मंज़िल तक वे सिर्फ़ चलना जानते हैं अनुकरण करना उनकी अपनी कोई मंज़िल नहीं होती
 
डा.सुभाष राय
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अशोक रावत की गजलें

अशोक रावत गजलगोई में एक जाना-पहचाना नाम है। बकौल सोम ठाकुर, अशोक रावत उन गजलकारों में से एक हैं, जिनकी गजलों में युगीन दुर्व्यवस्था, दिग्भ्रमित राजनीति और संस्कारहीन मानसिकता को नितांत नवीन, चिंतना-सम्मत सहजात भाषा सौष्ठव के साथ कभी व्यंग्य, कभी विक्षोभ
 
डा.सुभाष राय
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सबके दिल की बात है गजल

गजल कहना और सुनना किसे पसंद नहीं है। इसकी खास वजह है, उसकी लय और उसमें निहित अर्थ का स्फोट। यह विधा पूर्व-अरेबियन कविता से छठीं शताब्दी के कुछ पहले निकली। फारसी साहित्य में गजल का वर्चस्व दिखता है। वहीं से यह अरबी, तुर्की, पश्तो और बाद में उर्दू में आयी।
 
डा.सुभाष राय
May 07 2010 04:58 PM
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यह पहेली आप हल करेंगे?

आज मन हुआ एक मजेदार खेल का. ब्लाग पर गज़लें बहुत पसंद की जाती हैं. जो भी पहुँचता है, दिल से पढता है और कुछ न कुछ अपने मन के उद्गार छोड़ जाता है. आइये मैं एक मशहूर नामचीन शायर की एक गजल सुनाता हूँ. ग़ज़ल के नीचे उस पर एक छोटी सी टिप्पडी है. उसमें उस शायर का
 
डा.सुभाष राय
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नाख़ून क्यों बढ़ते हैं : हजारी प्रसाद द्विवेदी

मेरी छोटी लड़की ने उस दिन पूछ दिया कि आदमी के नाख़ून क्यों बढ़ते हैं तो मैं कुछ सोच ही नहीं सका. जब आदमी जंगली था, वनमानुष जैसा, उसे नाख़ून की जरूरत थी. जंगल में वही उसके अस्त्र थे. दांत भी थे पर नाख़ून के बाद ही उसका स्थान था. उन दिनों उसे जूझना पड़ता था,
 
डा.सुभाष राय
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आवारगी के मजे

आवारगी किसे नहीं लुभाती. आवारा के मायने वो नहीं है जो अमूमन लोग लगाते हैं. आजकल किसी को आवारा कह दीजिये, वो लड़ने को आमादा हो जायेगा. इसका प्रयोग अब गाली की तरह होने लगा है. मेरे एक कवि मित्र हैं. जाने-माने कवि हैं.आगरे के हैं. रामेन्द्र
 
डा.सुभाष राय
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आइये ग़ज़ल सुनें

कहीं जाना है मुझे. जल्दी में हूँ लेकिन सोचा आप से कुछ बतियाता चलूँ. जब वक्त बहुत कम हो तो जो चीज सबसे ज्यादा मन को पसंद आती है, वो है ग़ज़ल. लीजिये दो गजलें पेश कर रहा हूँ. शायर किसी परिचय का मोहताज नहीं है. बड़ा नाम है जनाब मुनव्वर राणा का, आप जानते
 
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बात-बेबात ने अपने दो माह पूरे किये

बात-बेबात ने आज अपने दो माह पूरे कर लिए. चार मार्च को मैंने आरम्भ किया था. अपनी रचनाओं का प्रकाशन मेरे लिए कोई नयी बात नहीं थी. ब्लॉग पर आने के पहले मेरी सैकड़ों कविताएँ और टिप्पड़ियां समाचारपत्रों और प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी थीं. पर सच
 
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दिल क्यों है परेशां?

बेनाम से इक ख़ौफ से दिल क्यों है परेशा जब तय है कि कुछ वक्त से पहले नहीं होगा शहरयार साहब जब यह बात कहते हैं तो इस पर सोचने का मन करता है। यह सच है या नहीं पर लोग ऐसा ही कहते हैं। वक्त से पहले कुछ भी नहीं मिलता। हर मुलाकात का, हर बात का, हर खयाल का वक्त
 
डा.सुभाष राय
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मगर आईने सारे धुंधले हुए

अचानक शहरयार साहब के कलाम से नये सिरे से रूबरू होने का मौका मिला। समकालीन उर्दू शायरी में शहरयार एक बड़ा नाम हैं। हिंदी पाठकों में भी उनकी मुकम्मल पहचान है। वे अपनी शायरी में सामाजिक विसंगतियों को तो उभारते ही हैं, एक नये समाज का ख्वाब भी देखते हैं।
 
डा.सुभाष राय
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हम डर कर क्यों जियें

अमेरिका, आस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और कनाडा को लगता है, हिंदुस्तान के दिल पर हमला होने ही वाला है। कभी भी, किसी भी क्षण। उन्होंने अपने नागरिकों को चेतावनियां जारी की हैं, दिल्ली मत जाना, अगर दिल्ली में हो तो अपने ठिकाने पर बने रहना, बाजारों में मत निकलना,
 
डा.सुभाष राय
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उसने आत्महत्या कर ली

आज मन थोडा उदास था. उसने आत्महत्या कर ली. उसे मैं नहीं जानता था, मैंने देखा भी नहीं था. सुना कि वह सुंदर थी, पढने लिखने में भी ठीक थी. अभी किशोरावस्था की देहलीज पर थी. उसके मां-बाप झगड़ते रहते थे. इस झगडे में उनका इतना समय चला जाता था कि अपनी जवान होती
 
डा.सुभाष राय
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क्रूरता की कोई पराकाष्ठा तो होगी

बचपन में आप ने भी सुना होगा। बड़े-बूढ़े अक्सर कहते सुने जाते हैं-सर्वेगुणा कांचनमाश्रयन्ती यानि सारे गुण कंचन में आश्रय ग्रहण करते हैं। जिसके पास धन-संपदा है, उसका समाज सम्मान करता है, उसे सभी बड़ी कुर्सी देते हैं, उसकी प्रशंसा होती है। जो लोग उससे कुछ पाना
 
डा.सुभाष राय
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हम आखिर लिखते क्यों हैं

आखिर हम लिखते क्यों हैं? लिखना कोई रोग है या मजबूरी या कुछ और? इससे क्या हासिल हो सकता है? इन सवालों पर आप क्या जवाब देंगे? लिखना कुछ भी हो सकता है। कोई जरूरी नहीं कि वह साहित्य ही हो। लिखने वाला नहीं जानता कि वह जो लिख रहा है, वह साहित्य के रूप में जाना
 
Dr. Subhash Rai