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गूंजअनुगूंज / GUNJANUGUNJ

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12 Jun 2010
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स्वामी रामतीर्थ के विचार

कोई चीज़ कितनी भी प्यारी क्यों न हो, अगर वह आत्म साक्षात्कार में बाधक हो तो उसे तुरंत हटा देना चाहिए । सांसारिक वस्तुओं में सुख की तलाश व्यर्थ है । आनंद का खजाना तुम्हारे भीतर है । इच्छाओं से ऊपर उठ जाओ, वे पूरी हो जाएंगी ; माँगोगे तो उनकी
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आवाज़

एक झेन साधक की मृत्यु हुई । उसके आश्रम के निकट ही एक अंधा वृद्ध रहता था । साधक की शोकसभा में उसने कहा – “मैं जन्म से अंधा हूँ । लोगो के चेहरे नहीं देख सकता । लेकिन उनकी भावनाएँ उनकी आवाज़ से पहचान पाता हूँ । आमतौर पर मैं जब किसी को बधाई देते सुनता हूँ,
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शैले की जीवनोपयोगी उक्तियाँ

• अधिकार विनाशकारी प्लेग के समान है; जिसे छूता है नष्ट कर देता है । • कविता सुखी और उत्तम मनुष्यों के उत्तम और सुखमय श्रणों का उद्-गार है । • जिस प्रकार एक निराश चोर चोरों को पकड़नेवाला बन जाता है, उसी प्रकार निराश होकर लेखक आलोचक बन जाते हैं । • आत्मा का
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आज फिर हम ओशो के एक प्रवचन से चुनी हुई कहानी को प्रस्तुत कर रहें हैं । यह कहानी दमन और संयम के सही अर्थ खोलती है । दमन एक संध्या दो भिक्षु किसी पहाड़ी नदी को पार करते थे । एक था वृद्ध संन्यासी, दूसरा युवा । वृद्ध आगे था, युवा पीछे । नदी तट पर एक युवती खड़ी
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शोपेनहावर के अनमोल विचार

शोपेनहावर के अनमोल विचार • विश्वास और प्रेम में एक बात समान है; दोनों में से कोई भी जबरदस्ती पैदा नहीं किया जा सकता । • उपयोगी कलाओं की जननी है आवश्यकता, ललित कलाओं की जननी है विलासिता । पहली पैदा हुई बुद्धि से और दूसरी प्रतिभा से । • कोई भी अपने सिवाय
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जिंदगी फ़िराक़ की नज़र से

मौत का भी इलाज हो शायद जिंदगी का कोई इलाज नहीं ***********************न समझने की ये बातें हैं न समझाने की जिंदगी उचटी हुई नींद है दीवाने की ************************** गुर जिंदगी के सीखे खिलती हुई कली से लब पर है मुस्कराहट दिल खून रो रहा है
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त्याग

आज ओशो के प्रवचन पथ की खोज से ली गई एक कथा प्रस्तुत कर रहा हूँ , जो त्याग का सही अर्थ बताने में सहायक होगी । त्याग एक फकीर था, अत्यंत अपरिग्रही और त्यागी । वह था और उसकी पत्नी थी । दोनों लकड़ियाँ काटते और उन्हें बेच कर अपनी आजीविका चलाते । संध्या जो पैसा
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क्या दार्शनिक होना बुरा है ?

क्या दार्शनिक होना बुरा है ? क्या ज्ञान के प्रति प्रेम होना स्वाभाविक नहीं है ? क्या ज्ञान के प्रति पागलपन की हद तक जुनून होना समाज के लिए घातक है ? क्या ज्ञान के प्रति जिज्ञासु होना बुरा है ? मैं जानता हूँ कि आप इस बहस में नहीं पड़ना चाहेंगे । फिर भी मैं
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नास्तिक दर्शन

नास्तिक दर्शनों में चार्वाक, जैन और बौद्ध दर्शन आते हैं । ये वेदों के प्रमाण में विश्वास नहीं रखते, इसलिए नास्तिक दर्शन के अंतर्गत रखे गए हैं ।चार्वाक दर्शन के प्रणेता बृहस्पति माने जाते हैं । बार्हस्पत्य सूत्र इनका ग्रंथ माना जाता है, जो अप्राप्य है ।
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षट्दर्शन

भारत का आस्तिक दर्शन न्याय, वैशेषिक, साख्य, योग, पूर्व मीमांसा और उत्तरमीमांसा (वेदांत)  में बाँटा गया है । इतिहास वेत्ता मानते हैं कि ई.पू. पाँचवीं शताब्दी से लेकर ई.पू. पहली शताब्दी तक इन दर्शनों का विकास हुआ और इन्होंने व्यवस्थित रूप प्राप्त कर
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स्मृति -ग्रंथ

भारत के इतिहास और संस्कृति में पाँच स्मृति-ग्रंथ प्रसिद्ध हैं :मनु - स्मृति याज्ञवल्क्य स्मृति पराशर स्मृति नारद स्मृति शंख स्मृति
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भारतीय संस्कृति के आधार

भारतीय संस्कृति का इतिहास बहुत पुराना है । लगभग पांच हजार वर्ष पुराना इसका इतिहास है । इसके ज्ञान का आधारभूत चार वेदों में समाहित है । ये चार वेद हैं : ऋग्वेद यजुर्वेदसामवेद अथर्ववेद इन चारों वेदों के चार उपवेद हैं : ऋग्वेद का उपवेद आयुर्वेद यजुर्वेद का
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पेड़ और सड़कें

देश की जनसंख्या निरंतर बढ़ रही है । देश में भीड़ बढ़ रही है । लोगों का एक जगह से दूसरी जगह आना-जाना बढ़ रहा है । यातायात के साधन बढ़ रहे हैं । सड़कों पर गाड़ियों की संख्या बढ़ रही है । शहरों में गाड़ी खड़ी करने के लिए जगह कम पड़ रही है । एक शहर को दूसरे शहर से
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अमीर खुसरो की चतुराई

एक बार गर्मियों के दिनों में अमीर खुसरो किसी गाँव की यात्रा पर निकले थे । रास्ते में उन्हें बहुत जोर की प्यास लगी । वे पानी की खोज में एक पनघट पर जा पहुँचे । वहां चार पनिहारिनें पानी भर रही थी । खुसरों ने उनसे पानी पिलाने का अनुरोध किया । उनमें से एक
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पूर्ण उपस्थिति

प्रत्येक व्यक्ति अपनी दृष्टि से ठीक हैसच्चा भी, झूठा भी, पुण्यात्मा भी, पापी भी, सत्चरित्र भी, कुचरित्र भी, ईमानदार भी, ज्ञानी भी और अज्ञानी भी अगर व्यक्ति जहां है, वहां पूरी तरह मौजूद है, उपस्थित है होश के साथ तो उक्त भेद मिट जाते हैं और व्यक्ति
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पढ़ना और समझना

जब मैं कुछ पढ़ता हूँ और उससे अर्थ ग्रहण करता हूँ और जब आप कुछ पढ़ते हैंऔर उसका अर्थ ग्रहण करते हैंयह जरूरी नहीं कि हमने जो पढ़ा और उसका जो अर्थ ग्रहण किया वह वही है जो कि लेखक का रहा होगा नहीं, बहुत कम संभावनाएँ हैं कि कोई लेखक अपना
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संसार के पाँच शाश्वत नियम

संसार में पाँच शाश्वत नियम हैं :स्वार्थ : संसार का पहला नियम । धोखा : संसार का दूसरा नियम । लालच : संसार का तीसरा नियम । संग्रह : संसार का चौथा नियम । दुख : संसार का पाँचवाँ नियम । पहले चार नियम स्वैच्छिक हैं, पाँचवाँ इनके पीछे स्वत: चला आता है ।
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जर जोरु और जमीन

एक पुरानी कहावत है कि हर झगड़े की जड़ जर,जोरु और जमीन ही होती है । यह कहावत आदिकाल युग और सामंतवादी युग तथा औद्योगिक युग की अपेक्षा इस उत्तर आधुनिक युग में अधिक सही प्रतीत होती है । आज समाज में नारी की स्थिति एक वस्तु से ज्यादा नहीं है और स्वयं नारी ने
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पढ़ने की कला

लोगों में पढ़ने की आदत दिन-प्रतिदिन कम होती जा रही है । इसके कई कारण हैं । शिक्षा का ढ़ाँचा भी बहुत बदल गया है । शिक्षा ज्ञान प्राप्ति के लिए नहीं डिग्री के लिए ली जा रही है । पुस्तक पढ़ने का लोगों के पास समय नहीं है । फिर लोगों के नौकरी-पेशे ऐसे हो गए हैं
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कुछ मुक्तक

जिंदगी हमसे इस कदर रुठी हैकि हर साँस का हिसाब माँग बैठी हैमोहब्बत हमसे इस कदर रुठी हैकि हर पल के साथ का हिसाब माँग बैठी हैदिल था हमारा एक छोटा साउसमें भी तुम्हारा अक्ष थाजो तुम्हारी साँसों से धड़कता थाआज वही तार-तार है बेजान साक्यों हमसे इतनी परीक्षा ली
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बढ़ते शहर घटती कृषि योग्य जमीन

जब मैं छोटा बच्चा था और अपने गाँव से चंडीगढ़ आना होता था, तो सड़कों के दोनों ओर कितना मनोहारी दृश्य होता था । सड़क के दोनों ओर से प्रकृति की सुंदर छटाएँ देखने को मिलती थी । रबी की फसलें जब अपने यौवन पर होती थी, तब दूर-दूर तक सरसों के पीले फूलों से पीली हुई
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सुनना, करना और समझना

सत्य की अनुभूति होती है । किसी ज्ञानी जन से इसके संबंध में सुनने मात्र से प्राण परितृप्त नहीं होते । इसके संबंध में शास्त्र पढ़ लेने पर भी सत्य की प्यास नहीं बुझती । इस सत्य की प्यास तब तक नहीं मिटती जब तक कि यथार्थ में उसकी अनुभूति नहीं होती । सुनने और
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नैतिक साहस

ओशो उन दिनों जबलपुर विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र के प्राध्यापक थे । एक दिन वे नीतिशास्त्र पढ़ा रहे थे । ऐसा कभी नहीं होता था कि ओशो कक्षा में व्याख्यान दे रहे हों और कोई छात्र किसी दूसरे छात्र से बातों में लगा हो । लेकिन उस दिन सामने की बैंच पर बैठी दो
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पशु और बुद्धत्व

एक झेन कथा : शोदाई एरो जो ध्यान की शिक्षा ग्रहण करना चाहता था, ध्यान सीखना चाहता था । इस प्रयोजन हेतु वह बासो के पास आया ।बासो ने एरो से पूछा, "तुम्हारा आना किस लिए हुआ है ?"एरो ने कहा, "मुझे ज्ञान चाहिए, मैं ध्यान सीखना चाहता हूँ और बुद्धत्व की प्राप्ति
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सरलता

बहुचित्तता से जटिलता आती है । एक चित्तता से सरलता आती है । बहुचित्तता चीजों के साथ तादात्म्यता है । चीजों के साथ तादात्म्यता काट देने से एक चित्तता आएगी । व्यक्ति सरल होगा । बच्चे की सरलता स्वाभाविक है । व्यक्ति की सरलता एक अर्जित गुण है... जिसे
Apr 04 2010 11:06 AM
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क्या तटस्थ होना बुरा है ?

क्या तटस्थ होना बुरा है ? तटस्थता क्या है ? मनुष्य तटस्थ क्यों होता है ? आइए आज इन्हीं विषयों पर चर्चा करें ।तटस्थता का मतलब त्याग, संन्यास या वैराग्य नहीं है । तटस्थता का मतलब अतिवादी होना भी नहीं है । तटस्थता का मतलब किसी विचार के पक्ष या विपक्ष में
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दूरदर्शिता

दूरदर्शिता व्यवहारिक हो सकती है, लेकिन व्यवहारिकता कभी दूरदर्शिता नहीं हो सकती ।
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ओशो की डायरी से

ओशो की डायरी से चुने गए कुछ विचार-बिंदु : १.सत्य सरल है, शेष सब जटिल है, लेकिन हम सरल नहीं हैं, इसलिए सत्य को पाना कठिन हो जाता है । २.मैं दो ही प्रकार के मनुष्यों को जानता हूँ, एक तो वे जो सत्य की ओर पीठ किए हुए हैं और दूसरे वे जिन्होंने सत्य की ओर
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प्रेम

प्रेम से बड़ी इस जगत में दूसरी कोई अनुभूति नहीं है । प्रेम की परिपूर्णता में ही व्यक्ति विश्वसत्ता से संबंधित होता है। प्रेम की अग्नि में ही स्व और पर के भेद भस्म हो जाते हैं और उसकी अनुभूति होती है, जो कि स्व और पर केअतीत है । धर्म की भाषा में इस सत्य की
Mar 27 2010 08:01 PM
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ओशो और पतंजलि

ओशो हमारे युग के सर्वाधिक पढ़े जाने वाले,सुने जाने वाले प्रबुद्ध रहस्यदर्शियों में से हैं, जिन्होंने सत्य को यथा संभव हर तरह से कहने की कोशिश की है । पतंजलि पर ओशो को पढ़ना स्वयं की खोज की दिशा में एक सही कदम उन लोगों के लिए हो सकता है, जिनकी यात्रा योग के
Mar 08 2010 06:30 AM
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आध्यात्म

सपने टूटेदिल चटखासब कुछ बिखराएक अटूट रिश्ताबांधे रहा मुझे उससेजो अदृश्य थालेकिन मजबूत था इतनाकि जो बिखर जाना चाहिए थाउसे आरोह के शिखर तक पहुँचा करअंशों में स्वयं का रूपदिखा गयामैं अभिभूत हूँ उस शक्ति सेजो सदा मुझे अंशों मेंउस अनंत का रूप दिखा देती हैऔर
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कुछ विचार

जब व्यक्ति किसी ओर के कहने में हो, तो उसे समझाने की भूल न करें ।जो व्यक्ति दूसरों के बहकावे में आ जाते हैं, उनमें आत्म विश्वास की कमी और निर्णय लेने की क्षमता नहीं होती ।स्वीकार-भाव विधायक है; जो होता है वह रास्ते का रोड़ा नहीं बल्कि तुमसे सर्वश्रेष्ठ
Mar 02 2010 09:16 PM
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समस्या अकेली नहीं आती

जब कभी तुम समस्याओं से घिर जाओ और कोई ध्यान रखने वाला न हो और कहीं कोई दोस्त न मिले तो स्मरण कीजिए कि परमात्मा तुम्हारे निकट है वह तुम्हारी हर प्रार्थना सुनता है जब यह जीवन सूना दिखाई पड़े और सारे सपने टूटते दिखाई पड़ेंऔर तुम्हारे शब्दों को कोई न सुने तो
Feb 07 2010 07:30 PM
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राष्ट्रभाषा, राजभाषा या संपर्कभाषा हिंदी

आज हिंदी को बहुत से लोग राष्ट्रभाषा के रूप में देखते हैं । कुछ इसे राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित देखना चाहते हैं । जबकि कुछ का मानना है कि हिंदी संपर्क भाषा के रूप में विकसित हो रही है । आइए हम हिंदी के इन विभिन्न रूपों को विधिवत समझ लें, ताकि हमारे
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प्रेम की पातियाँ

प्रेम मुक्त करता है, बांधता नहीं । प्रेम मुक्त गगन का पक्षी है, जो मानव ह्रदय में उड़ान भरता है । प्रेम बरसता है, गरजता नहीं । प्रेम खिलना जानता है,सिकुड़ना नहीं । प्रेम दो ह्रदयों के बीच एक अहसास है । प्रेम मांगना नहीं देना जानता है । प्रेम आँखों में
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Jan 30 2010 06:09 PM
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बहुमूल्य चीज

क्या कभी आपने गौर किया कि बहुमूल्य चीज़ अपने आरम्भिक दौर में कोड़ियों के भाव बिकी हैं या उनका मूल्य पहचाना नहीं गया, लेकिन जब उनका मूल्य पहचाना गया तो वे अनमोल हो गई । आपकी प्रतिभा भी ऐसी ही चीज़ है । यदि आप इसे पहचान लेते हैं, तो शीघ्र ही इसे संसार भी
Jan 25 2010 10:36 PM
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भाव-उद्वेग

भाव-उद्वेग में चुप रहना सबसे बड़ा संयम है । भाव-उद्वेग की स्थिति में विवेक मनुष्य का साथ छोड़ देता है और मनुष्य अनुचित कर्म कर बैठता है । गुस्सा भाव-उद्वेग का ज्वलंत रूप है । गुस्से में जो मौन को साध कर अंतस-चित्त का अध्ययन करता है, वह शांत होना सीख जाता
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जिंदगी की ए बी सी

जिंदगी की ए बी सी अर्थात जिंदगी का आधार क्या है ? सार्थक जिंदगी क्या है ? जीवन को कैसे जिया जाए कि जीवन में आनंद घटित हो । अंग्रेजी के पाँच शब्दों से हम इसे समझने की कोशिश करते हैं ।जीवन की ए अवेयरनेस (awareness) अर्थात सजगता है । व्यक्ति की सजगता उसके
Jan 17 2010 12:05 AM
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दु:ख

देखा है जिंदगी को कुछ इतने करीब से कि दुख के सिवायसब बेगाने लगने लगे हैं जीवन में जब सुख आता है तो वह बँटना चाहता है । लेकिन जब दुख आता है तो मनुष्य संकुचित हो जाता है । स्वयं में सिमट जाना चाहता है । वस्तुत: दुख सुख की जड़ है । जिस आदमी के जीवन में दुख
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झूठ

कुछ झूठ समाज में स्थापित मूल्य बनकर सत्य के सिंहासन पर आरुढ़ होने का दावा करते हैं ।दूसरे दिन: पुनश्च : आपके मन में उक्त उक्ति से जो भी भाव आया, कृपया उसे टिप्पणी के रूप में देकर अनुगृहीत करें ।
टैग: सत्य
Jan 15 2010 06:33 PM