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कवि बाबा कानपुरी

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06 Jun 2010
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वैभव पाकर मत इतराओ

भोला था मन का सच्चा था,प्यारा था जब तक बच्चा थाकरता था वो बातें सच्ची,जबतक अकल से वो कच्चा थाबड़ा हुआ करता नादानी ,गढ़ता अपनी राम कहानीकिये नीर के टुकड़े-टुकड़े,देख मुझे होती हैरानीकहता ये केदार का पानी,लाया 'गया' बिहार का पानीये जमजम का यह संगम का,निर्मल
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प्रतिष्ठित कवि दीपचंद सुथार की काव्य यात्रा के स्वर्ण जयंती समारोह की कुछ झलकियाँ

भक्त शिरोमणि मीराबाई की जन्मस्थली मेड़ता सिटी जिला नागौर राजस्थान में वरिष्ठ कवि दीपचंद सुथार की काव्य यात्रा के स्वर्ण जयंती समारोह की कुछ झलकियाँ इसके बाद प्रस्तुत है एक छोटी सी रचनानहीं किसी से डरती चींटीठान लिया जो करती चींटीदाने एक-एक चुन-चुन कर,खुद
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देवनागरी लिपि की महिमा.

२१ मार्च को शिलांग(मेघालय) में आयोजित ३२वें अखिल भारतीय नागरी लिपि सम्मेलन में प्रस्तुत, देवनागरी लिपि की महिमा समेटे एक कविता.भाषा बोली के चुन-चुन कर, तिनके-तिनके, रोड़ा-रोड़ा|एक नागरी लिपि है, जिसने- एक सूत्र में सब को जोड़ा||बंगाली हो याकि
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काव्य की एक नई विधा जनक छ्न्द

जो स्वभाव से गाय हैं,शोषण उनका हो रहा,वहीं आज असहाय हैं.बाहर से खामोश हैं,झलक रहा तूफान सा,भीतर उसके रोष हैं.मिला जो कि वो कम नहीं,जो न मिला उसका हमें,किंचित कोई गम नहीं.मानव दानव एक हैं.नैतिकता का फ़र्क बस,लगते सभी अनेक हैं.रोम रोम में राम जोबसे, छावनी
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मौसमी दोहे

सबसे उँचा स्वयम् को, वृक्ष समझता ताड़,इतराता लगता कभी, देखा नहीं पहाड़.मँहगाई को देख कर, हुआ टमाटर लाल,दस से बत्तिस हो गया, मारी एक उछाल.न्यायालय में देख ली, देर और अंधेर,मुक्त हुआ आरोप से,मोनिंदर पंधेर.नही समझ कुछ आ रहा, सोच रहे जसवंत,इस प्रकार होगा कभी,
Feb 14 2010 05:40 PM
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गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ

बाबा कानपुरी की ओर से सभी भारतवासियों को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ.....जय हिन्द जय भारत
Jan 26 2010 04:41 PM
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बाबा कवि बर्राय-2

नेता अभिनेता अगर, नही करेंग सेक्स,रहते टेंसन मे सदा, होंगे नही रेलेक्स होंगे नही रेलेक्स, घने मातम के बादल,छा जाएँगे, लोग कहेंगे इनको पागल 'बाबा कवि बर्राय,' यही क्रेता-विक्रेता मल से मल धोते हैं, ये नेता-अभिनेता
Dec 29 2009 08:04 AM
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बाबा कवि बर्राय -1

खादी में गुण बहुत हैं, सदा पहनिए अंग है सफेद तो क्या छिपे, इसमे सातो रंग इसमे छिपे सातो रंग, दाम की है यह सस्ती सभी जगह है मान, नगर हो अथवा बस्ती बाबा कवि बर्राय सुनो हो भौतिक वादी बर्बादी से बचो, मॅंगा कर पहनो खादी खादी के अब बढ़ रहे, दिन-दिन दूने रेट