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दिल की कलम से...

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17 Jun 2010
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कभी कह नही पाया पर बहन, तू मुझे जान से प्यारी है......

कभी कोई आया था ज़िंदगी मे...तो चिढन सी थी की मेरे हिस्से का प्यार कम हो गया....माँ की गोद मुझसे छिन किसी और को मिल गयी....पिताजी की नज़रो मे कोई और चेहरा चढ़ गया....नाराज़ था मैं उससे क्यूँ आई वो...छिन गया था मुझसे मेरा संसार....मौका मिलते ही उसे परेशान
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मैं अच्छा कैसे बन जाऊं, मैं अच्छाई से डरता हूँ....

इसमें कुछ प्रश्न छिपे हैं जो कभी बचपन में उठा करते थे...फिर आज की एक सोच दिखानी चाही...प्रश्न अभी भी मन में है...इसलिए आपसे उत्तर की आशा रखता हूँ.....मर्यादा जीवन भर पूजी, बदले मे वनवास मिला...बड़ी सती थी जिसको कहते जग का तब उपहास मिला...शिव का आधा अंग
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आसमान से टूटा तारा...आँख से टूटी पलक....और इंसान की फितरत...

अक्सर सोचता हूँ जब भी तारा टूटता है या पलक का बाल टूट कर गिरता है...तो हम कुछ मांगते क्यूँ है...उसी सवाल का जवाब जो सोच पाया वही है ये रचना...पुरानी है...थोड़े संपादन के साथ...नभ के दामन से कल इक सितारा गिरा...माँ के आँचल का सूना हुआ फिर सिरा...माँ को
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मैं जहाँ था तुम वहाँ थे, रास्ते सब एक थे... (समाज की विषमताओं की वेदना लिखने वाला कवि और एक हास्य कवि)

शिवम् मिश्र जी ने एक मुहिम शुरू की....ये लिंक्स पढ़े....पहली बरसी पर विशेष :- अश्रुपूरित श्रद्धांजलि और मेरी वह मुराद ............बिन मांगे जो पूरी हुयी !! यह एक सार्थक और भावनात्मक प्रयास है....साहित्य के उन स्तंभों को हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी
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तू तो यशोदा है मगर मैं कृष्ण न बना...

जब भी मैं गिरा आँख से आँसू तेरे गिरा...मुझको जो सदा थामता आँचल का वो सिरा...शीत मे छाती से वो चिपका हुआ बचपन...वो गोद मे तेरी कहीं दुबका हुआ बचपन...मैं चल रहा समेटते यादें यूँ अनमना...तू तो यशोदा है मगर मैं कृष्ण न बना...उज्ज्वल भविष्य की हृदय में कामना
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ढूँढती इंसाफ़ को वो आँख अब भी है खुली...

थी कभी छत पर मेरे कुछ धूप आकर तैरती...और नीचे छाँव भी थी सुस्त थोड़ी सी थकी...छाँव के कालीन पर नन्हा खिलौना रेंगता...कुछ उछलती कूदती साँसों को मुझपे फेंकता...हाँ वो बचपन था कभी कुछ झूमता कुछ डोलता...आँख मून्दे मुँह सटाये मुझसे क्या क्या बोलता....फिर तभी
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विनती तुझसे है मेरी,हे मन! ठहर, विश्राम कर ले...

मोहिनी माया के चंगुल मे फँसा, बिखरा, बँटा,मूल कर्तव्यों की रेखा से कभी का तू हटा,अनवरत संघर्ष का क्रम है सतत बस चल रहा,भाग्य पर सब छोड़ के तू क्यूँ स्वयं को छल रहा,तू स्वयं की सोच से भीषण कोई संग्राम कर ले,विनती तुझसे है मेरी,हे मन! ठहर, विश्राम कर
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किन्नर और हम...अंतर क्या???

शुरुआत में किसी का कुछ दर्द रखने का प्रयास किया और अंत की पंक्ति में अपने दिल का दर्द रखने का प्रयास किया.... अगर किसी को ठेस पहुंचे तो मैं क्षमा चाहूँगा.... मिला एक शारीरिक विसंगति रूपी श्राप...उनका जन्म लेना ही है बन जाता इक पाप...कर्कश बजती तालियाँ और
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हाँ भैया हम तो कुत्ते हैं...

जानता हूँ ये कविता कि भाषा नहीं है...पर जो कुछ देख रहा हूँ उसके बाद दिल यही कह रहा है...किसी को बुरा लगे मेरी भाषा से तो क्षमा चाहता हूँ...जहाँ किया मन हवस मिटा ली...नाम बन गया है बस गाली...झुंड बना कर घूम रहे हैं....लोभी अवसर ढूँढ रहे हैं...मन नंगा तन
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थोड़े देते कष्ट मुझे तो मैं भी रहती नारी....(एक सुखी नारी कि व्यथा)

व्यथा हृदय की किसे सुनाऊं शोकाकुल ये मन है...कभी जहाँ सुख नाद गूँजता अब बस सूनापन है...जन्म हुआ जब मेरा, घर का सूना आँगन महका...अम्मा बाबा दोनो का ही अंतर्मन था चहका...इच्छा भी न कर पाती और चीज़ सामने होती...कभी बहे न इन आँखों से दुख के खारे मोती...बचपन
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बात है कुछ रोज़ पहले की.....

बात है कुछ रोज़ पहले की, टेढ़ी मेढी पगडंदियों से गुज़र रहा था...भोर होने वाली थी, पूरब से सूरज का मद्धम प्रकाश बिखर रहा था...पतझड़ के सताए, एक बूढ़े बरगद के नीचे, अचानक ठिठक गया...उन सूखी, बढ़ती उम्र की निशानी, दाढियों मे, मेरा मन अटक गया...उस विशालकाय
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कोशिशों की अब भी आख़िरी तो साँस थी बची...

कुछ बातें बहुत विचलित कर देती हैं...जरा सी हार पर ये समझना कि ज़िन्दगी के सब रास्ते बंद हो गए...और जीवन जैसे अनमोल उपहार को तोड़ कर फेंक देना और मौत को गले लगा लेना...जब तक हार न मानो हार नहीं होती....बस ये प्रयास है छोटा सा..उनसे कहने का कि....कोशिशों की
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लाली पूरब की ना खोए, नवजीवन का श्वास बहे...

 कुछ लाल रंग का उपयोग कर लिखा है उम्मीद है पसंद आये....हर पंक्ति में लाल शब्द या उससे जुड़े किसी शब्द का उपयोग किया है....एक छोटा सा प्रयोग और आवाहन... एक समय था लाली अद्भुत आसमान में सजती थी...सिंदूरी सी सांझ कभी तो भोर लालिमा रहती थी...मनुज धमनियों
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अरे, उन क्लब वालों की ज़िंदगी मे भूलने को इतना गम ही कहाँ है...

एक पुरानी रचना थोड़े संपादन के साथ फिर से पेश कर रहा हूँ शायद आप सभी को पसंद आये....थके हुए बल्ब की मद्धम रोशनी मे...किसी के लिए चमक का एहसास हूँ...देसी शराब की एक देसी दुकान मे...कोने मे पड़ा स्टील का गिलास हूँ...जाने रोज़ कौन कौन चले आते हैं...फिर
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आँगन के कोने मे गुपचुप तुलसी सी उग जाती अम्मा....

आज फिर माँ को समर्पित एक रचना लिख रहा हूँ...सूर्यकांत जी इस बार ये कहने का प्रयास किया है कि माँ अगर साथ न भी हो फिर भी कहाँ कहाँ है माँ...अपनी माँ, आपको और अर्चना जी को समर्पित है ये रचना....चला जो मुश्किल राह साथ मे चलती सी मिल जाती अम्मा...दुख का कभी
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है ये पल भर की चाँदनी, कल फिर रात है...

सेठ जी चादर ताने सोए पड़े थे...लक्ष्मी जी के स्वप्न मे खोए पड़े थे...तभी उनका बेटा झूमते हुए आया...और सेठ जी को हिला हिला के जगाया...फिर बोला उठो मुझे कुछ बताना है...कल मुझे भी अपना जन्मदिन मनाना है...लक्ष्मी जी पे हमला सेठ जी कैसे सहते...पर इससे पहले की
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लखनऊ के ब्लॉगर मित्रों से एक अनुरोध...

नमस्कार मित्रों...इस समय अपने गृहस्थान लखनऊ में हूँ...और लखनऊ के ब्लॉगर मित्रों से एक अनुरोध है कि अगर उनके पास कुछ प्रकाशन केन्द्रों कि जानकारी हो तो कृपया जरुर बताएं...और किसी पुस्तक के प्रकाशन सम्बन्धी हर प्रकार की जानकारी का भी स्वागत है...और हाँ
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हमें क्या करना इस हिन्दुस्तान से , उजड़ने दो, अगर उजड़ रहा है...

जब भी कहीं गोली चलती है,जिन पे गोली चलती है , उनके लिए तड़पते तड़पते उनका हिन्दुस्तान मरता है,जिनके अपनों पर गोली चलती है, उनके लिए डरा सहमा नया हिन्दुस्तान बनता है,बाकी के लिए क्या ग़ज़ब हो गया, ऐसे ही तो हमारा हिन्दुस्तान चलता है,क्या बिगड़ जाता है
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तुम ज़रा मुन्डेरो पे चढ़ना, देखो कुछ बादल आए हैं....

सरपत की सींकों के झुरमुट , मेड़ों पे तन कर झूम रहे...तोते भी हो उन्मुक्त आज, घर के पिंजरों मे घूम रहे...दिनकर जी अपने रथ को ले, जा दूर कहीं पर दुबके हैं...चुपचाप पपीहे चोंच खोल, अमृत पाने को लपके है... धरती अंबर के पुनर्मिलन का शुभ संदेशा लाए हैं...तुम
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आज पूछ्ता हूँ तुमसे...क्या कलम कभी तलवार बनेगी....

जो शोषण का प्रतिकार करे...आगे बढ़ अरि पे वार करे....ले अंगड़ाई तो हिले धारा...कंपन सारा आकाश करे....पान्च्जन्य के नाद को सुन...हर ओर अधर्म पे वार करेगी....आज पूछ्ता हूँ तुमसे...क्या कलम कभी तलवार बनेगी....हर एक विभीषण को छान्टे...सब अंग अंग उसके
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इंक़लाब का दीप जलाकर, स्वयं अमर हो जाती कविता....

कभी हृदय मे कुछ भारी सी, दबी दबी रह जाती कविता...कभी उमड़ कर सिसक सिसक कर आँखों से बह जाती कविता...कभी पीठ, माथे पे थपकी, कभी शहद की बूँद सी टपकी...गोदी ले, पुचकार प्यार से, अम्मा सी बन जाती कविता...कभी किसी टूटे ऐनक मे, कभी किसी की झुकी कमर मे...कभी
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चौखट पे कुछ गुमसुम बैठा, माँ अब तू सूनापन है....

नन्हे मचल रहे हाथों और पैरों के आघात सहे...हाथों के झूले मे मुझको अपने तू दिन रात लिए...मूक शब्द तब इन नैनों के तू ही एक समझती थी...रुदन कभी जो मेरा सुनती तू अकुलाई फिरती थी...अंजाने इस जग में मेरे तू ही प्रेम भरा घन थी..रोता हंसता और बिलखता माँ तू मेरा
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बड़ा हो तो गया मैं, बड़ा बन नही पाया...

माफ़ी चाहूँगा आजकल घर आया हूँ तो ब्लोग्स पढ़ नहीं पा रहा....जल्दी ही पढूंगा....कल एक आदमी था ज़ख्मी, सड़क पे पड़ा...मैं भी वहीं उससे कुछ दूर ही था खड़ा...कुछ इंसानियत जगी, कुछ आगे बढ़ा...तभी कुछ सोचा, ठिठका, और रुक गया...देर हो रही थी मुझे कहीं और जाना
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ऐसी भी क्या चुप्पी कल को चुप्पी ही हमपर चिल्लाए...

कौओं ने यूँ शोर मचाया,कोयल भूली अपनी कूके...वंशीस्वर हैं घुटे घुटे से, बजती हैं बस बम बंदूके...बड़ी उड़ाने भरी गगन मे, अब केवल कुछ जले पंख हैं...युध हुआ प्रारंभ कभी का, और हम थामे अभी शंख हैं...ऐसा ना हो खडग बान सब धरे धरे से ही रह जाए... ऐसी भी क्या
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जब उसने बच्चे के मुँह मे दो दाँतों को उगते देखा...

चौराहे पे कुछ बूढ़े से अरमानों को जलते देखा...भिखमंगे की एक लाश को, अधनंगी सी सडते देखा...झुग्गी मे मौसम इक इक कर बचा कुचा सब लील रहा था...वही पास के एक महल में मौसम रोज़ बदलते देखा....फूलों का इक बाग सजाकर नागफनी इक उसमे बोया...ग़लती की थी, हमने हर इक
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नमक स्वादानुसार.......(एक और लघुकथा..)

आसमान मे टिमटिमाते तारे, वो उधार की रोशनी से चमकता चाँद भी वो रोशनी नही दे पा रहे थे, जो केरोसीन भरी एक शीशी मे लटकी बाती जल जलकर उस छोटे से खंडहर को दे रही थी...पन्नी से ढकी छत... हवाओं के थपेड़ों से उनकी फट फट की आवाज़....पर कोने मे सजी ईंटों का बोझ और
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ऐ चंदा! तू मेरे बड़ा काम आया…...

बचपन का जब मेरे सूना था आँगन...खिलौने के सपनों मे खोया हुआ मन...तभी माँ ने चुपके से तुझको दिखाया...दिखाया था तुझमे वो बुढ़िया का साया...तुझे देख कर ही था बचपन गुज़ारा...ऐ चंदा! तू मेरे बड़ा काम आया...जवानी मे जब जेब खाली पड़ी थी...यूँ कूड़े मे मन के
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नव क्रांति कोई तो होने दो, भारत को अब न सोने दो....

इतिहास की अमर कथाओं में , भूगोल के उन अध्यायों में,अर्जुन गांडीव के बाणों में , अट्ठारह व्यास पुराणों में,दुर्भाग्य को अपने रोता है , भारत अब छिप कर सोता है ,कबिरा रहीम के दोहों में , भगवद्गीता के श्लोकों में ,मीरा और सूर के गीतों में ,उन कृष्ण सुदामा
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अरे मेरे महबूब तू है क्या .....

प्रेम पर कुछ कलम चलाने कि कोशिश तो कि...पर देखिये क्या हुआ.... :)जब तुझे पहली बार देखा दिल खुद ब खुद झुक गया...बुतो को पूजने का सिलसिला जाने क्यूँ बस रुक गया....कितनी मिन्नते करता हूँ तो तेरी एक झलक मिलती है...तेरी रहमत पे दिल धड़कता है, मेरी साँसें चलती
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10 रुपये का नोट ....(एक लघुकथा)

आज बहुत दिन बाद एक कहानी लिखी..धन्यवाद दूंगा दीपक 'मशाल' जी को, जिन्होंने प्रेरित किया...आपके लिए प्रस्तुत है एक लघुकथा...दौड़ती भागती ज़िंदगी का कुछ पलों का ठहराव सा, ये लोकल ट्रेन का प्लॅटफॉर्म…यहाँ कदम रुकते हैं पर मन उसी रफ़्तार से चलता जाता
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मैं कलम कुछ क्रांति की बात लिखना चाहती हूँ...

प्रेम मे डूबे हुए मैं गीत अब न लिख सकूँगी...मैं मिलन की चाशनी मे शब्द लिपटे न चखूँगी...हो भले चिर यौवना सौंदर्य की प्रतिमा भले हो...मैं समेटे कोख मे शृंगारिता अब न रखूँगी...मैं नहीं स्याही तुम्हारा रक्त बिंदु मांगती हूँ...मैं कलम कुछ क्रांति की बात लिखना
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मरता तो सरकार से पैसे ही मिल जाते, मेरे मरने से परिवार के दिन फिर जाते....

जाने एक नौजवान को क्या सनक चढ़ी...जाने थी क्या खुराफात उसने मन मे गढ़ी...वो जोश मे उठा और तेज़ी से चलने लगा...एक सज्जन का तेज़ी से पीछा करने लगा...बेचारे सज्जन भी ये देखकर बड़ा घबराए...अपने कदम थे उन्होने बड़ी तेज़ी से बढ़ाए...उनके काँधे पे एक छोटा सा
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वो किसी दामन मे कुछ काँटे सज़ा के आ रहे हैं...बोलकर हमसे गये थे गम भुलाने जा रहे हैं....

स्वप्न जालों मे फँसे, बिस्तर से जो चिपके पड़े थे...देख गोली, मूषकों से बिल मे जो दुबके हुए थे...थी बहुत शर्मिंदगी अंगड़ाइयों को भी मगर...जागकर भी नींद की डाली खड़े थे थाम कर...आज लेकिन जोश मे खुशियाँ मनाने जा रहे हैं...आज आलस छोड़कर ये घर जलाने जा रहे
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अब तो भीड़ लगा दो चल के चूड़ी के बाज़ार में....

लोकतंत्र का मंदिर धधका, फिर भी हम खामोश रहे....माँ कितना तड़पी होगी वो दिल के टुकड़े गोद लिए...कुछ दमड़ी के टुकड़े देकर कुर्बानी को तोल दिया...जिंदा है गद्दार अभी तक, उनको कैसा मोल दिया...गीदड़ हमने चुन के भेजे, खुद अपनी सरकार में...अब तो भीड़ लगा दो चल
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आँखों को अब अश्रु नही अंगार चाहिए.....

बहुत हो लिया विकल हृदय इन प्रेम की अंधी गलियों मे...भ्रमित रहा मन जाने कबसे सच्ची झूठी कलियों से...अदिश भाव ये जाने कबसे मन को मेरे जला रहे...कबसे झूठे व्यापरों मे मुझ निर्धन को फँसा रहे...अब मुझको नव स्वप्न नदी की धार चाहिए...आँखों को अब अश्रु नही अंगार
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ये बंदर कहीं कल इंसान तो नही बन जाएगा...

कल मुंडेर पे एक बंदर था मुझे दिखाई दिया...शांत बैठा था, शायद खुद मे ही कहीं गुम था...तभी एक बंदरिया ने उसे हल्के से था भींचा...उस ध्यान की डोर को था अपनी ओर खींचा...एक नन्हा भी बंदरिया की गोद से चिपका था...माँ की छाती से मासूम प्यार से चिपटा था...फिर वो
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अरे भारत के तथाकथित सपूतों मेरा क्या उखाड़ लोगे....

सुना है कल किसी ने मुझे मौत की सज़ा दी है...कलम के कुत्तों को भौंकने की एक और वजह दी है...भौंक लो भौंक लो जब थक कर चूर हो जाओगे...चुपचाप पुरानी गलियों के कोने मे सो जाओगे...दो दिन बंदर से उछल उछल कर मेरा क्या बिगाड़ लोगे...अरे भारत के तथाकथित सपूतों मेरा
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हलवा खाने की ज़िद और एक माँ की मजबूरी....

एक माँ चटाई पे लेटी आराम से सो रही थी...कोई स्वप्न सरिता उसका मन भिगो रही थी...तभी उसका बच्चा यूँही गुनगुनाते हुए आया...माँ के पैरों को छूकर हल्के हल्के से हिलाया...माँ उनीदी सी चटाई से बस थोड़ा उठी ही थी...तभी उस नन्हे ने हलवा खाने की ज़िद कर दी...माँ
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अपनी माँ के लिए एक शहीद के आँसू.....अपनी माँ के लिए जी न सका.....

उसकी साड़ी का मुड़ा कोना देख, मेरी आंख में तिनके का जाना याद आता है,उसका आँचल भीगा पाकर , मुझे डांट कर उसका खुद ही रोना याद आता है,आँखों में उसकी भी सूजन होती थी,जब मैं रातों को सो न पाता था,कलाई पर जलने के निशान भी देखे है, जब मैं गरमा गरम पूडियां खाता
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उत्तरकाँड बदल सकते हैं, हम अपने हिंदायन का....

बालकांड-------------------इक बचपन साधन की दुनिया मे एकाकी मग्न हुआ...सुख सुविधा की दुल्हनिया से बचपन मे ही लग्न हुआ...न आँचल की छाया पाई न बाबा का प्यार मिला...रखी इस एककीपन ने एक नयी आधारशिला...आदर जैसे शब्द सहम के तिलचट्टे से दुबक गये...अपनापन और प्यार