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शब्द और अर्थ

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17 Jun 2010
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सीढियों से चढ़ना

आज के युग में ,ईमानदारी के रास्ते चलना ,वैसे ही ,जैसे ,किसी बहुमंजिला ईमारत में लिफ्ट के बजाये सीढियों से चढ़ना. 
 
अतुल प्रकाश त्रिवेदी/ અતુલ પ્રકાશ ત્રિવેદી
Jun 17 2010 12:35 PM
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होली बिना लाग लपेट

माप - बाट नहीं तौला,होली बिना लाग लपेट रंगों से खेला .जीवन जैसा मिला ,वैसा जिया .हुरियारों की टोली संग ,गली मोहल्ले डोला ,खाई भंग ,चढ़ी तरंग ,नहीं उतरा अब तक ,मन चढ़ा रंग .अपने बच्चे डर डर के लगाते हैं ,माथे पर गुलाल ,हरा , गुलाबी , अबीर लाल
 
अतुल प्रकाश त्रिवेदी/ અતુલ પ્રકાશ ત્રિવેદી
Jun 16 2010 03:05 PM
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रचना के बीच अंतराल

अन्यमनस्क मन ,कई-कई दिन ,खोजता है एक रचना ,जीवन में .बहुत दिनों तक सुनता है कोयल का गान ,ढूंढता  है अतीत का एक प्रणय - प्राण ,बुजूर्गों के सुनाये किस्से ,पाठ के रटे - रटाये हिस्से ,किसी से किया हुआ  अनुबंध ,एक भूला हुआ सम्बन्ध .नदी के किनारे
 
अतुल प्रकाश त्रिवेदी/ અતુલ પ્રકાશ ત્રિવેદી
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एक पूरा शहर

हवा में रिसी गैस रातों रात एक शहर को शमशान कर गई .अफवाहों , टेलीफोन ,अधकचरी खबरों के सहारे कटी रात .आधी रात .बंद कर गई दरवाज़े , खिड़कियाँ , और दिमाग .चंद लोग   जूझते रहे ,करते रहे ,मौत से ,दो दो हाथ .पूरा शहर ,एक पूरा शहर ,नींद में ,एक
 
अतुल प्रकाश त्रिवेदी/ અતુલ પ્રકાશ ત્રિવેદી
Jun 15 2010 02:53 PM
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तुम , मैं , और कविता

तुम , मैं , और कविता यह कैसा रिश्ता ?हमारे बीच गुजरे मौन के पल ,या गरमा गरम संवाद ,पत्रों का लेनदेन ,या चौपाटी की साँझे की भेल,नहीं यह सब नहीं कविता  . मैं , मै था ,तुम, तुम थी ,अनायास और बेवजह थी कविता .एक हँसता हुआ चेहरा ,एक दर्द भरी हंसी ,एक
 
अतुल प्रकाश त्रिवेदी/ અતુલ પ્રકાશ ત્રિવેદી
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नीरव सत्य

रात दौड़ती जा रही ,सन्नाटे के साये में .दोनों ओर खड़े पेड़ हाथ फैला रोकना चाहते हों पथ मानो.एक लम्बी लपलपाती जीभ की तरह फैली सड़क .यह सफ़र मुंह से पेट या जीवन से मृत्यु का ?छूटता जा रहा है पीछे नीरव सत्य .मन में फट पड़े विचारों के सैकड़ों ज्वालामुखी .तप्त
 
अतुल प्रकाश त्रिवेदी/ અતુલ પ્રકાશ ત્રિવેદી
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बासी अखबार नहीं हूँ

दुनिया खरीदूंगा दावेदार नहीं हूँ ,और फिर इतना बेकार नहीं हूँ .दोस्त कम या ज्यादा हिसाब क्या ?नेता नहीं , साहूकार नहीं हूँ .चेहरे को मेकअप से सजाना ?आम दिन  हूँ , त्यौहार नहीं हूँ .जिंदगी - गणित में अव्वल नहीं तो क्या ,तुम जीत नहीं , मैं हार नहीं हूँ
 
अतुल प्रकाश त्रिवेदी/ અતુલ પ્રકાશ ત્રિવેદી
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१३ मई २०१०

एक चेहरा ढूंढना उम्र के लम्बे सफ़र में ,एक छाँव हर, तपिश , हर दोपहर में .एक परिन्द आसमान में जितना  ऊँचा उड़े ,एक डाल दिखती  थके हारे पर में .भूल गए ढाई अक्षर प्रेम के दहलीज पर ,एक साया याद रहा अंतिम प्रहर में  .दूर देश में अपनों  की
 
अतुल प्रकाश त्रिवेदी/ અતુલ પ્રકાશ ત્રિવેદી
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और हम इंतज़ार करते हैं

हर सुबह की शाम होती है , और हम इंतज़ार करते हैं . बदलते हैं रुख मौसमों के , और हम इंतज़ार करते हैं . मौत का एक दिन मुकम्मल है , और हम इंतज़ार करते हैं . गया वक़्त लौट कर नहीं आता , और हम इंतज़ार करते हैं . हर चेहरा एक मुखौटा है , और हम इंतज़ार करते हैं
 
अतुल प्रकाश त्रिवेदी/ અતુલ પ્રકાશ ત્રિવેદી
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मित्र जयराज के जन्मदिन पर !

जीवन की आपाधापी में . कुछ बीत गया , कुछ छूट गया , जो बाक़ी है वह अपना है , जो छूट गया वह सपना है . कुछ माँगा है , कुछ मिलता है , कुछ तीखा है , कुछ मखना है . प्रारब्ध हो ! या प्राप्य हो ! सुर में अटका या टूट गया . जीवन की आपाधापी में , जो बाँटा -वह अपना
 
अतुल प्रकाश त्रिवेदी/ અતુલ પ્રકાશ ત્રિવેદી / অতুল
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खंजर ना दीजिये

इस अजनबी शहर में घर ना दीजिये , शीशों के बीच हूँ पत्थर ना दीजिये . लेना है इम्तहां तो हैं रास्ते और भी , हादिसों का मौसम है खंजर ना दीजिये . कब मेरी नियत पलट जाये क्या पता , जिन्हें शौके - गुनाह है अवसर ना दीजिये . जो झूठ ही दोहराए मुंसिफ भी यहाँ तो
 
अतुल प्रकाश त्रिवेदी/ અતુલ પ્રકાશ ત્રિવેદી / অতুল
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यत्र-तत्र-सर्वत्र

कलयुग - मालूम नहीं युगों के नामकरण के पीछे क्या रहा था . पर कल - यानि एक पर्याय यन्त्र . यानि औजार . बहुत आगे जाएँ तो मशीन . आजकल गैजेट शब्द का इस्तेमाल हो रहा है . क्या कहें इसे हम हिंदी में ? कुछ लोग तो अब गैजेट्स को व्यक्तिगत सजावट की सामग्री के तौर
 
अतुल प्रकाश त्रिवेदी/ અતુલ પ્રકાશ ત્રિવેદી / অতুল
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अपने दोस्त अनुपम गुप्ता को समर्पित

नाराज है तो लड़ ले , गाली दे , आँखे तरेर , खामोश ना रह , मुंह ना फेर ! हममे अदावत कई जन्मों से सही , अब अल्लाह रहम ! खुदा खैर ! तेरी गाली मुआफ, मेरी खता मंजूर , दोनों उसके सामने होंगे, देर सबेर ! तेरे दोस्तों में मेरा शुमार न सही , ज़िन्दगी गुजरी नहीं
 
अतुल प्रकाश त्रिवेदी/ અતુલ પ્રકાશ ત્રિવેદી / অতুল
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ब्लॉग की दुनिया

मैं ब्लॉग पर किस लिए ? इस प्रश्न का कोई सीधा उत्तर शायद नहीं है . पहले हिंदी पढ़ने की इच्छा होती थी तो बहुत सी पत्रिकाएं मिल जाती थीं . सारिका . धर्मयुग . फिर युग बदल गया . तद्भव , हंस , संवेद, कभी कभी मिलती थीं जब इलाहाबाद या दिल्ली जाना होता था . अब
 
अतुल प्रकाश त्रिवेदी/ અતુલ પ્રકાશ ત્રિવેદી / অতুল
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शब्द और अर्थ

कभी तिरे हाथ की लकीरों से गुजरा था , आईने को भी यकीं नहीं मेरा चेहरा था . अब शब की सयाही मेरा हमसफ़र सही , कभी मेरा सूरज उठा था सुनहरा था . अखबार हाथ में प्याली सा कांपे है , हादिसा बड़ा न हो पर डरा - डरा था . सुनहरी शाम ने खिंची एक परछाई , वो दो बदन थे
 
अतुल प्रकाश त्रिवेदी/ અતુલ પ્રકાશ ત્રિવેદી / অতুল
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शब्द और अर्थ

राजा के हाथों में है - एक फेहरिश्त . फेहरिश्त में हैं नाम - कुछ बड़े , कुछ छोटे , कुछ लम्बे , कुछ नाटे, कुछ असली , कुछ खोटे, कुछ ऊपर , कुछ नीचे , कुछ ढीले , कुछ खींचे , कुछ खुले , कुछ मींचे . कुछ पहचाने - कुछ अनजाने . कुछ जागे, कुछ अनमने . फेहरिस्त में
 
अतुल प्रकाश त्रिवेदी/ અતુલ પ્રકાશ ત્રિવેદી / অতুল
Apr 12 2010 08:07 PM
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शब्द और अर्थ

कुछ कदम हम आपके साथ चले , और कुछ दिन ये मुलाकात चले . आज शाम से मौसम उदास है , चलो कहीं बैठें कुछ बात चले . उन्ही खतों को बार-बार पढना, पुरानी शराब थी कई जाम चले . ये शहर नया , ये लोग नए , नया तखल्लुस हो , नया नाम चले . मुहब्बत में एक दिन ऐसा हो , वो बन
 
अतुल प्रकाश त्रिवेदी/ અતુલ પ્રકાશ ત્રિવેદી / অতুল
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मैं तुम्हे मार ही डालूँगा

तुम आये हो मेरे पास , बदहवास , तुम्हारे हाथों में हैं , चमकता , लपलपाता , एक लम्बा छूरा. तुम आये हो मुझे मारने, तुम मुझे मार ही डालोगे . तुम्हारा है लंबा कद , बड़ा डील-डौल , भारी काठी , कद्दावर शरीर. तुम्हारी लाल आँखों से , सच पूछो , तो मैं बहुत डर गया
 
अतुल प्रकाश त्रिवेदी/ અતુલ પ્રકાશ ત્રિવેદી / অতুল
Apr 11 2010 10:19 PM
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अतुल प्रकाश त्रिवेदी/ અતુલ પ્રકાશ ત્રિવેદી / অতুল
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मैं क्यों लिखता हूँ

मैं क्यों लिखता हूँ ? लिखना मेरा पेशा नहीं है . फिर भी लिखना ? पत्र, टिपण्णी , या परीक्षा में प्रश्न का उत्तर नहीं . किसी प्रेमिका को पत्र या किसी की शादी या जन्मदिन के कार्ड का मजमून भी नहीं . अपने बच्चों को नसीहत देते हुए लिखा जाने वाला पत्र भी नहीं .
 
अतुल प्रकाश त्रिवेदी/ અતુલ પ્રકાશ ત્રિવેદી / অতুল
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दोस्त ना दुश्मन बनें , ऐसे गुजारा कीजिये , दोस्तों में जरुरी फासले निभाया कीजिये . कच्ची बहुत हैं मेरे घर की दीवारें ऐ 'अतुल' , मेरी गली से आप न तेज जाया कीजिये.
 
अतुल प्रकाश त्रिवेदी/ અતુલ પ્રકાશ ત્રિવેદી / অতুল
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शब्द और अर्थ

हिंदी लेखक या कवि. बचपन में पापा कहते थे - कविराज कविता के मत कान मरोड़ो , धंधे की कुछ बात करो कुछ पैसे जोड़ो . किसी पुरानी फिल्म के गाने की कुछ पंक्तिया. कैसा हो हिंदी का कथाकार या कवि ? क्या है उसका परिचय ? पत्रकार ? अध्यापक ? या पेशेवर लेखक ? क्यों
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लोग अब पहरावों से पहचाने जाते हैं , पहरावा न तेरा भला है , न मेरा भला है . अब तक धुआं है , धुआं है, धुआं है , न जाने किसका घर जला है . हर कोई नहीं समझता आइना चटकने का मतलब , मैंने देखा है एक चेहरा जला है . मै सच जानता हूँ मै सच नहीं कहूँगा , तुम्हारा ही
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फट गयी खेतों की मिट्टी , सूरज की गरमी सह सह कर | अमवा सी बौराई देह पोर - पोर टूटे , सरसों फिर फूटे || लेटा है कलुआ आँगन , ढांप अंगोछा , बिछा चटाई , काली बिल्ली पुरवा से , चट कर गई दूध मलाई | जाती बछिया को तक , गैय्या डोल रही खूंटे | सरसों फिर फूटे |
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तुम बदले बदले लगते हो , मैं अभी तक वैसा ही हूँ | पूजा की थाली में रखे थे , कुछ यादों के फूल पुराने , और तुम्हारे ख़त रखे हैं , मन की आँखों के सिरहाने | मेरा - तेरा इतिहास नहीं है , मैं झूठा किस्सा ही हूँ | आँखों पर मौन के ताले , आंसू की जंजीर ने बाँधा
Mar 26 2010 09:13 AM
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मान लो तुम्हारे हाथों में एक तलवार है,जिसकी हर वार के साथ कुंद हो जाती धार है ,जबकि गर्दने अपेक्षतया मोटी होती जा रही है ,और अब हाथों की गिरफ्त में भी कहाँ आ रही हैं .
Mar 25 2010 08:50 PM