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07 May 2010
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भरी दोपहर में आधे घंटे की सैर

टहलने जैसी बुनियादी आदत का छूट जाना कभी-कभी बिल्कुल अस्वाभाविक-सा लगता है। किंतु जब अपनी सेहत पर इसके दूरगामी असर को महसूस करता हूं तो बेहद अफसोस होता है। अपने फिटनेस को कायम नहीं रख पाना और ब्लड प्रेशर, हाइपो थायराइड, हाइपरटेंशन, मोटापा जैसे लाइफ स्टाइल
 
Srijan Shilpi
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कमीने और ईमानदार

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने भले और बुरे इंसान में फ़र्क़ करने की कसौटी यह बताई है कि जो दूसरों को सुखी देखकर खुश हो, वह भला आदमी है और जो दूसरों को दु:खी देखकर खुश हो, वह बुरा आदमी है।
 
Srijan Shilpi
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बाजार-सरकार बनाम जन-सहकार

चार बजट नोट कमाने के लिए और एक बजट वोट पाने के लिए। पांच साल की सत्ता के दौरान चार साल बाजार के साथ ताल में ताल मिलाने के बाद पांचवें साल वोटर की तरफ मुखातिब होना लोकतंत्र में सरकार की मजबूरी है। चुनाव में उतरकर जनता से समर्थन मांगने की यह मजबूरी यदि
 
Srijan Shilpi
Dec 29 2009 11:43 AM
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बेमौके के मीडिया अभियान के पीछे का माज़रा

यह महज संयोग से कुछ अधिक लगता है। इस चिट्ठे पर तीसरे मोर्चे से संबंधित पिछले लेख में कांग्रेस और भाजपा के बीच पनप रहे नापाक किस्म के दोस्ताने को खास तौर पर रेखांकित किया गया था। और, कांग्रेस का मीडिया प्रकोष्ठ इस तरह के दोस्ताने के सार्वजनिक होने के
 
Srijan Shilpi
Dec 29 2009 11:43 AM
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तीसरे मोर्चे की दस्तक

यह साबित करने के लिए अलग से दलील, तथ्य और प्रमाण पेश करने की जरूरत नहीं रह गई है कि केन्द्र की राजनीति में कांग्रेस और भाजपा एक-दूसरे के अस्तित्व को बनाए रखने में सबसे बड़े मददगार बनते जा रहे हैं। यदि इन दोनों पार्टियों का वश चले तो वे तमाम अन्य दलों
 
Srijan Shilpi
Dec 29 2009 11:43 AM
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सर्च इंजन के जरिए चिट्ठों पर आने वाले पाठक

यह देखकर अच्छा लग रहा है कि हिन्दी साहित्य के शोधछात्र भी अब शोध के सिलसिले में इंटरनेट का रुख़ करने लगे हैं और गूगल सर्च एवं हिन्दी विकिपीडिया के लेखों में दिए गए संदर्भ लिंकों के माध्यम से हिन्दी चिट्ठों पर उपलब्ध सामग्रियों में से भी अपने उपयोग ला
 
Srijan Shilpi
Dec 29 2009 11:43 AM
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कितने पानी में है हिन्दी चिट्ठाकारी

इंटरनेट : मानवता का व्यक्त मानस पटल इंटरनेट, समकालीन अग्रगामी मानवता का समष्टिगत, व्यक्त मानस पटल है। मानव अभिव्यक्ति का यह एक ऐसा विराट, अनंत और जीवंत सागर है जिसमें विचारों, भावनाओं और सूचनाओं की निरंतर चतुर्दिक तरंगें और लहरें उठती रहती हैं। प्रकृ
 
Srijan Shilpi
Dec 29 2009 11:43 AM
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मेरी पॉलिटिक्स इसलिए है, ज्ञान जी

मेरी पिछली पोस्ट “पार्टनर, मेरी पॉलिटिक्स यह है” पर टिप्पणी करते हुए अपने ज्ञानदत्त पाण्डेय जी ने एक बुनियादी सवाल पूछ लिया है: शायद पूछा जा सकता है - “पार्टनर, तुम्हारी पॉलिटिक्स क्यूं है?” मैं अच्छे भले लोगों को राजनैतिक मुद्दों पर कुकर
 
Srijan Shilpi
Dec 29 2009 11:43 AM
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सपनों के रहस्य-लोक की परतें

अपने एक मित्र से मिलने गया था। उनके कार्यालय की दीवार पर टँगे एक वाक्य पर नज़र गई। लिखा था, “सपने वे नहीं होते जो हम सोते समय देखते हैं, सपने वे होते हैं जो हमें सोने नहीं देते।” उस वाक्य में निहित प्रेरणा देर तक मन में गूंजती रही। किंतु
 
Srijan Shilpi
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आरक्षण: जंग अभी जारी है…

यूथ फॉर मेनटेनिंग अन-इक्वलिटी’ के उत्साही युवक आरक्षण-विरोध के प्रायोजित अभियान में सुप्रीम कोर्ट का जिस तरह से इस्तेमाल करना चाह रहे थे, वैसा तो हरगिज मुमकिन नहीं था। आरक्षण के मुद्दे पर फैसला करते समय सुप्रीम कोर्ट को न सिर्फ अपनी साख और मर्य
 
Srijan Shilpi
Dec 29 2009 11:43 AM
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धर्म, राजनीति और हम

जड़ प्रकृति के पिंडों के बीच जिस प्रकार आकर्षण और प्रतिकर्षण के दो बल सर्वदा एक साथ क्रियाशील रहते हैं जिनके कारण उनके बीच एक संतुलन बना रहता है, ठीक वैसे ही आकर्षण और प्रतिकर्षण के दो बल चेतन प्रकृति के जीवों के बीच भी सदा क्रियाशील रहते हैं जो सृष्
 
Srijan Shilpi
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सर्च इंजन के जरिए चिट्ठों पर आने वाले पाठक

यह देखकर अच्छा लग रहा है कि हिन्दी साहित्य के शोधछात्र भी अब शोध के सिलसिले में इंटरनेट का रुख़ करने लगे हैं और गूगल सर्च एवं हिन्दी विकिपीडिया के लेखों में दिए गए संदर्भ लिंकों के माध्यम से हिन्दी चिट्ठों पर उपलब्ध सामग्रियों में से भी अपने उपयोग ला
 
Srijan Shilpi
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कैरियर, गर्लफ्रेंड और विद्रोह

जिंदगी की राह में मिले अच्छे-बुरे अनुभवों के खट्टे-मीठे रंगों के कोलाज हम सब के मन में बनते-मिटते रहते हैं, लेकिन जब हम किसी कहानी के पात्रों के प्रिज्म से होकर उन्हें देखते हैं तो उन कोलाजों में से उभरती कुछ नायाब शक्लें स्मृति-पटल पर टँग जाती हैं।
 
Srijan Shilpi
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कैरियर, गर्लफ्रेंड और विद्रोह

जिंदगी की राह में मिले अच्छे-बुरे अनुभवों के खट्टे-मीठे रंगों के कोलाज हम सब के मन में बनते-मिटते रहते हैं, लेकिन जब हम किसी कहानी के पात्रों के प्रिज्म से होकर उन्हें देखते हैं तो उन कोलाजों में से उभरती कुछ नायाब शक्लें स्मृति-पटल पर टँग जाती हैं।
 
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