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अभिव्यक्तियाँ

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11 May 2010
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बदलाव

जीवन को सुधारने के लिए सिर्फ आर्थिक ढांचा बदल देने भर की जरुरत नहीं है, उसके लिए आदमी का सुधार करना होगा, व्यक्ति का सुधार करना होगा. वर्ना एक भरे - पूरे और वैभवशाली समाज में भी आज के से स्वस्थ और पाशविक वृतियों वाले व्यक्ति रहेंगे तो दुनियाँ ऐसी ही
 
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दुखांत ये नहीं होता .....

दुखांत यह नहीं होता कि रात की कटोरी को कोई जिन्दगी के शहद से भर न सके, और वास्तविकता के होंठ कभी उस शहद को चख ना सकें ....दुखांत यह होता है कि जब रात की कटोरी पर से चंद्रमाँ की कलई उतर जाये और उस कटोरी में पड़ी कल्पनाये कसैली हो जाये.दुखांत ये नहीं होता
 
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अंतर्द्वंद

सत-असत, पाप- पुन्य, न्याय-अन्याय, राग-विराग से युक्त जब दो भाव एक साथ उत्पन्न होते हैं तो मनुष्य विचार के आधार पर निर्णय नहीं कर पता कि किस पक्ष को स्वीकार करू अथवा किसका त्याग करूं ऐसी स्थिति में उस के भीतर 'हाँ-नहीं' में खींचतान चलती रहती है, वाही
 
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मानव हृदय

मानव हृदय एक रहस्यमय वस्तु है. कभी तो वह लाखो की ओर आंख उठा कर नही देखता और कभी कौडियो पर फिसल जाता है. कभी सैकडो निर्दोशो की हत्या पर आह तक नही करता और कभी एक बच्चे को देख कर ही रो पडता है. ....अम्रिता प्रीतम
 
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प्यार का अंत

जनम लेने के बाद मरना पडता है जैसे आकाश में उछाला पत्थर भी जमीन पर गिरता ही है . खून कर के फांसी होती है और चोरी करने पर जेल जाना पडता है , उसी प्रकार प्यार करने पर रोना पडता है. सुना है कि प्यार करने वाले की अंत में दर्द से पीडित होकर छाती फटती है !
 
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कविता से क्या मिलता हैं ?

कविता से क्या मिलता हैं ?एक काल्पनिक प्रशंसनीय जीवनजो दूसरो की दया पर अपना अस्तित्व रखता हैं ...! ........जय शंकर प्रसाद (नाटक स्कंदगुप्त )
 
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नारी मन ...

कभी कभी नारी को जिस चीज के प्रती जितना आकर्षण होता है नारी उस से उतनी ही दूर भागती है. अगर कोई ,प्याला मुह से ना लगा कर दूर फैंक दे तो समझ लो वो बेहद प्यासा है. इतना प्यासा कि तृप्ती की कल्पना से भी घबराता है . धरम वीर भारती
 
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व्यक्तित्व की पहचान

सोने की पहचान आग से होती है और व्यक्तित्व की पहचान भी तभी होगी जब वो काठीनाईयो से, वेदनाओ से, संघर्षो से खेळे और बाद में विजयी हो . तभी पता चलता है व्यक्तित्व में कितना प्रकाश और बळ है धरम वीर भारती
 
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एक कहानी अम्रिता प्रीतम की जुबानी

एक औरत थी उसने सच्चे मन से मुहोब्बत की थी . एक बार उसके प्रेमी ने उसके बालो में लाल गुलाब का फूल लगा दिया . तब उस औरत ने मुहोब्बत के बडे प्यारे गीत लिखे. लेकिन वह मुहोब्बत परवान ना चढी . तो उस औरत ने अपनी जिंदगी समाज के गळत मूल्यो पर न्योछावर कर दी. एक
 
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प्रेम

प्रेम एक भावनागत विषय है, भावना से ही इसका पोषण होता है, भावना से ही जीवित रहता है और भावना ही से लुप्त हो जाता है ! "तुम मेरे हो " जिस दिन इस विश्वास की जड हिल जाती है, उसी दिन प्रेम खतम हो जाता है !! .....मुन्शी प्रेम चंद
 
अनामिका की सदाये......
Mar 20 2010 05:14 PM
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पुरुष स्वभाव

यदि पुरुष की उपेक्षा करो, सीधे मुह बात ना करो तो वो तुम्हारा सब प्रकार से आदर करेंगे, तुम पर प्राण समर्पण करेंगे, परंतु ज्यू ही ज्ञात हो गया कि अब इसके हृदय में मेरा प्रेम हो गया है उसी दिन से दृष्टी फिर जायेगी, बात बात पर रुठेंगे, रोओगी तो ना मनायेंगे !
 
अनामिका की सदाये......
Mar 14 2010 06:34 PM
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स्पर्श की ताकत

औरत अपने प्रति आने वाले प्यार और आकर्षण को समझने में चाहे एक बार भूल कर जायें, लेकिन वह अपने प्रति आने वाली उदासी और उपेक्षा को पहचानने में कभी भूल नही करती. वह होठो पर होठो से स्पर्शो के गूढतम अर्थ समझ सकती है. वह आपके स्पर्श में आपकी नसो से चलती हुई
 
अनामिका की सदाये......
Mar 07 2010 09:14 PM
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विवाह ...

एक विवाह रस्म से होता है, एक विवाह दिल से होता है . रस्म वाला विवाह टूट जाये, मुश्किले आयें, मुसीबते हो पर उन सब को इन्सान आखिर झेल जाता है ...पर दिल के विवाह में कुछः नही बचता ! ......अम्रिता प्रीतम
 
अनामिका की सदाये......
Feb 26 2010 10:45 PM
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बदलाव

जो लोग भावुक होते हैं और सिर्फ रोते हैं, वो रो-धो कर रह जाते हैं. पर जो लोग हसना सीख लेते हैं, वे कभी कभी हस्ते हस्ते उस जिंदगी को बदल भी डालते हैं.
 
अनामिका की सदाये......
Feb 22 2010 09:41 PM
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मन का झुकाव

कब कहा और कैसे हम अपने मन को हार बैठते है, यह खुद हमे नही पता चलता. मालूम तब होता है जब जिसके कदमो पर हमने अपना सिर रख्खा हो और वह झटके से अपने कदम घसीट ले. उस वक्त हमारी नींद टूटती है और तब हम जा कर देखते है कि अरे हमारा सिर तो किसी के कदमो पर रख्खा हुआ
 
अनामिका की सदाये......
Feb 12 2010 11:42 PM
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स्त्री सुलभ व्यक्तित्व

जब स्त्री को जीवन की असाधारण कठीनाईयो का सामना करना पडता हैं तो उसके स्त्री सुलभ व्यक्तित्व और चरित्र पर एक प्रकार की कठोरता अंकित हो जाती हैं और उसका भाग्य कुंठित हो जाता हैं, क्युकी यदि वह भावुक और सुकोमल बनी रही तो उसका अंत हो जायेगा और यदि जीवित रही
 
अनामिका की सदाये......
Feb 02 2010 10:21 PM
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हमारे संस्कार

हम लोग ना उच्च वर्ग के हैं, ना निम्न वर्ग के. हमारे यहा रुडिया, परम्पराये, मर्यादाये भी ऐसी पुरानी और विषाक्त हैं कि कुल मिलाकर हम सब पर ऐसा प्रभाव पडता हैं कि हम यंत्र मात्र रह जाते हैं. हमारे अंदर उदार और उंचे सपने खतम हो जाते हैं. लेकिन ये भी सच हैं
 
अनामिका की सदाये......
Jan 20 2010 10:18 PM
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मन का उद्वेग..

विचारो केज़हर भरे कांटेजब मन में उगने लगते हैं तो..विषाक्त हो जाता हैपूरा वजूद रूपी पेड..तब चन्दन की खुशबु देने वालेभाव भीज़हर में डूबने लगते है..!नहीं रोक पाताकोई भी विवेक..!सब्र का घूँट पिला देने पर भी..नहीं शांत होतामन का उद्वेग..और..बिखर जाती है..मन
 
अनामिका की सदाये......
Jan 12 2010 11:07 PM
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प्यार और बंधन

प्यार जैसी निर्मम वस्तूक्या भय सेबांधकर रखी जा सकती है ...?नहीं....!!वह तो चाहता है..पूरा विश्वास..पूरी स्वाधीनता ..और साथ में पूरी जिम्मेदारी..!इसमें फैलने की असीमता है..जिस परबंधन रूपी ईटो की दिवारनहीं बन सकती..!!
 
अनामिका की सदाये......
Jan 08 2010 09:29 PM
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त्याग

संपत्तीशाली पुरुष संपत्ती के गुलाम होते हैं. वे कभी सत्य के समर में नही आ सकते ! जो सिपाही गर्दन में सोने की ईट बांध कर लडने चलता हैं, वह कभी नही लड सकता ! उसको तो अपनी ईट की चिंता लगी रहती हैं! जब तक इन्सान ममता का त्याग नही करेगा उसका उद्देश्य कभी पुरा
 
अनामिका की सदाये......
Dec 24 2009 09:40 PM
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प्रेम aur अंहकार

अंहकार को ध्वंस कर..पूर्ण श्रद्धा से..खुद को समर्पणकरने में ही.....चरम आनंद कीप्राप्ति की जा सकती है..!!जबकि..प्रेम अधिकार चाहता है..प्रेम जो देता है..उसके बदले मेंकुछ ना कुछ पाना चाहता है..!!
 
अनामिका की सदाये......
Dec 24 2009 09:39 PM
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खेळ

खेळ को खेळ की तरह खेलना चाहिये. खेळ इस तरह से खेलो कि निगाह जीत पर रहे, पर हार से घबराये नही, इमान को ना छोडे. जीत कर ............मुन्शी प्रेमचंद
 
अनामिका की सदाये......
Nov 29 2009 06:00 PM
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सांय-सांय

अंत समय में जैसे क्षितिज के अथाह विस्तार में उडने वाले पक्षी की बोली प्रती क्षण मद्धम होती जाती है यहा तक कि उसके शब्द का ध्यान मात्र शेष रह जाता है, इसी प्रकार हमारी बोली धीमी होते होते केवळ सांय सांय ही रह जाती है !!
 
अनामिका की सदाये......
Nov 29 2009 05:56 PM
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मूलमन्त्र

मनुष्य अपना जीवन चाहे जैसा बना सकता है ! इसका मूलमन्त्र ये है कि बुरे, क्षुद्र, अश्लील विचार मन मे ना आने पाए, वह बल पूर्वक इन विचरो को हटाता रहे और उत्कृष्ट विचारो तथा भावो से अपने हृदय को पवित्र रखे ! ...... मुंशी प्रेम चंद
 
अनामिका की सदाये......
Nov 01 2009 06:45 PM
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नाच

देवताओ का नाच देखना है तो - देखो वृक्ष कि पत्तियो पर निर्मल चन्द्र की किरनो का नाच, तालाब मे कमल के फूल पर पानी की बूँदो का नाच, जंगल मे देखो मोर कैसे पंख फैला नाचता है !पिशाचो का नाच देखना है तो - देखो दरिद्र पडोसी ज़मिदार के जूते खा कर कैसा नाचता है !
 
अनामिका की सदाये......
Nov 01 2009 06:43 PM
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मुंशी प्रेम चंद

१.बचपन में माँ का प्यार ना मिलने पर जिंदगी की वह उम्र, जब इंसान को मुहोब्बत की सबसे ज्यादा जरुरत होती है....बचपन है. उस वक्त पौधे को पानी मिल जाए तो जिंदगी भर के लिए उसकी जड़े मजबूत हो जाती है. उस वक्त खुराक ना पाकर उसकी जिंदगी खुश्क हो जाती है. मेरी माँ
 
अनामिका की सदाये......
Oct 25 2009 12:40 PM