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माथापच्ची ( मेरे मन की उथल पुथल )

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16 May 2010
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क्यों जीता हुँ, दुनियाँ के ढग से,

क्यों जीता हुँ, दुनियाँ के ढंग से,क्यों मिटाता हुँ, खुद को खुद मे से ही, दुनियाँ के डर से,चाहता हुँ, सडक पर खेल रहे बेफ्रिक बच्चो की तरह खेलना, अपना पसंदीदा पुराने कपडे पहन कर घुमना, चाहता हुँ, जमीन पर बैठ कर उंगलियाँ चाट कर खाना, जब भी मन हो, जोर से
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कौन है सफल, आज यह समझ आता है

कौन है सफल, यह समझ नही पाता था।दुनिया जिसे सफल/असफल कहती है, उनको नही मान पाता था।दिमागी घोडे दौडाता था, पर कही पहुँच नही पाता था।कौन है सफल, यह समझ नही पाता था।क्या सफल है वो धनी व्यवसायी, जिसके बेटे को 52 साल की विधवा से बलात्कार करता पाता था।सफल है वो
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इसलिए कविता करना चाहता हुँ मैं,

आखिर क्यो कविता करना चाहता हुँ मैं, किसको और क्या बताना चाहता हुँ मैं ।“शब्द-ज्ञान” मे कच्चा हुँ, सब पकड लेगे, फिर भी महफिल क्यो सजाना चाहता हुँ मैं।आखिर क्यो कविता करना चाहता हुँ मैं, किसको और क्या बताना चाहता हुँ मैं ।मेरी “सांसारिक नाकामयाबियाँ” नही