उस्ताद शायर पुरुषोत्तम

उस्ताद शायर पुरुषोत्तम "यकीन" की शायरी

http://pyaqeen.blogspot.com
ब्लॉगवाणी पर यह ब्लॉग
नयी प्रविष्टी लिखी
10 Jun 2010
कुल प्रविष्टियां
5
पाठक भेजे
41
पसंद
0
नापसंद
0
पाठक प्रति पोस्ट
08.20
पसंद करें
2
नापसंद करें

उस्ताद शायर पुरुषोत्तम "यकीन" की शायरी

न वो गिरजा, न वो मस्ज़िद, न वो मन्दर बनाते हैंलडाते हैं हमें और अपने- अपने घर बनाते हैंहम अपने दम से अपने रास्ते बहतर बनाते हैंमगर फ़िर राहबर रोडे यहां अक्सर बनाते हैंकहीं गड्ढे, कहीं खाई, कहीं ठोकर बनाते हैंयूं कुछ आसानियां राहों में अब रहबर बनाते
पसंद करें
0
नापसंद करें

उस्ताद शायर पुरुषोत्तम "यकीन" की शायरी

आग है हर सू आग हवामत गा दीपक राग हवामैं मिरदंग बजाता हूंतू गा कोई फ़ाग हवाबन्द है इस बोतल में ज़िनखोल न इस का काग हवाअब कुछ ऎसा शोर मचादुनिया जाए जाग हवातेरी अपनी ढपली हैतेरा अपना राग हवादेखें किसकी आए खबरउड तो गया है काग हवाकैसी "यकीन" हवा ये चलीहो गए
पसंद करें
0
नापसंद करें

चहरे सब तमतमाये हुए है

एककोई हमें न शहर में जाने है साब जीफ़िर कौन हम को काम पे रक्खे है साब जीरोजी रही न गांव में तो शहर को चलेघर अपना कौन शौक से छोडे है साब जीघरबार भी था खेत भी खलियान भी हुज़ूर वो सब तो साहूकार के गहने है साब जीदुनिया में अपने भी कभी थे दोस्त रिश्तेदारअब
Mar 29 2010 03:55 PM
पसंद करें
0
नापसंद करें

सूरज से ठनी है मेरी

एकबहुत मासूम-से चहरे बहुत-से घर बनाता हूंमैं इक संसार सपनों का मेरे अंदर बनाता हूंकहो मत शब्द इनको ये मेरी वो भावनाएं हैमैं जिनकी हू-ब-हू तस्वीर कागज़ पर बनाता हूंबदन में शब को दिन भर की थकन जब चुभने लगती हैसंजो कर कल्पनाएं नर्म-सा बिस्तर बनाता हूंसुकून
Mar 21 2010 04:55 AM