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उस्ताद शायर पुरुषोत्तम "यकीन" की शायरी
न वो गिरजा, न वो मस्ज़िद, न वो मन्दर बनाते हैंलडाते हैं हमें और अपने- अपने घर बनाते हैंहम अपने दम से अपने रास्ते बहतर बनाते हैंमगर फ़िर राहबर रोडे यहां अक्सर बनाते हैंकहीं गड्ढे, कहीं खाई, कहीं ठोकर बनाते हैंयूं कुछ आसानियां राहों में अब रहबर बनाते
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Jun 10 2010 03:46 PM


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