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12 Jun 2010
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'हिन्दोस्तानी होने के फायदे'

'पुनः संपादित व प्रकाशित व्यंग लेख हेप्पी वीकेंड सन्देश के साथ ' ----------------------------------------------------------------------------------------एक हिन्दोस्तानी होने के कितने सारे फायदे हैं,इन पर हमने शायद कभी गौर नहीं किया है | एक विशुद्ध
 
योगेश शर्मा
Jun 12 2010 04:04 PM
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जीवन, लकीरों का खेल

जीवनलकीरों  का  खेल कभी  इन  की  दूरी कभी  इनका  मेल ये तकदीर  बन हथेलियों  पे  चढ़े
 
योगेश शर्मा
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'वो ठेले वाला'

तपती सड़क  पे  वो, नंगे पांव चल रहा था धरती धधक  रही थी, आकाश जल रहा था कभी खींचता था ठेला, कभी ख़ुद को धकेलता था पीछे को हाथ कर  कभी,  सामान टटोलता  था दहकते बदन से जैसे, बारिश सी हो रही थी पसीने
 
योगेश शर्मा
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'तन्हाई के सहारे'

(पुनः संपादित )----------------------------------------------अपनी तन्हाई में, पर्दों के सहारे हैं ,देखते जिनको ये दिन गुज़ारे हैं,हिलाएं इनको हवाएं जब जब, ये लगे, घर में लोग सारे हैं,दीवार से घड़ियाँ उतार कर रख दीं ,वक्त से रिश्ते, न कुछ हमारे
 
योगेश शर्मा
May 23 2010 12:00 PM
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'कैसे दीवाने'

साए साए रहे, साए साए पले, धूप से की दोस्ती, तो चांदनी से जले,चमकती रौशनी से, डर था, टूटेंगे ख्वाब आशियाँ जा कर बनाया ,हमने चरागों के तले, खो गए राह में, धूल के मानिंद भी,  कभी हवाओं सा उड़े, कभी रुक गए, कभी फिर चले,हमें
 
योगेश शर्मा
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'रुखसत'

तुम चले जाओगे तो,                 ज्यादा बिगड़ क्या जायेगा, ज़िन्दगी में थोड़ा सा,               बस खालीपन रह
 
Yogesh Sharma
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'होता है तो होने दो'

हर रोज़ ये सुबह पूरब से, पश्चिम को करवट लेती है,अपना ही सूरज पूरब में,जो ढलता है तो ढलने दोसालों से मिट्टी की खुशबू,बस यादों में ही बाकी है,साँसों का दम धुएं में,ग़र घुटता है तो घुटने दोरंगों की इतनी बेहतर,कहाँ रोज़ नुमाइश होती है,आस्मां मे भरने को
 
Yogesh Sharma
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"कशमकश"

निशानी इश्क की माँगी, मिला ख़त मोहब्बत का, जो महबूबा ने, दुश्मन की किताबों में छुपाया था,हसरत मंजिलों की, उम्र भर हमने कभी ना की,ये  और बात है, रास्तों पे  बहुत प्यार आया था,ज़माने सुन लो, मुझको
 
Yogesh Sharma
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"मसीहा"

सुना था, ग़म जब हद से बढ़ जायेगा,सोखने दर्द सबका, मसीहा इक आयेगा,उसके तो इंतज़ार में, कबसे है कायनात,दुनिया भी थक चुकी, होती न करामात,ये उम्मीद झूठी, ख़ुद ब ख़ुद टूटेगी एक दिन,आसमां को छोड़ ख़ुद पे नज़र, जायेगी एक दिन,जानेंगे हम ,पहल तो, करनी ही होगी तन्हा,और
 
Yogesh Sharma
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Apr 22 2010 08:39 AM
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'कविता इक लिख लेता हूँ'

घुमड़ता है जो भी दिल में,वो कहाँ भला सब कहता हूँ,कभी बोलने से उकता जाता,कभी कहने से डरता हूँ,कभी शब्द सही न मिल पायें,कभी मौके कहीं फिसल जाएँ,तब बातों को मन ही में,स्याही सा भर लेता हूँ,एकांत में इनके छींटों से,कविता इक लिख लेता हूँ,कुछ बातो को बोलना
 
Yogesh Sharma
Apr 18 2010 10:27 AM
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"बचपन"

बचपन की बातें बचपन के किस्से, धुंधलाती यादों के चमकीले हिस्से,इस आज से जुड़े हैं, गुज़रे कल के तार,जब दोस्ती थी सबसे, हर रिश्ते में था प्यार याद आते है वो मस्ती, बेफिक्री के पल, जब आज से था मतलब, न सूझता था कल,शरारतें, बदमाशियां ...बदमाशियों पे मार,जब
 
Yogesh Sharma
टैग: बचपन
Apr 10 2010 10:43 AM
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"पंथी"

अँधेरे राह ढूँढ़ते हैं, रात गहराई है इतनी,धड़कने तक गूंजती हैं,खामोशियाँ छाई है कितनी,चांदनी में तर हवाएं, लोरिओं का राग दें, बिस्तरे के नर्म तकिये,बांहें फैला आवाज़ दें,पलकें हुयी जाती हो बोझिल, जिस्म चाहे टूटता है, हौसलों में मस्त ये मन, उठ
 
Yogesh Sharma
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"माँ में बड़ा हो गया हूँ"

माँ, मैं ये जानता हूँ, कि मैं बड़ा हो गया हूँ, पुकारते  तुझको,जिन पर सरकता थाहर दो कदम पर,लड़खड़ा के गिरता था,उन पैरों पर खड़ा हो गया हूँ, माँ, मैं बड़ा हो गया हूँ पर माँ, मैं कहना चाहता हूँ,कि मैं सोना चाहता हूँ,तुम्हारी गोद में रख कर
 
Yogesh Sharma
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"ख़त तुम्हारा"

ख़त  मिला तुम्हारा,पते  बगैर  पहुँचा  मुझ तक ,हवाएं जानती  हैं खूब, तुम्हारे ख़त  लाना  मुझ तक, चली दिल से तुम्हारे,वो
 
Yogesh Sharma
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"मैं"

मैं से शुरू सारे सवाल,मैं में छुपे सारे जवाब,मैं कभी दुनिया से बेहतर,मैं कभी सबसे ख़राब,मैं की है अपनी ही मस्ती,मैं उम्र भर का नकाब,मैं गलतियों का पुलिंदा,मैं फिर भी सबसे लाजवाब,मैं परेशानी का सबब,मैं गुनाहों की वजह,मैं से जुड़े गम सैकड़ो हैं,मैं तब भी दे
 
Yogesh Sharma
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"आंच अभी बाकी है"

हमने, अपने आस पास, ऐसे बहत से लोगों को देखा होगा जो अब बूढ़े हो चुके हैं..... कमज़ोर हो चुके हैं | हमारी नज़रों में, शायद अब ये लोग कुछ विशेष न रह गए हों और यह भी संभव है कि कहीं ना कहीं ये लोग भी कहीं अपना आत्म विश्वास खो चुके हों | इनमे से कईयों को तो
 
Yogesh Sharma
Apr 04 2010 11:36 AM
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"यादों में वोही लोग आने लगे हैं"

यादों में वोही लोग आने लगे हैं, ख्यालों में आकर सताने लगे हैं, जिनके यकीं को, जी भर के तोड़ा था,तपते  सेहराओं में, भटकता  छोड़ा था,वो बहारों में आ कर डराने लगे हैं, यादों में वोही लोग आने लगे
 
Yogesh Sharma
Apr 03 2010 10:03 PM
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सुपुत्र....प्राईवेसी... और मैं

( पेश है पुरानी पोस्ट फिर एक बार... कुछ संशोधन और.......नये, इम्प्रूव्ड नाम के साथ
 
Yogesh Sharma
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"जिंदा मुर्दे"

उसे लगता था, दुनिया है मुर्दों की, यहाँ बस मुर्दें ही सांस लेते हैं, पिघला के रूहें, बना के नश्तर  उनसे,जान लेते हैं, खून पीते हैं, वो इक ज़माने तक बना रहा इंसान, जीने की हसरत में रोज़ मरता था, हुआ इंसानियत से
 
Yogesh Sharma
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"हमनशीं"

रंग मेरा,तेरी आँखों में झलक आता है दर्द तेरा,मेरी पलकों से छलक जाता है होँगे शिकवे ज़माने से,नहीं नाराजगी तुझसे, तेरा साया भी मुझे,दोस्त नज़र आता है नहीं खबर मुझे, क्या सच है क्या है भरम बस इक यकीन है,जन्मों का अपना नाता है - योगेश शर्मा
 
Yogesh Sharma
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"छोटा बच्चा"

मन के भीतर छिपा कहीं,इक छोटा सा बच्चा है,झूठ ,कपट के बीच भी जो,अब तक थोड़ा अच्छा है,बादल में दीवारों पर, जो अब भी चेहरे ढूँढता है,आईने में बिचका कर मूंह,खुद पर आज भी हंसता है,जिसका चंचल मन अब भी,गुब्बारों पे ललचाता है,परछाईं से कभी लड़ता है,कभी उससे दौड़
 
Yogesh Sharma
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"एक घर"

वक्त की रेत फिर इकठ्ठा करके, आँख से थोड़ी सी नमी लेके,पलों के कंकड़ों को चुन चुन के,   याद के गारे में मिलाया है, लफ्ज़ की ईंटों को फिर लगाया है, मैंने शायरी का घर बनाया है, स्याह रातों को, रंगीन सुबहों को,दिल की गहराईओं में कैद
 
Yogesh Sharma
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"किसी काम तो आऊँ"( ग़ज़ल )

लड़खड़ाना देख के मेरा, जो तुम संभल जाओ ,        नहीं होगा कोई शिकवा, मुझे फिर होश खोने का वजहें लाख मिल जाती हैं, तड़पने और शिकायत की बहाना एक नहीं मिलता, भला क्यों मुस्कुराने का जो समझ सको, जीत जाना ही बस
 
Yogesh Sharma
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कुछ शेर...बे- लगाम

हुई क्या दोस्ती ख़ुद से,  मैं अपना दुश्मन बन गया ,                       उम्मीदें जो दोस्तों से थी, अपने आप से हो गयीं ये डर जिंदा रहने
 
Yogesh Sharma
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"अमाँ.....कौन से शहीद"

नाम अब लगते सुने से,भगत और आज़ाद के,पढ़े कभी बचपन में थे,किस्से हमने सुभाष के,इम्तहान के पर्चों से ज्यादा,इनका न अब कुछ काम है,गांधी और नेहरु तो अब, बस रास्तों के नाम हैं,टोपी और खादी तो कब के,फैशन पुराने हो गए,आज़ादी को छुट्टी बने कितने ज़माने हो
 
Yogesh Sharma
Mar 28 2010 10:59 AM
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"ओस की बूँदें"

सूरज की आहट से, जाग के मदहोशी में,अलसाती ओस ने, फूल से सरगोशी में, बोला "दोस्त विदा, बस मुझको जाना है, मेरी इस काया को, भाप बन उड़ जाना है, अब मैं हवाओं के, पंखों पे झूलूँगी,उड़ते उड़ते, नभ शिखरों को छू लूंगी,बादल का कण बन, झूम झूम उड़ना है, पवन पवन देश
 
Yogesh Sharma
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"ईश्वर"

अक्सर, मन में ये विचार आता है,कि, मनुष्य कहाँ से आता और किधर जाता है?जीवन से पहले और मृत्यु के बाद क्या है ?क्या आत्मा वोही पुरानी, सिर्फ चोला ही नया है ?ईश्वर
 
Yogesh Sharma
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"मेरे पिताजी का स्कूटर"

 मैंने अपने बचपन की झांकी अपने 'मेरे पिताजी नामक ब्लॉग में प्रस्तुत की है | जिन्होंने मेरा वो ब्लॉग पढ़ा है उन्हें  मेरे पिटते पिटाते बचपन का एक्शन पैक्ड  ट्रेलर मिल गया होगा| मैं आपको ये बताना भूल गया था कि  पिताजी के
 
Yogesh Sharma
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"क्षमा"

इतना गुमसुम हो गया था जैसे के बेहोश हूँ,खामोशियाँ भी पूछती थीं, इतना क्यों खामोश हूँ,कर रहा था साफ़ बस, मन की सारी मैल को,मशगूल भूलने में था, हर इक पुराने बैर को नाग ढेरों बरसों से, दिल में थे पाले हुए,रंज के बेताल कितने, ख़ुद पे थे डाले हुए,भूत ये करते थे
 
Yogesh Sharma
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"मैं ताज हूँ "

शाहजहाँ तुम्हें याद है, या भूल चुके हो,मुझसे तुम बरसों पहले, ये कबूल चुके हो,कर बैठे प्यार मुझसे, मुमताज़ से भी बढ़ के, मुकम्मल किया जो मुझको, इंसानियत से गिरके,कब से चुप था मैं, अब सब्र नहीं है, दामन में मेरे, दो ही तो कब्र नहीं हैं, गड़े
 
Yogesh Sharma
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"दुआ"

वक्त के चलने का सारा खेल है, जब ज़िन्दगी ,कैसे हो सकता है भला, खुशिया हों पर गम न हो,ज्यादा क्या मांगू मैं  तुझसे, तूने ख़ुदा सब है दियाइतना कर एहसान
 
Yogesh Sharma
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Mar 21 2010 03:35 PM
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"तन्हाई"

तन्हाई में पर्दों के बस सहारे हैं ,इनको देख कर ही दिन गुज़ारे हैं,दीवार से घड़ियाँ उतार दीं सारी,वक्त से रिश्ते न अब हमारे हैं,सामने आता है एक ही चेहरा,हमने कितने
 
Yogesh Sharma
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"कारवां"

मैं चला तो था सफ़र में, कारवां के साथ साथ,थे कहीं कन्धों पे बाहें, और कहीं हाथों में हाथ,रास्ते में जाने कैसे, साथ हर छुटता गया,वक्त गुज़रता गया, काफिला घटता गया,कुछ मेरी तेज़ी से न चल पाए, पीछे रह गए, कुछ के क़दमों की, बड़ी तेज़ ही रफ़्तार थी ,कुछ
 
Yogesh Sharma
Mar 21 2010 11:04 AM
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"पिंजरा"

द्वार खुला कबसे, पिंजरे का ,पंछी, फिर भी बैठा है,उड़ जा उड़ जा,वक्त यही है,पल पल खुद से कहता है, लाख जतन कर भी, उड़ने की,हिम्मत जुटा न पाता है,पंख भी हैं  और मौक़ा भी फिर भी उड़ ना पाता है,है ऐसा क्या, जो रोके रास्ता,कैद से मुक्ति पाने का,प्रेम है ये
 
Yogesh Sharma
Mar 20 2010 06:09 PM
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"अर्ज़ किया है"

जो बैठे थे चमन में हम, बड़ा संजीदा  मौसम था,उठे और चल पड़े जो फिर, हवाओं के सलाम आयेमुहब्बत भी ज़माने में, बस अब सौदेबाजी है,इधर नज़राना दिल भेजा, उधर से दिल के दाम
 
Yogesh Sharma
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"एक दोस्त के लिए"

एक सुबह, मोहब्बत उजालों से  हुई एक दोपहर, धूप से हो बैठा प्यार,सितारे दिखते हैं, अब कितने  करीब,चाँद टंग जाता है, खिड़की के पार, हसीन  लगने लगी, हर चीज़  मुझे,हर शक्ल दोस्त सी, लगने है लगी, नज़र
 
Yogesh Sharma
Mar 18 2010 10:10 PM
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"मेरे पिताजी"

मेरे पिताजी काफी इमोशनल किस्म के इंसान थे, जैसे कि पहलवान लोग अक्सर हुआ करते हैं | पहलवान होने के नाते, जैसे इमोशनल होना उनका फ़र्ज़ था, वैसे ही इमोशनल होने के नाते थोड़ा गुस्सैल होना भी | उनको पहलवान कहना अगर पूरा सही भी नहीं होगा तो
 
Yogesh Sharma
Mar 18 2010 10:00 PM
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"दीवाने"

साए साए रहे, साए साए पले, धूप से की दोस्ती, तो चांदनी  से जले,चमकती रौशनी से, ख्वाब टूटने का डर था, आशियाँ आ कर बनाया , हमने  चरागों के तले, खो गए राह  में,
 
Yogesh Sharma
Mar 18 2010 09:53 PM
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"हिन्दोस्तानी होने के फायदे "

हिन्दोस्तानी होने के कितने  सारे फायदे हैं,यह सिर्फ मेरे जैसा एक  विशुद्ध  हिन्दोस्तानी ही समझता है | कभी कभी सोचता हूँ कि अगर हम  हिन्दोस्तान में न होकर, कहीं और पैदा हुए होते तो जीवन कितना नीरस
 
Yogesh Sharma
Mar 18 2010 08:19 AM
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"आवारा"

कोई फितरत से आवारा,कोई तबीयत से आवारा,किसी को आवारगी का शौक,मैं मजबूरी में आवारा,यूं तो, रास्ते बहुत थे,न समझा मैं, किधर जाऊं, था बस, मंजिलों का खौफ ,  जहाँ जाऊं, जिधर जाऊं, बचा जब कोइ न
 
Yogesh Sharma
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Mar 17 2010 12:24 PM