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22 Mar 2010
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लड़ नहीं सकता

मां ने कहा, शरीफ इन्सान बनो,बुराई से दूर रहो,क्यूंकि,हम लड़ नहीं सकते,टीचर ने कहा,अच्छे मार्क्स लाओ वर्ना,जिंदगी से तुम लड़ नहीं सकते,सरेआम होती कुत्सित मर्दानगी,को देख के दोस्त बोले,हमसे क्या मतलब,ऐसों से दूर रहो क्यूंकि,ऐसों से हम लड़ नहीं सकते,पापा ने
 
chandan
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मोहरा

क्यूँ लड़ता है आदमी,क्या कभी जीतता है आदमी,सिर्फ हारता है आदमी,तो क्यूँ लड़ता है आदमी,खेल तेरा,खेल के नियम भी तेरे,खिलाड़ी भी तू,फिर क्यूँ मोहरा बनता है आदमी,तू मदारी तू खिलाड़ी,सिर्फ तमाशा बनता है आदमी,पर जब तेरे डोर को,काटता है आदमी,तो तुझे भी,लगाम
 
chandan
Mar 21 2010 04:43 PM
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मां

याद आता है मां का वो रोना,वो सुबकना,जब मेरा संघर्ष ढूंढता था,स्थायित्व का एक अदद कोना,उसके आंसुओं का,मजबूरी के यौगिकों से घुला होना,जो पिघला सकता था,परमेश्वर का भी सीना,उसे रंज था,कि वो न लायी थी,सामने वाले प्रोफ़ेसर साहब ने,जो दिया था,अपने बेटे को
 
chandan
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ख्वाबों की मंजिल

कुछ अजीब सी चाहत है मेरी,जो पतझड़ देखे हैं,उन पत्तियों की शपथ है मेरी,दिल भी यही चाहता है, और यही है मेरे इबादत की ख्वाहिश,मेरे उम्र से हो छोटी,रास्तों की पैमाइश,हाँ मेरे पास वक़्त नहीं,कि मैं तेरे कालचक्र के साथ चलूँ,मुझे डर है कि मेरी धडकनें,न यूं ही
 
chandan
Mar 14 2010 07:37 PM
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महिला दिवस

क्या आज मेरे वजूद का पैमाना बताओगे,जो है सृष्टीकार की भी मां,उसके लिए शक्ति पूजा,और मेरे लिए दहेज़ की बेदी सजाओगे,जिसे कहते हो तुम मां दुर्गा मां काली,मैं भी उसका अंश हूँ,तुम कब समझ पाओगे,तुम्हे नौ महीने अपना खून पिलाया,कभी बेटी कभी बहन बनकर,तुम्हारे
 
chandan
Mar 07 2010 07:36 PM
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बुरा न मानों होली है....

मैं तुम्हारा पड़ोसी, खाली मेरी झोली है, तुम बुरा न मानो होली है, मुझसे कहते हैं कुछ बागी, इस बेबराबर कुश्ती का जवाब गोली है, पर मैं कहता आया कि बुरा न मानो होली है, मेरे पेट की चमड़ी मेरे रीढ़ को छू ली है, फिर भी दिल कहता है बुरा न मानो होली है, सोचता है
 
chandan
Mar 03 2010 05:51 PM
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प्रोफेशनल के मायने

आप किसी भी फील्ड से जूड़े हों। आपको दो शब्दों की एक लाइन अक्सर पेशे से जूड़े हुए अपने साथी और बॉस से सुनने को मिलती होगी, "Be Professional" आखिर प्रोफेशनल होना किस चिडीया का नाम है। हम सब जब तक अपने अपने पेशे से नहीं जूड़े थे तब तक तो यही जानते थे कि
 
chandan
Nov 13 2008 12:23 PM
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इंसानों की मंडी..

हर शहर हर कस्बे में हर रोज बिकते हैं हजारों लाखों लोग. हम में से हर व्यक्ति ने इन्हें सिर्फ बिकते हुए नहीं देखा बल्कि खुद खरीदा भी है. बकायेदा रोज सुबह हर शहर में लगती है इंसानों की मंडी. जी हाँ आपने सही समझा मैं बात कर रहा हूँ रोज सुबह बिकने वाले दिहाडी
 
chandan
Oct 25 2008 06:19 PM
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आधुनिक पत्रकारिता- पीत या छदम पत्रकारिता

आज मैंने हिन्दुस्तान अखबार में रवीश कुमार का ब्लाग से सम्बन्धित लेख पढा। जिसमे उन्होने मनीषा पाण्डेय की बेदखली की डायरी का उल्लेख किया है। मनीषा की डायरी पढ़ने के बाद मुझे लगा कि वाकई में ब्लाग अपनी बातो को कहने का सशक्त माध्यम हो सकता है. वैसे मैं मनीषा
 
chandan
May 28 2008 08:09 PM