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13 Jun 2010
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एक पूरा बरस : अधूरा समझौता

तुमने ठीक ही लिखा है-- न आने पायें उदासी के झोंके ,फुहारें दर्द की न पड़ें सुबह-शाम,आँखों में परछाइयाँ बादलों कीथमें केवल, जमें नहीं सावन में .--- यह सब कुछ  चाहता हूँ  मैं भीपर दोस्त,एक  पूरा बरस होता
 
prkant
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दोस्ती देने का नाम है -- तुमने कहा था

स्वप्न पलकों पर तिरा करते थे जो अक्सर ,कदम थके-थके जो बहक-बहक जाते थेमुड़ने के लिए चलते-चलते,पुरवा पवन वह ओस-भीगी सिहरा जाती थी सीला मन जो,रीत गये सभी कहो तो क्यों !!सिर पटक-पटक जाती है बिखर लहर ,फूट-फूट जाते हैं इस पहाड़ी नदी
 
prkant
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अक्कड़-बक्कड़ ओल्हा-पाती

मेरी परिभाषा में शामिल पीपल , पोखर , धूल गांव कीकाली , डीह , कराही - पियरी ,कजरी , चैता , फाग , बिदेसिया ,ताल, चिरैया ,पागल पुरवा ,चौखट , पनघट , घूंघट , गागर,साँझ ढले की दीया-बाती
 
prkant
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और सुनो अनु

मैं अब भी लिखता हूँ तुम पर कवितायें , अनु जबकि तुम सुनती हो नवजात शिशु की सांसें पति के सीने पर सिर रख.मैं अब भी ढूंढता हूँ तुम्हारे लिए उपमाएं ,गढता हूँ टटके बिम्ब और बनाता हूँ नए-नए अर्थ तुम्हारे कहे उन्हीं पुराने शब्दों से .मैं अब भी मोड़ता हूँ पन्नों
 
prkant
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सुनो अनु

__________________________________सुनो अनु! ऐसा क्यों होता है तुम अपने लिए चुनती हो दिनऔर रात मेरे हिस्से आती है .एक अलसाई सुबहतुमने चुना था प्रेममैं बेचैन हो उठा.एक खड़ी दोपहरतुमने चुना यथार्थमैं दिग्भ्रांत हो उठा.फिर, आज इस ऊदी शामतुमने चुना है
 
prkant
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एक प्रेमगीत

देह बांची नित्य मैंने वेदमंत्रों की तरह परउपनिषद के ब्रह्म-सी तुम दूर ही होती रहीं मैं अर्थ की गहराइयों से शब्द की सीमा तलकभटका किया हर रोज लेकिन तुम सदा खोती
 
prkant
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औरतों के लिए एक ऋचा, पुरुषों की ओर से

तुमने कब कहा मुझसे तुमको चाँद चाहिए तब तो  नहीं, जबअंजलि में जल ले  मैंने कहा-कुछ भी मांग लो , मिलेगा .तब तो तुमने यूँ  ही नचायेहीरे की कनी-से नैनपलकें झपकाईंऔर
 
prkant
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हाशिया

अभी जितना कहा है और उससे भी कम जितना लिखा हैऔर छोड़ दिया हैशब्द, वाक्य, अर्थ की पोटलियों मेंइधर-उधरमेज-किताब-अख़बारसब कहीं भटकने के लिएउससे कहीं ज्यादा- बहुत ज्यादारह गया हैटकने से-किसी कमीज़
 
prkant
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कलफ़ लगी औरतें

----------------------------------------कलफ लगी साड़ियाँ सरसराती हैं नफासत से उठते-बैठते-चलते ;तुडती-मुडती-सिकुड़ती हैंमोड़-दर-मोड़भीतर-बाहर हर ओर .अक्सर निकाली  जाती
 
prkant
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लाल सूरज

--------------------------------------तुम देहरी पार दीप रखो- न रखो अँधेरा घिरेगा ही सघन या विरल सपने छीजने लगें तो यही होता है--रात बांसुरी नहीं बजाती ,चाँद बच्चे नहीं बहलाता ,सितारे जंगल में भेज देते हैंभटके हुए बटोही
 
prkant
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यह मठ और गढ़ अब नहीं टूटेंगे

यह मठ और गढ़ अब नहीं टूटेंगेइसलिए नहीं किऔर मजबूत हो गयी हैं दीवारेंया कि और गहरी हो गयी है इनकी  नींवबल्कि इसलिए,मात्र इसलिए किबेसुरे बांसों क़ी चरमराहट हकला उठी
 
prkant
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May 02 2010 03:20 PM
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मैं बुद्ध नहीं हूँ

____________________________मैं बुद्ध नहीं हूँ.मेरे महाभिनिष्क्रमण और बुद्धत्त्व के  बीचनहीं किसी सुजाता की खीरशाक्यों का वैभव कपिलवस्तु के प्राचीर ;है तो सिर्फ यशोधरा की पीरशुद्धोदन का मोतियाबिंद मायादेवी का गठिया राहुल की किताबों का बोझ और
 
prkant
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देह की दुकानें

--------------------------दर्द उधार नहीं लेतीं देह की दुकानें हैं उसूल पर चलती हैं.अनुसूया की मर्यादा द्रोपदी की दृढ़ता और सीता का सतीत्व पुते हैं सब लिपस्टिक की परतों में .चमकदार झलर-मलर कपड़ों के भीतरकाजल से काले हैंआगत  के
 
prkant
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अलगनी पर टंगी औरतें

जम्फर , फरिया, ब्लाउज संगसुबह से शाम तकअलगनी पर टंगी रहती हैंचिमटियों से दबीकुछ साड़ियाँ .गरमाई हवा में फडफडाती हैंकभी धूप में, कभी छाँव मेंसूखती हैं भाप देतींकड़क हो
 
prkant
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मेला

परिंदे उड़ान भरते हैं आँखों में आसमान भरते हैंमेले में भीड़ नहीं आतीमेले में मेहमान भरते हैं .
 
prkant
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देह की बात

देह की बात हो तो कहे भी कोईमन की तकलीफ का ज़िक्र क्या कीजिये सांस एक डोर है फड़फड़ाती हुई जोर से खींचिए फिर उड़ा दीजिए.फागुनी गंध-सा टीसता है ये मनइन कुंवारी हवाओं का स्पर्श कर         स्नेह की आखिरी बूँद तक किस
 
prkant
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शिमला: जैसा मैंने देखा

१.सुबह ------चीड के पेड़ों पर उतरी अनमनी अलसाई भोर नेमलते हुए आँखें खोलींऔर एक अजनबी को ताकते देखकुछ झिझकी , कुछ शरमाईफिर कोहरे का घूँघट काढ लिया.ठंड  खाए सूरज ने खंखाराभोर कुछ और सिमटी .दो
 
prkant
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अपराध है बेटी होना

एक थी परीफूल- सी खिलीसजी-सँवरीबनी-ठनी झूमती फिरी.कुछ स्वेटर बुनेमोज़े दस्ताने भीझबले संग सपने--कुछ जाने, अनजाने भी----एक बेटी है इस बार बेटा ही होगा.बेटी से कहती रही-- आएगा भैया छोटा-सा, नन्हा-सा.छोटे-छोटे  हाथ होंगे, छोटे-छोटे
 
prkant
Mar 06 2010 11:13 PM
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फागुन की सांझ

दीप जला दीवट  पर   होंठ लगी बांसुरी चौखट पर  बैठ गयी फागुन की साँझ री.     मन की तरंग उठी तन के सितार में      मैना उदास हुई
 
prkant
Mar 06 2010 10:41 PM
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विदाई की रात

आज तुमने रख लिया अपना सब सामान कपडे-लत्ते , रूमाल जाने को ससुराल.कल सुबह की ट्रेन और रात अभी बाकी हैनींद नहीं आँखों मेंआंसू से डब-डबतैरते हैं दिन-महीने-साल.सुड़कती हो नाक सोचती हो जानेंगे जुकाम,जानती नहीं, हज़ार मुंह हैं
 
prkant
Mar 06 2010 10:12 PM
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कनक चूड़ी

-------------------------------------------ला दो ना पिया ला दो कनक चूड़ीमुझे भी पिया ला दो कनक चूड़ी. सोना के कानों  में सोने का झुमकारूपा के पांवों में पायलिया भारीबन-ठन के फिरती हैं संग की सहेलियांएक
 
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अंतिम मुलाक़ात के दिन

----------------------------------उस अंतिम मुलाक़ात के दिनबादल छाये  रहे आसमान में धूप रह-रहकर  उतरी धनखेतों में,हवा डोलती फिरी उदास-सीउफन आयी नदी के तीर-तीर,फूल-फूल उठे कुशा के वनऊसर धूसर से दुधिया हुआ.उस
 
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कुछ फुटकर

_____________________करके तिरछे नयन तुमने देखा मुझेएक अजानी चुभन तुमने देखा मुझेदेह की देहरी से निकल आया कलसांझ का दीप मन तुमने देखा मुझे.गंध ने पुष्प की पाँखुरी पर लिखाहोंठ ने बांस की बांसुरी पर लिखाकल वही गीत
 
prkant
Feb 28 2010 08:48 AM
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पछुवा पवन

___________________बात सुनो पछुवा पवन       बात सुनो पछुवा पवनअर्जन के उत्सव में रहने दो शेष तनिक       रिश्तों की स्नेहिल छुवन.परदेसी पाती के अक्षर में पाने को घिरते  हैं अर्थ कई
 
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लड़कियाँ

------------------------------------ये लड़कियाँ पहाड़ की          ये लड़कियाँ पहाड़ कीये मन की अपने मन रखेंनयन की बस नयन रखेंहृदय की पीर तीर-सीकरके हर जतन रखेंनदी-सी
 
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तुम

____________________________तुम्हें कहकर विदा उस दिन हमारी भर गयी ऑंखेंकहीं भीतर कोई झरना बहाकर झर गयीं ऑंखेंन चाहा था कि तुमको दर्द अपने दिल का दिखलाऊँमगर ये हो नहीं पाया खुलासा कर गयीं ऑंखें.अज़ब सी बेकली है दिल को समझाया नहीं
 
prkant
Feb 26 2010 09:24 PM
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जून में यमुना

______________________________________________________________________________सूरदास बहुत याद आए।सूखी यमुना के तल में खड़ा होकर सोचता रहा---कालिय नाग क्या कर रहा होगा? ताजेवाला बैराज के पीछे निवास बना लिया होगा शायद!!' देखियत कालिंदी अति करी'रेत का रंग
 
prkant
Feb 25 2010 11:10 PM
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दर्द का गीत

___________________________मैं गीत लिखता हूँ और दर्द गुनगुनाता हूँयह बात अक्सर समझ नहीं आती / मैं प्रेम करता हूँ और विश्वास हो जाता हूँ यह बात अक्सर नज़र नहीं आती /मैं देह जीता हूँ और मन ढोता हूँयह बात कभी खबर नहीं बनती /मैं
 
prkant
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Feb 25 2010 11:09 PM
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तनु के लिए

___________________सबको ढूंढना पड़ता है स्वयं अपना रास्ता ,बैसाखियाँ दूर तक साथ नहीं देतीं ;दूर तक साथ नहीं देते माता, पिता,भाई या बहन; हर रिश्ता कुछ दूर चल ठिठक जाता है. उन्मत्त घोड़ा  कैनवास पर आंकतीचांदनी धोई अंगुलियाँकप पकड़ते थरथराती
 
prkant
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होली के दोहे

___________________फिर फगुनाई धूप ने, छेड़े मन के तारप्रणय निवेदन कर रहा, बूढ़ा हरसिंगार.तेरी चूनर रंग गयी, मेरी भी तू रंगफिर दोनों मिल घोटेंगे, कबिरा वाली भंग.फिर अलसाई सांझ ने,
 
prkant
Feb 25 2010 10:38 PM
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सामान और आदमी

आदमी सामान नहीं होता पर अपने हर  सामान में थोड़ा-बहुत आदमी ज़रूर होता है.सामान समेट कर जाना किसी की ज़िन्दगी से जाना भी होता है. सामान केवल जगह ही नहीं घेरता मन भी घेरता है. वैशेषिक दर्शन कहता है--
 
prkant
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Feb 20 2010 09:52 PM
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जग बौराया

 जग बौरायाआना जाना भरमपेट की माया.
 
prkant
Feb 20 2010 09:31 PM