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हरे कृष्णा

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10 May 2010
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जगत में छ: श्रेणी के लोग होते है, द्वितिय श्रेणी उनकी है, अच्छा और बुरा दोनों देखना पर थोड़ा सा बुरा दिखाई दे तो उसे बहुत बड़ा चढ़ा देना।

प्रथम श्रेणी जो दूसरों में केवल दोष देखते हैं, पढ़ने के लिये चटका लगाईये।     बुरा भी देखना अच्छा भी देखना, लेकिन जो बुरा मिल गया तो बिल्कुल इस तरह झपट पड़ना कि अब मिल गया मिल गया। जो ढूँढ़ रहा था वो मिल गया, और उसको झपट लेना और फ़िर उसको बहुत
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जगत में छ: श्रेणी के लोग होते हैं, प्रथम श्रेणी उनकी है, अर्थात सबसे निकृष्ट कहा जा सकता है, कि वह जो दूसरों के केवल दोष ही देखे।

श्रीमद्भागवतम स्कन्ध ४ श्लोक १२ दोषान परेशान हि गुणेषु साधवो गृहन्नति केचित न भवाद्रिशु द्विज गुणांस च फ़लगुन बहुलि परिष्णवो महत्तमास तेषु अविदत्त भवान अगम । दोषान – दोष, परेशां – दूसरों के, हि – लिये, गुणेषु – गुण के अंदर, साधवा: - साधु, गृहन्नति –
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"पूतना वध" भागवतम - दशम स्कन्ध, भाग छ:

"पूतना वध" भागवतम - दशम स्कन्ध, भाग छ:श्लोक नं ३५भागवतम दशम स्कन्ध, भाग छ:"पूतना लोग बालघ्नि राक्षसी रुधिरासनाजिघमसयपि हरये स्तनम दत्तवापा सबगति"तात्पर्य - कृष्ण कृपामूर्ति अभयचरणार्विन्द भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद द्वारा पूतना सदैव बालकों के खून