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16 Jun 2010
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आज मुझे जी भर रोने दो

आज मुझे जी भर रोने दो !बीते मधुर क्षणों को मुझकोविस्मृति सागर में खोने दो ,आज मुझे जी भर रोने दो !छुओ न उर के दुखते छाले,मेरी साधों के हैं पाले,बढ़ने दो प्रतिपल पर पीड़ाउसमें स्मृतियाँ खोने दो !आज मुझे जी भर रोने दो !मत छीनो मेरी उर वीणा,भर देगी प्राणों
 
Sadhana Vaid
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ज्योतिकण

कौन के अरमान नभ में ज्योतिकण बन छा रहे हैं !कौन सी वह है सुहागन देव का जो ध्यान धरती,गगन गंगा में पिया हित दीप का जो दान करती,छूट कर उसके करों से जो उमड़ते आ रहे हैं !कौन के अरमान नभ में ज्योतिकण बन छा रहे हैं !आज किसने गा दिया है राग दीपक मधुर स्वर भर,जल
 
Sadhana Vaid
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और छाया है अँधेरा

'उन्मना' एवं 'सुधीनामा' के पाठकों का मैं ह्रदय से आभार व्यक्त करती हूँ जिन्होंने इनकी रचनाओं को पढ़ा और सराहा ! क्षमायाचना के साथ यह कहना चाहूँगी कि मेरे अमेरिका प्रवास के कारण शायद कुछ समय का व्यवधान इन ब्लॉग्स पर नयी रचनाएँ डालने में पड़ेगा ! आशा है आप
 
Sadhana Vaid
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मुझे सुहाता मुरझाना

तुम्हें फूल का खिलना भाता मुझे सुहाता मुरझाना,तुम्हें न भाते साश्रु नयनमुझको न सुहाता मुस्काना ! तुम पूनम की सुघर चाँदनीपर बलि-बलि जाते साथी,मुझको शांत अमावस्या का भाता है यह सूना बाना !उदित सूर्य की स्वर्ण रश्मियाँ तुम्हें मधुर कुछ दे जातीं,मुझे क्षितिज
 
Sadhana Vaid
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सब एकाकी

इस संसृति में सब एकाकी ! चमक रहा ऊषा के आँचल में नभ का तारा एकाकी ! इस संसृति में सब एकाकी ! ज्वार उठा सागर के उर में लहरें तट पर आ टकराईं,निर्मम तट पर आकर उसने निज जीवन की निधि बिखराई,सागर में अब भी हलचल है तट पर लहर मिटी एकाकी ! इस संसृति में सब एकाकी
 
Sadhana Vaid
Jun 01 2010 08:21 PM
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रीते आँगन का सूनापन

रीते आँगन का सूनापन भर जाता दसों दिशाओं में,विगलित हो जाता है कण-कण !रीते आँगन का सूनापन ! नव पल्लव आच्छादित पीपलरक्तिम तन सिसकी सी भरता,सूने कोटर के पास बया चंचल हो परिक्रमा करता,उसके नन्हे-मुन्नों के स्वरना उसे सुनाई देते हैं,पीपल की नंगी बाहों
 
Sadhana Vaid
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उर की डाली

हा सूखी उर की डाली ! आज गया है रूठ अनोखा इस उपवन का माली ! हा सूखी उर की डाली ! स्वाँस पवन की शीतलता से मिटा न उसका ताप,आशा की किरणें आकर के बढ़ा गयीं संताप, नयन सरोवर लुटकर भी हा कर न सके हरियाली ! हा सूखी उर की डाली ! भाव कुसुम अधखिली कली भी हाय न होने
 
Sadhana Vaid
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* तारे *

ये रजनी के उर क्षत सजनी ! चम-चम करते रहते प्रतिपल,झर-झर झरते रहते हर क्षण,पी-पी कर ह्रदय रक्त पागलये लाल बने रहते सजनी ! ये रजनी के उर क्षत सजनी ! वह दीवानी ना जान सकी,पागल सुख के क्षण पा न सकी, सूने उर में भर अंधकार जग को चिर सुख देती सजनी ! ये रजनी के
 
Sadhana Vaid
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साथी मेरे गीत खो गए !

साथी मेरे गीत खो गए !उस दिन चन्दा अलसाया था,मेरे अंगना में आया था,किरणों के तारों पर उसनेधीमे-धीमे कुछ गाया था !जग के नयनों में स्वप्नों के,साज सजे, विश्वास सो गए ! साथी मेरे गीत खो गए ! रजनी थी सुख से मुस्काई,मधु ऋतु में फूली अमराई,शांत कोटरों में सोई
 
Sadhana Vaid
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स्वप्न आते रहे

चाँद तारे दीवाली मनाते रहे,रात जगती रही स्वप्न आते रहे ! चंद्रिका ने दिया आँसुओं को लुटा,उनको ऊषा ने निज माँग में भर लिया,पुष्प झरते रहे, वृक्ष लुटते रहे,भ्रमर आते रहे, गुनगुनाते रहे ! चाँद तारे दीवाली मनाते रहे,रात जगती रही, स्वप्न आते रहे ! छोड़ हिम को
 
Sadhana Vaid
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सखी न कुछ भी भाता आज !

सखी न कुछ भी भाता आज ! गुंजित मधुर कूक कोयल की, मादक अलियों का सरसाज ! सखी न कुछ भी भाता आज ! आज न भाता मदिर भाव से प्रमुदित ऊषा का आना,आज न भाता मृदु मलयानिल का सुमनों को छू जाना,अरी न भाती चंद्र ज्योत्सना और न रजनी का प्रिय साज ! सखी न कुछ भी भाता आज !
 
Sadhana Vaid
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हताशा

तुम न आये मैं तुम्हारी बाट ही तकती रही,और स्वागत को तुम्हारे साज नव सजती रही ! तुम न आये सूर्य की अंतिम किरण भी खो गयी है,तुम न आये चन्द्र की यह ज्योत्सना भी सो गयी है !तुम न आये पर निशा ने कालिमा जग पर बिछा दी,तुम न आये फिर उषा ने अरुणिमा भू पर लुटा दी
 
Sadhana Vaid
May 16 2010 05:46 PM
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कारवाँ संहार का

रो रही है सर पटक कर ज़िंदगी और बढता जा रहा है कारवाँ संहार का ! कंठ में भर स्वर प्रभाती का मधुरअलस कलिका संग कीलित नव उषा,खिलखिलाती आ गयी जब अवनितलदेख उसका लास यह बोली निशा,ह्रास मेरा दे रहा जीवन तुझे,क्रम यही है निर्दयी संसार का ! रो रही है सर पटक कर
 
Sadhana Vaid
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आकांक्षा

अश्रु मेरी अमर निधि हैं, तुम मधुर मुस्कान ले लो,किन्तु प्रियतम तुम न मेरे भग्न उर के साथ खेलो !है मुझे अभिशाप ही प्रिय आस क्यों वरदान की फिर,क्या कभी सुखमय पलों की कल्पना रह सकी स्थिर ! अब न उतनी शक्ति मुझमें सह सकूँ अवहेलना प्रिय,और साहस भी न इतना कह
 
Sadhana Vaid
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साँझ घिर आई प्रवासी !

साँझ घिर आई प्रवासी ! तुम न आये, छा गयी जग पर न जाने कब उदासी ! साँझ घिर आई प्रवासी ! ह्रदय में तूफ़ान मचले, नयन में वारिद घनेरे,बढ़ गए पश्चिम दिशा में निविड़ तम के व्यस्त घेरे,तरसती है सिंधु तट पर मीन भी व्याकुल पियासी ! साँझ घिर आई प्रवासी ! चंद्रिका की
 
Sadhana Vaid
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बासी फूल

मैं पतझड़ का बासी फूल ! चढ़ न सकूँगी देव मूर्ति पर, मिटना होगा बन कर धूल ! मैं पतझड़ का बासी फूल ! प्रिय के युगल चरण साकार, सह न सकेंगे मेरा भार,सौरभ हीन शून्य जीवन मम, इसे सजाना है बेकार,कान्त कल्पना प्रिय चरणों पर चढ़ने की, थी मेरी भूल ! मैं पतझड़ का बासी
 
Sadhana Vaid
May 09 2010 07:33 AM
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तुम न आये

आज भी प्रिय तुम न आये,और मैं बैठी अकेली राह में पलकें बिछाये ! आज भी प्रिय तुम न आये !सप्त ऋषियों ने गगन में आज वन्दनवार बाँधे,सोहता मंगल कलश सा धवल चन्दा मौन साधे,जोहती हूँ बाट प्रियतम नयन में आँसू छिपाये ! आज भी प्रिय तुम न आये ! खिल उठी है रातरानी गंध
 
Sadhana Vaid
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धूल का अधिकार

मुझको फूलों से बहुत प्यार है लेकिनअधिकार धूल का ही मुझ पर है भारी ! माना फूलों में है सुगंध मतवाली,सुरभित जिससे उपवन की डाली-डाली,इन फूलों से फल, फल से जीवन मिलता,इन फूलों से श्रृंगार प्रकृति का खिलता,पर मेरी धरती तो अवढर दानी है ,इसकी महिमा देवों ने भी
 
Sadhana Vaid
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प्रणय के क्षण

दिये प्रणय के जो क्षण तुमने,जीवन के आधार बन गए ,घृणा, उपेक्षा, पीड़ा, दंशनपरित्यक्ता को प्यार बन गये ! सुख सज्जा के स्वप्न ह्रदय नेमिलन रात्रि में खूब सँवारे ,हुई विरह की भोर, नयन के मोती ही गलहार बन गये ! कभी निशा की शीतलता का मोल न कर पाया था जो मन
 
Sadhana Vaid
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मुझे मिले वे चरण

प्राण तरसते रहे निरंतर, मिला किसी का प्यार नहीं,मुझे मिले वे चरण कि जिन पर कुछ मेरा अधिकार नहीं ! मंजिल दूर, डगर अनजानी, जीवन पथिक थका हारा,एकाकी सर्वस्व लुटा कर फिरता है मारा-मारा,निज अभीष्ट मंदिर का जिसने पाया अब तक द्वार नहीं,मुझे मिले वे चरण कि जिन
 
Sadhana Vaid
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अनुभूति

सोच रहा मेरा पागल मन ! कौन शक्ति दुनिया में जिससे है इतना भारी अपनापन !सोच रहा मेरा पागल मन ! है सुख क्या दुःख कौन वस्तु है,है अथवा यह सब केवल भ्रम,क्या इस जीवन में सुख दुःख काचलता ही रहता है यह क्रम, क्यों नैराश्य है दुःख का सूचक,क्यों है आशा ही में
 
Sadhana Vaid
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प्यार की प्रतिमा

याद के मोती समेटे उर पटल में स्वप्न की डोली उठाने जा रही हूँ ,चरण रज से माँग में सिन्दूर भर करप्यार की प्रतिमा सिराने जा रही हूँ !मैं सुहागन हूँ मगर वह जो सदा से देवता द्वारा उपेक्षित हो रही है,भावना की साधना में निरत शाश्वतछलकती सी नयन निर्झरिणी बही है
 
Sadhana Vaid
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मैं दिये बुझते जला दूँ !

स्नेह का तुम दान दे दो मैं दिये बुझते जला दूँ ! चुक गया है तेल जीवन का न जिनमें ज्योति कण भर,जा रहे हैं रूठ कर जो विवश बंधन में जकड कर,जो तनिक तुम मान दे दो मैं ह्रदय रूठे मना लूँ ! स्नेह का तुम दान दे दो मैं दिये बुझते जला दूँ १ स्वप्न सूने जा रहे हैं
 
Sadhana Vaid
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नाविक से

ले चल मेरी नौका पार !भव सागर में बही जा रही,नहीं किनारा कोई पा रही,सुख दुःख की झंझा में पड़ कर डूब रही मंझधार ! ले चल मेरी नौका पार !नाविक मुझे वही तट भाये,रहें जहाँ जग से ठुकराये,जहाँ बसा हो एक अनोखा पीड़ा का संसार ! ले चल मेरी नौका पार ! मैं भी उनमें
 
Sadhana Vaid
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आज वारिद रो रहे हैं

आज वारिद रो रहे हैं !कुटिल जग की कालिमा निज अश्रुजल से धो रहे हैं ! आज वारिद रो रहे हैं ! देख कर संतप्त भू को पाप ल्वाला में सुलगते,ह्रदय की सद्भावनाएँ वासनाओं में बदलते,विकल होकर आज अपने धैर्य से च्युत हो रहे हैं ! आज वारिद रो रहे हैं ! ध्वंस लीला
 
Sadhana Vaid
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प्रणय का संभार कैसा !

हो तुम्हीं यदि दूर तो यह प्रणय का सम्भार कैसा ! तुम लगा पाये न मेरे दु:ख का अनुमान साथी, जान कर भी अब बने जो आज यों अनजान साथी,है निराशा की धधकती आग एक महान साथी, हो चुके हैं भस्म जिसमें छलकते अरमान साथी,प्राण शीतल प्रेम में यह विरह का श्रृंगार कैसा ! हो
 
Sadhana Vaid
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स्वप्न के ये खिलौने

मुझे दे दिये स्वप्न के ये खिलौने कहाँ तक सम्हालूँ, कहाँ पर सजाऊँ ! मुझे चाँदनी रात भाती नहीं है, चमक तारकों की सुहाती नहीं है, मुझे चाहिये स्नेह के दीप अनुपम जिन्हें मैं जला कर जगत जगमगाऊँ ! यह बादल की रिमझिम मुझे छेड़ जाती, यह बिजली दशा पर मेरी
 
Sadhana Vaid
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प्यार का अधिकार

मैं न तुमसे प्यार का अधिकार लूँगी !और जीने को न तुमसे स्नेह का आधार लूँगी !मैं न तुमसे प्यार का अधिकार लूँगी ! पंथ मेरा गगन के जल कण सजल करते रहेंगे, चन्द्र की अवहेलना सह ज्योति कण झरते रहेंगे, दीप भी बुझ जायें नभ के, है न इनकी चाह मुझको,तम मुझे प्रिय,
 
Sadhana Vaid
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जीत क्या है हार क्या है

जो किसी भी मूल्य पर बीते दिवस लौटा सकी तो,मैं तुम्हें बतला सकूँगीजीत क्या है हार क्या है ! था बड़ा जीवन सुनहरा,मस्त, चिंता का न कुहरा ,छू सका था जिसे केवल खेलना, खिलना, मचलना !जो यदि वह पा सकी तो मैं तुम्हें बतला सकूँगी अश्रु का संसार क्या है !एक था साथी
 
Sadhana Vaid
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खोया सा जीवन

यह मेरा खोया सा जीवन ! क्या फिर से पा जाऊँगी मैं इस लुटी हुई दुनिया का धन ! यह मेरा खोया सा जीवन !मेरी सूनी-सूनी रातें, प्रिय की मीठी-मीठी बातें,फिर याद दिला जातीं आकर,बीते सपने, बीते मृदु क्षण ! यह मेरा खोया सा जीवन ! स्मृति फिर-फिर कर आ जाती, इस मन में
 
Sadhana Vaid
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चाँद और लहर

जब लहर ने उठा शीश ऊपर लखा चाँद ने मुस्कुरा कर निगाह फेर ली ! ऊब कर शून्यता से गगन की बहुतएक दिन चाँदनी आ सरित से मिली ,हर लहर में निरख ज्योति के पुंज कोएक प्रतिबिम्ब पाकर बहुत वह खिली !वीचि के गान में भूल अपनत्व को उन तरंगों में जा कर स्वयं खो गयी ,ताल
 
Sadhana Vaid
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परदेशी निर्मोही !

वह पंथी तो परदेशी है ,कर पल्लव हिला-हिला उसको क्यों व्यर्थ बुलाते हो पादप ,क्यों स्नेह जताते हो पादप ! क्या जाने उसका कौन नगर ,क्या जाने उसकी कौन डगर ,क्या जाने कहाँ लुटायेगा वह स्नेह सुधा प्याले भर-भर !निर्मम होते हैं परदेशी जग तो यह ही कहता आया क्यों
 
Sadhana Vaid
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अरे कौन तुम !

अरे कौन तुम मेरे उर में पीड़ा बन कर मुस्काते हो ! मैंने जीवन के प्रभात में विस्मृति की झाँकी देखी है ,आश लता पर कान्त कल्पना की तितली बाँकी देखी है ,मैंने देखा अरमानों को चहक-चहक मधुरिम स्वर करते ,मैंने देखा अभिलाषा के सागर से तृष्णा घट भरते ,किन्तु अरे
 
Sadhana Vaid
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मैं तुम्हीं से आज अपने गान लूँगी !

मैं तुम्हीं से आज अपने गान लूँगी !मूक है वंशी तुम्हारी तो हुआ क्या ,मैं उसीसे आज स्वर, लय, तान लूँगी !मैं तुम्हीं से आज अपने गान लूँगी ! एक दिन जब प्यार सिर धुन रो रहा था,स्वार्थ का साम्राज्य अविचल हो रहा था,पापियों के भार से थी धरिणी कम्पित,विकल कोलाहल
 
Sadhana Vaid
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मनोव्यथा

मन चलो एकांत में सुख शान्ति से जीवन बिताने,दु:ख कुछ जग का भुलाने,आग कुछ उर की बुझाने ! हँस रहा जग देख तुझको रुक न पल भर भी दिवाने,बस चला चल राह अपनी इक नयी दुनिया बसाने !शून्य में चल गगन को कुछ दु:खमयी ताने सुनाने,व्यंग से कुचले ह्रदय केभाव कुछ उसको
 
Sadhana Vaid
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मेरा परिचय

हँस कर पूछ रहे हो परिचय कैसे दूँ निज परिचय आज ! जीवित ही शव हूँ मैं प्रियतमहूँ अवसादों का प्रिय साज़ ! लहराता है प्रति पल-पल पर पीड़ाओं का उदधि अपार !असफलता की चट्टानों से टकराता है पारावार ! सुख की रेखा कभी न जिसने देखी हो वह क्या जाने कैसा सुख है कैसा
 
Sadhana Vaid
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Unmanaa

 
 
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Unmanaa

 
 
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विरहिणी

प्राण न क्या तुम तक पहुँचेगी व्याकुल उर की करूण पुकार,और न क्या मैं फिर पाउंगीअपना लुटा हुआ संसार ?प्रात पवन ऊषा के आँचल से आती कुछ ले संदेश ,और कल्पना पगली चल पड़तीअपने प्रियतम के देश ! किन्तु भटक कर स्वयम्भावना में खो जाती है पगली ,और ह्रदय में छा जाती
 
Sadhana Vaid
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संकल्प

तुम चाहो तो जग में ज्वाला सुलगा दो, मैं स्वप्नों का संसार न मिटने दूँगी !तुम विप्लव का संगीत सुनाने आये, तुम पत्थर पर निज प्रीति लुटाने आये, तुमने मुकुलित सुमनों का यौवन देखा, तुमने उजड़े पादप का वैभव देखा ! तुम चाहे उपवन का सौरभ बिखरा दो, मैं कलियों का
 
Sadhana Vaid