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बावरा मन

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04 Jun 2010
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सुप्त जागृति

    सुप्त जागृतिजागने से गर सवेरा होताइंसा का रूख कुछ और होता ;         सुप्त जागृति को मिलती लय         जीवन बन जाता संगीतमय
 
सुमन'मीत'
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संजोया सपना

अकसर ऐसा होता है कि सपने टूट जाया करते हैं पर इंसान जज़्बाती है ना.............. फिर से नई आस के साथ सपने बुनने लगता है टूटता है, बिखरता है पर सपने संजोना बन्द नहीं करता.............बस सपनों को हकीकत में बदलते देखना चाहता है.........
 
सुमन'मीत'
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तुम्हें बदलना होगा !

                          तुम्हें बदलना होगा ! जीवन की राहें         बहुत हैं पथरीली
 
सुमन'मीत'
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अर्पित ‘सुमन’ ..... एक प्रयास

आज ये सफर 5 महिनों का होने को आया है जब कुछ लफ्ज़ मेरी डायरी के पन्नों से इस ब्लॉग पर उभर आये थे । उस वक्त सच कहूं तो ये सोचा न था कि ये सफर इतना सुखद होगा आप सभी के साथ। इन बीते महिनों में आप सभी का भरपूर सहयोग मिला और सुझाव भी। इतने दूर होकर भी हम
 
सुमन'मीत'
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अंतर्द्वन्द

                                 
 
सुमन'मीत'
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स्वप्निल राह

जीवन की राहों में कई बार कदम कुछ ऐसी राह पकड़ लेते हैं जिसकी कोई मंजिल नहीं होती या यूं कहो कि मंजिल सपना बन जाती है और वो राह स्वप्निल ।स्वप्निल राह जीवन की सच्चाई से अनभिज्ञ वो बढ़ती जा रही थी स्वप्निल रास्तों के गांव लेकर विचारों की छांव कदम पर आई ठोकर
 
सुमन'मीत'
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कुम्भ स्नान..............आस्था

                                        आज कुम्भ का अंतिम
 
सुमन'मीत'
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याद आता है.............

याद आता है.......याद आता हैवो माँ का लोरी सुनानाकल्पना के घोड़े परपरियों के लोक ले जानाचुपके से दबे पांवनींद का आ जानासपनों की दुनियाँ मेंबस खो जाना ...खो जाना...खो जाना..................याद आता हैवो दोस्तों संग खेलनाझूले पर बैठ करहवा से बातें करनाकोमल
 
सुमन'मीत'
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तेरे बगैर ............

अहसास ,संवेदनाएं सिर्फ मानव हृदय में ही नहीं पनपती अपितू हर उस जगह में समा जाती है जिससे हम जुड़े होते हैं फिर चाहे वो हमारा घर हो या हर वो जगह जो हमसे जुड़ी हो 1संवेदनाएं सभी में हैं बात सिर्फ महसूस करने की है जुड़ाव की है 1जैसे हमें अनुभूति होती है अपने
 
सुमन'मीत'
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क्यों ?

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सुमन'मीत'
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हसरत-ए-मंजिल

हसरत-ए-मंजिलन मैं बदला न तुम बदली न ही बदलीहसरत-ए-मंजिलफिर क्यूं कहते हैं सभीकि बदला सा सब नज़र आता हैशमा छुपा देती हैशब-ए-गम केअंधियारे कोवो समझते हैंकि हम चिरागों के नशेमन में जिया करते हैं ...............
 
सुमन'मीत'
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ढलती शाम

ढलती शामअकसर देखा करती हूँशाम ढलते-2 पंछियों का झुंड सिमट आता है एक नपे तुले क्षितिज में उड़ते हैं जो दिनभर खुले आसमां में अपनी अलबेली उड़ान पर.... शाम की इस बेला में साथी का सानिध्यपंखों की चंचलताउनकी स्वर लहरी प्रतीत होती एक पर्व सीउनके चुहलपन से बनती
 
सुमन'मीत'
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यूं ही कभी !

कुछ पल दोस्ती के नाम यूं ही कभीइन बन्द आखों मेंआती है सामनेकुछ बीती यादेंकुछ जीये हुए पल;वो हंसना वो रोनाउठकर रातों कोबातें सुनानायाद है आताअब इन दिनों मेंजीकर जो गुजर गयाबीते हुए दिनों में;हर पल दिल मेंकसक सी उठती हैकाश होते पास वोजिनसे अब दूरी है;हर
 
सुमन'मीत'
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अस्तित्व

हर वर्ष 8 मार्च को नारी दिवस मनाया जाता है1अखबारों , टेलिविज़न , पत्रिकाओं में अनेक लेख छपते हैं उन सभी के बारे में जिन्होनें अपने जीवन में कोई मकाम हासिल कर लिया है पर इस दिवस पर उन सभी नारियों को अपनी ये कविता समर्पित करती हूँ जिनकी प्रतिभाएं किसी
 
सुमन'मीत'
Mar 06 2010 05:32 PM
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होली के रंग में

होली के रंग में मस्ती की आई है बयार आया है रंगों का त्यौहार ,भूला कर सब बैर और भरम आओ झूम के मना लें ये जशन ,पोत लें खुद पे प्रीत की स्याही छोड़ जात का बन्धन बनें हमराही ,सब तरफ फैला दें अमन का गुलाल जीवन बने बसंत आए खुशियों की बहार ,रंग जायें इस कदर होली
 
सुमन'मीत'
Feb 27 2010 10:41 PM
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अनकहे जज़्बात

अनकहे जज़्बात एक दिन यूं ही सामना हुआ अपनी ‘कृति’ से विस्मित सी वो देख कर मुझे कहने लगी.....क्या सबब है – 2 जो तुम मेरी इतनी बांह थामे चलते हो , अपने जज़्बातों से मुझे इतना डुबोए रखते हो 1 यूं तो हैं सब अपने ये कहते रहते हो , क्यों अपने जज़्बातों से उनको
 
सुमन'मीत'
Feb 24 2010 10:13 PM
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जीवन के पल

               जीवन के पल हर गुजरा
 
सुमन'मीत'
Feb 19 2010 01:10 PM
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आगमन

                                   कभी     कहीं
 
सुमन'मीत'
Feb 13 2010 10:15 PM
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"प्रकृति के रंग"

शाम ढल आईमेघ की गहराईनीर बन आईआसमा की तन्हाईन किसे भी नज़र आई ;रातभर ऐसे बरसे मेघसींचा हर कोना व खेतन जाना कोई ये भेदकिसने खेला है ये खेल ;प्रभात में खिला उजला रूपधुंध से निकली किरणों मे धूपखेत में महका बसंत भरपूरअम्बर आसमानी दिखा मगरूर ;पंछियों से उड़े
 
सुमन'मीत'
Feb 07 2010 01:30 PM
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अँधियारा सवेरा

उजली चादर ओढ़ेनिकला नया सवेरा ;पर अधखुली इन आँखों सेछटा नहीं था अभी अँधेरा ;थोड़ी सी थी नमीछाया था अभी कोहरा !ये सुबह बीत करदोपहर में बदल गई ;हज़ार कोशिशे नाकाम रहीअँधेरा लिपटा था मुझसे अभी ;दिन भी बीत गया ऐसेइसी कशमकश में शाम गई !रात ने आकर अबचान्दनी की आस
 
सुमन'मीत'
Feb 03 2010 09:36 PM
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कभी-कभी सोचती हूँ...........

जाने क्या है जाने क्या नहींबहुत है मगर फिर भी कुछ नहींतुम हो मै हूँ और ये धराफिर भी जी है भरा भराकभी जो सोचूँ तो ये पाऊँमन है बावरा कैसे समझाऊकि न मैं हूँ न हो तुमबस कुछ है तन्हा सा गुम.......................
 
सुमन'मीत'
Feb 03 2010 09:32 PM
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"जीवन राग"

जीवन राग की तान मस्तानीसमझे न ये मन अभिमानी ;बंधता नित नव बन्धन मेंकरता क्रंदन फिर मन ही मन में ;गिरता संभलता चोट खाताबावरा मन चलता ही जाता ;जिस्म से ये रूह के तारकर देते जब मन को लाचार ;होता तब इच्छाओं का अर्पणमन पर ज्यूँ यथार्थ का पदार्पण ;छंट जाता
 
सुमन'मीत'
Feb 02 2010 12:33 AM
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