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राम लाल का ब्लाग

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12 Jun 2010
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कहीं आज जाकर हल हुई है भोपाल गैस त्रासदी

शीर्षक पर अगर भरोसा न हो तो आज कोई भी टी.वी. न्यूज़ चैनल लगा कर देख लीजिए. भोपाल गैस त्रासदी की समस्या हल हो गई है इसीलिए इसके बारे में कहीं कोई ख़बर नहीं है. आज वहां इससे भी बड़ी दूसरी समस्याएं दिखाई जा रही हैं जैसे फुटबाल वर्ल्ड कप, मोदी-नीतिश समस्या,
टैग: गैस
Jun 13 2010 08:05 AM
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हम डंडे के पीर हैं.

समाचार को पढ़ने के लिए इस पर क्लिक करेंसूखा पड़ता है तो हम लाओ-लाओ चिल्लाते हैं, बाढ़ आती है तो बचाओ-बचाओ. लेकिन हम सीखने से तब तक इन्कार करते रहते हैं जब तक कोई और चारा ही न बचे. अब ऊपर के समाचार को ही देख लीजिए, देश में अधिकांश जगह पानी का यही हाल है
Jun 10 2010 05:51 PM
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खेल खेल में

मणिशंकर अय्यर ने खेलों को जंब्बूरी कहा तो मंत्री पद खोना पड़ा. पर सच तो ये है कि भारत जैसे विकासशील देश में मूलभूत सुविधाएं मुहय्या करवाने का यही एक बहाना बचा है. चीन व कोरिया इसके जीवंत उदाहरण हैं जहां ओलंपिक खेलों के चलते ढेरों काम हुआ.कामनवेल्थ खेलों
Jun 06 2010 12:20 PM
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इसे आप क्या कहेंगे

ऊपर वाले चित्र में:- एक पार्क के बाहर, सुबह की सैर को आने वाले लोगों के लिए एक आदमी मिल्क शेक बेच रहा है. मिल्क शेक की मिक्सी पोर्टेबल जैनरेटर से चलाता है वह.नीचे वाले चित्र में:- उसी मिल्क शेक वाले के सामने सड़क के पार, लोकल मार्केट के बाहर एक स्थाई
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वाह रे पाकिस्तान तेरी ट्विट्टरी की क्या कहने

किसी टी.वी. चैनल पर देखा कि एक मुस्लिम महिला का कहना था कि यदि मोहम्मद साहब की तस्वीर बना कर छीछालेदर की कोशिश की भी गई है तो इसे सिरे से नकार देना भर ही काफी है पर पाकिस्तान ने फ़ेसबुक साइट बैन कर की. फिर लगा कि लोहा गर्म है...सो लगे हाथ यूट्यूब साइट भी
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RTI की असफलता के कारण

RTI की असफलता के कारणों में एक यह भी है कि कुछ लोगों ने तमाम ऊल-जुलूल क़िस्म की जानकारियां 10-10 रूपये में महज इसलिए मांगने का 'धंधा' अपना रखा है कि बाबुओं की नकेल कस कर रखी जा सके.इस तरह के लोगों ने बाबुओं को 'डराने'  वाले नामों की संस्थाएं बना ली
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ब्लागरत्रयी ज्ञान-शुक्ल-समीर... हुआ क्या है!

मैंने तीनों की पोस्ट की पढ़ीं.ज्ञान जी ने जो समझा वह लिखा लेकिन उनकी भाषा में कहीं कोई दुराग्रह/पूर्वाग्रह मैंने नहीं पाया. अलबत्ता जहां एक ओर शुक्ल जी के लिए छोटे भाई का सा  निहित अधिकार झलकता है वहीं समीर जी के लिए कोई ऐसी बात नहीं झलकती कि वे
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मज़ाकिया फ़तवे

वह भी ज़रूर एक समय रहा होगा जब भाषाई ज्ञान की सीमाओं के चलते पवित्र क़ुरान को पढ़ने-समझने समझने वाले बहुत कम लोग रहे होंगे. उस समय, भाषा के जानकार मुल्ला-क़ाजी अपनी समझ के अनुसार इसके अर्थ आम लोगों को बताया करते थे. आज समय बदल गया है, मुल्ला-क़ाजियों के
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मम्मियों का डे

सुबह-सुबह एग्रीगेटर देखकर पता चला कि केवल आज मदर्स डे है. भारतीय शहरी मध्यवर्ग को अफ़ीम का एक डोज़ और. ब्लागरों को पोस्ट लिखने का एक बहाना और. हमारे यहां तो भई हर रोज़ ही माता-पिता व परिवार का रहता आया है, हल्ला किस बात का.
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Honor Killings का सच.

एक और मां-बाप ने, अख़बार में काम करने वाली अपनी ही बच्ची समाजी ढकोसले के चलते मार दी. सोचता हूं कि कैसे मां बाप हैं ये और कैसा है इनका ये तथाकथित सामाजिक सम्मान. बच्चियों के भ्रूण-हत्यारे ही आगे चलकर ऐसे मां-बाप हो सकते हैं. यह भी सोचता हूं कि इनके
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अफ़ग़ानिस्तान के लिए क्रिकेट बहुत ज़रूरी है

आदिकाल से ही विभिन्न जनजातियों में बंटे चले आ रहे अफ़ग़ानिस्तान को एक राष्ट्र के रूप में बांध सकने के लिए आज केवल क्रिकेट ही सक्षम दिखता है. यहां राजनीति व जनजातियों की अपनी-अपनी सीमाएं रही हैं जिनके चलते अफ़ग़ानिस्तान कभी भी लड़ाकू क़ौम से ऊपर उठ कर एक
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ग़ैर शादीशुदा होने से चिड़चिड़ापन बढ़ता है.

शादी न होने के तीन कारण हो सकते हैं; शारीरिक सौंदर्य का अभाव, सामाजकि-आर्थिक/ व्यवहारिक-बौद्धिक अक्षमताएं या फिर सभिज्ञ निर्णय.माधुरी गुप्ता सरीखे लोगों की सिविल सेवा की आकांक्षा जब पूर्ण नहीं होती व दोयम दर्ज़े की नौकरी करनी पड़ती है तो वे खुद को दूसरों
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राजस्थान का ललित मोदी.

वाह रे ललित मोदी कल तक तो तुम्हारे राजस्थानी होने पर हम गर्व कर रहे थे पर, तुम्हारे कारनामे जैसे-जैसे सामने आ रहे हैं अब तो ख़ुद को गै़र-राजस्थानी बताना पड़ रहा है.प्रभु ने तुम्हे नि:संदेह बुद्धी दी है पर, वो तुम्हें सद्बुद्धी भी दे..0----0
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आपकी पोस्ट पर लानत भेजता हूं

कई ब्लाग पोस्ट पढ़कर दिल तो करता है कि टिप्पणी दूं - "आपकी पोस्ट पर लानत भेजता हूं"...पर समाजकर्म है कि कुछ कहते नहीं बनता. कम से कम कविताओं के ढेरों ब्लागों की तो यही हालत है. एक से एक फुसफसी तुकबंदियां...(हालांकि कुछ बहुत बेहतरीन हैं)और उस पर तुर्रा ये
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अब पाकी क्या करेंगे ?

कल IPL के मैच के दौरान बैंगलोर में फटे दो बाम्ब के बावज़ूद न तो वहां कोई भगदड़ मची और न लोग घरों को लौटे. मैच भी हुआ और लोगों ने ठस्से से देखा भी.पाकिस्तानी क्ल शाम से ज़रूर सिर खुजाते घूम रहे होंगे कि अरे ये क्या हो गया, भारतीयों ने तो डरना ही छोड़
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वाह भई मोदी ये क्या कर दिया

IPL में कुछ तो धांधली है, इसका विश्वास तो सभी को शुरू से ही था पर ये ललित मोदी इतना निरंकुश व्यवाहर करने लगेगा यह किसी ने नहीं सोचा था. ललित मोदी को याद रखना चाहिये कि राज्य से पंगा वही ले सकता है जिसके अपने दामन में दाग़ न हो.शशि थरूर ने अगर कुछ ऐसा
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ऐसे में बेचारी कांग्रेस क्या करे.

कांग्रेस की प्रोग्रेसिव पहचान के चलते शशि थरूर आराम से इसमें चले आए. संयुक्तराष्ट्रीय छवि व मलियालम फ़ैक्टर के चलते केरल से लोकसभा की सीट भी निकाल लाए. पहली ही बार में गच्च से विदेश राज्यमंत्री पद का जुगाड़ हो गया.पर अपने बड़बोलेपन और रंगीन मिजाज़ियों के
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राजनीति में भरोसा फिर क़ायम हो गया

किसी चैनल पर BJP का भंडाफोड़ देखा जिसमें कोई आरोपी बड़े बड़े कांग्रेसियों के नाम ले रहा था कि कैसे बंबई के पुलिस कमिश्नर की नियुक्ति में उसने तीर मारे..कैसे वो इन्कम टैक्स के छापे से बच गया.कल तक तो बेचारा जूदेव सिंह अकेला धरा जा रहा था.बहुत अच्छा लगा ये
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गुड मार्निंग, सरकार !

76 पुलिस वालों को यूं घेर कर मार डालने के बावजूद क्या सरकार को ये लगता है कि नक्सलियों को हराने के लिये उसके पास कोई नीति है ? या यूं ही गाल बजाने से काम चलाते रहेंगी सरकारें !सरकारों को याद रखना चाहिये कि पुलिस में केवल रोटी की चाह में भर्ती होने वालों
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क्या मोदी का कुछ होगा ?

लालू का तो कुछ नहीं विगड़ा, मायावती का भी कुछ नहीं बिगड़ा. कौन जाने क्या होगा मोदी का. राम जाने कुछ होगा भी कि नहीं. यही जानने के लिए अब देखेंगे न्यायपालिका का एक और निर्णय हम लोग.
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एम.पी. को देख सीटी बजाने के दिन आए

मुलायम सिंह यादव का मानना है कि महिला आरक्षण इस लिए नहीं होना चाहिये कि महिला सांसदों को देखकर छोरे सीटियां बजाएंगे.लेकिन ऐसी महिलाओं को बिना सांसद बने ही, कोई देख सीटी बजाए तो शायद इन्हें कोई एतराज़ नहीं है. साथ ही, बिना आरक्षण के जीत कर आने वाली
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मूर्ख डाकुओं की मेट्रो रेल !

दिल्ली में मेट्रो रेल चलाई थी भीड़ कम करने के लिए.तमाम बसें बंद कर दीं. अब लोग बेचारे बसों से दुगना किराया देते हैं और मज़बूरी में मेट्रो में ठुस कर चलते हैं. चार-चार डिब्बों की मेट्रो को आठ-आठ डिब्बों की ज़रूरत है. लेकिन डिब्बे बढ़ाने के बजाय
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नौकरी साथ जाएगी

कुछ लोग कह गए कि साथ कुछ नहीं जाएगा. सब खाली हाथ जाएंगे. पर मेरे एक मित्र हैं जिन्हें लगता है कि शायद कुछ साथ जाए न जाए, नौकरी साथ ज़रूर जाएगी. चौबीसों घंटे नौकरीमय रहते हैं. न परिवार की परवाह न मित्रों की चाह. और भी बड़े आदमी बनके ही मानेंगे.
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बन्दूको की सलामी और जोकरई

अंग्रज़ों ने अपने समय के छुटभइए राजाओं को उल्लू बनाने के लिए तोपों की सलामी-प्रथा शुरू कर रखी थी. जो अंग्रेजों का जितना बड़ा पिट्ठू उसे उतनी ही ज़्यादा तोपों की सलामी. ये जोकर राजा इसी बात पर मूछों पर ताव दिए घूमते थे कि देखा उन्हें कितनी ज़्यादा तोपों
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लाठीधारी स्त्रिवादियों को भी जै राम जी की.

मुझे लगा कि घुघूती बासूती के ब्लाग पर की गई इस टिप्पणी को यहां पोस्ट की तरह लगाया जाना चाहिये:- कुछ लोगों के दिमाग़ में यह अच्छे से बैठ गया है कि पुरूष केवल स्त्री का शोषक व केवल शोषक ही हो सकता है (कारण :- हो सकता है उनके घरों में या उनके आस पास ऐसा
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कितने बदनसीब हैं ये लोग

कुछ लोग हैं कि जिन्हें पता नहींखुशियों का मतलत.और कुछ हैं कि खुशियों से मुंह चुराए बैठे हैं.ज़रूर बदनसीब रहे होंगेये लोग.0-----------------0
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परमाणु नीति देख के बनाइयो रे

यह कैसी परमाणु नीति है कि सरकार परमाणु-दुर्घटना की स्थिति में खुद तो अपना पल्ला झाड़ कर किनारे खड़े हो जाने पर तुली ही हुई है; साथ ही साथ, देश के मुज़रिमों को बचाने में भी पीछे नहीं रहना चाहती.भोपाल गैस त्रासदी से सरकार ने शायद यह सही सीख ली है कि
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बाबाओं की बन आई है आजकल

पिछले कुछ समय से कोई न कोई बाबा किसी न किसी कांड में फंसता चला आ रहा है. चाहे वह नकली बाबा का पर्दाफ़ाश हो या भगदड़ में मौतें या काला जादू हो या फिर आतंकियों से सांठ-गांठ.इन सबके चलते एक बात तो तय है कि उन लाखों सच्चे सन्यासियों से भी लोगों का विश्वास
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IPL की जंबूरी चालू आहे

वाह ! हम भारतीयों ने भी क्या किस्मत पाई है. हाकी का विश्वकप ख़त्म हुआ नहीं कि IPL शुरू हो गया. बाबू लोग जल्दी जल्दी दफ़्तरों से आते हैं और टी0 के0 आगे जम जाते हैं. बच्चे रिमोट ढूंढते रह जाते हैं. पत्नियां पतियों की फ़रमाइश पर रसोइयों में नई नई चीज़े
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वाह भई कल्बे छा गए तुम तो

लखनऊ के एक कोई तथाकथित काले चोगे वाले शिया लीडर कह रहे हैं कि महिलाओं का काम सिर्फ़ बच्चे पैदा करना है न कि अपना हिस्सा मांगना. इन सज्जन का नाम है कल्बे जव्वाद. कल किसी दूसरे टी.वी. चैनल पर एक साधूबाबा भी कुछ यही राम अलाप रहे थे.इन प्रस्तरयुगीन विचारधारा
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आओ तरक़्की की बात करें

तरक़्की की क्या कहूं, मेरे प्रधानमंत्री 6 से 10 के बीच की सकल घरेलू उत्पाद की बात करते हैं. इसी के चलने शहरों में खाते-पीते लोगों की संख्या बढ़ने का सबूत है बजन कम करने की दुकानें खुलती ही चली जा रही हैंदूसरी तरफ़ गांव का किसान दु:खी होकर मज़दूर बन
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श्श्श्श्श...पाकिस्तान का मज़ाक उड़ाना मना है.

कल तक, पाकिस्तान के पास ले दे कर दो ही चीजें थीं जिसके भरोसे ये गंजे बच्चों की मानिंद उछल-उछल कर दुनिया को अपना बचकाना सा मुंह दिखाता आया है. पहला है परमाणु बम्ब व दूसरे, हाकी-क्रिकेट का खेल.क्रिकेटरों को कल इसने हड़का के बर्ख़ास्त कर दिया, आज हाकी की
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काहे ब्याही बिदेस लखी

न जाने कौन सा भ्रम है कि फूलों सी पालने के बाद भी मां-बाप अपनी बेटियों को विदेश ब्याह देते हैं. इतनी ख़बरें रोज़ आती हैं कि इन बेटियों को विदेशों में जाने क्या-क्या सहना पड़ता है और मां-बाप हैं कि चाह कर भी अपने कलेजे के टुकड़े के लिए कुछ नहीं कर
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ब्लाग लिख कर तीर मारने वालों की फ़ेहरिस्त

उस दिन मैं बात कर रहा था - " भई राम लाल, ये ब्लाग लिखने की क्या सूझी ?"राम लाल -"अरे भाई, जब ये लेखक टाइप लोग कुछ कुछ लिख कर इस मुग़ालते में रहते हैं कि उनके लिखे से समाज बदल जाएगा तो फिर मैं क्यों पीछे रहूं !"-"तो ?" -"तो क्या, मैंने भी ठान ली कि
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महिला आरक्षण की एक लघुकथा

नेता जी नींद से हड़बड़ा कर उठ बैठे - "जानती हो मैंने अभी सपने में देखा कि मेरी लाल बत्ती की कार में तुम पिछली सीट पर बैठी हो और मैं, आगे ड्राइवर के बगल में " पत्नी -"इत्ता काहे डरते हो जी, ये तो सोचो कि कार तो हमारे अपने ही घर में रही न.  और फिर तुम
Mar 09 2010 08:10 AM
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महिला आरक्षण विधेयक की सबसे बड़ी ग़लती.

सोचना तो सरकार को भी चाहिये कि जब, संसद व राज्यों में पहले से ही अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए आरक्षण है तो क्यों नहीं जनप्रतिनिधियों की समस्त संख्या में से महिला आरक्षण दिया जाता.या कहिये कि कुल सीटें 100, अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए 23, बाक़ी बची 77, तो
Mar 09 2010 07:54 AM
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आलोक मेहता को एक चपत राम लाल की भी.

कोई आलोक मेहता किसी अख़बार में ब्लागरों के बारे में कुछ उल्टा-सीधा लिख कर होली मना चलता बना. बाद में पता कि हिन्दी ब्लागरों से पंगा लेने वाले ये सज्जन आजकल राजनीति के गलियारों में संसद-सदस्यता सूंघते घूम रहे हैं. ये पत्रकार टाइप कुछ हैं; यहां-जुगाड़
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Mar 07 2010 03:13 PM
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कृपालु ये क्या कह दिया

कुण्डा के आश्रम में मची भगदड़ में दसियों ग़रीबों के मरने की ख़बर पर कृपालु महाराज ने यूं पल्ला झाड़ लिया मानो मरने वाले अफ़गानी तालिबान रहे हों.क्या फ़ायदा इतनी बड़ी प्रकांड पंडिताइ का कि आदमी ही आदमी न लगे बल्कि ग़ैरजि़म्मेदार ख़ैरात बटोरने वाली
टैग: भीड़
Mar 07 2010 02:51 PM
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राहुल महाजन की शादी हो गई

यह दिखाने के लिए टी0 वी0 चैनल को धन्यवाद कि समाज में आज भी ऐसी ठाड़ी औरतें हैं जो इस तरह के इन्सान से भी शादी के लिए तैयार बैठी हैं, लाइन लगाकर.और साधुवाद उन महानुभावों को जो इस तरह के सीरीयल लगातार देखने का माद्दा रखते हैं.चैनल, प्रतियोगी व दर्शक, सभी
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Mar 07 2010 02:38 PM