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सामाजिक रिशतें
मन में फिर फूल खिलने लगे है,आशाओं के दीप फिर जलने लगें है । आसमान में पहले दिखती थी कालीमा, अब रूपहले इन्द्र धनुष से बनने लगें है ।। मुस्कान से भी पहले जो करते थे नफरत, दिल खोलकर हँसने लगें है । कटे-कटे से रहना जिनकी थी आदत, अब दौडकर गले मिलने लगें है
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Apr 30 2010 08:18 AM


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