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मेरी कहानियां

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16 Jun 2010
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हजपुरा

....मैं लखनऊ ,छोड़ के पूना आ गया ....फिल्म क़ा ज्ञान लेनेरैगिंग के डर से ....दो चार दिन अपने एक पहचान वाले घर ही रहापर बकरा कब तक जान बचाएगा .....एक दिन किरण कुमार औररजा मुराद के हत्थे चढ़ गया .....बड़ी -गाली गलौज से बात की ॥वैसे मैं भी थोड़ा सा बदमाश
Jun 16 2010 04:07 PM
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हजपुरा

.....पहली बार ,मैं अपने शहर से ,कहीं दूर की यात्रा कर रहा थाट्रेन में दो लडके और मिले जो .....पूना में इंटरव्यू देने जा रहे थे.....पूना पहुँचने के बाद ......मैं अपने एक पहचान वाले घर जापहुंचा । दुसरे दिन प्रभात स्टूडियो में इंटरव्यू था ......प्रभात रोडपे
Jun 14 2010 12:59 PM
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हज़पुरा

......लखनऊ में मैं ....अकेला हो गया .....मन नहीं लगता था ...बी कॉम की पढाईशुरू की ......रतन के ख़त में कहीं ,यह जरुर लिखा होता था .....मुम्बई बहुत आगेहर मामले में है ....रतन को गेज्बो रेस्टोरेंट में काम मिल गया ..... कुछ महीनों बाद ....रतन वापस आ गया
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हज़पुरा

..... हाई स्कूल के बाद ......मैंने कामर्स ले कर ....आगे की पढाई शुरू कीनये दोस्त मिले ....रतन मेरा दोस्त भी पास हो गया था हम एक ही सेक्सनमें थे .....हाई स्कूल पास हो जान के बाद .....अपने आप को हीरो समझने लगा.....एक कापी ले कर स्कूल जाना .....क्लास में
Jun 04 2010 03:09 PM
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हज़पुरा

......मुझमें फिल्मों में जाने की नींव .....सन सत्तावन (५७)में हीपड़ गयी ,जब मैं सातवीं क्लास में पढ़ रहा था ....और साथ मिलादोस्त रतन का .........फिल्म देखने की आदत पड़ चुकी थी .....घरके बगल ,रेलवे स्टेशन के ही करीब ......सुदर्शन टाकीज था ...अब भीहै
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हजपुरा

सन ५२ था ,और मैं दूसरी क्लास में था ,घर से बहुत नजदीक था स्कूलपैदल ही मैं जाता था ...मेरे साथ ...रिफूजी बैरेक में रहने वाले वहलडके भी थे .....जो बंटवारे के बाद ,यहाँ रहने के लिए उन्हें घर मिला था ....मेरा साथ पंजाबी लडकों के साथ बीतता .....हर परिवार के
Jun 01 2010 04:37 PM
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हजपुरा

......गाँव में मेरा बचपना छे साल तक बीता...पढ़ाई के लिए ,मुझेपिता जी , लखनऊ शहर ले आये .....मैं आकेला ही आया ,माँगाँव में ही रह गयी ......यह दौर था सन ५१ का ......पिता जी कोस्टेशन के पास रेलवे कालोनी में घर मिल गया था ......दो कमरे थेएक किचन था ,किचन से
May 20 2010 03:47 PM
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हजपुरा

....मैं उन यादों को लिख रहा हूँ .....जो मेरे बचपने की वह हैं .......जिनसेमेरे जीवन का रूप -रंग बदला ....मेरी माँ पे ....देवी माँ का साया था .....जब उन पर आता थातब वह क्या क्या बोलती थी ......मुझे याद नहीं है ....पर वह भय...आज तक ,मेरे अंदर छिपा बैठा है
May 19 2010 05:39 PM
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हजपुरा

हजपुरा ..........मेरे गाँव का नाम है .....उत्तर प्रदेश में ...अयोध्या नाम का एक शहर हैउससे चालीस मील पूरब में जिला आंबेडकर नगर है .....कचहरी से जलाल पुर की तरफएक सडक जाती है .......उसी सडक पे करीब सोलह मील पे सडक के किनारे ...हजपुरा गाँवहै ......यहीं मैं
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भौजी

सारा गाँव ,उन्हें भौजी बुलाता था ....यह आज की बात नहीं है । यह दौर है ,सन पचास से सन साठ का ....अभी कुछ वर्ष पहले देश आजाद हुआ था ।गरीबी बहुत थी ...दो वक्त का खाना ,नसीब नहीं था ...बच्चे एक लगोंटी मेंघूमते थे .....भौजी ही एक ही थी ....जो सभी का ख्याल
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माँ

सब कुछ ठीक ठाक ही चल रहा था ,एक दिन पंडित जी का जवान बेटा गुज़र गया ,बहुत बड़ी खेती थी ...अब उसे कौन देखेगा ? यही विचार उनके मन में गूंज रही थी ,खुद भी साठ से ऊपर हो चुके थे ....उनका वंस कैसे चले गा ? बेटे के अचानक गुजरजाने से ....उसकी पत्नी पेट से जरुर
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धन्नों बुआ

.......धन्नों बुआ ....गाँव भर की बुआ थी ....पांच भाईओं की बहनसभी भाई अपना -अपना परिवार ले कर अलग अलग रहते हैं ... ॥धन्नों बुआ को भी दो कमरे दे दिया था ....तीन बीघा जमीन दे दिया थाउसी से उनका गुजारा होता था .....करीब आठ से दस साल की थी ,तभी उनका विवाह हो
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डाकू मामा

........हम बच्चे , उन्हें डाकू मामा कह के बुलाते थे । क्यों बुलाते थे ?नहीं हमें मालूम .....एक दिन , मैंने अपनी दादी से पूछा ....दादी , ये डाकू मामा ,सच -मुच के डाकू हैं ? दादी ने जो बताया , वह मेरी समझ में नहींआया । डाकू मामा की .....दो साल की बिटिया को
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भय

.....बहुत छोटा था , करीब सात साल का ,गर्मी की छुट्टी होते ही ,मैं अपनीदादी के पास गाँव आ जाता था । सबसे बड़ा सुख था यहाँ कोई पढने को नहींकहता था ,मैं दादी की उंगली पकड कर अपनेगाँव में घूमता था । दादी को मैं तीन माई कह के बुलाता था , क्यों बुलाता था मुझे
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सत्तू

........अब मेरी , ख़ास इज्जत होने लगी ,ज़ेबा जी के स्टाफ मेंकरीब दस रोज हो चुका था ,उनके साथ काम करते हुए । मैं जानताथा ,मुझ पे इतना सब खर्च जो हो रहा है ....उसके पीछे कुछ न कुछ ,कोई बात जरुर है ,हीरो खान के साथ एक फिल्म थी जो पूरी हो गयी है.....उस दिन
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सत्तू

......मैं और बिरजू , ज़ेबा जी के बंगले के पास ही पहुंचे थे , तभी ज़ेबा जी अपनी कार से बाहर निकली शूटिंग पे जानेके लिए ....उनकी कार हमारे सामने से गुजरी .....और हम से कुछ दूरी पे जा कर रुक गयी । मैं घबरा गया ,बिरजू भी डर गया ,हम दोनों तेजी से आगे बढ़ गये
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सत्तू

..................हम दोनों डान की कैद से जरुर निकल आये ....अब ...क्या , क्या मैं ,जो वादा डान से कर के आया हूँ ,उसे पूरा कर पाउँगा ? इसी सोच में दो दिन गुज़र गया .........मैं अपनी झोपड़ी से निकला ही नहीं .....बिरजू ,मेरा दोस्तइतना डरा हुआ था ,बस एक ही रट
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सत्तू

.....दोपहर को ,बिरजू मेरे लिए खाना ले कर आया ,मेरा डरा हुआ चेहरा देख कर ,उसने पूछा .......क्या बात है ?....चेहरा तेरा इतना मुरझाया हुआ क्यों है ?यह डान,मुझे कातिल बनाना चाहता है ....उस हीरो खान से मेरी क्या दुश्मनी है ? बता तू,बोल...बोल ना चुप क्यों है ?
Mar 26 2010 01:20 PM
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सत्तू

....गाडी , बहुत बड़ी थी ....एक ड्राईवर ,सफ़ेद कपड़ों में था । जो उस गाडी को चला रहा था।कहाँ ले कर मुझे जा रहा है ? मुझे नहीं मालूम ....पर डर था , मुझसे क्या कराना चाहते हैं ?गाड़ी चली जा रही थी ,मैं अपने विचारों में खोया ...एक -एक पलडर से गुज़र रहा था
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सत्तू

पुलिस ,पूछ पाछ के चली गयी ,मैं पुलिस के व्योहार से मैं डर गया ।इसी सोच में पड़ा रहा ,क्या सच में किसी चंगुल में फंस रहा हूँ ?मुझे यहाँ से भागने में समझदारी लगी ,सब कुछ था तो ,पैसा टिकट ,फिर एक ख्याल आया ,मेरे जाने से ,पुलिस का शक पक्का न हो जाय ।की मैं
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सत्तू

......मुझे ठीक होते - होते चार दिन लग गया ,बिरजू मेरा बहुत ख्याल रखता ।मेरे खाने पीने का पूरा ध्यान रखता ,सुबह वह खाना बना कर , खुद खा करऔर मेरे लिए रख कर चला जाता । मैं अपनी तीन दिन की बेहोशी को अभीतक समझ नहीं पा रहा हूँ । क्या मैं सच में बेहोश था ,
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सत्तू

......बेला जी की बिल्डिंग के पास खड़े -खड़े ग्यारह बज गया ,लगा अब वहनहीं आयेंगी .....या चली गयी होंगी ?कुछ देर बाद एक सवारी मिली उसकोफिल्म सिटी जाना था ....,एक पल को सोचा , ..क्या करूं ... जाऊं ....या ..मनाकर दूँ ......लेकिन ..यह कब तक ....... । तभी
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सत्तू

.....मैं अपने आप से , बार -बार पूछने लगा ,जो कुछ मैं कर रहा हूँइसका अंजाम क्या होगा ?........क्या मैं गुनाह की चादर ओढ़ रहा हूँ ?इसी उधेड़ -बुन में बैठा रहा ........कुछ सोच के, नोट जो अभी निकाले थे ,दुबारा उसी झोले में रख दिया ......और आँखे बंद कर के सोने
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सत्तू

करीब दो बजे ,आँख खुली ...भूख लग रही थी । इस झोपड़ी में एक बड़ासा ड्रम था ,जिसमें बिरजू सुबह उठ कर पानी भर देता था ,मैंने पहलेनहाया और फिर चाय पीने के लिए ,घर से निकला ,बगल की गली मेंएक चाय की दूकान थी ,वहीं अक्सर चाय पीता हूँ, यह दूकान एक औरतचलाती है
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सत्तू

मोहन ने चौकीदार से कुछ बात की ,और फिर मेरे रिक्शे के पास आया ।मैं पास की झाड़ी में छिप गया था ,कौन सा डरहै ,मुझे नहीं मालूम ,यह सभी लोगमुझे तलासते रहे ,जहाँ मैं छिपा बैठा था वहीं पे एक थैला पड़ा हुआ था । मैंने उसेध्यान से देखा ,उस में कुछ था ,पर क्या था
Mar 15 2010 12:49 PM
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सत्तू

आज दस दिन बीत चुका था ,बार बाला का काम करते हुए ।हमारी आपस में कोई भी बात अभी तक नहीं हुई थी , बस वहरिक्शे में बैठती ,और मैं बार तक पहुंचा देता और वापस करीब चारबजे तक मैं फिर आता ...उनको रिक्शे में बैठाता और चल देता ,कभी -कभीखूब शराब पिए होती ,मैं उनको
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सत्तू

रात का करीब दस बज रहे थे , मैं रिक्शे से बाहर निकल कर खड़ा हो गया । और इन्तजार करने लगा ,उस बार -बाला का ,मन में एक डर था ,कहीं रातकी बात भूल न गयी हो ? मेरी हालत वैसी थी , जैसे आप को भूख लगी हो औरआप ........बार बार कह रहें हो ....नहीं यार मुझे भूख नहीं
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सत्तू

बेबी का बेड रूम ,पहले महले पे था ,मैं डरा हुआ सीढियॉ चढ़ने लगा । ऊपर से उतरते हुए बेबी की माँ मिलीमुझे देख कर मुस्करा दिया ,जैसे कह रहीं हो ,जाओ ....हलाल होने । मैं बेबी के कमरे के बाहर ,जा कर खड़ाहो गया । मुझे देख कर ,अंदर बुलाया .....अंदर आ जाओ । मैं
Mar 05 2010 02:11 PM
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सत्तू

......जेबा जी का यह पूछना .....मैं हिन्दू बन सकती हूँ ?.........मैं कुछ नहीं बोला ,हमारे बीच .........एक ख़ामोशी बनी रही । ..........बेबी ने मेरी तरफ देखा ,...कुछ सोच के पूछ.......इतना चुप क्यों हो गये ?......बस ....ऐसे ही । अच्छा यह बताओ हम जा कहाँ रहें
Mar 04 2010 12:16 PM
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सत्तू

करीब महीना बीत गया काम करते हुए ,ज़ेबाजी की वज़ह से , ......इस घर का खास आदमी हो गया.....मुझे यहीं बंगले में ही रहने को कह दिया गया था । मैंने बिरजू से माफ़ी मांग लिया था ,समझादिया था । अगर नौकरी करनी है तो बंगले में ही रहना पड़ेगा ,वह मुझे शक की नजर से
Feb 26 2010 11:08 AM
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सत्तू

करीब रात के दो बजे शूटिंग खत्म हुई , मैं हिरोइन की कार में आगे बैठ गया । ऐसा मुझे कहा गया था ,बेबी के साथ हमेसा रहना । सुबह भी इसी तरह बेबी जेबा के साथ आया था । घर आते -आते तीन बज गये ,वहीं बंगले में मुझे सोने को कहा गया ,मैं और ड्राईवर मोहन बंगले के
Feb 25 2010 04:33 PM
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सत्तू

हम दोनों ,घर पहुंचे ......घर क्या था ,एक टीन की चादर- छत बनी झोपडी थी । मैं बहुत खुश था ,आखिरनौकरी मिल ही गई । बिरजू ,पता नहीं क्यों चुप था ,ऐसा लग रहा था । जैसे उसको मेरी नौकरी का मिलनाअच्छा नहीं लगा । मैंने ही पूछा ,क्या बात बिरजू तू इतना चुप क्यों है
Feb 24 2010 01:57 PM
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सत्तू

हम सभी को ,इस शहर में रहते हुए करीब चार महीने बीत चुके थे । कोई काम अभी तक नहींमिला ,बी .ए .तक की पढाई बेकार सी हो चुकी थी । कहीं भी मेरे लायक काम नहीं था ,बड़ी उम्मीदसे मुम्बई आया था । कुछ काम मिल जाएगा तो अपने परिवार का पेट पाल सकूंगा । रोज एक दिनकल की
Feb 24 2010 10:04 AM
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उम्र सत्तासी की दिल बचपन का

उसकी जिंदगी में बहुत सूना पन था ,उसकी लड़ाई अपनों से थी .पूरा घर भरा हुआ था ,सब अपने में मस्त थे ,बेटे ,बेटी ,बहु ,नाती ,पोते | सब तो थे फिर भी अकेला था |वक्त पे खाना मिल जाता चाय मिल जाती ,पर कोई ठीक से बात नहीं करता ,एक अखबार ही उसका साथी था जो शाम तक
Feb 19 2010 02:53 PM
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दादाजी

मधुबाला जी की फोटो ले कर ,मैं अपने दोस्तों से जा मिला और उनसे किसी उर्दू जानने वाले का पतापूछने लगा .......तभी आसिफ बोला अबे अंधेरी वाली मस्जिद में चलते हैं ,वहाँ कोई न कोई मिल जायेगा ,आसिफ ने पूछा ,क्या जानना है उर्दू का ? मैं चुप रहा ...और कुछ पूछने से
Feb 18 2010 02:46 PM
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दादाजी

मुझे आज तक दादा जी के नाम से ही जानते हैं ,बहुत नामचीन थे ,देश का वह ईनाम भी जीत चुके थे .......जिसे जीतने के लिए ,बहुत मेहनत करनी पड़ती है . उन्होंने बहुत सारी कहानियाँ ,गीत फिल्मों के ,कवितायें ....कहाँ नहीं छपे ...सरकार उन्हें पेंसन भी देती थी
Feb 18 2010 01:28 PM
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अमन की आस

रात को खाना खाते हुए ,मेरी पत्नी मेरी ही आखों में ही झांके जा रही थी । मुझसे सच जाना चाहती थी ।मेरा खाना कम ,डर जायदा मेरे अंदर जादा भरा हुआ था । मैंने खामोशी में सारा खाना खा लिया ,हाथ मुहंधो कर अपने बिस्तर पर जा लेटा ,आँखों में नीद नहीं थी ,सिर्फ आँखे
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Feb 16 2010 10:15 AM
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अमन की आस

रात को खाना खाते हुए ,मेरी पत्नी मेरी ही आखों में ही झांके जा रही थी । मुझसे सच जाना चाहती थी ।मेरा खाना कम ,डर जायदा मेरे अंदर जादा भरा हुआ था । मैंने खामोशी में सारा खाना खा लिया ,हाथ मुहंधो कर अपने बिस्तर पर जा लेटा ,आँखों में नीद नहीं थी ,सिर्फ आँखे
टैग: अमन
Feb 16 2010 10:12 AM
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अमन की आस

बहुत कोशिश करता हूँ ...अपने जख्मों को भूल जाऊं ,पर वो नासूर बन कर बहता ही रहता है लाख मलहम लगता हूँ ........पर ठीक ही नहीं होने देते हैं लोग ,यह कोई और नहीं हैं ,मेरे अपने ही हैं । उसका नाम सलीम था ,उसकोअपने नाम से बड़ी चिड है .....हर तीसरे का नाम जो सलीम
टैग: अमन
Feb 15 2010 02:44 PM
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ससुराल

चारो तरफ अन्धकार था ,मैं आखों के सहारे नहीं चल रहा था ,मैं एक अंदाजे से पैर रखता और आगे बढ़ जाता ....यह क्रम कब तक चला मुझे नहीं मालूम ...पैर से कुछ लगा ,अँधेरे में कुछ दिख तो रहा नहीं था ...फिर भी अंदाजे से यह जानने की कोशिश की ,क्या है यह ?झुक कर हाथ से
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