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महुआ घटवारिन (कुछ प्रेम कथाएँ)

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30 Apr 2010
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कहानी- महुआ घटवारिन - पंकज सुबीर

''सर रेणु जी ने महुआ घटवारिन की पूरी कहानी नहीं लिखी, उसका अंत क्या हुआ ये पता नहीं चलता'' कुसुम ने प्रोफेसर आनंद कांत शर्मा की ओर देखते हुए पूछा। ''पूरी तो है, मेरे विचार में तो कहानी पूरी है, हां ज्यादा विस्तृत इसलिए नहीं लिखा है, क्योंकि मूल कथा तो
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मुठ्ठी भर उजास

       दूर गहरे सिंदूरी रंग का सूरज क्षितिज की रेखा को छू रहा है ,ओर इसी सिंदूरी सूरज के सामने से कभी कभी घर लौटते हुए हुए परिंदो का कोई झुंड उड़ता हुआ निकलता है तो एसा लगता है मानो एक बड़े सिंदूरी से मेज़पोश पर किसी ने परिंदों
Feb 18 2010 06:46 PM
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पंकज सुबीर की कहानियां

कहानीकार के रूप में पंकज सुबीर की कहानियाँ बहुचर्चित हंस, वागर्थ, नया ज्ञानोदय, कादम्बिनी, लफ्ज, आधारशिला जैसी पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। दैनिक भास्‍कर, नव भारत, नई दुनिया आदि समाचार पत्रों में 100 से भी अधिक कहानियाँ, व्यंग्य, ग़ज़ल और कविताएं
Jan 09 2010 06:51 AM