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15 Jun 2010
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मंत्र शक्ति का यथार्थ!

                    विषय एकदम अलग - मेरे लेखन का सबसे अलग विषय किन्तु ये मेरी सोच ही नहीं बल्कि यथार्थ के साथ जुड़ी मेरी वह सोच है जिसको मैंने भोगा है और इस
 
रेखा श्रीवास्तव
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निर्णय से पहले सोचें और विचार करें !

                     कल की ही बात है मेरे एक बहुत ही आत्मीय मेरे पास आये, उनको ये लगता है कि  मैं जो भी सलाह दूँगी वह सही और तार्किक रूप से बतलाई गयी
 
रेखा श्रीवास्तव
टैग: शादी
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दिशा बदलें और बदलें शिक्षा का प्रारूप !

               वैसे तो ये रोज की बात है की दो चार हत्या , आत्महत्या के प्रकरण अखबार में न रहे हों. हम पढ़ कर उसको फ़ेंक देते हैं, यह सोचते भी नहीं है की क्या इससे जुड़े लोगों को इसके
 
रेखा श्रीवास्तव
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जनगणना और जाति सहित जनगणना !

                             देश में जनगणना का कार्य आरभ्य होने जा रहा है, हमारा गृह मंत्रालय इसके लिए प्रारूप
 
रेखा श्रीवास्तव
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मजदूर दिवस - !

                         आज मजदूर दिवस है - आज कोई मजदूर काम नहीं करेगा? लेकिन क्या और दिवसों की तरह से इन मजदूरों का भी कहीं
 
रेखा श्रीवास्तव
May 01 2010 11:25 AM
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'खाने' पर सरकारी मुहर !

             "खाना" अब सरकारी मुहर के साथ पूरी तरह से कानूनी बन चुका है. खूब खाओ और खूब खिलाओ कहीं कोई भूखा न रह
 
रेखा श्रीवास्तव
टैग: rishvat
Apr 07 2010 04:31 PM
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मेरी सोच

इस विषय की  सार्थकता  क्या है? इस प्रश्न का सामना करने के लिए मैं पूरी तरह से तैयार हूँ. अभिभावक  इस देश के भविष्य को दिशा निर्देश देने वाले हैं और कई ऐसे निर्णय होते हैं कि उसमें उनकी भूमिका बहुत ही जरूरी होती है. मेरी मुलाकात अपनी
 
रेखा श्रीवास्तव
टैग: bharat
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दायित्व बनाम क़ानून!

                            समाज में  संस्कार, संस्थाएं और उनसे बनी हमारी संस्कृति में बिखराव झलकने लगा है. इसको
 
रेखा श्रीवास्तव
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तरवा चाट चमचा भये - चमचा बन भये ...............

           ये नेतन कि जातउ  न बड़ी खुशामद चाहत है, नेतन कि तारीफ के पुल बांधत रहौ धीरे धीरे गाँव से निकर के शहर और शहर  से निकर के दिल्ली पहुंचई जैहौ. जा में तनकौ शक या शुबहा
 
रेखा श्रीवास्तव
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महिला आरक्षण विधेयक!

                              महिला दिवस पर महिला आरक्षण विधेयक का , जो पिछले १४ वर्षों से लंबित पड़ा हुआ है,
 
रेखा श्रीवास्तव
टैग: mahila aarakshan
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संबोधन - कितने अपने और कितने पराये!

समाज में परिवार , मित्र और औपचारिक परिचय सबमें एक तारतम्य होता है और इसके लिए ही सामाजिक संबंधों का अपना महत्व है। हमारी संस्कृति में पुरातन काल से ही और गांवों में आज भी धर्म जाति से परे एक सम्बन्ध बना होता है । अगर जमादारिन है तो उसको भी चाची के संबोधन
 
रेखा श्रीवास्तव
Dec 26 2009 12:54 PM
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विकलांग दिवस - एक संदेश!

आज अंतर्राष्ट्रीय विकलांग दिवस है! एक ऐसा वर्ग , जो सामान्य से इतर है किंतु वे बेचारे नहीं है - इसके लिए इतिहास लिख रहे हैं। यह समाज आज भी उनको सम्मान नहीं दे पाता है, जिसके वे हक़दार हैं। एक अहसास रखते हैं उनके लिए कि वे विकलांग हैं, पर वे वास्तव में
 
रेखा श्रीवास्तव
Dec 03 2009 03:22 PM
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जरा याद करो क़ुरबानी...............

कल एक वर्ष हो जाएगा मुंबई काण्ड को, हम उन सभी शहीदों को नमन करते हैं - जिन्होंने अपना जीवन देश के लिए कुर्बान कर दिया किंतु फिर हम उतने ही सवालों से घिर जाते हैं कि हमने यानि इस देश के वे लोग जो उनके प्रति न्याय के लिए जिम्मेदार हैं - क्या आज तक न्याय कर
 
रेखा श्रीवास्तव
Nov 25 2009 01:23 PM
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लोकतंत्र के टूटते आधार!

कहीं पढ़ा की 'कल्याण सिंह' फिर भाजपा में शामिल होने के बाद ६ दिसंबर को 'जय श्री राम ' बोलेंगे। ये तथाकथित नेता अपने को समझते क्या हैं? लोकतन्त्र को मजाक बना कर रखा है। जब जहाँ चाहे मुंह उठाकर चल दिए, क्योंकि चुनाव तो साम दंड से जीत ही चुके हैं और वे अपने
 
रेखा श्रीवास्तव
टैग: lok
Nov 25 2009 12:27 PM
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नैतिक मूल्य और क़ानून!

समाज के बढ़ते हुए प्रगतिशील कदमों ने हमारे नैतिक मूल्यों पर सबसे अधिक प्रहार किया है। उन मूल्यों के रक्षा के लिए ही, हम कानून पर क़ानून बनाते जा रहे हैं। लेकिन यह एक विचारणीय विषय है कि क्या नैतिक मूल्यों की रक्षा के लिए भी कानून की जरूरत होगी और कानून
 
रेखा श्रीवास्तव
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धर्म की आड़ में!

क्या इतने ऊपर जाकर भी नारी किसी की नजर में आज भी उपभोग की वस्तु बन कर रह रही है कि जब तक उसका मन चाहा उपभोग किया और जब ऊब गए तो जब चाहा छोड़ दिया। दूसरी औरत जो उसकी जिन्दगी में आ जाती है। उस पत्नी को कानूनी पत्नी का हक़ दिलाने के लिए सबसे आसन और त्वरित
 
रेखा श्रीवास्तव
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फिर से शुरू करें!

आज तो यह आम हो चुका है कि बच्चे माँ - बाप को छोड़ कर पढने चले गए या फिर नौकरी के लिए चले गए। सभी बच्चों को उनकी रूचि के अनुसार जाना ही है। यह भी आम बात में शुमार हो चुका है कि बच्चे विदेश पढने या नौकरी के लिए जा रहे हैं और माँ-बाप अकेले घर में रहा जाते
 
रेखा श्रीवास्तव
Dec 05 2008 11:03 AM
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कहाँ गई नैतिकता!

देश अभी उबर नहीं है उन ६० घंटों के भयावह धमाकों और बरबादियों से और हमारे जन प्रतिनिधि कहे जाने वाले सांसद और विधायक बड़ी बड़ी फूल मालाएं पहने कहीं स्टेशन का उद्घाटन कर रहे हैं। वह भी उस स्थिति में जब की राज्य में पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व प्रधानमंत्री वि
 
रेखा श्रीवास्तव
Dec 02 2008 10:25 AM
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देश के दुश्मन!

कभी पाकिस्तान बना था तो वहां पर जो हैवानियत का तांडव हुआ था , कमोबेश उसी से गुजर रहा है देश। किस लिए?वे भाषा और राज्य के आधार पर देश के टुकड़े करना चाहते हैं। दूसरे हमारी युवा पीढी किस तरह से उसकी प्रतिक्रिया दे रही है। क्या एक पागल हो तो सारा युवा वर्ग
 
रेखा श्रीवास्तव