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संवेदना : एक एहसास

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03 Jun 2010
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"पापा को गुस्सा क्यों आता है "

कल शाम को ऑफिस से लौटते समय अचानक लगा की ....................               थका हुआ शरीर खुद को बोझ महसूस हो रहा था............ऐसा लगा की जैसे खुद को ढो के ले जा रहे हों.........न तो
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........सत्य की स्वीकारोक्ति ..

                     जीवन में कभी कभी खुद से आंखे मिला लेने से कोई क्षति नहीं होती..........लेकिन कभी कभी जहाँ आपकी नजर नहीं पहुँच पाए वहां कोई मित्र
May 27 2010 08:20 PM
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व्यथित प्रेम....

 इस संधर्भ को को देखकर आप सोच रहे होंगे.....की प्रेम वो भी व्यथित ,,,,,,,,,कुछ दिलचस्प होगा.............तो आप सही है...........दिलचस्प का तात्पर्य ही होता है जो दिल में चस्पा हो जाये वही  दिलचस्प है...........खैर आज मुझे प्रेम की व्यथा लिखने की
May 24 2010 05:41 PM
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मासूम इर्ष्या....

ईर्ष्या.........आम तौर पे इसे नकारात्मक भावना के साथ जोड़ा जाता है........किन्तु मैंने इसे मासूम इर्ष्या का नाम इसलिए दिया है की वे बेचारे इससे ग्रसित होने पे बड़े ही नादानी से अपनी हरकतों द्वारा सामने वालों को कष्ट देने का पूरा प्रयास करते हैं
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......जरा सोचिए...

                आज मैंने अरुंधती रॉय का लेख पढ़ा.....(आउट लुक के २९ मार्च के अंक में)....मन थोडा खिन्न था........अपनी व्यवस्था  पे, अपनी सरकारी मशीनरी पे. कुछ नेताओं
Apr 03 2010 12:51 PM
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गुलाबी रंग .........

गुलाबी रंग .........मेरा पसंदीदा रंग गुलाबी रहा है..यह कब से है मैं नहीं जानता..........अल्लाहाबाद में जाने के बाद मैंने सोचना शुरू किया की अपने बारे में जाना जाये..मुझे क्या पसंद है ? क्या अच्छा लगता है ? कैसा खाना अच्छा है , कैसा पहनावा ? असल में गाँव
Mar 29 2010 02:32 PM
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माँ की.एक कहानी.

. मैं जब छोटा था तो माँ अक्सर मुझे कहानियां  सुनाया करती थी. सच्ची वाली.........मैं शेर वाली या भेड़ वाली भी सुनता था लेकिन यदि कहानी के पात्र मेरे परिचित होते तो मुझे बड़ा मजा आता.......एक कहानी जो मुझे आज याद आ रही
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ये क्या हो रहा है?

आज मैं थोडा क्षुब्द हूँ. इसका कारण पिछले दिन आया उच्चतम न्यायालय का एक निर्णय है. दक्षिण  कि एक अभिनेत्री द्वारा दायर याचिका में "live in relationship" को जायज़ ठहराने कि मांग कि गयी थी और उससे उत्पन्न संतान को जायज ठहराने
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खुद से मिलना

एक दिन शाम को मैं गंगा किनारे बैठा हुआ था. थोडा उदास सा शांत. जीवन के प्रति पस्च्मुखी सोच से ग्रसित. मैं अपने अतीत कि खुशियों को याद कर रहा था. वर्तमान से दुखी (अपरिचित) , अतीत में जीना अच्छा लगता था. ऐसा लगता था कि जब वापस गाँव  जाऊंगा तो फिर
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हाले-दिल ना पूछो ............

हाले-दिल न पूछो , हमसे हमारा. छोडो भी, नहीं कामअब ये  तुम्हारा,हाले- दिल .............आदत  तुम्हारी है, सबसे निराली  लगती हमेशा हो, तुम भोली-भाली वो हसने-हँसाने की, आदत तुम्हारीलगती है मुझको, वो कितनीप्यारी लौटा लाओ
Mar 06 2010 12:08 AM
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स्वर्णिम काल

"युवा रास्ट्र पे बोझ है! " ऐसा कहते हुए शर्मा जी ने मेज पे अपना मुक्का दे मारा. उनके शब्दों ने तो नहीं किन्तु धडाम की आवाज़ ने सब सहकर्मियों का ध्यान अपनी ओर एक झटके  में खिंच लिया. सब उनकी
Mar 02 2010 07:32 PM
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एक प्रार्थना.........

    माँ  हमको  इंसान  बना  दे , प्यारी  सी  संतान  बना  दे .  सबके  दिल  में  बसने  वाले , तू  प्यारे  अरमान  जगा  दे . माँ
Mar 02 2010 06:23 PM
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"शादी क्यों होती है?"

" शादी क्यों होती है? इस प्रश्न ने मुझे चौका दिया ...... मैं उधर देखने लगा ..एक महिला जो की २८ से ज्यादा की नहीं लग रही थी अपने लगभग ५-६ साल के बच्ची और ४- ५ साल के बच्चे के साथ थी। वो उन्हें कुछ बता रही थी। मैंने धीरे से अपने कान उधर कर दिए ......वास्तव
Feb 28 2010 04:35 PM
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एक बात ये भी .................

खुश होना और खुश दिखना दो अलग स्थिति है.............खुश होने में वक्ती शांत और मस्त हो जाता है...............खुश दिखने में तनाव होता है.....खुश होने पर ये चिंता नहीं होती की सामने वाला क्या सोच रहा है ............खुश दिखने के लिए हमेशा सामने वाले के रुख
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मोहब्बत कहते जिसे हैं.........

यूँ तो प्यार इतनी ऊँची भावना है की इसके बारे में बहुत कुछ कहा जा सकता है, लिखा जा सकता है, और ऐसा किया भी गया है।,मैंने अब तक के समय में जो देखा है , महसूस किया है , समझा है उसे जरूर बताना चाहूँगा.....हुआ यूं की मेरे एक परिचित ने मुझसे पुछा की आप किसी से
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बहन के विदाई के वक्त .........

विदाई , एक विरह का संकेत ....जुदाई का प्रतिक ...... यह कैसा होता है ...इसका अनुभव मुझे पिछले दिनों हुआ ....इससे पहेले मुझे लगता था कि मैं विशेष हूँ, मुझे इससे क्या फर्क पड़ता है। मेरी भावनाएं मर चुकी हैं॥ अध्यात्म के रस्ते में,ज्ञान के रास्ते में आंसुओं
Feb 15 2010 05:35 PM
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मेरी माँ

माँ होती ही ऐसी है, कि जब पास हो तो कदर नहीं होती और जब न हो तो उसकी कीमत पता चलती है।सभी की तरह मेरी भी माँ है। उसके पास जब मैं था तो मुझे उसके होने का एहसास नहीं था ,पर जब मैं आगे की पढाई करने अल्लाहाबाद चला आया तो धीरे धीरे उनकी कमी खलने लगी। ये तो
Jan 29 2010 08:55 PM
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mera dost

मेरा एक दोस्त है , था, नहीं कह सकता क्योंकि शरीर बदल लेने से भावनाएं नहीं बदला करती । आज जब किन्ही दोस्तों को मस्ती करते देखता हूँ तो बरबस उसका ख्याल आ जाता है।वो था ही ऐसा, एकदम ताजा , अल्हड ,मनमौजी, धुन का पक्का उसे सनकी भी कहा जा सकता है। पर था बहुत
Jan 27 2010 07:38 PM
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अधूरा सपना: समलैंगिकता पर उठे बवंडर पर थोडी सी फूँक

अधूरा सपना: समलैंगिकता पर उठे बवंडर पर थोडी सी फूँक
Jan 26 2010 10:30 PM