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15 Jun 2010
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नरेंद्र मोदी - हीरो या ज़ीरो ???

दो तीन दिन पहले मुझे अचानक पटना जाना पड़ा. वहाँ भारतीय जनता पार्टी की विशाल रैली थी. राज्य के मुख्य मंत्री (बीजेपी के सहायक दल से) इस बात पर बिदक गए कि उनकी तस्वीर श्री नरेंद्र मोदी से हाथ मिलाते हुए दिखाई गई थी. और मीडिया ने इस बात का बतंगड़ भी बनाया. मैं
 
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चाँद हुआ गुलज़ार !

चार महीने, इकतालीस फॉलोअर, पैंतालीस पोस्ट, टिप्पणियाँ और इससे भी कहीं ज़्यादा लोगों से बने रिश्ते... ये आँकड़े नहीं हैं, यह एक टीस है, जो जितना चुभती है, उतना ही हमारी सम्वेदना के स्वर मुखर होते हैं. यह एक बड़ा ही नाज़ुक एहसास है, जब भी गुज़रता है हमारे दिल
 
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लघु ब्लॉगर मीट और राजनीति !!

सलिल वर्मा जी के ब्लॉग, चला बिहारी ब्लॉगर बनने, पर सुश्री सोनी गर्ग का कमेंट आया जिसमें उन्होंने नई फिल्म राजनीति का एक सम्वाद उद्धृत किया था, जिसे नसीर साब ने फिल्म में कहा है. यह सम्वाद बहुत प्रभावशाली था और कहीं न कहीं हमारी भावनाओं को अभिव्यक्ति
 
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वातानुकूलित कक्ष से ग्लोबल वार्मिंग की रपटः विश्व पर्यावरण दिवस 2010

धरती माँ का बढ़ता बुख़ार, और सारे ईलाज बेकार. मर्ज़ लाईलाज तो नहीं, लेकिन पहल कौन करे. समाज में आज भी ऐसे बच्चे कम हैं, जो माँ बाप के हुक़्म पर चौदह साल के लिए बिना कुछ सोचे जंगल चले जाते हैं, या फिर अंधे माँ बाप को कंधे पर लादे सारे तीरथ घुमा लाते हैं. आज
 
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एक इल्ज़ामः डॉ. राही मासूम रज़ा और सआदत हसन मण्टो पर

आज स्वप्निल कुमार आतिश से लम्बी साहित्यिक चर्चा होती रही. एक जैसा सोचने वाले मिल जाएँ तो ये फैसला मुश्किल हो जाता है कि विचार किसके हैं और आए किसके दिमाग़ में हैं. बात मण्टो से शुरू हुई और राही मासूम रज़ा पर खतम हुई. अब खतम हुई कि एक नए सिलसिले की शुरुआत
 
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क्यों पुलकित है ज़लज़ला???

पूरे मधुमक्खियों के छत्ते मेंएक रानी होती है लेकिन जब सभी रानी बनकर टूट पड़ें किसी एक पर तो ज़लज़ला आता है!कोई शक्ल नहीं होती उसकीनाम नहीं, जाति नहीं, लिंग भेद नहीं.रक्तबीज की तरह हर पल एक नया रूप धरकर आता है वो सामने.जानते हो क्यों...क्योंकि एक बार अपमानित
 
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बुद्धू बक्से का बुद्ध – “लोक-सभा चैनल”

                  टीवी समाचार चैनलों को हम इस ब्लॉग पर हमेशा समाचार मनोरंजन चैनल नाम से ही सम्बोधित करते रहे हैं. लखनऊ ब्लॉगर्स एसोसिएशन के मित्रों ने तो अपनी एक पोस्ट
 
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May 29 2010 07:03 PM
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बुद्ध पूजने की चीज़ नहीं हैं - बुद्धत्व तक पहुंचना है !!

27 मई 2010बुद्ध पूर्णिमा के अवसर परसभी को बधाई!बुद्ध के सन्दर्भ में बधाई जैसे शब्द बौने प्रतीत होते हैं!बुद्ध का इस धरती पर आना, एक अनूठी घटना है!!बुद्ध हमारी चेतना को झंझोड़ जाते हैंबुद्ध का कहना कि“संसार मे दुःख है, दुःख का कारण है और कारण का उपाय
 
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कुछ विज्ञान कवितायें

जैसे मोहब्बत कब, किसे , कहाँ और किससे हो जाए कोई नहीं जानता, वैसे ही साहित्य का कीड़ा कब किसके दिमाग़ में घुस जाए, बड़ा मुश्किल है पता लगाना. मनोहर श्याम जोशी हों, या श्रीलाल शुक्ल… कहाँ विज्ञान के डिग्री धारक और कहाँ साहित्य. अब अपने ब्लॉग जगत पर ही देखें,
 
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चौथे खंभे के ढपोरशंखी !!

आज की दुनिया में हर रोज, हम एक नई सुबह की कामना के साथ बिस्तर से उठते हैं और ऐसे में यदि कोई कह दे कि आज का दिन बड़ा अच्छा गुज़रेगा तो बस उसके मुंह में घी शक्कर डालकर जीवन के अग्निपथ पर चल देते हैं. हमारे इस दिवास्वप्न की पूर्ति के लिए, हमारे देश का
 
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May 22 2010 05:29 PM
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अब तो अपनी लेखनी से, नाड़ा ही तू डाल रे!

पिछले दिनों पुण्य प्रसून जी के ब्लोग में, मीडिया के गिरते स्तर पर पाकिस्तानी कवि “हबीब जालिब” की कविता पढी, “अब क़लम से इज़ारबंद ही डाल”...मूल कविता उर्दू में थी और उसका हिन्दी अनुवाद शायद! प्रसून जी ने किया था. मुझें कविता जितनी जानदार और बेबाक लगी उसका
 
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आरुषी हेमराज हत्याकाण्ड - जाँच एजेंसियों को मुँह चिढाता

कुछ नवजात शिशुओं के शरीर पर, ध्यान से देखें तो नीले निशान पाए जाते हैं. मेरी माँ कहा करती थीं कि जब भी कोई बच्चा इस दुनिया में आने से मना करता है, भगवान उसे पीटकर दुनिया में भेजते हैं. और ये निशान दरसल उसी पिटाई के होते हैं. कितना सच, कितना झूठ..जाने
 
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कौन है आम आदमी ?

आपके आशीर्वाद एवं शुभकामनाओं से हमने तीन माह पूरे कर लिएआज की पोस्ट समर्पित है, हमारे ब्लॉग के हीरो"आम आदमी"को...  (कार्टून: श्री आर. के.  लक्ष्मण)कौन है आम आदमी ? आर. के. लक्ष्मण के कार्टूनों में से झाँकता समाज व्यवस्था के संघर्षों से
 
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माँ तुझे सलाम!!!

वैसे तो हम दोनों का यही मानना है कि जिन मौक़ों के लिए दिन मुकर्रर कर दिए जाते हैं उनकी अहमियत, बस उस दिन या तारीख तक मह्दूद होकर रह जाती है, एक फॉर्मेलिटी की तरह. और दुनिया का सबसे मीठा लफ्ज़ और सबसे पाकीज़ा रिश्ता, सिर्फ एक दिन का मोह्ताज नहीं. हमारे लिए
 
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गोवा मेरे कैमरे की नज़र से

पिछले हफ्ते आप लोगों से छुट्टी लेकर गोवा चला गया था. चैतन्य जी का आग्रह था कि मैं गोवा का यात्रा वृतांत लिखूँ. उन्होंने तो कहा था कि GO और ‘आ’. यानि जाकर आ, और शर्त ये थी कि आते ही एक ताज़ी पोस्ट गोवा के अनुभव पर. कुछ और मित्र भी ज़ोर दे रहे थे. सोचा, बड़ा
 
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भला यूँ ही कर लेता है कोई आत्महत्या?

सबसे पहले तो सीमा गर्ग जी का धन्यवाद, जो उन्होंने हमारी पिछली रिपोर्ट को न सिर्फ पढ़ा, बल्कि तथ्यों की स्वयम् जाँच भी की. अतः यह हमारा उत्तर्दायित्व बनता है कि हम उनके द्वारा उठाये गये प्रश्नों के उत्तर ही नहीं, वरन आँकड़ों की सत्यता भी प्रमाणित
 
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दो बीघा ज़मीन – एक वायबिलिटी रिपोर्ट

पिछ्ले दिनों जब पंजाब के फरीदकोट ज़िले में जाना हुआ, तो ज़हन में बस एक ही बात कौंध रही थी “पंजाब मे किसान की आत्महत्या”. कोई और वक्त होता तो शायद मैं अख़बार मे पढी इस खबर को राजनैतिक प्रपंच या मीडिया की प्लांटेड ख़बर मान कर, अख़बार का पन्ना पलट लेता, या फिर
 
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भिक्षुक

(फोटो साभार: Ronn Ashore - Flickr)[वह आता,दो टूक कलेजे के करतापछ्ताता पथ पर आता – निराला ]दिसंबर की ठिठुरती ठंड मेंदिल्ली के जनपथ परमुझे याद आ गए कविवर निरालाजब दिखा ‘भिक्षुक’ मुझे इकख़ुद में गठरी की तरह सिमटा हुआऔर माँगने को रुपए - दो रुपए सभी को
 
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SMS पोल की खोलो पोल

सन 1975 के पहले तो सब यही सोचते थे कि एक सिक्का हवा में उछाला जाए तो उसके ‘चित्’ या ‘पट’ आने की सम्भावना 50% है यानि आधी आधी. लेकिन 1975 की फिल्म शोले ने तो उस सम्भावना में भी नई सम्भावनाएँ जगा दीं, अगर सिक्का किनारे पर खड़ा हो जाए… फिर तो न ‘चित्’ न
 
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एक सम्वेदना

चढते हुए पारे ने चालीस का स्तर पार कर लिया हैपरिंदे प्यास के मारे दम तोड़ रहे हैं...आइए... अपनी सम्वेदनशीलता को जीवित करेंअपने घर, आँगन, छत, मुंडेर, बाग, बगीचे, कहीं भीएक बरतन में पानी रखेंउन परिंदों के लिए, उनके जीवन के लिएधरोहर हैं ये हमारी...
 
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आवारा ग़ज़ल

ये इंसानों का जंगल है यहाँ सब छूट जाते हैंबनाकर राह्बर का भेस, रह्ज़न लूट जाते हैं.सफर कब खत्म होगा रूह का ये कौन बतलाएये बढ जाती है आगे जिस्म पीछे छूट जाते हैं.किसी मासूम बच्चे की तरह ये शेर हैं नाज़ुकज़रा सा मुँह चिढाकर देख लो यह रूठ जाते हैं.वो पढकर
 
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BPL बनाम IPL

पिछले दिनों समाचार पत्रों और समाचार मनोरंजन चैनलों पर दो खबरें छायी रहीं, एक खबर BPL-वाले भारत से थी : “दंतेवाड़ा मे CRPF के 76 जवानों का नक्सलवादी हमले में शहीद होना” और दूसरी खबर IPL-वाले इंडिया से थी: “केन्द्रीय मंत्री शशि थरूर का IPL विवाद के चलते
 
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मुख और मुखौटा

देख लो नोचकर नाख़ून से मेरा चेहरादूसरा चेहरा लगाया है, न चिपकाया है.कहते हैं आईना दिल का हुआ करता है ये चेहरा, सब का.जैसे हों दिल में उमड़ते हुए जज़्बात, दिखा करते  हैं इस चेहरे पर.गर किसी ने जो ओढ़ रखा हो चेहरा एक औरदिल में हों ज़हर, पर चेहरे
 
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अभिव्यक्ति उत्सव - ब्लॉग जगत में दो माह

मैं… जब भी कुछ मह्सूस किया, आदतन उसे सामने पड़े किसी भी काग़ज़ के टुकड़े पर, या अखबार के किसी कोरे हाशिये पर, नज़्म की शक्ल में लिखा, दोहराया, कुछ दिन सम्भाला और फिर कहीं किसी कोने में रखकर भूल गया. लगा जैसे मन की बात को पर लग गये और जज़्बात के परिंदे उड़कर
 
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किरन खेर : मुर्गा-लड़ाई मे घुसी शेरनी

अचानक इस विषय पर लिखना पड़ेगा, ऐसी हमारी तैयारी भी न थी और योजना भी नहीं. लेकिन एक घटना ने हमें विवश कर दिया लिखने पर. पिछली रात, पौने ग्यारह का समय था ! बुद्दू बक्से के रिमोट पर उंगली क़िकेट खेल रहा था कि अचानक NDTV 24 X 7 पर चल रही मुर्गा-लडाई दिखाई दी.
 
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मुर्गा लड़ाई- लखनऊ के चौक से, टेलिविज़न स्टूडियो तक

(चौथे खम्भें मे लगी दीमक भाग -3)नवाबों का शहर लखनऊ और नवाबी ठाठ का एक नमूना – मुर्गा लड़ाई. मीर और मिर्ज़ा की शतरंज की तरह, मुर्गा लड़ाई भी नवाबी शौक का एक हिस्सा थी. अपने-अपने मुर्गे को दाना पानी खिला-पिलाकर एक दूसरे से भिड़ा देते थे. शहर के चौक पर मुकाबला
 
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अमीर खुसरो की रचनाएँ - एक साहित्यिक धरोहर

अगर मैं पूछूँ कि “मेरे अँगने में तुम्हारा क्या काम है” और “रंग बरसे भीजे चुनर वाली”, इन दोनों गानों मे क्या समानता है, तो आपका जवाब एक स्वर में यही होगा कि दोनों गाने अमिताभ बच्चन ने गाए हैं और दोनों अपने समय के बड़े मशहूर गाने थे और आज भी हैं. लेकिन जो
 
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चौथे खम्बे में लगी दीमक – भाग 2.

बड़ी पुरानी बात है कि आप अगर एक उँगली किसी की तरफ उठाते हैं तो चार उँगलियाँ खुद ब खुद आपकी तरफ उठ जाती हैं. ये भी कहा जाता है कि कमरे के अंदर आराम कुर्सी पर बैठकर आप किसी पर दोषारोपण कर सकते हैं, लेकिन जब वास्तविकता से आपका सामना होता है तो सारे आदर्श धरे
 
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"अर्थ आवर" - इंडिया बनाम भारत

“अर्थ आवर” का अर्थ, पढे लिखे लोगों के लिये बहुत गहरा है. आज दुनिया के 121 देशों ने इस महायज्ञ में भाग लिया और वहाँ की जनता ने रात साढे आठ बजे से साढे नौ बजे के बीच घर की बत्तियाँ गुल कर दीं. हमारे देश की गिनती भी उन देशों में है. लेकिन ठहरिये! ये कैसा
 
SAMVEDANA KE SWAR
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चौथे खम्बे में लगी दीमक-भाग 1

एलेक्ट्रोनिक मीडिया का प्रादुर्भाव भारतीय समाज में मात्र दो दशक पुराना है. ऐसे में आज का मीडिया 20-22 वर्ष का वो दिग्भ्रमित शहरी युवा प्रतीत होता है जो मात्र और मात्र उत्तेजना से भरा है. न तो उसे भान है अपनी 5000 वर्षों पुरानी सांस्कृतिक धरोहर का और न ही
 
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ओशो के सम्बोधिं दिवस पर

21 मार्च 2010 ओशो के सम्बोधिं दिवस परवो ब्लैक होल साबुलाता रहा मुझे दूर सेऔर जब आकर्षित हुआ मै उसकी ओरनिचोड़ लिया उसने मुझेयापी गया था मैं उसे!गहन अथाह अन्धेरे के दूसरे सिरे परउसका दिव्य स्वरूप दिखाई दियाजिसमें अनंत विस्तार थामैं था या नहीं ??कुछ नहीं
 
SAMVEDANA KE SWAR
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पागलपन

एक बार ऐसा हो गया कि एक गाँव में एक जादूगर आया. उसने आकर गाँव के कुँए में एक मंत्र पढा और कोइ चीज़ उसमें डाल दी और कहा कि इस कुँए का पानी जो भी पियेगा वो पागल हो जायेगा. साँझ होते होते उस गाँव के सभी लोगों ने उस कुँए का पानी पिया. क्योंकि प्यास नहीं सही
 
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अभिमन्यु

“कुपुत्रो जायते क्वचिदपि माता कुमाता न भवति.”एक आदमी ने शादी के बाद अपनी बीवी के कहने में आकर अपनी माँ का कलेजा निकाल कर बीवी को तोहफे के तौर पर देने चला. रास्ते में उसे ठोकर लगी और उस कटे हुए कलेजे से आवाज़ आई, “बेटा! कहीं चोट तो नहीं लगी.”एक बच्चा, पैदा
 
SAMVEDANA KE SWAR
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ढोंगी बाबा , लालची मीडिया और लाचार आदमी

पिछले कुछ दिनों से हमारे सारे समाचार चैनेलों, जिन्हें आज के संदर्भ में News Entertainment Channels कहना उचित होगा, ने भारतीय समाज में फैले ढोंगी बाबाओं के स्टिंग ऑपरेशन किये और साबुन तेल के विज्ञापनों का तडका लगाकर इन समाचारों की जम कर बिक्री की. “सी”
 
SAMVEDANA KE SWAR
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बजट बनाम आम आदमी

सत्तर के दशक मे “गरीबी हटाओ” के इन्दिरा गाँधी के नारे ने जहाँ एक ओर उस “गूंगी गुडिया” को सत्ता मे स्थापित कर दिया था, वहीं 2004 मे “आम आदमी” के नारे ने इस उपनाम को भारतीय लोकतंत्र का पर्याय बना दिया है. इस सारे खेल मे किसने किसका उद्वार किया यह तो इतिहास
 
SAMVEDANA KE SWAR
Mar 02 2010 11:08 PM
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होली तो इतिहास में हो ली...

होली का त्यौहार, मची धूम चारों ओर है जी, देख-देख रंग की बौछार मन डरता है.देश पर  भ्रष्ट  नेताओं  का   है  काला   रंग,  आतंक  की आग में ये देश देखो जरता है.रंग  सतरंगी,  इन्द्रधनुष 
 
SAMVEDANA KE SWAR
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Feb 27 2010 12:05 AM
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फ़िल्मी गालियाँ और मेरे वकील - डा राही मासूम रजा

आज पहली बार अपनी बात रखते हुए ये समझ में नहीं आ रहा कि जो मैं कहने जा रहा हूँ उसके हक में हूँ कि खिलाफ। मुद्दा है फिल्मों के संवाद और गीतों में "गालियों" के बढ़ते प्रयोग - कितने उचित और कितने अनुचित। गानों में तो फिर भी ये एक हद के अन्दर होते हैं, लेकिन
 
SAMVEDANA KE SWAR
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आओ सारे पहन लें आईने

कई बार किसी कहानी, नाटक, कविता या सिनेमा को देखते-सुनते हुए ऐसा लगता है कि हम इनके किरदारों से कहीं मिल चुके हैं. कुछ किरदार हमसे इतने करीब होते है कि उनसे अपनापन सा हो जाता है. एक ऐसा रिश्ता सा बन जाता है कि उनकी चर्चा हम अपने परिवार के सदस्यों कि तरह
 
SAMVEDANA KE SWAR
Feb 19 2010 08:45 PM
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निर्मल पाण्डेय

निर्मल पाण्डेय एक बेहतरीन कलाकार की मृत्यु पर...हम अपनी सम्वेदना एवं श्रद्धांजलि व्यक्त करते हैंमात्र ४८ वर्ष की आयु में आज (१८ फ़रवरी २०१०)दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया ...एक अदाकार और एक गायकइश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे
 
SAMVEDANA KE SWAR
Feb 18 2010 07:35 PM
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खबरों का आतंक

कलम का जादूगर या कलम का सिपाही जैसे लफ्ज़ आज अपना मतलब खो चुके हैं. पत्रकारिता से क्रांति का गवाह रहा है हमारा देश. फिर एक लम्बा इतिहास रहा स्वतंत्र, निर्भीक और निष्पक्ष समाचारपत्रों का. और आज का दौर है इलेक्ट्रोनिक मीडिया का. ये समाचार "देता" नहीं
 
SAMVEDANA KE SWAR
Feb 16 2010 08:34 PM