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15 Mar 2010
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"कम्प्यूटर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

मन को करता है मतवाला।कम्प्यूटर है बहुत निराला।।यह तो एक अनिवार्य भाग है।कम्प्यूटर का यह दिमाग है।।चलते इससे हैं प्रोग्राम।सी.पी.यू.है इसका नाम।।गतिविधियाँ सब दिखलाता है।यह मॉनीटर कहलाता है।।सुन्दर रंग हैं न्यारे-न्यारे।आँखों को लगते हैं प्यारे।।इसमें
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
Mar 16 2010 07:50 AM
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‘‘गुब्बारे’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

बच्चों को लगते जो प्यारे। वो कहलाते हैं गुब्बारे।।गलियों, बाजारों, ठेलों में।गुब्बारे बिकते मेलों में।।काले, लाल, बैंगनी, पीले।कुछ हैं हरे, बसन्ती, नीले।।पापा थैली भर कर लाते।जन्म-दिवस पर इन्हें सजाते।।गलियों, बाजारों, ठेलों में।गुब्बारे बिकते
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
Mar 15 2010 08:52 AM
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‘‘जंगल और जीव’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

रहता वन में और हमारे, संग-साथ भी रहता है। यह गजराज तस्करों के, जालिम-जुल्मों को सहता है।।समझदार है, सीधा भी है, काम हमारे आता है।सरकस के कोड़े खाकर,  नूतन करतब दिखलाता है।।मूक प्राणियों पर हमको तो, तरस बहुत ही आता है। इनकी देख दुर्दशा अपना, सीना
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
Mar 13 2010 08:56 PM
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"गैस सिलेण्डर" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

गैस सिलेण्डर कितना प्यारा।मम्मी की आँखों का तारा।। रेगूलेटर अच्छा लाना। सही ढंग से इसे लगाना।। गैस सिलेण्डर है वरदान। यह रसोई-घर की है शान।। दूघ पकाओ, चाय बनाओ। मनचाहे पकवान बनाओ।। बिजली अगर नही है घर में।यह प्रकाश देता पल भर में।। बाथरूम में इसे लगाओ।
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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‘‘फ्रिज’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

बाबा जी का रेफ्रीजेटर, लाल रंग का बड़ा सलोना। किन्तु हमारा है छोटा सा, लगता जैसे एक खिलौना।। सब्जी, दूध, दही, मक्खन, फ्रिज में आरक्षित रहता। पानी रखो बर्फ जमाओ, मैं दादी-अम्माँ से कहता।। ठण्डी-ठण्डी आइस-क्रीम भी,इसमें है जम जाती।गर्मी के मौसम में कुल्फी,
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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‘‘जोकर’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

जो काम नही कर पायें दूसरे, वो जोकर कर जाये। सरकस मे जोकर ही, दर्शक-गण को खूब रिझाये। नाक नुकीली, चड्ढी ढीली, लम्बी टोपी पहने, उछल-कूद कर जोकर राजा, सबको खूब हँसाये। चाँटा मारा साथी को, खुद रोता जोर-शोर से, हाव-भाव से, शैतानी से, सबका मन भरमाये। लम्बावाला
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
Mar 11 2010 01:04 PM
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“नये-नये कुछ पेड़ लगाना” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

प्राण-वायु को देने वाले.जन-जीवन के हैं रखवाले।धरती का श्रंगार सजाना,नये-नये कुछ पेड़ लगाना।।खट्टे-मीठे, रंग-रँगीले,फल देते ये बहुत रसीले।आँगन-बागों की शोभा हैं,हरे-भरे हैं पेड़ सजीले।।उपवन में हँसते मुस्काते,सुंमन हमारे मन को भाते।वातावरण सुगन्धित
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
Mar 10 2010 08:42 AM
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‘‘डस्टर’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

विद्यालय अच्छा लगता, पर डस्टर कष्ट बहुत देता है। पढ़ना तो अच्छा लगता, पर लिखना कष्ट बहुत देता है।। दीदी जी तो अच्छी लगतीं, पर वो काम बहुत देती हैं। छोटी से छोटी गल्ती पर, डस्टर कई जमा देतीं हैं।। कोई तो उनसे यह पूछे, क्या डस्टर का काम यही है? कोमल हाथों
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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‘‘पतंग का खेल’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

 लाल और काले रंग वाली, मेरी पतंग बड़ी मतवाली।मैं जब विद्यालय से आता,खाना खा झट छत पर जाता। पतंग उड़ाना मुझको भाता, बड़े चाव से पेंच लड़ाता।पापा-मम्मी मुझे रोकते,बात-बात पर मुझे टोकते।लेकिन मैं था नही मानता,इसका नही परिणाम जानता।वही हुआ
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
Mar 08 2010 03:36 PM
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“देखो एक मदारी आया।” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

देखो एक मदारी आया। अपने संग लाठी भी लाया।।डम-डम डमरू बजा रहा है।भालू, बन्दर नचा रहा है।।लम्बे काले बालों वाला।भालू का अन्दाज निराला।।खेल अनोखे दिखलाता है।बच्चों के मन को भाता है।। वानर है कितना शैतान।पकड़ रहा भालू के कान।।यह अपनी धुन में ऐँठा
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
Mar 07 2010 03:15 PM
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"टोपी" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

गंजापन ढकने को टोपी, मेरे सिर पर रहती है। ठिठुरन से रक्षा करती हूँ , बार-बार यह कहती है।।  देखो अपनी गाँधी टोपी, सारे जग से न्यारी है। आन-बान भारत की है ये, हमको लगती प्यारी है।।लालबहादुर और जवाहर जी ने, इसको धार लिया। भारत का सिंहासन
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
Mar 06 2010 01:42 PM
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‘‘बालक की इच्छा’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

 मैं अपनी मम्मी-पापा के,नयनों का हूँ नन्हा-तारा। मुझको लाकर देते हैं वो,रंग-बिरंगा सा गुब्बारा।।मुझे कार में बैठाकर,वो रोज घुमाने जाते हैं।पापा जी मेरी खातिर,कुछ नये खिलौने लाते हैं।।मैं जब चलता ठुमक-ठुमक,वो फूले नही समाते हैं।जग के स्वप्न
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
Mar 05 2010 03:44 PM
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‘‘आयी रेल-आयी रेल’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

धक्का-मुक्की रेलम-पेल।आयी रेल-आयी रेल।।इंजन चलता सबसे आगे।पीछे -पीछे डिब्बे भागे।।हार्न बजाता, धुआँ छोड़ता।पटरी पर यह तेज दौड़ता।।जब स्टेशन आ जाता है।सिग्नल पर यह रुक जाता है।।जब तक बत्ती लाल रहेगी।इसकी जीरो चाल रहेगी।।हरा रंग जब हो जाता है।तब आगे को बढ़
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
Mar 04 2010 12:49 PM
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“मदारी का खेल : रानीविशाल” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

"एक खेल मदारी का" डम-डम, डम-डम डमरू बाजा। उछला-कूदा, छुटकू राजा।।खाना खाकर ताजा-ताजा।ठुमक-ठुमककर छुटकू नाचा।।वानर-राजा खेल दिखाते।बच्चे तालीखूब बजाते।। छुटकी को कर रहा  इशारा।लगता सबको कितना प्यारा।।अब छुटकी भी उठकर आई।खेल-खेल में धूम
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
Mar 03 2010 03:09 PM
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‘‘कौआ’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

कौआ बहुत सयाना होता।कर्कश इसका गाना होता।।पेड़ों की डाली पर रहता।सर्दी, गर्मी, वर्षा सहता।।कीड़े और मकोड़े खाता।सूखी रोटी भी खा जाता।।सड़े मांस पर यह ललचाता।काँव-काँव स्वर में चिल्लाता।।साफ सफाई करता बेहतर।काला-कौआ होता मेहतर।।(चित्र गूगल सर्च से साभार)
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
Mar 02 2010 01:17 PM
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“मच्छर-दानी” (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

जिसमें नींद चैन की आती।वो मच्छर-दानी कहलाती।।लाल-गुलाबी और हैं धानी।नीली-पीली बड़ी सुहानी।।छोटी, बड़ी और दरम्यानी।कई तरह की मच्छर-दानी।।इसको खोलो और लगाओ।बिस्तर पर सुख से सो जाओ।।जब ठण्डक कम हो जाती है।गरमी और बारिश आती है।। तब मच्छर हैं बहुत
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
Mar 01 2010 12:00 PM
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"कम्प्यूटर" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

 यह मेरा कम्प्यूटर प्यारा,इसमें ज्ञान भरा है सारा।भइया इससे नेट चलाते,नई-नई बातें बतलाते।यह प्रश्नों का उत्तर देता,पल भर में गणना कर लेता। माउस, सी.पी.यू, मानीटर,मिलकर बन जाता कम्प्यूटर।इसमें ही की-बोर्ड लगाते,जिससे भाषा को लिख पाते।नया जमाना अब है
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
Feb 27 2010 12:02 PM
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“आई होली! आई होली!!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

आयी होली, आई होली।रंग-बिरंगी आई होली।मुन्नी आओ, चुन्नी आओ, रंग भरी पिचकारी लाओ,मिल-जुल कर खेलेंगे होली।रंग-बिरंगी आई होली।।मठरी खाओ, गुँजिया खाओ, पीला-लाल गुलाल उड़ाओ,मस्ती लेकर आई होली।रंग-बिरंगी आई होली।। रंगों की बौछार कहीं है,ठण्डे जल की धार कहीं
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
Feb 25 2010 08:45 PM
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“संगीता स्वरूप का बालगीतः रेल” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”

“छुक-छुक करती आई रेल!”छुक-छुक करती आई रेल!आओ मिलकर खेलें खेल!! लालू-ममता जल्दी आओ! आकर के डिब्बा बन जाओ!! खूब चलेगी अपनी रेल! आओ मिलकर खेलें खेल!! गुड्डी आई पिंकी आई! लाल हरी झण्डी ले आई!! लगी रेंगने अपनी रेल! आओ मिलकर खेलें खेल!! इंजन चलता आगे-आगे!
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
Feb 24 2010 02:12 PM
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‘‘मोबाइल फोन’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

पापा ने दिलवाया मुझको,सेल-फोन इक प्यारा सा।मन-भावन रंगों वाला,यह एक खिलौना न्यारा सा।।रोज सुबह को मुझे जगाता,मोबाइल कहलाता है।दूर-दूर तक बात कराता,सही समय बतलाता है।।नम्बर डायल करो किसी का,पता-ठिकाना बतलाओ।मुट्ठी में इसको पकड़ो और,संग कहीं भी ले
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
Feb 23 2010 08:37 AM
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‘‘मेरी गैया’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

मेरी गैया बड़ी निराली, सीधी-सादी, भोली-भाली। सुबह हुई काली रम्भाई, मेरा दूध निकालो भाई। हरी घास खाने को लाना, उसमें भूसा नही मिलाना। उसका बछड़ा बड़ा सलोना, वह प्यारा सा एक खिलौना। मैं जब गाय दूहने जाता, वह अम्मा कहकर चिल्लाता। सारा दूध नही दुह लेना,
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
Feb 22 2010 12:04 PM
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‘‘तितली रानी’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक)

मन को बहुत लुभाने वाली,तितली रानी कितनी सुन्दर।भरा हुआ इसके पंखों में,रंगों का है एक समन्दर।।उपवन में मंडराती रहती,फूलों का रस पी जाती है।अपना मोहक रूप दिखाने,यह मेरे घर भी आती है।।भोली-भाली और सलोनी,यह जब लगती है सुस्ताने।इसे देख कर एक छिपकली,आ जाती है
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
Feb 21 2010 07:24 PM
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“भगवान एक है!" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

मन्दिर, मस्जिद और गुरूद्वारे। भक्तों को लगते हैं प्यारे।। हिन्दू मन्दिर में हैं जाते। देवताओं को शीश नवाते।।ईसाई गिरजाघर जाते। दीन-दलित को गले लगाते।। जहाँ इमाम नमाज पढ़ाता।मस्जिद उसे पुकारा जाता।।सिक्खों को प्यारे गुरूद्वारे। मत्था वहाँ टिकाते
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
Feb 19 2010 07:57 PM
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“संगीता स्वरूप का बालगीत” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

“चूहे की होली”  चूहा  खेल रहा था होली। रंगो की लेकर रंगोली।।भर पिचकारी उसने मारी। बिल्ली  मौसी भीगी सारी।।अब बिल्ली को गुस्सा आया। उसने चूहे को धमकाया।।चूहा थर-थर काँप रहा था।  डरकर माफ़ी  मांग रहा था।।हंस कर तब बिल्ली ये
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
Feb 18 2010 09:36 PM
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“भैया! मुझको भी, लिखना-पढ़ना, सिखला दो!”(डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

“भैया! मुझको भी, लिखना-पढ़ना, सिखला दो!”भैया! मुझको भी,लिखना-पढ़ना, सिखला दो।क.ख.ग.घ, ए.बी.सी.डी, गिनती भी बतला दो।।पढ़ लिख कर मैं, मम्मी-पापा जैसे काम करूँगी।दुनिया भर में, बापू जैसा अपना नाम करूँगी।।रोज-सवेरे, साथ-तुम्हारे, मैं भी उठा करूँगी।पुस्तक लेकर
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
Feb 18 2010 07:05 AM
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“बाल-गीत” (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

हाथी दादा सूंड उठा कर,चले देखने मेला। बन्दर मामा साथ हो लिया,बन करके उनका चेला। चाट पकौड़ी खूब उड़ाई,देख चाट का ठेला। बड़े मजे से फिर दोनों ने,जम करके खाया केला। अब दोनों आपस में बोले, अच्छा लगा बहुत मेला।(चित्र गुगल सर्च से साभार)
 
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Feb 17 2010 09:37 AM
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‘‘चिड़िया रानी’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

बच्चों अर्थात् नन्हीं कलियों और सुमनों को समर्पित हैः यह “नाइस” ब्लॉग! चिड़िया रानी फुदक-फुदक कर, मीठा राग सुनाती हो।आनन-फानन में उड़ करके, आसमान तक जाती हो।।मेरे अगर पंख होते तो, मैं भी नभ तक हो आता।पेड़ो के ऊपर जा करके, ताजे-मीठे फल खाता।।जब मन करता मैं
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
Feb 16 2010 08:17 AM
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“दिन आ गये हैं प्यार के” (मयंक)

खिल उठा सारा चमन, दिन आ गये हैं प्यार के। रीझने के खीझने के, प्रीत और मनुहार के।। चहुँओर धरती सज रही और डालियाँ हैं फूलती, पायल छमाछम बज रहीं और बालियाँ हैं झूलती, डोलियाँ सजने लगीं, दिन आ गये शृंगार के। रीझने के खीझने के, प्रीत और मनुहार के।। झूमते हैं
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
टैग: गीत
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“तार वीणा के बजे बिन साज नाइस।” (मयंक)

कह दिया मेरे सुमन ने आज नाइस। तार वीणा के बजे बिन साज नाइस।। ज्ञान की गंगा बही, विज्ञान पुलकित हो गया, आकाश झंकृत हो गया, संसार हर्षित हो गया, नाम से माँ के हुआ आगाज़ नाइस। तार वीणा के बजे बिन साज नाइस।। बेसुरे से राग में, अनुराग भरने को चला हूँ, मैं
 
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