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नन्हें सुमन

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16 Jun 2010
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"माँ!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

माता के उपकार बहुत, वो भाषा हमें बताती है! उँगली पकड़ हमारी माता, चलना हमें सिखाती है!! दुनिया में अस्तित्व हमारा, माँ के ही तो कारण है, खुद गीले में सोती वो, सूखे में हमें सुलाती है! उँगली पकड़ हमारी…….. देश-काल चाहे जो भी हो, माँ ममता की मूरत है, धोकर
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“भक्तों जोड़ो इनसे नाता” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

सुन्दर-सुन्दर और सजीली!आकर्षक और रंग-रंगीली!! शिवशंकर और साँईबाबा! यहाँ विराजा काशी-काबा!! कृष्ण-कन्हैया अलबेला है! कोई गुरू कोई चेला है!! जग-जननी माँ पार्वती हैं! धवल वस्त्र में सरस्वती हैं!! आदि-देव की छटा निराली! इनकी सूँड बहुत मतवाली!! जो जी चाहे वो
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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"चन्दा-मामा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

!! चन्दा-मामा !!नभ में कैसा दमक रहा है।चन्दा मामा चमक रहा है।।कभी बड़ा मोटा हो जाता।और कभी छोटा हो जाता।। करवा-चौथ पर्व जब आता।चन्दा का महत्व बढ़ जाता।।महिलाएँ छत पर जाकर के।इसको तकती हैं जी-भर के।।यह सुहाग का शुभ दाता है।इसीलिए पूजा जाता है।।जब भी बादल
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“मधुमक्खी है नाम तुम्हारा!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

मधुमक्खी मधुमक्खी है नाम तुम्हारा। शहद बनाती कितना सारा।। अपने छत्ते में रखती हो। कभी नही इसको चखती हो।। कंजूसी इतनी करती हो। रोज तिजोरी को भरती हो।। दान-पुण्य का काम नही है। दया-धर्म का नाम नही है।। इक दिन डाका पड़ जायेगा। शहद-मोम सब उड़ जायेगा।। मिट
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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"कल मुझको तुम भूल न जाना!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

आमों के बागों में जाकर,आम टोकरी भरकर लाया!घर के लोगों ने जी भरकर,चूस-चूस कर इनको खाया!! प्राची बिटिया और प्रांजल,बड़े चाव से इनको खाते!मीठे-मीठे और रसीले,आम बहुत इनको हैं भाते!!राज-दुलारो, नन्हे-मुन्नों,कल मुझको तुम भूल न जाना!जब मैं बूढ़ा हो जाऊँगा,इसी
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“शायद वर्षा जल्दी आये” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

टर्र-टर्र मेंढक टर्राए! शायद वर्षा जल्दी आये! बाजारों में आम आ गये, अमलतास पर फूल छा गये, लेकिन बारिस नजर न आये! टर्र-टर्र मेंढक टर्राए! शायद वर्षा जल्दी आये! सूख गये सब ताल-तलैय्या, छोटू कहाँ चलाए नैय्या! सबको गर्मी बहुत सताए! टर्र-टर्र मेंढक टर्राए!
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“सूरज-चन्दा:श्रीमती संगीता स्वरूप”

"सूरज चाचा-चन्दा मामा" सूरज चाचा , सूरज चाचा जैसे  ही  तुम  आते  हो नयी  सुबह की  नयी किरण को अपने  संग  में लाते हो  | फूलों से उपवन  भर जाता भौंरे  गुनगुन  गाते हैं चिड़ियों  का कलरव
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“आम रसीले मन को भाये” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

सरदी भागी, गरमी आई! पेड़ों पर हरियाली छाई!!  वासन्ती मौसम गदराया! वृक्ष आम का है बौराया!! बागों में कोयलिया बोली! कानों में मिश्री सी घोली!! सूरज पर चढ़ गई जवानी! अच्छा लगता शीतल पानी!! लू के गरम थपेड़े खाकर! आम झूलते हैं पेड़ों पर!! मानसून की बदली
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“तितली रानी” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

तितली रानी, तितली रानी! तुमने क्या है मन में ठानी!! उड़कर दूर देश से आई! लगता है लग गई थकाई!! सुस्ताने को हाथ मिला है! मुझे तुम्हारा साथ मिला है!! तुम रंगों का भरा समन्दर! पंख तुम्हारे लगते सुन्दर!! चलो तुम्हें मैं ले जाता हूँ! थोड़ा पानी पिलवाता हूँ!!
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“खरबूजे का मौसम आया” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

पिकनिक करने का मन आया! मोटर में सबको बैठाया!! पहुँच गये जब नदी किनारे! खरबूजे के खेत निहारे!! ककड़ी, खीरा और तरबूजे! कच्चे-पक्के थे खरबूजे!! प्राची, किट्टू और प्रांजल! करते थे जंगल में मंगल!! लो मैं पेटी में भर लाया! खरबूजों का मौसम आया!!  देख पेड़
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“लीची के गुच्छे मन भाए!” (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

हरी, लाल और पीली-पीली! बिकती लीची बहुत रसीली!! गुच्छा प्राची के मन भाया! उसने उसको झट कब्जाया!! लीची को पकड़ा, दिखलाया! भइया को उसने ललचाया!! प्रांजल के भी मन में आया! सोचा इसको जाए खाया!! गरमी का मौसम आया है! लीची के गुच्छे लाया है!! दोनों ने गुच्छे
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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‘‘बगुला भगत’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

बगुला भगत बना है कैसा?लगता एक तपस्वी जैसा।।अपनी धुन में अड़ा हुआ है।एक टाँग पर खड़ा हुआ है।।धवल दूध सा उजला तन है।जिसमें बसता काला मन है।।मीनों के कुल का घाती है।नेता जी का यह नाती है।।बैठा यह तालाब किनारे।छिपी मछलियाँ डर के मारे।।पंख कभी यह नोच रहा
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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‘‘उल्लू’’ (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

उल्लू का रंग-रूप निराला।लगता कितना भोला-भाला।।अन्धकार इसके मन भाता।सूरज इसको नही सुहाता।।यह लक्ष्मी जी का वाहक है।धन-दौलत का संग्राहक है।।इसकी पूजा जो है करता।ये उसकी मति को है हरता।।धन का रोग लगा देता यह।सुख की नींद भगा देता यह।।सबको इसके बोल
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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"सुमन हमें सिखलाते हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक)

“शिक्षाप्रद बाल-कविता”काँटों में पलना जिनकी,किस्मत का लेखा है।फिर भी उनको खिलते, मुस्काते हमने देखा है।।कड़ी घूप हो सरदी या, बारिस से मौसम गीला हो।पर गुलाब हँसता ही रहता,चाहे काला, पीला हो।। ये उपवन में हँसकर,भँवरों के मन को बहलाते हैं।दुख में कभी न
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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‘‘कूलर’’ (डा. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

ठण्डी-ठण्डी हवा खिलाये।इसी लिए कूलर कहलाये।।जब जाड़ा कम हो जाता है।होली का मौसम आता है।।फिर चलतीं हैं गर्म हवाएँ।यही हवाएँ लू कहलायें।।तब यह बक्सा बड़े काम का।सुख देता है परम धाम का।।कूलर गर्मी हर लेता है।कमरा ठण्डा कर देता है।।चाहे घर हो या हो दफ्तर।सजा
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“महाकुम्भ-मेला” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

महाकुम्भ-स्नानहरिद्वार, उज्जैन, प्रयाग।नासिक के जागे हैं भाग।। बहुत बड़ा यहाँ लगता मेला। लोगों का आता है रेला।। सुर-सरिता के पावन तट पर। सभी लगाते डुबकी जी भर।। बारह वर्ष बाद जो आता।महाकुम्भ है वो कहलाता।। भक्त बहुत इसमें जाते हैं।साधू-सन्यासी आते
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
Apr 25 2010 04:32 PM
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“बाल कविता:समीर लाल (उड़नतश्तरी)”

“गर्मी की छुट्टी” -समीर लाल ’समीर’गर्मी की छुट्टी कर ली हमने खूब पढ़ाई पढ़कर के आँखें खुजलाई लिखी परीक्षा मेहनत कर के तब गर्मी की छुट्टी आई. अब होगा बस खेल तमाशा सुबह शाम को धूम धमाका सब बच्चे घर में खेलेंगे धूप भला हम क्यूँ झेलेंगे.. पापा संग जा कुल्फी
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“लैपटॉप” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

“लैपटॉप”इस बस्ते में क्या है भइया, हमें खोल कर दिखलाओ! कहाँ चले तुम इसको लेकर, कुछ हमको भी बतलाओ!!  इसमें प्यारा लैपटॉप है, छोटा सा है कम्प्यूटर! नये जमाने का इसको ही, हम तो कहते हैं ट्यूटर!! जो कुछ डेस्कटॉप में होता, वही सभी कुछ है इसमें! चाहे कहीं
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“नानी जी का घर” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

मई महीना आता है और, जब गर्मी बढ़ जाती है।नानी जी के घर की मुझको, बेहद याद सताती है।।तब मैं मम्मी से कहती हूँ, नानी के घर जाना है।नानी के प्यारे हाथों से, आइसक्रीम भी  खाना है।।कथा-कहानी मम्मी तुम तो, मुझको नही सुनाती हो।नानी जैसे मीठे
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“पेंसिल” (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

रंग-बिरंगी पेंसिलें तो, हमको खूब लुभाती हैं। ये ही हमसे ए.बी.सी.डी., क.ख.ग. लिखवाती हैं।। रेखा-चित्र बनाना, इनके बिना असम्भव होता है।कला बनाना भी तो, केवल इनसे सम्भव होता है।। गल्ती हो जाये तो,लेकर रबड़ तुरन्त मिटा डालो।गुणा-भाग करना चाहो
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“बिन वेतन का चौकीदार” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”

“आज मैं अपने कुत्ते “टॉम” को कंघी कर रहा था तो सरस पायस के सम्पादक श्री रावेंद्रकुमार रवि ने इसके ये प्यारे-प्यारे चित्र मेरे कैमरे में कैद कर ही दिये!”टॉम हमारा कितना अच्छा! लगता है यह सीधा सच्चा!! ठण्डे जल से रोज नहाता! फिर मुझसे कंघी करवाता!! 
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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‘‘हमारा सूरज’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘‘मयंक’’)

पूरब से जो उगता है और पश्चिम में छिप जाता है। यह प्रकाश का पुंज हमारा सूरज कहलाता है।। रुकता नही कभी भी चलता रहता सदा नियम से, दुनिया को नियमित होने का पाठ पढ़ा जाता है। यह प्रकाश का पुंज हमारा सूरज कहलाता है।। नही किसी से भेद-भाव और वैर कभी रखता है, सदा
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“पढ़ना-लिखना मजबूरी है!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

मुश्किल हैं विज्ञान, गणित, हिन्दी ने बहुत सताया है। अंग्रेजी की देख जटिलता, मेरा मन घबराया है।।  भूगोल और इतिहास मुझे, बिल्कुल भी नही सुहाते हैं। श्लोकों के कठिन अर्थ, मुझको करने नही आते हैं।। देखी नही किताब उठाकर, खेल-कूद में समय गँवाया, अब सिर पर
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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‘‘भँवरा’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

गुन-गुन करता भँवरा आया।कलियों फूलों पर मंडराया।। यह गुंजन करता उपवन में।गीत सुनाता है गुंजन में।। कितना काला इसका तन है।किन्तु बड़ा ही उजला मन है। जामुन जैसी शोभा न्यारी।खुशबू इसको लगती प्यारी।। यह फूलों का रस पीता है।मीठा रस पीकर जीता है।। (चित्र गूगल
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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‘‘वफादार है बड़े काम का’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

यह कुत्ता है बड़ा शिकारी।बिल्ली का दुश्मन है भारी।।बन्दर अगर इसे दिख जाता।भौंक-भौंक कर उसे भगाता।।उछल-उछल कर दौड़ लगाता।बॉल पकड़ कर जल्दी लाता।। यह सीधा-सच्चा लगता है। बच्चों को अच्छा लगता है।।धवल दूध सा तन है सारा।इसका नाम फिरंगी प्यारा।।आँखें इसकी चमकीली
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
Mar 28 2010 08:47 PM
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"सब्जी-मण्डी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

देखो-देखो सब्जी-मण्डी, बिकते आलू,बैंगन,भिण्डी।कच्चे केले, पक्के केले,मटर, टमाटर के हैं ठेले।गोभी,पालक,मिर्च हरी है,धनिये से टोकरी भरी है।लौकी, तोरी और परबल हैं,पीले-पीले सीताफल हैं।अचरज में है जनता सारी,सब्जी-मण्डी कितनी प्यारी।(चित्र गूगल सर्च से साभार)
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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‘‘बस’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

बस में जाने में मुझको,आनन्द बहुत आता है।खिड़की के नजदीक बैठना,मुझको बहुत सुहाता है।।(चित्र गूगल सर्च से साभार) पहले मैं विद्यालय में,रिक्शा से आता-जाता था।रिक्शे-वाले की हालत पर,तरस मुझे आता था।।(चित्र गूगल सर्च से साभार)लेकिन अब विद्यालय में,इक
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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"मेरा विद्यालय" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

विद्या का भण्डार भरा है जिसमें सारा।मुझको अपना विद्यालय लगता है प्यारा।।नित्य नियम से विद्यालय में, मैं पढ़ने को जाता हूँ।इण्टरवल जब हो जाता मैं टिफन खोल कर खाता हूँ।खेल-खेल में दीदी जी विज्ञान गणित सिखलाती हैं।हिन्दी और सामान्य-ज्ञान भी ढंग से हमें
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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‘‘टेली-विजन’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

मेरा टी0वी0 है अनमोल।खोल रहा दुनिया की पोल।।इसमें चैनल एक हजार।इसके बिन जीवन बेकार।।कितना प्यारा और सलोना।बच्चों का ये एक खिलौना।।समाचार इसमें हैं आते।कार्टून हैं खूब हँसाते।।गीत और संगीत सुनाता।पल-पल की घटना बतलाता।।बस रिमोट का बटन दबाओ।मनचाहा चैनल पा
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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‘‘रंग-बिरंगी तितली आई’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

तितली आई! तितली आई!! रंग-बिरंगी, तितली आई।। कितने सुन्दर पंख तुम्हारे। आँखों को लगते हैं प्यारे।। फूलों पर खुश हो मँडलाती। अपनी धुन में हो इठलाती।। जब आती बरसात सुहानी। पुरवा चलती है मस्तानी।। तब तुम अपनी चाल दिखाती। लहरा कर उड़ती बलखाती।। पर जल्दी ही थक
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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‘‘मेरा बस्ता कितना भारी’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

मेरा बस्ता कितना भारी।बोझ उठाना है लाचारी।।मेरा तो नन्हा सा मन है।छोटी बुद्धि दुर्बल तन है।।पढ़नी पड़ती सारी पुस्तक।थक जाता है मेरा मस्तक।।रोज-रोज विद्यालय जाना।बड़ा कठिन है भार उठाना।।कम्प्यूटर का युग अब आया।इसमें सारा ज्ञान समाया।।मोटी पोथी सभी हटा
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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‘‘प्यारी प्राची’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

 इतनी जल्दी क्या है बिटिया, सिर पर पल्लू लाने की।अभी उम्र है गुड्डे-गुड़ियों के संग,समय बिताने की।।(चित्र गूगल सर्च से साभार)मम्मी-पापा तुम्हें देख कर, मन ही मन हर्षाते हैं।जब वो नन्ही सी बेटी की, छवि आखों में पाते है।।जब आयेगा समय सुहाना, देंगे हम
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
Mar 17 2010 08:25 PM
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"मच्छर-दानी" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

जिसमें नींद चैन की आती।वो मच्छर-दानी कहलाती।।लाल-गुलाबी और हैं धानी।नीली-पीली बड़ी सुहानी।।छोटी, बड़ी और दरम्यानी।कई तरह की मच्छर-दानी।।इसको खोलो और लगाओ।बिस्तर पर सुख से सो जाओ।।जब ठण्डक कम हो जाती है।गरमी और बारिश आती है।।तब मच्छर हैं बहुत सताते।भिन-भिन
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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"कम्प्यूटर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

मन को करता है मतवाला।कम्प्यूटर है बहुत निराला।।यह तो एक अनिवार्य भाग है।कम्प्यूटर का यह दिमाग है।।चलते इससे हैं प्रोग्राम।सी.पी.यू.है इसका नाम।।गतिविधियाँ सब दिखलाता है।यह मॉनीटर कहलाता है।।सुन्दर रंग हैं न्यारे-न्यारे।आँखों को लगते हैं प्यारे।।इसमें
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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‘‘गुब्बारे’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

बच्चों को लगते जो प्यारे। वो कहलाते हैं गुब्बारे।।गलियों, बाजारों, ठेलों में।गुब्बारे बिकते मेलों में।।काले, लाल, बैंगनी, पीले।कुछ हैं हरे, बसन्ती, नीले।।पापा थैली भर कर लाते।जन्म-दिवस पर इन्हें सजाते।।गलियों, बाजारों, ठेलों में।गुब्बारे बिकते
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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‘‘जंगल और जीव’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

रहता वन में और हमारे, संग-साथ भी रहता है। यह गजराज तस्करों के, जालिम-जुल्मों को सहता है।।समझदार है, सीधा भी है, काम हमारे आता है।सरकस के कोड़े खाकर,  नूतन करतब दिखलाता है।।मूक प्राणियों पर हमको तो, तरस बहुत ही आता है। इनकी देख दुर्दशा अपना, सीना
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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"गैस सिलेण्डर" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

गैस सिलेण्डर कितना प्यारा।मम्मी की आँखों का तारा।। रेगूलेटर अच्छा लाना। सही ढंग से इसे लगाना।। गैस सिलेण्डर है वरदान। यह रसोई-घर की है शान।। दूघ पकाओ, चाय बनाओ। मनचाहे पकवान बनाओ।। बिजली अगर नही है घर में।यह प्रकाश देता पल भर में।। बाथरूम में इसे लगाओ।
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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‘‘फ्रिज’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

बाबा जी का रेफ्रीजेटर, लाल रंग का बड़ा सलोना। किन्तु हमारा है छोटा सा, लगता जैसे एक खिलौना।। सब्जी, दूध, दही, मक्खन, फ्रिज में आरक्षित रहता। पानी रखो बर्फ जमाओ, मैं दादी-अम्माँ से कहता।। ठण्डी-ठण्डी आइस-क्रीम भी,इसमें है जम जाती।गर्मी के मौसम में कुल्फी,
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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‘‘जोकर’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

जो काम नही कर पायें दूसरे, वो जोकर कर जाये। सरकस मे जोकर ही, दर्शक-गण को खूब रिझाये। नाक नुकीली, चड्ढी ढीली, लम्बी टोपी पहने, उछल-कूद कर जोकर राजा, सबको खूब हँसाये। चाँटा मारा साथी को, खुद रोता जोर-शोर से, हाव-भाव से, शैतानी से, सबका मन भरमाये। लम्बावाला
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“नये-नये कुछ पेड़ लगाना” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

प्राण-वायु को देने वाले.जन-जीवन के हैं रखवाले।धरती का श्रंगार सजाना,नये-नये कुछ पेड़ लगाना।।खट्टे-मीठे, रंग-रँगीले,फल देते ये बहुत रसीले।आँगन-बागों की शोभा हैं,हरे-भरे हैं पेड़ सजीले।।उपवन में हँसते मुस्काते,सुंमन हमारे मन को भाते।वातावरण सुगन्धित
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक