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धूप कणी (मुक्तक) - शशि पाधा
जिसकी लाली ओढ़ के, लाल हुआ कचनार छलके उसकी गागरी, अँजुरी भर दो चार सूना-सूना मन का घर, संशय थे अनेक खोल झरोखा आन मिली धूप कणी की रेख पल दो पल संताप से, मन क्यों करता रोष जलती धरती देख के, बरसे शीतल ओस अतिरिक्त...
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Jun 18 2010 01:03 PM


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