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18 Jun 2010
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धूप कणी (मुक्तक) - शशि पाधा

जिसकी लाली ओढ़ के, लाल हुआ कचनार छलके उसकी गागरी, अँजुरी भर दो चार सूना-सूना मन का घर, संशय थे अनेक खोल झरोखा आन मिली धूप कणी की रेख पल दो पल संताप से, मन क्यों करता रोष जलती धरती देख के, बरसे शीतल ओस अतिरिक्त...
Jun 18 2010 01:03 PM
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प्रकृति का स्वर्ग: अंडमान-निकोबार ...

अटल बिहारी वाजपयी जी की कविता ‘उनको याद करें’ की कुछ पंक्तियाँ गौरतलब हैं- जो वर्षों तक लड़े जेल में, उनकी याद करें/जो फाँसी पर चढे खेल में, उनकी याद करें/याद करें काला पानी को/अंग्रेजों की मनमानी को/कोल्हू में जुट तेल पेरते/सावरकर बलिदानी को। आज भी
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ख़लिश (तेरी आवाज़ मेरे अलफ़ाज़ ) का ...

अपनी अपनी विधा में सितारे कहे जाने वाले देश के चुनिन्दा दस साहित्यकारों को एक साथ , एक ही मंच पर पहली बार देखना किसी सुखद और आश्चर्य जनक अनुभूति और रोमांच के सिवाय कुछ भी ना था और अवसर था लोकप्रिय कवि दीपक शर्मा के काव्य संग्रह का लोकार्पण .गत दिवस,
Jun 17 2010 01:46 PM
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सूखे पत्तों की गीली सदा [मुक्तक] - अजय ...

टूटते सूखे पत्तों की गीली सदा गुज़रे लम्हों को आवाज़ देती हुई प्यासी नदियों को छूती सिसकती हवा खाक-ए-पा को भी परवाज़ देती हुई गर्म नश्तर सी किरणों को काँधे लिए आ पहुँचता है सूरज भी होते सहर सुबह से रात तक वक्त कोई नहीं अब बची है महज़ दोपहर, दोपहर अतिरिक्त...
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हैपी संडे [बाल कविता]- रचना सागर

रात के बाद दिन आता है चाँद के बाद सुरज MONDAY के बाद TUESDAY आया HOMEWORK भी खुब लाया WEDNESDAY के बाद THUSDAY और FRIDAY के बाद SATURDAY आया अंत मे आया SUNDAY और साथ मे लाया मस्ती क्योंकी SUNDAY IS A HOLIDAY अतिरिक्त...
Jun 16 2010 01:38 PM
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उसके अपने [लघुकथा] - सूरजप्रकश

वैसे वह काफी पढ़ा-लिखा और खुले विचारों वाला युवक था। एक कॉलेज मे साहित्य पढ़ाता था, लेकिन शहर मे आए दिन होने वाले दंगो से उसे बहुत डर लगता था। ये दंगे कभी भी भड़क उठते थे। वजह कोई भी हो, उनका अंत सांप्रादायिक दंगे के रूप में होता था।पूरा शहर दो हिस्सों मे
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तद्गुण अलंकार [काव्य का रचना ...

असर सँग का जब दिखे, लें तब तद्गुण मान। नीरस भी रस-निधि बने, शुष्क बने रस-खान।। सत्संगति से गुण बढ़ें, दोष बढ़ाये कुसंग। दोनों में 'तद्गुण' 'सलिल', तत्त्व एक दो रंग।। जब किसी वस्तु द्वारा समीपवर्ती वस्तु के गुण या गुणों अपना लेने की विशेषता वर्णित की जाती
Jun 15 2010 01:50 PM
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चिंताएं [कविता] - राजीव थेपड़ा

चिन्ताएं-एक लंबी यात्रा हैं-अन्तहीन, चिन्ताएं-एक फ़ैला आकाश है असीम, चिन्ताएं-हमारे होने का एक बोध हैं, साथ ही हमारे अहंकार का एक प्रश्न भी!! चिन्ताएं-कभी दूर ही नहीं होती हमसे, अन्त-हीन हैं हमारी अबूझ चिन्ताएं, जो हमारे कामों से ही शुरू होती हैं, और
Jun 15 2010 06:52 AM
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माँ की याद में [कविता] - सुशील कुमार

दुनिया के टंठों से आजिज आ लौट आऊँगा जब तुम्हारे पास तो गोद में मेरा सिर धर अपनी खुरदरी हथेली से जरा थपकियाना मुझे माँ क्या बताऊँ जब से तुम्हें छोड़ परदेस आया हूँ माँ रोजी कमाने, कभी नींद-भर सोया नहीं! अतिरिक्त...
Jun 14 2010 01:35 PM
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बहू का नगों वाला सेट [कहानी] - संगीता ...

बाजार जाने के लिए ज्‍योंहि मैं तैयार होकर बाहर निकली, बारिश शुरू हो चुकी थी। लौटकर बरामदे में एक कुर्सी डालकर एक पत्रिका हाथ में लेकर बारिश थमने का इंतजार करने लगी। बाजार के कई काम थे, बैंक से पैसे निकालने थे, राशन और सब्जियां भी लानी थी। कभी कभी बाजार
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न्याय बिकता है [मुक्तक] - कुलवंत सिंह

न्याय बिकता है तराजू तोल ले, हृदय की संवेदना का मोल ले, हर तरफ है रुपया आज बोलता, बेचने अपनी पिटारी खोल ले| बचे हुए भी चार गांधी चुक गये, सत्य अहिंसा पुस्तकों में छप गये, हिंदुस्तां की अस्मिता को बेचने सौदागर ही हर तरफ बस रह गये| अतिरिक्त...
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मेरा अस्तित्व [कविता] - डॉ. प्रीति जैन

बूँद पकड़ती हूँ मैं ऊँगली के सिरे पर फिर निहारती हूँ उसे चमकते हुए प्यार भी ऐसा ही है तुमसे लिपटा तुमसे मिलता और तुमसे पनपता और फिर मेरी आँखों में समाता| अतिरिक्त...
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जंगल की संतान [पुस्तक समीक्षा] - शरद ...

"आदिवासी संस्कृति, परंपरा एवं रीतिरिवाजों को समेटे एक भावुक उपन्यास" उपन्यास के लेखक ने अपने जीवन का महत्वपूर्ण समय चन्द्रपुर, गढ़चिरोली (महाराष्ट्र) एवं बस्तर के जंगलों में व्यतीत किया है। शायद यही कारण है कि उन्होनें कोयावंशीय आदिवासी संस्कृति को न
Jun 12 2010 07:17 AM
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तूफ़ान [कविता] - अवनीश तिवारी

हर सुहानी शाम तुम्हारी यादों का तूफ़ान उठ मेरे दिमाग से दिल में उतरता है ढलते सूरज के साथ साथ थम सा जाता है| रात की चांदनी में सिहर तैरता है मेरी आँखों में तुम्हारी तस्वीर बन तुम्हारा - मेरा मिलन मुझे नव जीवन दे जाता है| अतिरिक्त...
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विकलांग [लघुकथा] - सुनीति रावत

बस आकर स्टैन्ड पर रूकी| लोग धक्का-मुक्की कर उतरने-चढ़ने लगे| उन्ही में से एक वृद्ध सज्जन भी पैर लचकाते लाठी का सहारा लेकर बस मे चढ़ गये और एक सीट का सहारा लेकर किसी तरह खड़े हो गये। उन्होने सामने नजर उठाई, लिखा था ‘केवल विकलांगों के लिए’| बडी उम्मीद से
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किसी से कोई क्यों कम हो [गज़ल] - प्राण ...

किसी के सामने खामोश बनके कोई क्यों नम हो जमाने में मेरे रामा किसी से कोई क्यों कम हो कफ़न में लाश है इक शख्स की लेकिन बिना सर के किसी की ज़िन्दगी का अंत ऐसा भी न निर्मम हो अतिरिक्त...
Jun 10 2010 01:54 PM
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रासो काव्य और उसकी विशेषताएं - अजय ...

हिन्दी साहित्य के आदिकाल में रासो साहित्य सर्वाधिक लोकप्रिय रहा। अनेक रासो ग्रंथों की रचना इस काल में हुई जिनमें पृथ्वीराजरासो, परमालरासो, बीसलदेवरासो आदि प्रमुख हैं। अधिकांश रासो राजाओं और सामंतों के शौर्य और वीरता का अतिरंजनापूर्ण वर्णन करते हुए लिखे
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घर जिस चिराग से जलना हो [नज़्म] – दीपक ...

बात घर की मिटाने की करते हैं तो हजारों ख़यालात जेहन में आते हैं बेहिसाब तरकीबें रह-रहकर आती हैं अनगिनत तरीके बार-बार सिर उठाते हैं। घर जिस चिराग से जलना हो तो लौ उसकी हवाओं मैं भी लपलपाती है ना तो तेल ही दीपक का कम होता है ना ही तेज़ी से छोटी होती बाती
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इंटरनेट पर छाई राजस्थानी [आलेख] - अजय ...

राजस्थानी भाषा विश्वविख्यात है। इसका एक कारण इंटरनेट है, जहां राजस्थानी को हर किसी ने चाहा तथा सम्मान दिया है। सरकारी वेबसाइटों पर भी अब राजस्थानी देखने को मिल रही हैं। श्रीगंगानगर जिला इस पहल को शुरुआत करने वाला पहला जिला है। इस जिले की सरकारी वेबसाईट
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महान् ध्रुव [बाल-कविता] - डॉ. ...

सुनीति और सुरुचि थीं राजा उत्तानपाद की दो रानी, थी प्रिय अधिक सुरुचि राजा को इससे वह करती रहती थी मनमानी। ध्रुव की माँ थीं सुनीति और सुरुचि-पुत्र थे उत्तम, दोनों शिशु खेला करते थे राजा को प्रिय-सम! अतिरिक्त...
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सूक्ष्म अलंकार [काव्य का रचना ...

देख बिंदु में सिन्धु जब, बिन बोले सुन अंग. इंगित से समझा सकें, उत्तर- समझ प्रसंग. तब भावों का हो सके, अकथनीय विस्तार. सूक्ष्म नाम का हो तभी, पद्य में अलंकार.. किन्हीं काव्य पंक्तियों में प्रसंग विशेष में जब अन्य के भाव को समझकर अभिप्राय विशेष से चेष्टाओं
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ममता, राघव, प्रणब तो मोहरे हैं बेदाम ...

आम आदमी भूख से, जितना हो बेजार. सह लेगा मनमानियाँ, होकर चुप लाचार.. राजनीति है स्वार्थ का सौदा, सेवा नाम. बेच-खरीदे देश को, खुद रहकर बेनाम.. ममता राघव प्रणब तो मोहरे हैं बेदाम. सेठ और अफसर मिले, कमा रहे हैं दाम.. अतिरिक्त...
Jun 07 2010 02:53 PM
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रूमी का अनुवाद - देवी नागरानी

1. मैं कौन हूँ? जो मैं 'मैं' नहीं, तो कौन हूँ मैं? गर मैं वो नहीं जो बात करता हूँ, तो कौन हूँ मैं? गर ये 'मैं' सिर्फ़ वस्त्र हूँ, तो कौन है जिसका मैं आवरण हूँ? अतिरिक्त...
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कान नहीं होते [कविता] - ज़कीया ज़ुबैरी

कार की दीवारों के कान नहीं होते। घर की दीवारें कमज़ोर हैं रोक नहीं पातीं ख़ुफ़िया आवाज़ों को। सुनने वाले कान तेज़ हैं.. बहुत तेज़ पतले फुर्तीले कान! अतिरिक्त...
Jun 06 2010 06:44 AM
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पर्यावरण से खिलवाड़ कब तक [आलेख] - ...

मानव सभ्यता के आरंभ से ही प्रकृति के आगोश में पला और पर्यावरण की सुरक्षा के प्रति सचेत रहा। पर जैसे-जैसे विकास के सोपानों को मानव पार करता गया, प्रकृति का दोहन व पर्यावरण से खिलवाड़ रोजमर्रा की चीज हो गई। ऐसे में आज समग्र विश्व में पर्यावरण चर्चा व चिंता
Jun 05 2010 01:57 PM
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सब संताप हर दें [कविता] - प्रवीण शुक्ला

आओ हम मिल मिला कर सब संताप हर दें बुझ चुकी समता मशालो में फिर ताप भर दें राष्ट्र की गरिमा पुनः उत्थान की सीढ़ी चढ़े रहमान के रहबर बढें और राम की पीढ़ी बढे समता का ऐसा रंग हम जन जन में घोल दें हिन्दू नमाजें पढ़ें और मुस्लिम जय बोल दें धर्म की लकीरें मिटे और
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उदासी के मंज़र [गज़ल] - देवमणि पाण्डेय ...

उदासी के मंज़र मकानों में हैं के रंगीनियाँ अब दुकानों में हैं। मोहब्बत को मौसम ने आवाज़ दी दिलों की पतंगें उड़ानों में हैं। इन्हें अपने अंजाम का डर नहीं कई चाहतें इम्तहानों में हैं। न जाने किसे और छलनी करेंगें कई तीर उनकी कमानों में हैं। अतिरिक्त...
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शह की जीत (2) - शक्ति प्रकाश

अशरफ नवाब के पास जितने मल्ल थे उससे कुछ कम आशिक अली के चमचे| एक फर्क था अशरफ अली के मल्ल खुलेआम हवेली में आते थे पर आशिक अली के चमचे अशरफ नवाब की गैर मौजूदगी में। रामबाबू ने छत से दोनों भाइयों को उतरते देखा, अशरफ नवाब के निकलने का इंतजार किया और तेजी से
Jun 04 2010 06:28 AM
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भारत की बेटी (बाल-कविता) - प्रदीप ...

माँ जी मुझको जाने दो, मैं भी रण-भूमी जाऊँगी| मैं भारत की बेटी हूँ, झांसी-रानी बन जाऊँगी|| भारत माँ के शुभ्र-मुकुट पर जो भी आंख उठाएगा वो बर्फीली घाटी में ही वहीँ, दफ़न हो जायेगा अग्नि और आकाश मिसाइल दुश्मन पर बरसाऊँगी| अतिरिक्त...
Jun 03 2010 01:54 PM
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संस्कृत से खड़ीबोली तक का सफर [आलेख] - ...

किसी भाषा में लिखे गये साहित्य के विकास-क्रम को समझने के लिये इसकी उत्पत्ति और विकास के विभिन्न चरणों को समझना भी आवश्यक हो जाता है क्योंकि हर भाषा का साहित्य अपनी पूर्ववर्ती भाषा की साहित्यिक अवधारणाओं की विरासत को लेकर ही आगे बढ़ता है। हिन्दी साहित्य
Jun 03 2010 06:36 AM
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दिल्ली में [गज़ल] - दीपक 'बेदिल'

तुम भी परेशां हम भी परेशान दिल्ली में हम दो ही तो दुखी हैं इन्सान दिल्ली में किसी भूखे को यहाँ कोई रोटी नहीं देता दिल छोटे और बड़े हैं मकान दिल्ली में रिश्ता बनता नहीं कि टूट जाता है पहले इश्क हो या दोस्ती कुछ नहीं आसान दिल्ली में अतिरिक्त...
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छँटा कोहरा [कहानी] - किरण राजपुरोहित ...

"कॉलेज से आते ही माँ ने जैसे ही खबर दी कि नीति आई हुई है तो जैसे मुझे तो पर ही लग गए। सीधी तुझ से मिलने चली आई।.....और बता न कैसी है तू ....सब लोग कैसे हैं....." चहकते हुए अभिधा ने बोलना शुरु किया लेकिन बात पूरी न हुई उससे पहले ही उसे ये एहसास भी हो गया
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अभियान [कविता] - श्रीप्रकाश शुक्ल

नहीं चाहता मेरी कृतियाँ, मधुशालाओं में गायी जाएँ नाचें कूदें शब्द नटी बन सम्पन्नों का जी बहलायें मुझे नहीं चिंता उनकी, जो रह्ते हैं प्रागारों में मेरी कृतियाँ उनको अर्पित, जो पलते हैं गलियारों में अतिरिक्त...
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अधिक अलंकार [काव्य का रचना शास्त्र: ...

किसी काव्य रचना में आधार तथा आधेय में से किसी एक का दूसरे की अपेक्षाकृत आधिक्य वर्णन होने पर अधिक अलंकार होता है. इसके निम्न दो प्रकार होते हैं. अ. आधार से आधेय का आधिक्य: उदाहरण : रावरे को रूप नख-शिख लौं सराहि काहू मोहन सों कह्यो-कह्यो गुण अवदात है.
Jun 01 2010 06:52 AM
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ग्रीष्म ऋतू की त्रिपदी - डॉ. वेद व्यथित

क्यों इतना जलाते हो थोडा तो जरा ठहरो क्यों राख बनाते हो ये आग ही तो मैं हूँ यदि आग नही होगी तो राख ही तो मैं हूँ अपनों ने ही सुलगाया क्या खूब तमाशा है नजदीक में जो आया अतिरिक्त...
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अनुकरणीय श्रीमदभगवद गीता [स्थाई ...

पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैस्मान्हत्वैतानाततायिन:। तस्मान्नाहो वयं हंतुं धार्तराष्ट्रांसबान्धवान। स्वाज्नं हि कथं हत्वा सुखिन: स्याम माधव ॥36॥ अनुवाद:- वध करने के योग्य इन दुष्टों को मारकर हमें पाप ही लगेगा। इसलिए, हे कृष्ण! हम अपने ही भाईयों, इन धृतराष्ट्र
May 30 2010 07:35 AM
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गुमसुम [लघुकथा] - सुधा भार्गव

चार वर्ष का नन्हा टोडी- “माँ का दुलारा, बाबा का प्यारा, बहन का निराला राजा भैया|” पॉँच वर्ष का होते ही वह स्कूल जाने लगा| तब से ये सारे विशेषण छू-मंतर हो गये| स्कूल जाते समय माँ हिदायत देती - कायदे से रहना| नन्हा समझ न पाया - कायदा किसे कहते हैं| बाबा
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सिफर का सफ़र [ग़ज़ल] - श्यामल सुमन

नज़र बे-जुबाँ और जुबाँ बे-नज़र है इशारे समझने का अपना हुनर है सितारों के आगे अलग भी है दुनिया नज़र तो उठाओ उसी की कसर है मुहब्बत की राहों में गिरते, सम्भलते ये जाना कि प्रेमी पे कैसा कहर है अतिरिक्त...