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पूर्णिमा

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01 Feb 2010
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मूंगफली के दाने

हमविदेशों में भेजते हैंमूंगफली के दाने.अमरीका के बुद्धिजीवीशराब के साथ पसंद करते हैंहमारे मूंगफली के दाने .उन्हें एकदम नापसंद हैटूटा हुआ होनाकिसी भी दाने का कोई भी कोना.इसलिए इस महान देश कीमहान परम्परा का निर्वाह करते हुएउन्हें छीलती हैं वे औरतेंजिन्हें
 
पूर्णिमा
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प्रार्थना

हे प्रभो ! बड़ा दयालु है तू , तूने युद्धों की दुनिया में बांसुरी बनाई , तूने काँटों की दुनिया में कलियाँ खिलाईं तूने नफ़रतों के अंधेरों में प्यार के दीपक जलाए , तूने मर्दों की दुनिया में औरतें बनाईं !हे प्रभु ! बस इतना वरदान दे - ये वंशियाँ - कोलाहल के
 
पूर्णिमा
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Jan 28 2010 05:35 PM
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बेटियाँ

जब खुश होती हैं बेटियाँतो आँगन चहकने लगता है .रंगोली सजती है दरवाजे पर .सारा का सारा आसमानभर उठता है बन्दनवारों से .तुलसी रोज़ होती है एक हाथ लम्बी .नीम में पड़ते हैं झूले .आम के बौर में छिप करकूकती है कोयल .और चौक में बिखर - बिखर जाते हैंचम्पा - चमेली
 
पूर्णिमा
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रास्ते

चीख पुकार मची है हर ओर.भागी जा रही है दुनिया.धक्का मुक्की में औंधे मुँहगिर पड़ी सब्जी वाली बुढ़िया.पुजारी जी का जनेऊफँस गयापादरी जी के क्रॉस में.मौलवी साहब का पाजामाचिर गयाग्रंथी जी की किरपान से.किसी को परवाह नहीं-न धर्म की न शर्म की.बस दौडे जा रहे हैं
 
पूर्णिमा
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Jan 28 2010 05:33 PM
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मन

मनअगर फट जाता है कभी,लाख कोशिश करोजोड़े नही जुड़ता.बसतैरती रहती हैं पुरानी यादेंनिचले तल सेऊपरी सतह तक .दूध जैसा मन भीएक बार फटा-तो बस फट गया- सदा के लिए.-पूर्णिमा  शर्मा  
 
पूर्णिमा
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वक्त की बिल्ली

वक्त बिल्ली की तरहदबे पाँव आया मेरी बच्ची के पास.मैंने रसोई से देखा-बिल्ली म्याऊँ-म्याऊँ करने लगी.बच्ची ने पकड़ लिए दोनों कानतो आँख मिचमिचाकर रह गईवक्त की बिल्ली.बच्ची ने पकड़ी उसकी पूँछबिल्ली को मौका मिल गया,ज़ोर से काट लिया दूसरी बांह में.बिलबिलाकर रह
 
पूर्णिमा
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Jan 28 2010 05:32 PM
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लड़के

सपनों को सहेजते हैंअपनी आंखों मेंअपनी उम्र का हिसाब रखते हुए लड़के .खिलखिलाती हैं जब लड़कियाँ,अपनी मुस्कान को दबाते हैं लड़के.आईने के सामने घंटोंबतियाती हैं जब बहनें,कभी रीझकर तो कभी खीझकरमुक्का तानते हैं लड़के .और जब किसी दिनतिरछी चितवन सेदेख लेती है
 
पूर्णिमा
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लड़कियाँ कविताएँ हैं

लड़कियाँ कविताएँ हैं ;चाहे - अचाहे आ जाती हैंमन के आँगन में .कभी हँसाती और गुदगुदाती हैं .कभी रूठ जाती हैं ,कभी रुलाती हैं .कविताओं को कुछ भी छिपाना नहीं आता .लड़कियाँ भी कहाँ कुछ छिपाना जानती हैं ?कविताएँ सहज हैं ,सच्ची हैं, सुंदर हैं .लड़कियाँ भी कितनी
 
पूर्णिमा
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सुसाइड नोट

कहानी : डॉ. पूर्णिमा शर्मा सुसाइड नोटऔर उसने बिजली के वे नंगे तार अपनी दोनों कलाइयों पर अच्छी तरह लपेट लिए। वह इस बार पहले की तरह चीखना नहीं चाहता था, जब स्विच आन करते ही जोर का झटका लगा था और वह दूर जा गिरा था। तार हाथ से छूट गए थे। वह ज़िंदा बच गया था।
 
ऋषभ Rishabha
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