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यार कहानी

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13 Jun 2010
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महंगाई की बारिश में समर्थन मूल्य की छतरी

अरविन्द चतुर्वेद : मानसून की  आहट मिल चुकी  है और सरकार ने हर साल की  तरह खरीफ की  फसलों के समर्थन मूल्य घोषित कर दिए हैं। यह अलग बात है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य की छतरी महंगाई की तूफानी
 
अरविन्द चतुर्वेद
Jun 13 2010 09:04 PM
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नरेंद्र मोदी का बच्चा-राग

अरविन्द चतुर्वेद : बचपन कैसे सुरक्षित रहे, बच्चों की दुनिया को कैसे खुशगवार और रचनात्मक बनाया जाए- इसकी चिंता सरकारों को भले ही कम हो और बच्चों की बेहतरी का सारा दारोमदार उनके मां-बाप पर छोड़कर सरकारें निश्चिंत हो जाती हों, लेकिन सियासत करने वाले बच्चों
 
अरविन्द चतुर्वेद
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भारत की बढती स्वीकार्यता

अरविन्द चतुर्वेद :आजकल हमारे विदेश मंत्री एसएम कृष्णा प्रतिनिधि मंडल के साथ अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन में हैं। अपनी समकक्ष अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन से हुई मुलाकात और उनके साथ हुई आधिकारिक बातचीत में हिलेरी ने भारत को च्एक उभरती हुई विश्व
 
अरविन्द चतुर्वेद
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बदल रहा बंगाल

अरविन्द चतुर्वेद :पश्चिम बंगाल में 15वीं लोकसभा के चुनावों के पहले से ही बदलाव की जो बयार बह रही है, उसका रूख किसी भी प्रकार से मोड़ पाने या दूसरी ओर घुमा सकने की सत्तारूढ़ वाममोर्चा की कोई भी कोशिश कामयाब होती नहीं दिखाई दे रही है। पहले त्रिस्तरीय पंचायत
 
अरविन्द चतुर्वेद
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दौलत की देवी

अरविन्द चतुर्वेद :  मायावती दलित की बेटी होने के विशेषण का इजहार करते हुए अपने विरोधियों को सियासत के मैदान में चुनौती देती हैं और विरोधी जवाब में उन्हें दौलत की बेटी के विशेषण से नवाजा करते हैं। दोनों ही विशेषण अपनी जगह सौ फीसदी सही हैं। मायावती
 
अरविन्द चतुर्वेद
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बैलगाड़ी पर लदी नींद

अरविन्द चतुर्वेद :________________आसपास के बारह गांवों का सरगना कहा जाता है, यह गांव। सरगना, केवल इसलिए कि अंगरेज कलक्टर उल्ढन साहेब ने इसी गांव के लोगों के साथ कर्मनाशा के जंगल में शिकार खेलना पसंद किया था। सरगना, केवल इसलिए कि नलराजा के मेले में इस
 
अरविन्द चतुर्वेद
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यह है विकास का कचरा!

अरविन्द चतुर्वेद : हमारी मानसिकता ही कुछ ऐसी बन गई है कि जब आग लगती है, तब कुआं खोदने की तैयारी करते हैं। अब यही देखिए कि राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के मायापुरी इलाके में कचरे में पड़े बेहद खतरनाक कोबाल्ट-60 के विकिरण की चपेट में आकर जब कुछ
 
अरविन्द चतुर्वेद
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खेल से दूर सदाबहार खेल

अरविन्द चतुर्वेद :जो खेल होता हुआ दिखता है चाहे वह हॉकी हो या क्रिकेट, उससे अलग एक और सदाबहार खेल चलता रहता है, जो वास्तविक खेलों, उनकी तैयारियों और उनको संचालित-आयोजित करने वाले खेलते रहते हैं। इस सदाबहार खेल के कई रंग हो सकते हैं- पैसे का, भ्रष्टाचारी
 
अरविन्द चतुर्वेद
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बौनों के बीच महापुरुष

अरविन्द चतुर्वेद :हमारा आचरण इतना क्षुद्रता पूर्ण और व्यक्तित्व इतना बौना होता जा रहा है कि लगता है शायद हम अपने महापुरूषों का सम्मान करने लायक भी नहीं रह गए हैं। कभी राष्ट्रपिता महात्मा गाांधी को पता नहीं क्या समझ कर और किस सनक में खरी-खोटी सुनाई जाती
 
अरविन्द चतुर्वेद
Apr 22 2010 03:25 PM
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इसे कहते हैं चिराग तले अँधेरा!

अरविन्द चतुर्वेद :कहते हैं कि यह ग्लोबल समय है और सूचना क्रांति के चलते दुनिया सिमट कर बहुत छोटी हो गई है। अपने देश ने भी कम ग्लोबल तरक्की नहीं की है और सूचना तकनीक के मामले में तो कहा जाता है कि हमने दुनियाभर में झंडे गाड़ दिए हैं और परचम फहरा रहे हैं।
 
अरविन्द चतुर्वेद
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मोहन कुजूर का चाकू

अरविन्द चतुर्वेद :हेड ऑफिस के सामने वाले लॉन में मेन गेट के ठीक बायीं ओर सस्ते नीले जींस की पैंट और गहरे लाल रंग की बनियान पहने वह जो एक काला-कलूटा तंदुरूस्त-सा लड़का बैठा हुआ है- वह है मोहन कुजूर। आप उसकी उम्र के बारे में क्या सोचते हैं- चौबीस-पच्चीस
 
अरविन्द चतुर्वेद
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मेरे गाँव की कहानी/दस : अकाल में अनहोनी

अरविन्द चतुर्वेद :वे सालभर पहले आए थे " बारहगांवा " के इस हेकड़ीबाज गांव में। इलाके भर के बारह गांवों में लोग पीठ पीछे कहा करते थे- यह गांव तो हरहा सांड़ है, भइया! किसी के भी खेत में मुंह मारता फिरता है, और मना करो तो ऊपर से सींग भी चलाता है। लेकिन क्या
 
अरविन्द चतुर्वेद
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गाँव कहानी/नौ : लौट के बुद्धू घर को आया

अरविन्द चतुर्वेद :बुद्धू चेरो जब से गांव लौटा है, उदास-उदास रहता है। लोग पूछते हैं, क्यों अब ओबरा कब जाओगे? बुद्धू जवाब देता है, चार महीने गांव पर ही रहेंगे, बरसात बाद सोचेंगे कि ओबरा ही जाना है कि दुद्धी या रेनूकूट। सालभर बाद ओबरा से बुद्धू आया है। उसका
 
अरविन्द चतुर्वेद
Mar 30 2010 09:34 PM
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गाँव कहानी/आठ : वनरक्षक मुच्छड़ तिवारी

अरविन्द चतुर्वेद :पुजारी बाबा बोले- हम लोगों के लड़कपन में कर्मनाशा के जंगल में घों-घों करते सूअर, भालू और तेंदुआ का बराबर डर बना रहता था। एक बार तो बाघ भी आ गया था। पहली बार विजयगढ़ के राजा साहब का मचान नलराजा के नाले के किनारे गूलर के पेड़ पर बांधा गया
 
अरविन्द चतुर्वेद
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गाँव कहानी/सात : विजयी-सियार संग्राम

अरविन्द चतुर्वेद :पूस के महीने में एक ठंडी सुबह जब विजय कुमार चौबे उर्फ विजयी की नींद खुली तो रोजाना की तरह बदन में गरमाहट लाने वाली गांजे की तलब ने इतना जोर मारा कि उन्होंने झटपट बिस्तर छोड़ा और जो पैजामानुमा पैंट पहन कर सोए थे, उसके ऊपर शर्ट चढ़ाई और
 
अरविन्द चतुर्वेद
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गाँव कहानी/छः - शादी कब होगी, पुजारी बाबा

अरविन्द चतुर्वेद :पुजारी बाबा बुजुर्ग हैं लेकिन चिर कुमार हैं, बाल ब्रहमचारी। और, असली नाम भी है पवन कुमार। बचपन में मां-बाप मर गए और उनसे बड़े दोनों भाइयों ने तो शादी-ब्याह करके अपना घर बसा लिया, इकलौती बहन की भी शादी हो गई मगर भाइयों-भौजाइयों का मुंह
 
अरविन्द चतुर्वेद
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मेरे गाँव की कहानी/पांच : बांके, सिपहिया से डर लागे!

अरविन्द चतुर्वेद :बांके यानी बांकेलाल! उनका असली नाम क्या है, यह उनके घरवालों को ही पता होगा। बांके नाम गांववालों ने दिया है जिसे उन्होंने सिर झुकाकर स्वीकार कर लिया है और इस हद तक स्वीकार कर लिया है कि अगर कोई उनके असली नाम से पुकार ले तो खुद
 
अरविन्द चतुर्वेद
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मेरे गाँव की कहानी/चार : नहर के पुल पर अड्डा

अरविन्द चतुर्वेद :पीपल के विशाल पुराने वृक्ष की छाया में नहर के पुल के दोनों किनारों पर गांव के दस-बीस लोग अक्सर आमने-सामने बैठे खाली वक्त गुजारते मिल जाते हैं। इनमें नौजवान लड़के भी होते हैं और बड़े बुजुर्ग भी। हां, अक्सर यह होता है कि नौजवान पुल के किसी
 
अरविन्द चतुर्वेद
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मेरे गाँव की कहानी : तीन - मछली-भात और नींबू के पत्ते

अरविन्द चतुर्वेद :एक समय वह भी था कि वर्षा-जल से नहाए जंगल से होकर जब पुरवा हवा चलती थी तो भीगी वनस्पितियों की मादक महक के झोंके गांव तक आते थे। बरसात ही नहीं, हर मौसम में इस गांव की जिंदगी की निगाहें सहज रूप से पूरब जंगल की ओर उठती थीं, लेकिन जबसे जंगल
 
अरविन्द चतुर्वेद
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मेरे गांव की कहानी- दो : कलहवा गांव में कत्ल

अरविंद चतुर्वेद :मेरे गांव का नाम कलहवा गांव इसलिए, क्योंकि बाभनों में पटूटीदारी की लाग-डांट बराबर बनी रहती थी और बात-बात पर गाली-गलौज के साथ लाठियां निकलती रहती थीं। यह कलह तीन बार जब अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंची तो रामप्यारे चौबे, रामखेलावन चौबे और कुबेर
 
अरविन्द चतुर्वेद
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मेरे गावं की कहानी : एक

अरविन्द चतुर्वेद समय की अपनी फिक्र होती है जो हर आदमी के चेहरे पर लकीरें खींचती रहती है। उसके विशाल परदे पर पुराने दृश्य ओझल होते हुए गायब होते जाते हैं और उनकी जगह नए दृश्य, नए चित्र उभरते हैं। क्या यह रूप-परिवर्तन ही समय-परिवर्तन है? नहर किनारे बसे इस
 
अरविन्द चतुर्वेद
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दूसरी मरियम

अरविन्द चतुर्वेद मरियम यहां रांची शहर से कोई पच्चीस-तीस किलोमीटर दूर तमाड़ इलाके के किसी गांव की रहने वाली है। पहली बार उसे छह महीने पहले देखा था, जब इस मकान के एक हिस्से में किराएदार बनकर रहने आया। जब मैं मकान मालिक से बात कर रहा था तो घर के भीतर से एक
 
अरविन्द चतुर्वेद
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शहरी कायाकल्प का खामियाजा

अरविन्द चतुर्वेद देश की राजधानी दिल्ली और उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में शहरी कायाकल्प को लेकर एक कश-म-कश देखी जा सकती है और कहना नहीं होगा कि नगर विकास की अंधाधुंध कार्रवाइयों के चलते दोनों जगह की सरकारें नागरिकों के निशाने पर हैं। दिल्ली में अवैध
 
अरविन्द चतुर्वेद
Mar 08 2010 08:47 PM
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दरख्तों के दुश्मन परिंदों के दोस्त नहीं होते!

अरविन्द चतुर्वेद लखनऊ के बाटेनिकल गार्डन में बरगद का एक विशाल पेड़ है- दो सौ साल पुराना। वह लखनऊ की हरियाली और छांव का बुजुर्ग पुरखा है और बागो-बहार का संगी-साथी और गवाह। बरगद के इस पुराने पेड़ ने जमाने देखे हैं। इसने हुकूमत की हेकड़ी भी देखी है और यह भी
 
अरविन्द चतुर्वेद
Mar 07 2010 08:44 PM
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मन न रंगाए, रंगाए जोगी कपड़ा!

अरविंद चतुर्वेदसृष्टि की सर्वोत्तम रचना होकर भी पुरूष रंगों के मामले में प्रकृति से कई हाथ पीछे है। प्रकृति हमसे कहीं ज्यादा रंगीन है। उसके खजाने में रंग ही रंग हैं। आदमी ने रंगों के आचरण का पहला पाठ भी प्रकृति से ही पढ़ा होगा। यानी रंगों की पाठशाला में
 
अरविन्द चतुर्वेद
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घुटना टेक रहकर कैसे होंगे हाई टेक

अरविंद चतुर्वेददेश के पुलिस प्रशासन और सुरक्षा बलों में वांछित गुणात्मक बदलाव के लिए देशभर के पुलिस प्रमुखों के सम्मेलन में गृह मंत्री पी चिदंबरम ने जैसी तीखी टिप्पणी की और पुलिस मुखियाओं से जैसे सवाल किए, उन पर अगर किसी ने जवाब देने के बजाय सिर झुकाकर
 
अरविन्द चतुर्वेद
Feb 27 2010 08:47 PM
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एक खेल का नाम है छुपम छुपाई

एक खेल का नाम है छुपम छुपाई. छोटे बच्चों में बहुत लोकप्रिय है. हो सकता है बचपन में आपने भी खेला हो. एक बच्चा छुप जाता है और बाकी बच्चे उसे खोजते हैं. छिपा हुआ बच्चा कई तरह से चकमा देता है - आवाज़ निकाल कर या कोई चीज इधर- उधर फेंककर.
 
अरविन्द चतुर्वेद
Feb 25 2010 08:48 PM
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खजुराहो की खासियत

अरविन्द चतुर्वेद       गोया वहां धरती की हथेलियाँ खाली थीं और उन पर रखने के लिए उनके पास पत्थर के सिवा कुछ न था ! सो, उन्होंने पत्थर को आकर दिया -
 
अरविन्द चतुर्वेद
Feb 13 2010 09:35 PM
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बानगी बनारस की (दो)

- अरविन्द चतुर्वेद -वे सिंह हैं, उपाध्याय हैं, राय हैं कि जायसवाल हैं, लेकिन हैं काशीनाथ! कचौड़ीगली जाते हैं तो काशीफल की तरकारी और कचौड़ी के लिए मुंह में पानी आ जाता है. बाज़ार जाते हैं सब्जी का थैला लेकर तो कुछ खरीदें या नहीं, मगर गोल, चिपटे, हरित-पीताभ
 
अरविन्द चतुर्वेद
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बानगी बनारस की (एक)

अरविन्द चतुर्वेद दुनिया भर में बाजारवाद, भूमंडलीकरण की धूम मची है. इक्कीसवीं सदी उसकी दुन्दुभी बजा रही है. लेकिन अपने बनारस शहर का क्या कीजियेगा! इसके मंदिरों के घंटे-घड़ियाल की आवाज़ आज भी मद्धिम नहीं हुई और कभी-कभी तो इतनी तेज सुनाई देती है कि इक्कीसवीं
 
अरविन्द चतुर्वेद
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सजना है मगर जीवन के लिए

जैसा देश-वैसा भेष...! इस मुहावरे को स्थानांतरित कीजिये और जाइये बाज़ार से एक अच्छा-सा व्यक्तित्व खरीद लाइए. यह अपील न अटपटी लगनी चाहिए, न इसपर चौंकने की जरूरत है. यही हो रहा है. रमैया की दुल्हिन बाज़ार नहीं लूट रही है, बाज़ार उसको लूट रहा है. बल्कि वोह तो
 
अरविन्द चतुर्वेद
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बसंत वियोग

अरविन्द चतुर्वेद यही क्या कम है कि उम्र के पचास पार बसंत में बनारस में बैठे-बैठे मन कर्मनाशा के वनों में भटक रहा है. वर्ना शहर में क्या छतों के गमलों में बौने बसंत
 
अरविन्द चतुर्वेद
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प्यार चाहिए

कवि हरिवंश राय बच्चन ने कभी लिखा था, प्रेमियों के लिए हाय कितनी क्रूर दुनिया ! पीछे मुड़कर देखिये तो इस कविता-पंक्ति की सच्चाई का एहसास जरूर होगा. हरियाणा से लेकर उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में प्रेमी युगल प्रेम-दुर्घटना के क्रूर शिकार हुए. कहीं पंचायतों
 
अरविन्द चतुर्वेद