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18 Jun 2010
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वाह! क्या खूब धोखा दिया जा रहा है दुःख को भी!

पिछले कई दिनों से मै ब्लॉग से दूर रहा!बस यूँ समझे कि मजबूर रहा!आज भी बस अधिक समय नहीं दे पा रहा हूँ!सो एक पोस्ट जो पहले भी पोस्ट कर चुका था आज फिर आपके समक्ष रख रहा हूँ!मित्र!एक ऐसा शब्द है जो पूर्णता देता है हमे!या यूं कहिये कि सम्पूर्णता देता है
 
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तेरी बेरुखी बेसबब तो ना होगी.....

तेरी बेरुखी बेसबब तो ना होगी,यही सोच कर दिल हल्का हो गया,इक पल तो रहे इस पल में,फिर मन अतीत में खो गया,जय हिन्द,जय श्रीराम,कुंवर जी,
 
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खामोशियों की जुबाँ समझे तो मायने बदल जाते है बातो के.....(कुंवर जी)

खामोशियों की जुबाँ समझेतो मायने बदल जाते है बातो के,असमंजस में है कि बातों के मायने बदलेया बात पुरानी रहने दे....जिस्मानी जुबाँ का अंदाज-ए-बयाँ तोकुछ और ही अफसाना कह रहा,अच्छा लगे तो मान ले वरनाअफसानात रूहानी रहने दे,हौंसले अपने तो पस्त
 
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तुझको मजबूर समझ मै लौट आया.....

मै कल तेरे दरवाजे तक गयाऔर लौट आया,अन्दर जाना जी ने बहुत चाहापर मै लौट आया,मन ही मन तेरा दर खटखटायाऔर मै लौट आया,लगा मुझे ऐसा किदेख लिया है तुमने मुझे कहीं से,तुमको भी अनदेखा कर मै लौट आया,कुछ तो रह गया था मेरा वही पर,उसे वहीँ छोड़ कर मै लौट आया,मै
 
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अब तो बस करो...

सुन लो ये मौन-क्रंदन,उसका भी हैकुछ कहने का मन!अभी चल रही थीतैयारी उसके आने की,अभी विचारो में तुम्हारेपनप रहा है उसका दमन,तब नहीं सोचा थाअब सोच रहे हो...तब के अवसर को समस्या जान,अब हल खोज रहे हो!उजाड़ रहे होस्वयं तैयार किया हुआ चमन!और तुमने
 
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जीवन कोई दलदल है क्या........?....(क्षणिका)

जितना सुलझाना चाहता हूँउतना ही छटपटाता हूँ,जितना छटपटाता हूँउतना ही धंसता जाता हूँ,जीवन कोई दलदल है क्या........?समझ ही नहीं पाता हूँ......जय हिन्द जय श्रीराम,कुंवर जी,
 
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जिकर करण के लायक नहीं और चुप रहया ना जावै, {हरयाणवी रागणी},

ये मन भी...बस कुछ भी कहीं भी महसूस करने लग जाता है,नहीं सोचता चलो घर की ही तो बात है,पर नहीं...इन शब्दों के आगे भला हमारी क्या बिसात है...?घर की हो या बहार वालो की अब घात तो घात है....आज कुछ आपबीती जो जैसे अनुभव की थी ज्यों की त्यों प्रस्तुत
 
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क्या हमारा अपना इतना सामर्थ्य है की हम परमात्मा की दी हुई प्रेरणा को अस्वीकृत कर दे,उसे औचित्यहीन घोषित कर दे,बिना उसकी सहमती या आज्ञा के.....?-(एक

आज बस एक प्रशन जिससे मै अकेला जूझता रहता हूँ!"क्या हमारा अपना इतना सामर्थ्य है कि  हम परमात्मा की दी हुई प्रेरणा को अस्वीकृत कर दे,उसे औचित्यहीन घोषित कर दे,बिना उसकी सहमती या आज्ञा के.....?"मै मानता हूँ कि 'शब्द' 'विचार' को अक्षरशः
 
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ओ कान्हा के देस को जाने वाले...(अरज)

ओ कान्हा के देस को जाने वाले...उसके संग बोल-बतलाने वाले...उसे अपने संग हंसाने-रुलाने वाले...एक अरज हमारी भी उसको सुना देना!शब्दों के अर्थ करने में ही जो उलझा हुआ है...अपनी नज़रो में ही जो सुलझा हुआ है...पुष्प खिलने से पहले ही उसका मुरझा हुआ
 
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शायद इसलिए है सारे मौन...(कविता),

पहले तो मौन और फिर  पण्डित जी     को पढ़ा तो मन जो विचार उठे वो ही आज आपके समक्ष है.....सब खुद से ही बोल रहे है,अपमे मन को टटोल रहे है.....अन्दर ही अन्दर खुद को तोल रहे है,लगा अपनी आत्मा का मोल रहे है,ऐसे में भला
 
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वाह कह दे एक बार बस वाह कह दे,.....(हास्य-वयंग्य)

कवी हृदय पती साधारण पतियों से अधिक पत्निव्रता होता है,इसमें कोई दो-राही बात नहीं हैं!उदाहरण के लिए आप कालजयी फिल्म "नवरंग" देख सकते है!कवी हृदय पती तो बस एक वाह का मारा होता है!पत्नी उसे दुत्कारती रहे,कोई इज्जत ना करे(वैसे ऐसे काम वो कम ही कर पाते है
 
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मिट्टी मेरी.... न जाने कैसी है, है?-(कुंवर जी)

आज ही घर से वापिस आया हूँ!बहुत कुछ पढ़े बिना छोट गया होगा!थकान भी बहुत हो रही है!कुछ भी नया जो लिखा गया उस से संतुष्टि सी नहीं मिली सो आज पुरानी कविता फिर आपके समक्ष........ किसी का भी दुःख मै नहीं बाँट सकता हूँ,किसी की भी राहों से कांटे मै नहीं छाँट सकता
 
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माँ के ख़यालात में....(कुंवर जी)

हँसता-गाता,खेलता-खाता,रोता-नहाता,रूठता-मनाता भी मै शायद अधुरा ही होता हूँ!आंसुओ के अहातो मेंदुखो के अखाड़ो में,मुश्किलों के पहाडो में अपनों के मेलो मेंपरायो के झमेलों में,भी शायद मै अधूरा ही होता हूँ!माँ के ख़यालात में,और जब कलम होती है हाथ में तो ही मै
 
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मै समझ नहीं पा रहा हूँ कि मै कैसे पूछूं!(वयंग्य)

मै समझ नहीं पा रहा हूँ कि मै  कैसे पूछूं!क्या वर्ण वयस्था उचित थी या है या हो सकती है?उस हिसाब से चार वर्ण-एक पंडित जो ज्ञान बांटता है,एक क्षत्रिय-जो अपनी जान की भी परवाह नहीं करता दूसरो की रक्षा करने में,एक वैश्य-जो सभी के लिए 'अर्थ' को सही अर्थो
 
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मै नहीं मानता कि ब्लॉगजगत केवल आतंकवादियों और उनके समर्थको से या नपुन्सको से ही भरा पड़ा है!

यहाँ सुनील जी को पढ़ा  तो मुझसे रहा ना गया!मै वहा भी इस बात पर अपनी असहमति उनसे जता चुका हूँ!पर लगा वो पर्याप्त नहीं है!मै नहीं मानता कि ब्लॉगजगत केवल आतंकवादियों और उनके समर्थको से या नपुन्सको से ही भरा पड़ा
 
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कमी अपनों की खलती ही है!-(कविता)

रातो में,बातो में,कभी खयालो मेंकभी हालातो में,कभी जोश में कभी जज्बातों में,किसी से बिछुड़ने पर किसी की मुलाकातों में,मौत के हमले में,कभी जिंदगी की घातों में,बोझ होते रिश्तों मेंकहीं नए जुड़ते नातों में...कमी अपनों की खलती ही है! जय हिन्द जय
 
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ये शब्द मेरे साथ आजकल कबड्डी खेल रहे है!-(कुंवर जी),(कविता)

ये शब्द मेरे साथ आजकल कबड्डी खेल रहे है!मै सोचता हूँ इस बार तो धर-दबोचुन्गा,तैयार भी हो जाता हूँ पूरी तरह!पर पता ही नहीं चलता कब-कैसे वो बोनस भी ले जाते है!और मै खड़ा देखता रह जाता हूँ!अब मै कसता हूँ लंगोटएक बार फिर,हाथो को लगाता हूँमिट्टी भरपूर,मुट्ठियाँ
 
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अपने अनुभव रूपी ज्ञान का दूसरो के लिए भी प्रयोग कर लेना चाहिए!फायदा अपना भी होगा और दुसरो का भी!कुछ सीखो यहाँ से-कुंवर जी,(हास्य-वयंग्य)

हमें अपने अनुभवों का लाभ सभी को देना चाहिए!ऐसा मेरा मानना है!ऐसी ही एक घटना मै आपको सुनाने जा रहा हूँ,शायद उसके बाद आपका भी ऐसा ही मानना हो जाए!हुआ यूँ कि हम और राणा जी,किसी पार्टी में शिरकत करने पहुँच गए!अब ये बताने का कोई औचित्य नहीं लग रहा कि हम
 
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देखना कैसे-कैसे मर्द है यहाँ?-कुंवर जी,

बैलगाड़ी धेरे-धीरे टुमक-टुमक चल रही थी जी!अब वो तो बैलगाड़ी थी ऐसे ही चलनी थी!जितने यात्री उसमे बैठे वो बोर भी नहीं हो रहे थे,सभी को आदत थी उसमे सफ़र करने की!उनमे एक भाई साहब कुछ अलग से दिख रहे थे!सौभाग्य से या दुर्भाग्य से घडी केवल उन्ही के पास थी
 
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अब मै सोचता हूँ कि क्या शराबी को प्रमाण पत्र मिल जाता है कुछ भी कहने का!क्या उसे सच में

एक बार एक शराबी गली में खड़ा सभी आने जाने वालो को गालिया(वो भी बेहद गन्दी वाली) दे रहा था!सभी परेशान तो थे पर सोच रहे थे चला जाएगा,सो कुछ नहीं बोल रहे थे!अब हो गयी बहुत ज्यादा देर,आदमी-औरत सभी तंग!जो मुसाफिर थे,वो चले जाते,जो वही रहने वाले थे वो तो तड़प
 
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भाई जान;क्षमा करना,मै तो बस आपसे बात करना चाहता था और आपने तो अपने पूरे समाज की जिम्मेवारी अपने सर पर ले ली!और उसी समाज ने आपको अकेला छोड़ दिया!लेकिन

वैसे मै ऐसे मुद्दों को एक दिन से ज्यादा घसीटने में विश्वाश नहीं रखता!लेकिन भाई जान इस से महीने भर से चिपटे हुए है तो क्या मै दो दिन भी नहीं खेल सकता !सलीम भाई जान;क्षमा करना,मै तो बस आपसे बात करना चाहता था और आपने तो अपने पूरे समाज की जिम्मेवारी अपने सर
 
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ब्लॉग-जगत की शान,आतंकवादी भाई जान,सलीम खान से एक छोटा सवाल अपना भी!पता नहीं वो बताएँगे या नहीं!मर्जी है उनकी आखिर नियत है उनकी!-कुंवर जी,

मै पिछले कई दिनों से अपने आप को इस विषय से बचाए हुए था!पर मन चंचल आखिर चंचलता दिखा ही गया!आतंकवादी भाई जान,मुस्लिम जगत की शान,सलीम खान का प्रेम मुझे खींच ही लाया दुबारा से इस खेल में!हालांकि वो भरे-पूरे मस्तिष्क के स्वामी है,इस पर किसी को भी कोई भी
 
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अपने यहाँ बच्चे अभी इतने नहीं गिरे है!वो बस देखा-देखी ये सब कर रहे है!इसका सबसे सटीक और प्रत्यक्ष उदाहरण आप सब लोग है!क्यों क्या नहीं हो...........

माँ-बाप का ऋण एक दिन में चुकता करने की ये पश्चिमी सोच यहाँ भी अपने पैर पसारने काफी हद तक सफल होती दिखाई दे रही है!ये दुर्भाग्य ही तो है!अरे भगवान् का सबसे शुद्धतम रूप जो प्रत्यक्ष हमारे पास है वो माँ-बाप ही तो है!समस्त जीवन उनको देने पर भी हम उनका ऋण
 
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गुरुदत्त से गुलाल तक की ये दुनिया........जैसी है वैसी की वैसी ही बचा लो ये दुनिया!

 गुरुदत्त साहब की प्यासा एक अमर कृति है!उसी का ये गीत "ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है...." जब मैंने फिल्म में देखा था तो मै लगभग रो पड़ा था!मेरे पसंदीदा गानों में से एक ये भी है!कल ही मेरे एक मित्र से हल्की-फुलकी बहस हो गयी ये लेकर कि ये गाना
 
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जी हाँ!कसाब के साथ मै भी राष्ट्रद्रोही हूँ!क्या आप मुझे माफ़ करेंगे,मेरे इस राष्ट्रद्रोह के लिए.....

आज जैसे ही मैंने अखबार पढने के लिए उठाया तो कसाब को फांसी की सजा बुलने की खबर को ही मुख्य पाया!बढ़िया भी लगा!दिल में एक ख़ुशी की लहर सी तो दौड़ी थी सच में!लेकिन तभी वो ख़ुशी थोड़ी सी बेइज्जती में तब्दील होकर मेरी देशभग्ति की भावना पर प्रशनचिंह बन कर खड़ी
 
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और यूँ हमारी एक-आध धड़कन और बढ़ जाती है!

कई बार जिंदगी बहुत करीब से गुजर जाती है,अनजाने में हमें जिन्दा होने का एहसास करा जाती है,मौत हमें एक बार फिर से मारने में शरमाती है,और यूँ हमारी एक-आध धड़कन और बढ़ जाती है!भावो और शब्दों की लड़ाई आँखों से झड़ जाती है,समय की पेशानी पर कुछ सलवटें और पड़
 
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अरे उनको देखने के लिए मेरी बहन ही मिली है क्या आज,और भी तो बहुत सी लडकिया है बाज़ार में, (वयंग्य)

कितने बेशर्म है सब,पागलो की तरह देखते ही जाते है,कुछ तो कुटिल तरीके से मुस्कुरा भी रहे है,जैसे जाहिल हो,अरे उनको देखने के लिए मेरी बहन ही मिली है क्या आज,और भी तो बहुत सी लडकिया है बाज़ार में,और ये मै क्यूँ गलती महसूस कर रहा हूँ,आज तो मै किसी और लड़की
 
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ना तो लेखनी में समर्पण है,ना सही है कभी आह कोई,क्या लिख पाऊंगा मै,खुद के लिए,औरो के लिए!(एक विचार...., )

ना तो लेखनी में समर्पण है,ना सही है कभी आह कोई,क्या लिख पाऊंगा मै,खुद के लिए,औरो के लिए!बहा चला गया हर बार बहाव के साथ मै,बह गया गया कभी भाव के साथ,खींच-तान रही जारी सदा लगाव के साथ,रहा लुटता हर बार चुनाव के साथ!क्या उलझन ही जीवन है,या पकड़ ली है गलत
 
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संवेदना दिखाने को संवेदनहीन होते लोग,(कविता), (वयंग्य)

संवेदना दिखाने को संवेदनहीन होते लोग,दुसरो को जगाने के लिए अपने होश खोते लोग!हाँ मै अभी जिन्दा हूँ,बस यही बताने के लिएजिंदगी को ढोते लोग!ओरो की नींद उड़ा,खुद चैन से सोने के सपने संजोते लोग!भगवान् ने इंसान बनायवो ही अबहिन्दू-मुस्लिम होते लोग!हथियार उठा जो
 
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चलो माहौल कुछ शायराना हो जाए,दिल के जख्म दिखाने का कुछ तो बहाना हो जाए!

चलो माहौल कुछ शायराना हो जाए, दिल के जख्म दिखाने का कुछ तो बहाना हो जाए!तुम अपनी बात कहना हम अपनी कहेंगे,बीती बातो का फिर से दोहराना हो जाए!झेला तो बहुत है जिंदगी को सभी ने,आओ एक-दुसरे को समझाना हो जाए!संजोया है जो मर-जी कर हमने,देखने-दिखाने को
 
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आज आदमी की सोच इतनी बीमार क्यों है?(कविता), (वयंग्य)

कल जब आदरणीय गोदियाल जी की ये कविता वयंग्य  पढ़ी!तो शब्दों को तो जैसे कोई पगडण्डी मिल गयी हो!बढ़ चले उस ओर ही!राह में जितने भी "क्यों" मिले सब को एकत्रित कर ले आये मेरे पास!अब मुझ अज्ञानी के पास इनके उत्तर है नहीं!शायद आप के पास हो,यही सोच कर इन्हें
 
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पलके जो गीली है,उन ही आँखों में ये अंगार क्यों है?वयंग्य)

कल ही आदरणीय गोदियाल जी के वयंग्य कविता पढ़ी!शब्दों को तो जैसे कोई पगडण्डी मिल गयी हो!बढ़ चले उस ओर ही!राह में जितने भी "क्यों" मिले सब को एकत्रित कर ले आये मेरे पास!अब मुझ अज्ञानी के पास
 
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पता नहीं क्या चाहते है ये दुनियावाले मुझ से?(वयंग्यिका)

मेरा पिछली पोस्ट का अनुभव बड़ा ही ख़ास रहा!मुझे एहसास हुआ कि किते सज्जन मेरे हित में सोच रहे है!मै अकेला नहीं हूँ यहाँ!मुझे गिरता देख कितने ही सज्जन मुझे सम्हालने के लिए तत्पर दिखे!आज के समय मे अपनी इस अनन्त  व्यस्तता में से भी आप सब ने
 
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मै ब्लॉग-जगत से माफ़ी मांगता हूँ,यदि मेरी वजह से ब्लॉग्गिंग का स्तर गिरा है तो!लेकिन कोई आगे तो आये सही क्या है बताने के लिए....

अभी कुछ देर पहले ही ये क्यों  और  किसके  लिए  कर  रहे  है  ब्लॉग्गिंग  ब्लॉग पढ़ा!वहा जो पोस्ट दिखाई गयी है उन पोस्टो में से एक मेरी पोस्ट है!बाकी के बारे मै कुछ नहीं कह
 
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अब इतनी जिम्मेवारी तो हमारी बनती ही है कि हम सजग रहे!एक विचार....

क्या आप एक सामजिक आदमी और धार्मिक आदमी में फर्क महसूस करते है!मतलब धर्म और समाज कितने जुड़ा है एक-दुसरे से!क्या एक सामजिक आदमी धार्मिक हो सकता है या एक धार्मिक आदमी सामाजिक नहीं हो सकता!कई बार जो बाते समाज के हिसाब से हितकर होती है धर्म उसे
 
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मुस्लिम समाज को कलंकित करने वालो के लिए "एजाज़ भाई" ने पेश की सरहानीय मिसाल!और हाँ!इसे वो भी पढ़े जो ये कहते है की मुस्लिम समाज सिर्फ कट्टर लोगो का

कल मेरी पोस्ट पर जो सबसे पहले टिप्पणी आई,वो चौंकाने वाली थी!टिप्पणीकार थे श्रीमान एजाज इद्रेसी!ये वो ही एजाज भाई जान थे जो कुछ दिन पहले कह रहे थे कि "क्या आप के घर में सभी वेद,पुराण और धार्मिक ग्रन्थ
 
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देखना एक बार क्या ये सच्ची बात है?(वयंग्य),

देखना एक बार ये आँखों की चमक ये हाथो की पकड़ये होंठो पर मुस्कानक्या सच्ची बात है!या फिरमहज़ औपचारिकताओं की करामात है!ये फोटो अभी कुछ दिन पहले दैनिक  जागरण  में  छपा  था!देख कर कुछ अटपटा सा तो लगा,पर सोचा काश ये सब
 
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एक रेल 150 की.मी./घंटा की रफ़्तार से आ रही है, और दूसरी 123 की.मी../घंटा की रफ़्तार से जा रही है,तो बताओ मेरी उम्र कितनी?"(हास्य-वयंग्य)

बहुत  पुरानी  तो  बात  नहीं  है  खैर!फिर भी पुरानी तो है ही,काफी समय से सुनते आ रहे है!हमारे विद्यालय की दीवारे भी तब ज्यादा ऊँची नहीं होती थी!ये तो अब करनी पड़ी जब विद्यालयों की लड़कियों को
 
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कभी-कभी मै मजबूर हो जाता हूँ सोचने को कि,ऐसा भी हो सकता है क्या?(कविता),

मानवीय संवेदनाये कब-कहाँ क्या रूप धर ले इसे समझना अभी तक काफी मुश्किल रहा है,मेरे लिए तो कम से कम!नहीं मालूम खुद का भी तो औरो को तो क्या ख़ाक जान पाऊंगा मै!फिर भी शब्दों के सहारे कभी खुद को कभी किसी और को समझाने निकल पड़ता हूँ जी!या यूँ कहे कि शब्द खुद ही
 
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कृप्या सच्चे मुसलमान भाई इसे ना पढ़े! मै नहीं चाहता मेरी वजह से किसी मुस्लिम भाई के इस्लाम का उल्लंघन हो!लेकिन जवाब कौन देगा भाई?

मेरा इरादा कभी भी किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का कतई नहीं रहा है!बस विषय कई बार ऐसे होते है कि कई बार बहस चल ही पड़ती है!हो  सकता  है  कि मै गलत हूँ,तो सही बताने वालो का भी स्वागत है जी! "मुफ्ती अब्दुल कुदूस
 
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