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Kala Sampada Evam Vaichariki

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28 Apr 2010
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चित्रकार ए. रामचन्द्रन की कला: सौन्दर्य में बौद्धिकता की गुहार

चित्र में कथाओं का समावेषकृएक वर्णनात्मक अभिव्यक्ति का दर्षन हुआ, रवीन्द्र भवन कला दीर्घा में प्रदर्षित वढ़ेरा आर्ट गैलरी द्वारा आयोजित ए. रामचन्द्रन की एकल प्रदर्षनी के माध्यम से। चित्र हो या मूर्ति प्रदर्षित समस्त कृतियाँ परिवेष को अत्यन्त भावमय किये
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चित्रकार ए. रामचन्द्रन की कला : आधुनिकतावाद को खारिज करती एक सौन्दर्य दृष्टि

क्षणे-क्षणे यन्नवतामुपैति तदेवरूपं रमणीयतायाः ! – माघ रामचन्द्रन के चित्रों से गुज़रना भारतीय वाङ्मय से गुज़रने जैसा है। रामचन्द्रन के चित्रों को देखना भारतीयता का सिंहावलोकन करना है। रामचन्द्रन के चित्रों का अवलोकन भारतीय समाज के विकास का अवलोकन है।
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सम्पादकीय: खोई हुई पगडण्डियाँ

जैसे मनुष्य अधूरा है वैसे मनुष्य की कला अधूरी है। इस अधूरेपन का अहसास ही जीवन को सौन्दर्यमय और गतिशील बनाने में तत्पर रहता है। इस अधूरेपन को कभी मृत्यु अर्थ देती है, कभी जीवन की दूसरी आवश्यकताएँ। इन दोनों से बचकर मनुष्यता ने यदि कुछ हासिल किया है तो वह
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गगन गिल

एक अनवरत आत्मालाप का कवि : हरिभजन सिंह कवि हरिभजन सिंह की कविताएं
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कवि हरिभजन सिंह की कविताएं

-अनुवाद: गगन गिल अँधेरी रात में जिस हाथ ने सुलगता जिस्म तुम्हारा छू लिया है वही हाथ सुलगता है अग्नि के कुंड में से जो चुल्लू भरा था आचमन के लिए मैंने न उसे अचव ही सका न उसे गिरा ही सका पहली बार मेरे जिस्म की सारी दरारें बेबस लगती हैं कोई जल है जो टपकता
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कला दीर्घा

अंक मई-जून-2009 के कलाकार और उनकी कला कृतियाँ, आवरण चित्र : अर्पिता सिंह, ड्राइंग पी. मंसाराम एस्थेर वार्कोव अजित केसरी शरत चन्द्र देबू रवि नारायण नायक फ्रेदेरिक्क किएस्लेर जे. सुलतान अली पॉल क्ली खेमलता देवांगन ए. रूस्केंस अर्नावाज़ ड्राईवर पिराजी
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इस अगम परिसर में

पिछले दिनों महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादेमी ने सर्व भारतीय भाषा सम्मेलन, नागपुर में आयोजित किया था। यह दूसरा आयोजन था। पहला उन्होंने मुम्बई में किया था। मैंने भी उसमें शिरकत की थी। मुझे बहुतखुशी हुई। साहित्य अकादेमी, दिल्ली को छोड़कर शायद ही किसी
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Editorial 1

कवि-बिम्बों से ही समृद्ध होती है:- ‘एकला चलो’ वाले रबीन्द्रनाथ, ‘चीर डालो ओ प्रभु लालसा में भरा ये हृदय’ की अक्का महादेवी, ‘नाचत है कुलनासी’ वाली मीरा, ‘डुबोया मुझको होने ने’ वाले ग़ालिब, ‘अभी टुक रोते-रोते सो गया है’ वाले मीर-जिनकी क़ब्र आजहर महान कवि
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Editorial 2

पिछले दिनों महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादेमी ने सर्व भारतीय भाषा सम्मेलन, नागपुर में आयोजित किया था। यह दूसरा आयोजन था। पहला उन्होंने मुम्बई में किया था। मैंने भी उसमें शिरकत की थी। मुझे बहुतखुशी हुई। साहित्य अकादेमी, दिल्ली को छोड़कर शायद ही किसी
Dec 20 2009 03:03 PM
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कवि हरिभजन सिंह की कविताएं

दीवार: कहीं कोई दीवार उभर रही है चुपचाप, अचेत, अदृश्य देह को सहला-सहला जाती पौष-माघ की धूप जितना भी खटका नहीं उसका दबे पाँव चली आती मौत जितना भी सन्देह नहीं उस पर लेकिन कोई दीवार उभर रही है ज़रूर…. -अनुवाद: मनजीत कौर भाटिया दीवार कहीं कोई दीवार उभर
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एक अनवरत आत्मालाप का कवि : हरिभजन सिंह

-लेखक: गगन गिल हर महान कवि अन्ततः एक बिम्ब हो जाता है। काव्य-कर्म चेतन-अवचेतन के रूप में स्वयं को बिम्ब में बदलने देना है, जैसे मक्खी तितली में, मछली मेढक में बदल जाए। बड़ा कवि वह नहीं, जो हर विषय पर कविता लिख सकता हो, बल्कि वह है जो एक ही विषय पर बार-बार