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पुनश्च

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04 May 2010
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सांसों में बसी दुआएं

छीन करमेरे हिस्से कीमुट्ठी भर खुशी,खो दिया हैतुमने शायद,सकून आसमां भर।मेरी सांसों में अबबस गई हैं दुआएंकि तेरी आहों कातुझ पर नपड़ जाए असर।
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शुक्र है कि कम हो रहा फैमिली सीक्रेट का कहर

वे इंटरनेट पर चैट करती हैं। उनके कपड़े आधुनिक हैं। अंग्रेजी तो इनकी जबान से ऐसे निकलती है, जैसे मातृभाषा ही हो। विदेश जाना इनके लिए अपने शहर के किसी मार्केट जाने जैसा ही सहज है। आधुनिकता की चकाचौंध में इनकी छवि बेहद मोहक लगती है। पर क्या वाकई ये
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अजन्मी वह

शायद दोषअक्षरों का हैजो खुद कोसंजो नहीं पाएकोरे कागजों पर।या फिरकागजों ने हीकी है खताकि खुद में समेट नहीं पाएअक्षरों को।पर सच है किखड़े हैं दोनोंसमय के कटघरे मेंकि एक सुन्दर कृतिरह गई अजन्मी।
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आस जगे जब दिया जले

भोर की किरणें छितर जाएं,(सुबह ऑफिस के लिए निकलने का दृश्य)दोपहर यंू ही गुजर जाए,(ऑफिस में काम का दृश्य)तेरी गंध की जो याद आए,तनहाई पसर जाए।(लंच बॉक्स खोलते ही पत्नी की याद)मिलन हो जब शाम ढले।(शाम को दोनों अपने-अपने ऑफिस से निकल कर किसी मोड़ पर मिलते
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यह औरतों का काम क्या होता है

अभी दो दिन पहले ही ऑफिस में महिला दिवस स्पेशल अंक पर चर्चा हो रही थी। इस अंक को पूरे दैनिक भास्कर नेटवर्क की 18 महिलाएं तैयार कर रही हैं। इनमें दो हमारे सेंटर (जयपुर) की भी हैं। चर्चा के दौरान हमारी एक अन्य महिला सहकर्मी ने मजाकिया लहजे में कहा कि मुझे
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मासूम चाहत

सोते- सोते,कभी रोती है,कभी हंसती है।कच्चे दूध सी,मेरी मासूम चाहतमहकती है।कभी पेट पर,कभी छाती पर,गुदगुदाते हैंउसके नन्हें पांव।सच का सूरज,जब जलाता जिया,किलकारी बनकरमेरी मासूम चाहतबरसती है।कलेजे के टुकड़े को,कलेजे से बांधूं।आंखों के तारे को,आंखों से
Feb 16 2010 07:50 PM
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दो छोटी •विताएं

दो छोटी •विताएंए•बहुत पानी है तुम्हारे बिनाऔर बहुत प्यास भी।बहुत निराशा है तुम्हारे बिनाऔर बहुत आस भी।असमंजस और आश्वासनदोनों तुम्हारे बिनाऔर तुम्हारे साथ भी।दोखामोशी •ी भाषा मेंबैचेनी •ी लिपि मेंउस अजन्मे रिश्ते ने•ितनी चीखें मारी•ितने •िए सवालहाय! अरसे
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दो छोटी कविताएं

ए• ए•बहुत पानी है तुम्हारे बिना और बहुत प्यास भी। बहुत निराशा है तुम्हारे बिना और बहुत आस भी। असमंजस और आश्वासन दोनों तुम्हारे बिना और तुम्हारे साथ भी। दोखामोशी •ी भाषा मेंबैचेनी •ी लिपि मेंउस अजन्मे रिश्ते ने•ितनी चीखें मारी•ितने •िए सवालहाय! अरसे बाद
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यहां कहां सृजन

हो रही तब्दील पत्थर में,जिसमें न स्पन्दन है,और न सृजन!चिडिय़ों की चहचहाहटसी किलकारी भीपड़ोस के पेड़ों तक सीमित,सूना मेरा आंगन!चरम पर हैफूट कर बहने की चाहतसहूं असीम पीड़ा का सुखगंूजे उसका रुदन!कपोल फूटने का स्वप्न लिएझुकती हैं आंखें,पर वहां फिर न सृजनन
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बस नजरों भर आकाश

भगाने कोमन का अंधकार,काफी है एक टिमटिमाता दीया!पलटकर एक नजरदेखना उनकाजोड़ जाता है जिया! मु_ी भर सकून,नजरो भर आकाश,आंचल में लंू समेटबस इतना दो प्यार!टूटे नहीं लय-छंद,दास्तां नहीं यहहार-जीत की,चाहत बस इतनी सीजीवन मेंकविता रहे बरकरार!
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कुछ पाती एक शाम के नाम

हां, मैं उदास हंू,तन्हाइयों के पास हंू।दूर तकविस्तार है,अंतहीनआकार है,चांद-तारों बिनामैं आकाश हंू।हां, मैं उदास हंू।बंजरजमीन है,नभनीर हीन है,बिखरे बीज कामैं प्रयास हंू।हां, मैं उदास हंू।
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पुनश्च

आज अरसे बाद फिरपिघला कुछ मन मेंलाओ, कलम दोकविता उमड़ती है।भावों के बादलों सेआकुल-व्याकुल मन हैकोई स्नेहिल आंचल दोआंखें बरसती हैं।मन ही नहीं चाहता पढऩामन की मौन भाषाकौन सुनेगा इसकीआंखें कुछ कहती हैं।
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बनोगे मेरी अभिव्यक्ति

हां, तुम याद आओगेआंखों से बरस जाओगे।जब तपस सी होगी उलझनझुलसने लगेगा फसल मनहर्षाने को कण-कणबदरी बन कर छा जाओगेहां, तुम याद आओगे।लगने लगेगी लंबी रातअंधकार देगा सतत आघातलाने का स्वर्णिम प्रभातसूरज-सा तप जाओगेहां, तुम याद आओगे।जब जन्म लेगी संवेदना
Jan 24 2010 06:05 PM
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पुनश्च

आज फिर हो गयीजिंदगी से मुलाकातफिज़ाओं ने हाल पूछा लम्हों ने की बात!गुनगुनी धूप ने jee bher निहारा मुझेछू कर मेरा बदन हवा ने सराहा मुझे उद्वेलित हुई भावना पकड़ कर मेरा हाथ!आज फिर हो गयी ज़िन्दगी से मुलाकात! बादलों की ओट सेछिप-छिप कर झांकता,बावरा है सूरज
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पुनश्च

रिअलिटी शो सच का सामना में शामिल एक महिला प्रतिभागी परहाँ, की है प्रेमी से तुमनेथोड़ी सी बेवफाईमाँ-बाप से झूठ भी बोली होकिसी की चोट पर ख़ुशी होती हैयह राज भी तुम्ही खोली हो!हथेली रंग ली हैसपने चुराएहैसहेली की आंसू सेकाजल भी सजाए हैं !पर इन आँखों से अब
Dec 31 2009 02:30 PM
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कुछ बातें लहरों की

ह्रदय समुद्र कीभाव लहरेंलौट आती हैंबार-बारक्या किनारे का पत्थर हो तुम?चलती आयी हूँ बहुत दूर सेपड़ गए छले हायपाँव मेंक्या बिन मंजिल की डगर हो तुम?देती रही सदाएं gunjee समग्र दिशाएँसिहर उठी फिजाएं दिया क्यों नहीं प्रत्युत्तरअस्तित्व में अगर हो तुम?२आखिर कर
Dec 29 2009 08:40 PM
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पुनश्च

प्रतीक्षारत थीसदियों से पत्थेर के अंतस में,तुम झरना बनकर आयेफूटकर मैं बहीबन लहर लहर।कालजयी रात थी,हुई अनोखी बात थी,स्मरणीय इतिहास बना वह सुनहरा पहर।हो तुझमें समाहितअंश-अंश आह्लादित ,मंजिल के संग-संगहुआ प्रारंभ सफ़र.
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पुनश्च

तुम ताज महल होदर्शनीय, मुग्धेय,शांतिदातामुखरित, पवित्र,प्रीतिगाथापर मेरी भावना से अंजान अलग होतुम ताजमहल हो।करती तुझसे बेहद प्यार तुम आकर्षण की मूर्ति साकार तुम मेरा उत्साह,मेरी चहल-पहल होतुम ताज महल हो,तुम ताज महल हो।tउम्हर सामीप्य देता सकूँसामर्थ्य
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पुनश्च

सो गयी प्रतीक्षा थक कर तब गुनगुनाते तुम आयेझुलस बिखर गए आस सुमन तब बदरी बन तुम छायेयह महज संयोग नहीं प्रिय, हूँ सदियों से शापित मैंचाह जिस यज्ञ से कुछ पाना बन शर्मिष्ठा हुई अर्पित मैं
टैग: prateeksha
Dec 27 2009 03:23 PM
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शब्दॊं के सफर में आज से आप सभी के साथ

शब्दॊं के सफर में आज से आप सभी के साथ मैं भी
Dec 20 2009 05:37 PM