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15 Jun 2010
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बार-गर्ल.(शाब्दिक कोलाज)

ग़सक़* से ग़लस* तक का परिदृश्य...........।जाड़ों की बारिश मेंबार के निबिड़ अँधेरे मेंपछीते से,घुसते ही सड़ांध के झिझोड़ते हुए
 
Amitraghat
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कबाड़ी वाला

कोलतार-सी धधकती देह पर ठुकी-झाँकती दो पनियल आँखें सूखते होंठ-कर्रे बाल लिये अधखुले धूल से सने पपोटे ताकता है वह कभी आकाश तो कभी घास के विराट मैदान-सा रीता ठेला और लगाता है ज़ोर-की आवाज़ ”पेप्परला-कोप्पीला-ताबला-पेचपुर्ज़ा-खाली बोत्तल-कबाड़ला..” और हाँफ
 
Amitraghat
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अपनी परछाई

उस रोज़ भीड़ जमा थी रईस-बुर्जुआ-टुच्चे-शातिर सभी तो मना कर रहे थे जेस्चर भी उनका यही दर्शा रहा था; ”उसके जुड़वाँ हुए हैं…….., वह वृक्ष-तल-वासिनी मुक्तिबोध की वही पगली नायिका वहीं अधजले-फिके-कण्डे और राख, नहीं थी अब वह एकाकी, चिपकी जिससे दो नन्ही-नन्ही
 
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अहा !

अहा ! कितनी प्यारी–सी लड़कीजो मिली थी मुझे घूरे परमृत-अजन्मीपर फिर भी मैंनेउसे उठाया औरतब आँख खोल वह मुस्काईजिसमें थीं अनंत सम्भावनाएँ….मैंने चूम ली उसकीअर्ध विकसित नाक और ली ढेर सारी मुफ़त की मिठ्ठियाँउसने पकड़ लिया मेरा चश्मा और खिलखिला उठी,लोग अब
 
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चूहा मेरी बहन और रेटकिल

हद्द हो गई ! अब जा के मिला है जेब में, वो बित्ते-भर का चूहा जिसे कत्ल कर दिया था बवजह कई बरस पहले, मॉरटिन रेटकिल रख के ”नहीं, ये विज्ञापन कतई नहीं है बल्कि ज़रिया था मुक्ति का..........“ पर फिर भी चूहा तो मिला है ! और मारे बू के छूट रही हैं उबकाईयां जबकि
 
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पर

बारिश से भीगीउस शाम कोदेखा थाबुर्क़े के भीतरकॉरसेट पहने उसबुर्क़ानशीं कोऔर जाने किस आलम मेंआगे बढ़करछोटी-सी बिन्दी लगा दी थीउस शफ़्फ़ाफ़ चेहरे परवो स्तब्धदेखती ही रहीऔर चली गईफिर मिलने का वादा करके(अगले दिन)-वो ही शाम  थी-वो ही बारिश-वो ही
 
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लाश

जबकि दोपहर बेहद दिलचस्प है..........। और हम हस्बे मामूल* डर रहे हैं लाश से खासतौर पर जब हमने खुद अपने हाथों से मारा हो..........” हमें लगता है कि वह मुरदा कहीं आँखें न खोल ले लिहाज़ा कई घण्टों तक हाथ में चाकू लिये या कुछ भी उसका इंतज़ार करते हैं, कि कब
 
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कुंता

अबजबकि छोड़ आया हूँ  मैंकुंता को बरघाट*और भूल चुका हूँउसका सादा-सा चेहरादो ही दिनों में,तब भी,क्यूँ कर रहा हूँ उस दिन का विश्लेषणअपने मित्र के साथ उससूने से पार्क मेंअपरिचित मुर्गाबियाँ देखते हुएशाम कोक्या इसलिये किपूछ रहा है वहउस रात की शुरूआत जब
 
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हेल्मेट

वह रक्षाबन्धन के दिन कुछ किलो मीटर की दूरी पर रह रही बहन को लिवाकर बाईक से लौट रहा था उधर तेजी से आते ट्रक ने उसे टक्कर मार दी भाई वहीं धाराशायी हो गया बाजू मे उसके लटका स्वस्थ हेल्मेट रह गया, तभी घिर आए तमाशबीनो मे से कुछ का मन  भाई को अस्पताल
 
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वैश्विक गिरोह्

वैश्विक होते संसार में हर ओर अतृप्त इच्छा-लालसा-कुंठाओं की जलती लाशों से उठती लपलपाती झंझार से भागता हूँ विशून्य में थकहार ढूँढ़ता हूँ पेशल रात को उसकी अंकोर में सिर रख सो जाना चाहता हूँ उमगती भोर तक; कि तभी ठकमुर्री से देखता हूँ दिगंत-व्याप्त-रात की
 
Amitraghat
Feb 22 2010 06:36 PM
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शलाम शाब

धुँधलके को तोडती हुई वह आवाज़ ”शलाम शाब” ”दीवाली का इनाम शाब” और सस्मित आ खड़ा हुआ फिर सलाम ठोकता मालदार महाशयों के बीच जी रहा हज़ारों किमी दूर थानकों से अभिनिष्क्रमित तथागत की जन्म स्थली का वह वामन युवा चुपचाप देखता कई दिनों का रखा उपयोगितावादी पड़ोस का
 
Amitraghat
Feb 12 2010 06:43 PM
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शुरूआत

जीवन से ऊबकर व्यवस्था से निराश चट्टान के कगर पर खड़ा सामने वितत-विशाल-औंडा-ताल पूछा स्वयं से,”सोच ले फिर से, क्या मरना ज़रूरी है?” ”हाँ,” -दू टूक-सा दिया मैंने उत्तर और कूद पड़ा झट से; तीखी थी छलाँग, ताल ने भी नहीं मचाया शोर ना ही कहीं उठी हिलोर व्यवस्था
 
Amitraghat
Feb 11 2010 05:24 PM
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मनोभिलाष

सवेरे का वक्त था, आसमान कुछ आर्द्र, हल्का नीला हरित पत्तियों पर ठिठकी नन्हीं-नन्हीं जल की कुछ बूँदें, प्रकृति की सुघड़-स्वच्छ घटा में बारिश की आड़ी-तिरछी-फुहार मदोन्माद से बहता खुला-खुला-सा निरंकुश नाला सुदूर पूरबी क्षितिज से झाँकते धुँधले नीले पहाड़, तब
 
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हम्माल

हम्माल उस सियाले में अकस्मात जंगल की हवा में समाहित वनद्रुमों की मदनीय सुवास से नहाई शाम में घर लौटे धुलिया-मिटिया,धुरिया-धुरंग लगढग नग्न लीतड़ा पहने युगों से विशाल भार को काँधें लिये आदिम रहस से भरे अंतस की पहरेदारी करता वह हरहठ युवा हम्माल जिसकी सुदृढ़
 
Amitraghat
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माँ के बारे मे

माँ के बारे मे जाने कैसे??? उन्हें पता चल गया कि मैं एक कवि भी हूँ आदमी होने के अलावा और फिर तब, -नक्सलियों ने -फिदायीनों ने -आत्मघातियों ने सबने समवेत होकर मोबाइल पर मैसेज किया कि मुझे कविता सुनानी है उनके बीच -प्रेमभरी -वासनामयी जिसमे ज़िक्र हो
 
Amitraghat
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मुर्गा

मुर्गाहर एक जन्मदिन पर मेरेमुर्गा कटता है।उसकी गर्दन परआहिस्ता-आहिस्ता फिरती छुरीको महसूस किया जाता है अक्सरखाना खाने के फौरन बादऔर मर्सिया गाता है पूरा परिवार;फिर उसकी चबी हड्डियों को बचे चावल को औरगंधाती प्याज को फेंक देते हैंपालतू कुत्ते के सामने
 
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तरुणाई के पार

उसतरूणाई के अंतिम पहरजब मैने उसेठठाते-उछलते-कूदते-धप-धड़ामगिरते उठते देखा थामगरसरलता के अवसानकी उस घड़ीके साथ हीवह लड़का अब बड़ा-सा दिखता हैशबल पृष्ठों से भरी मेगज़िन को वहबेहिचक पीछे से पलटसस्मित देखता है !
 
Amitraghat
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महंत (लुप्त होते देहाती शब्दों की नाट्य कविता)

जाने कऊन महोत्सव में मदभरी फगुनहट मेंढाक तले आ जुटे अहा! देखो,कुल-छोटे-बड़े-पदहैसियतानुसार- क्रमबद्ध खुरदुरे-ठठाते-चुप्पे-चकमे-बदमस्त बोली कसते भोले-भाले,हज्जार-पानसो-सौ-पच्चास-बीस-दस-पाँच-दोऔर एक के नोट और संग कछु कलदार फिर आगे बढ़-बढ़ हुई जोहारकि खिंच गया
 
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सभ्य वैश्याएं

सभ्य वेश्याँएछोटे-छोटे नीची छतों के घरजहाँ हर घर एक चकला घरजिनकी अपनी ही एक गाथाजिनका अतीत भी और वर्तमान और अनिश्चित सा भविष्यजिनकी एक सी ही तस्वीरजहाँ गन्दी-गन्दी टेढ़ी मेड़ी अनंत गलियांसाय में जिनकी कुकुरमुत्तों सी उगी व तनी दारू की भट्टियाँआसपास गंधाते
 
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सेल्समेन

सेल्समेनघास के विराट मैदानों की तरहफैली सर्द रात के सन्नाटेको चीरती है- जैसे लकडहारे चीरतें हैं लकड़ी-उसकी माँ की चीखऔर हम सब बड़ जातें हैंपोस्ट - मार्टम कक्ष मैंमेरे सामने ही होता है शव विच्छेदनऔर निकलती है उसमें से-ढेरों मन गालियाँ-दुस्तर लक्ष्य-अंतहीन
 
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लम्बोदर

लम्बोदरगिरती महीन जलराशि - मध्यउस लम्बमान ताल उपात से सटेसंकुल वृक्षों की लसस डालियोंके पत्र्पुन्ज से आवृत स्थल परकार स्कूटर ट्रक ट्रालियों मैंविराजित - विसर्जन के लिएबाट जोहते लम्बोदर असंख्य - जनों के संगअकस्मातचीरकरवह पगलाई स्त्रीताल की अथाह गहराई मे
 
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राजा बुश

राजा बुशहतप्रभ है वहपश्चाताप -हीन व्यवस्थित अपराधीरजा बुश किकैसे चल सकता है मुकदमा उन परक्या राज प्रसाद से पाई गईएक मुर्गी के पर चबी हड्डियाँ और खून के छींटें सेमुकदमा बनता है ?फ़िर भी राजा बुश पर चला---मुर्गी को क्या आपने काटा था राजा बुशनहीं मरोड़ा था
 
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माँ

रोज दरीचे खोलकरदेखता हूँ तो नजर आता है एक अक्स उमुमनबाहर आ कर पाता हूँबूढ़ी तुलसी की टकटकी बांधेस्नेहसिक्त आँखेऔर डाल देता हूँएक लोटा रस्मी पानीमुस्कराती है वह तब भीछूता हूँ जब मै उसकेपियराते पत्तेबर्गरेज अभी दूर है चश्मा भूल आया हूँ मेज पर वो रखा है मैं
 
Amitraghat
Feb 26 2009 07:42 AM
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सुंदरतम सजनी

स्मृति-प्रिय सुंदरतम सजनी !आया जब से तुम से मिल कर ,ले - ले चुम्बन आलिंगन भर ,नहीं भूलता मैं वह रजनी -आच्छादित घन घोर घटा मैं,पानी बरस रहा था रिमझिम ,चकमक चमके विधुत-स्वर्णिम ,अग-जग था अचित निद्रा मैं ;आकर चुपके से पा अवसर ,तुमने कितने धीरे - धीरे , हाथ
 
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आत्मघाती का सच

उस औघड़ शाम में जाने किस खंभार में तार पर बैठी हल्ला करती लाल चिडिया और आसमान पर टंगे - नीचे गिरते रक्तिम बादल और अरे हाँ !था तो मैं भी वहीं बूढ़े बोहड़ के नीचे उस जन संकुल स्थल पर जब हुआ था स्फोट और उड़ गए थे - सत्ताधीशों लोलुपों के - कुछ नेताओं के -
 
Amitraghat
Feb 06 2009 09:56 AM
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सूना जीवन

रोज़ के मानिंद आज फ़िर पसरा सन्नाटा है सुनाई देता है बस सन्नाटे का अट्टाहास दिखाई देता है तो बस गहन अन्धकार खिलखिला कर हँसी थी कभी किसी सदी मेरा भी घर था कभी जहाँ एकांत ढूंढे नहीं मिलता था खुशियों का सैलाब बहा करता था घर वही है समाज लोग वही हैं पर सामाजिक
 
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काफिर

उनकी नजरों मैं हैं हम इस कदर काफिरख्वाब मैं भी नजरआज़ाएं तो हो जातें हैं नींद मैं गाफिल
 
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मेरी बहन

दरवाजे की आड़ खड़ी ,लिए हाथ मैं थाली, था जिसमे चावल काली मूंछ ; सुन रही थी बेटे को कहते बहन की चोटी को गाय की पूँछ , मंद मंद मुस्करा , कर रही थी झूठा गुस्सा "मारूंगी चपत तुझे , मत सता बहन को अपनी कुछ दिन का है जो हिस्सा " सुन माँ की बात लजाई युवती ; कर
 
Amitraghat
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पैसेंजर

छूटते पर्जन्यवन-वनांतरडांडे पर लगे झुरमुटआड़े - तिरछे खजूर के सरल दरख्तसमाधिस्थ - झुटुंग - बोहड़ केविलुप्त प्राय - प्रसृत - बलस्थ वृक्ष,मेघो के राज्य में सिरोन्नत किएविस्मयी - विमुग्धकारी - गिरिशिखर उटज ; छोटे - छोटे स्टेशन वित्त - निरापद खेत - खलिहान
 
Amitraghat
Oct 04 2008 11:40 AM
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मेरी बेटी

आसढ़ का दिन था चारों और फैले बादलों के थानऔर बारिश की गिरती रिमझिम फुहार ओसारे में खड़ीउत्फुल्ल थी लली माँ गई थी बाजार खिन में लिया उसने ठानचुन्नी को फैंट बाँहों को चढ़ाया जैसे तैसे साना आटा टूटे कुछ नाखून हुई दुखी पर फ़िर से काम में वह जुटीपरात में जमाया
 
Amitraghat
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माँ

जाड़े की रात्री मैं ठिठुरती - कांपती सूखे पत्र - सी हिलती , उकडूं बैठनिहारती छप्पर को , कहाँ से आती ये हवा सोचती ;पर न दिखा सामने पटविहीन पट जहाँ से प्रवेश करती बेधड़क , निर्लज्ज हवा विशाल अट्टालिकाओं के प्रशस्त उष्ण प्रकोष्ठों से पिटी दिखा रही दादागिरी
 
Amitraghat
Sep 26 2008 12:09 PM
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परिवर्तन

ज्ञात नहीं क्यूँ कर भूंकते हैंविशाल अट्टालिकाओं में विचरते श्वान दलबनताई - सी निस्तब्धता में पैहमघर लौटते अथक - निरंतर मेहनत करकेथके हरे शराबी पर जिसको नहीं मिलीआज तय की गई उज्रतऔर जो आगे चलकर लड़खड़ा धड़ाम सा गिर पड़ता है तब भी उस अर्ध चेतना में संग्यापराध
 
Amitraghat
Sep 17 2008 05:59 PM