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विनय पत्रिका

http://binaypatrika.blogspot.com
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01 Apr 2010
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"हम तो चलते हैं लो ख़ुदा हाफ़िज़..."

जीवन चलता रहता है। यही शाश्वत सच है। निर्मल बने रहने के लिए चलना पड़ेगा। बहता पानी निर्मला...। मुझे इतिहास की किताबें बहुत अच्छी लगती हैं। खासतौर पर उनके वे पात्र, जो देश व समाज की बनायी सीमाओं की बाधा को लांघकर लंबे सफर पर चलते रहे। अनजाने देश पहुंचे।
 
विनय मिश्र
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रोशनी की तलाश में बुझ गयी जीवन ज्योति

वे सभी गरीब ग्रामीण थे। उनकी आंखों में मोतियाबिंद ने अंधेरा भर दिया था। आपरेशन का खर्च नहीं उठा सकते थे, इसलिए निशुल्क आपरेशन शिविर की खबर पाकर बलांगीर (ओडिशा का एक जिला) जा रहे थे। रास्ते में एक गैस टैंकर ने उनकी टाटा मैजिक को सामने से टक्कर मार दी।
 
विनय मिश्र
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लो, आ ही गया...

उस दिन एक परिचित संपादक जी से बात हो रही थी। उन्होंने अपने अखबार का ई-पेपर संस्करण देखने को कहा। कुछ विशेष था। और तभी अखबार के मुखपृष्ठ पर लहलहाते सरसों के खेत देखकर अपना बसंत याद आ गया।आज भी गंगा के किनारे जाता हूं, तो विद्यापति याद आते हैं। बड़ सुख सार
 
विनय मिश्र
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लाखों समर्थकों के ज्योति बाबू... और लाखों विरोधियों के भी

बचपन में जब हम कलकत्ता से गांव जाते, तो बाबा-दादा और चाचा के उम्र के लोग ज्योति बाबू के बारे में पूछते थे। आजकल कुछ लोग बंगाल की चर्चा चलने पर ममता बनर्जी के बारे में पूछते हैं। बिहार के सुदूर गांव में उन दिनों अखबार एक दिन बाद पहुंचता था। न जाने कितने
 
विनय मिश्र
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सो लिखूंगा।

मैंने भी ब्लॉग बना लिया है। और उसे थोड़ा सुंदर बनाने के लिए दिन-रात मेहनत की। दिन-रात इस लिए की सब खुद करना था। ऑप्शन के बारे में जानकारी कम। जो करना था, सीख-समझ कर। सो खूब मेहनत की। ब्लॉग बन कर तैयार हो गया, तो सोचा लिखा जाये। लिखने की तैयारी शुरू की।
 
विनय मिश्र
Jan 15 2010 02:42 PM