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उर्दू से हिंदी

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05 Jun 2010
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जनाब "सरवर" की एक ग़ज़ल :क्या तमाशा देखिये .....

ग़ज़ल : क्या तमाशा देखिये ..... क्या तमाशा देखिए तहसील-ए-लाहासिल में है एक दुनिया का मज़ा दुनिया-ए-आब--ओ-गिल में है देख ये जज़्ब-ए-मुहब्बत का करिश्मा तो नहीं कल जो तेरे दिल में था वो आज मेरे दिल में है मैं भला किस से कहूँ ,क्या क्या कहूँ ,कैसे कहूँ ? मौत से
 
आनन्द पाठक
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जनाब 'सरवर' की दो ग़ज़ल

ग़ज़ल : इक ज़रा सी देर को ...... इक ज़रा सी देर को नज़रों में आने के लिए तुम ने ’सरवर’ किस क़दर एहसान ज़माने के लिए ! इक तमन्ना, एक हसरत ,इक उम्मीद ,इक आरज़ू है अगर कुछ तो यही है सर छुपाने के लिए काम क्या आया दिल-ए-मुज़्तर मक़ाम-ए-ज़ीस्त में एक दुनिया आ गई बातें
 
आनन्द पाठक
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जनाब "सरवर" की एक ग़ज़ल : हम हुए गर्दिश-ए-दौरां.....

हम हुए गर्दिश-ए-दौरां से परेशां क्या क्या ! क्या था अफ़्साना-ए-जां और थे उन्वां क्या क्या ! हर नफ़स इक नया अफ़्साना सुना कर गुज़रा दिल पे फिर बीत गयी शाम-ए-ग़रीबां क्या क्या ! तेरे आवारा कहाँ जायें किसे अपना कहें ? तुझ से उम्मीद थी ऐ शहर-ए-निगारां क्या क्या
 
आनन्द पाठक
May 15 2010 08:08 PM
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जनाब "सरवर" की एक ग़ज़ल : वो तसव्वुर में ...

वो तसव्वुर में भी मुझ पर मेहरबां होता नहीं रब्त आख़िर क्यों हमारे दरमियां होता नहीं ? दिल पे जो गुज़रे है नज़रों से अयां होता नहीं हाये क्या कीजिए कि क़िस्सा ये बयां होता नहीं आशिक़ी में मातम-ए-आशुफ़्तगां होता नहीं ? आप ही कह दें कि ऐसा कब कहाँ होता नहीं? दिल
 
आनन्द पाठक
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जनाब सरवर की एक गज़ल : बयान-ए-हुस्न-ओ-शबाब

ग़ज़ल :बयान-ए-हुस्न..... बयान-ए-हुस्न-ओ-शबाब होगा तो फिर न क्यों इज़्तिराब होगा ? ख़बर न थी अपनी जुस्तजू में हिजाब-अन्दर-हिजाब होगा ! कहा करे मुझको लाख दुनिया सुकूत मेरा जवाब होगा किसे ख़बर थी दम-ए-शिकायत वो इस तरह आब-आब होगा ? मैं ख़ुद में रह रह कर झाँकता
 
आनन्द पाठक
May 02 2010 12:21 PM
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जनाब सरवर की दो मज़ीद ग़ज़लें........

ग़ज़ल : बेखु़दी आ गई लेकर कहाँ....... बेखु़दी आ गई लेकर कहाँ ऐ यार मुझे ? कर गई अपनी हक़ीक़त से ख़बरदार मुझे ख़ूब कटती है जो मिल बैठे हैं दीवाने दो उसको शमशीर मिली ,जुर्रत-ए-इज़हार मुझे तेरी महफ़िल की फ़ुसूँ-साज़ियाँ अल्लाह!अल्लाह ! खेंच कर ले गई फिर लज़्ज़त-ए-आज़ार
 
आनन्द पाठक
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जनाब सरवर की दो गज़लें

गज़ल : न सोज़ आह में मिरी.............. न सोज़ आह में मिरी, न साज़ है दिल में मैं लाऊँ कौन सी सौग़ात तेरी महफ़िल में ? मैं आईना हूँ कि आईना-रू नहीं मालूम ये वक़्त आया है इस आशिक़ी की मंज़िल में ख़ुदी कहूँ कि इसे बेख़ुदी बताओ तुम मैं अपने आप चला आया कू-ए-क़ातिल में
 
आनन्द पाठक
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एक गज़ल : उम्मीद-ओ-आरज़ू मिरी.......

उम्मीद-ओ-आरज़ू मिरी दमसाज़ बन गई इक सोज़-ए-आशिक़ी बनी,इक साज़ बन गई ! सौदा न कम हुआ सर-ए-मक़्सूद-ए-आशिक़ी क्या इन्तिहाये-आरज़ू आग़ाज़ बन गई ? यारों !ये क्या हुआ कि सर-ए-बज़्म-ए-ज़िन्दगी? जो भी ग़ज़ल कही ,शरार-अन्दाज़ बन गई ! कैसी तलाश ,किस की तमन्ना,कहाँ की दीद ख़ुद
 
आनन्द पाठक
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वाकियाती शायरी क्या है........किस्त ३(अंतिम किस्त)

[इस आलेख के २-भाग आप इसी ब्लोग पर पढ़ चुकें हैं ,प्रस्तुत है इस लेख की अन्तिम कड़ी)(ब) इबारत क्या ! इशारत क्या ! अदा क्या !मिर्ज़ा ग़ालिब का शे’र है बला-ए-जां है उसकी हर बात इबारत क्या ! इशारत क्या ! अदा क्या !अब ज़रा ये अश’आर देखिये.इन पर तब्सिरा
 
आनन्द पाठक
Apr 17 2010 08:15 PM
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ग़ज़ल : मुहब्बत आशना हो कर.......

मुहब्बत आशना हो कर वफ़ा ना-आशना होना इसी को तो नहीं कहते कहीं काफ़िर-अदा होना ? ये तपती दोपहर में मुझसे साए का जुदा होना ज़ियादा इस से क्या होगा भला बे-आसरा होना ? यकीं आ ही गया हमको तुम्हारी बे-नियाज़ी से बुज़र्गो से सुना था यूँ तो बन्दों का खु़दा होना ! न
 
आनन्द पाठक
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वाक़ियाती शायरी क्या है ..............क़िस्त २

[पिछली क़िस्त-१ में आप ने पढ़ा कि ग़ज़लों की चार तक़्सीम की जा सकती है जैसे हस्तीनी ,शंखिनी ,चतुरनी और पद्दमिनी .इनके बारें में एक मुख़्तसर ताअर्रुफ़ भी आप ने पढ़ा .अब आप आगे पढ़ें.रवायती शायर और रसूमियाती शायरी क्या है ] इस अजीब-ओ-ग़रीब तहरीर से कम से कम ये
 
आनन्द पाठक
Apr 08 2010 09:11 PM
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एक मजमून :"वाक़ियाती शायरी क्या है ?

"वाक़ियाती शायरी क्या है ? (यथार्थवादी शायरी क्या है?) ----सरवर आलम राज़ ’सरवर’[ यह लेख रोमन उर्दू में है जिस का हिन्दी रुपान्तरण यहाँ दिया जा रहा है जिस से हिन्दी के पाठकगण भी आनन्द उठा सकें] तम्हीद (भूमिका) कुछ अर्सा कब्ल (पहले) इन्टर्नेट पर :वाक़ियाती
 
आनन्द पाठक
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ग़ज़ल :हज़ारों लब से आती है सदा ये .

ग़ज़ल :हज़ारों लब से आती है सदा ये ....[यह ग़ज़ल जनाब पी०के०स्वामी ,नई दिल्ली ने मोहतरम शायर जनाब "सरवर" की शान में उनके जन्म दिन (१६-मार्च) पर कही है यह ग़ज़ल इस ब्लाग पे इस मक़्सद से लगा रहा हूँ कि अहलेकारीं भी इस ग़ज़ल की ख़्सूसियत और नाज़ुक ख़याली से लुत्फ़अंदोज़
 
आनन्द पाठक
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जनाब "सरवर" की दो गज़लें

ग़ज़ल : खेल इक बन गया ज़माने का ...... खेल इक बन गया ज़माने का तज़करा मेरे आने जाने का ज़िन्दगी ले रही है हमसे हिसाब क़तरे क़तरे का ,दाने दाने का क्या बताए वो हाल-ए-दिल अपना "जिस के दिल में हो ग़म ज़माने का" हम इधर बे-नियाज़-ए-सूद-ओ-ज़ियाँ शौक़ उधर तुम को आज़माने का
 
आनन्द पाठक
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जनाब "सरवर" की दो गज़लें

एक ग़ज़ल : डूबता है दिल कलेजा मुँह को आया जाए है...... डूबता है दिल कलेजा मुँह को आया जाए है हाय! यह कैसी क़ियामत याद तेरी ढाए है ! इश्क़ की यह ख़ुद फ़रेबी!अल-अमान-ओ-अल हफ़ीज़ ! जान कर वरना भला खु़द कौन धोखा खाए है आँख नम है ,दिल फ़सुर्दा है ,जिगर आशुफ़्ता खू लाख
 
आनन्द पाठक
Mar 08 2010 03:20 PM
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जनाब सरवर की एक ग़ज़ल : ग़ज़ल 13

ग़ज़ल १३ शब-ए-उम्मीद है ,सीने में दिल मचलता है हमारी शाम-ए-सुख़न का चिराग़ जलता है न आज का है भरोसा ,न ही ख़बर कल की ज़माना रोज़ नयी करवटें बदलता है अजीब चीज़ है दिल का मुआमला यारों ! सम्भालो लाख, मगर ये कहाँ सम्भलता है न तेरी दोस्ती अच्छी ,न दुश्मनी अच्छी न
 
आनन्द पाठक
Feb 21 2010 07:23 PM
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जनाब सरवर की एक ग़ज़ल : ग़ज़ल 12

ग़ज़ल 12 ज़माने की अदा है काफ़िराना जुदा मेरा है तर्ज़-ए-आशिक़ाना तिरा ज़ौक़-ए-तलब ना-मेह्रिमाना न आह-ए-सुब्ह ने सोज़-ए-शबाना शबाब-ओ-शे’र-ओ-सेहबाये-मुहब्बत बहोत याद आये है गुज़रा ज़माना’ चे निस्बत ख़ाक रा बाआलम-ए-पाक ? कहाँ मैं और कहाँ वो आस्ताना बहुत नाज़ुक है हर
 
आनन्द पाठक
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जनाब सरवर की एक ग़ज़ल : ग़ज़ल 11

ग़ज़ल 11 दिल पे गुज़री है जो बता ही दे ! दास्ताँ अब उसे सुना ही दे ! मेरे हक़ में दुआ नहीं, न सही किसी हीले से बददुआ ही दे ! खो न जाए कहीं मिरी पहचान तू वफ़ा का सिला जफ़ा ही दे ! शामे-फ़ुरक़त की तब सहर होगी हुस्न जब इश्क़ की गवाही दे बे-ज़बानी मिरी जुबाँ है अब
 
आनन्द पाठक
Feb 13 2010 07:04 PM
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जनाब सरवर की ग़ज़ल : 10

ग़ज़ल १० कहाँ से आ गए तुम को न जाने बहाने और फ़िर ऐसे बहाने ! कोई यह बात माने न माने मुझे धोखा दिया मेरे ख़ुदा ने ! ज़माना क्या बहुत काफी नहीं था ? जो तुम आए हो मुझको आज़माने ! लबों पर मुह्र-ए-ख़ामोशी लगी है दिलों में बन्द हैं कितने फ़साने ! न मौत अपनी न अपनी
 
आनन्द पाठक
Feb 09 2010 07:17 PM
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दो मुख्तलिफ गज़लें

ग़ज़ल ०९ जब नाम तिरा सूझे ,जब ध्यान तिरा आवे इक ग़म तिरे मजनू की ज़ंजीर हिला जावे ! सब की तो सुनूँ लोहू ये आँख न टपकावे कीधर से कोई ऐसा दिल और जिगर लावे ! जी को न लगाना तुम ,इक आन किसू से भी सब हुस्न के धोखे हैं ,सब इश्क़ के बहलावे ! ख़ुद अपना नाविश्ता है
 
आनन्द पाठक
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शायरी में ’ज़म(खोट) का पहलू’-----------कड़ी ३(अंतिम )

[नोट : कड़ी १ और कड़ी २ नीचे इसी ब्लॉग पर दर्ज-ए-जेल है ] अब दो मिसाल और देखिये जिनमें यह पहलू नुमाया नहीं है.(२) मिसाल -२ वालिद मरहूम राज़ चांदपुरी साहब ने अपनी एक किताब ’दास्तान-ए-चांद’ कानपुर (हिन्दुस्तान) में मन्क्कुरा (सन) १९२३ के एक मुशायरे का तज़करा
 
आनन्द पाठक
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मज़मून : शायरी में ’ज़म(खोट) का पहलू’-----------कड़ी २

शायरी में ’ज़म(खोट) का पहलू’-----------कड़ी २ ---सरवर आलम राज़ ’सरवर’(नोट : स्रोत -यह लेख इन्टरनेट साईट "उर्दू अन्ज़ुमन.काम से लिया गया है।जो उर्दू स्क्रिप्ट में लिखा हुआ है इसके मूल लेखक जनाब ’सरवर आलम राज़ ’सरवर’ साहिब है । यहाँ पर मैने हिंदीदाँ दोस्तों की
 
आनन्द पाठक
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एक मज़मून : शायरी में ’ज़म(खोट) का पहलू’-----------कड़ी १

शायरी में ’ज़म(खोट) का पहलू’-----------कड़ी १---सरवर आलम राज़ ’सरवर’(नोट : स्रोत -यह लेख इन्टरनेट साईट "उर्दू अन्ज़ुमन.काम से लिया गया है।जो उर्दू स्क्रिप्ट में लिखा हुआ है इसके मूल लेखक जनाब ’सरवर आलम राज़ ’सरवर’ साहिब है । यहाँ पर मैने हिंदीदाँ दोस्तों की
 
आनन्द पाठक
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जनाब सरवर की ग़ज़ल 08

ग़ज़ल ०८ आ भी जा कि इस दिल की शाम होने वाली है दिन तो ढल गया ज्यों त्यों, रात अब सवाली है ! इक निगाह के बदले जान बेच डाली है इश्क़ करने वालों की हर अदा निराली है ! हर्फ़-ए-आरज़ू लब पर आए भी तो क्या आए नाबकार यह दुनिया किसकी सुनने वाली है ? कोई क्या करे तकिया
 
आनन्द पाठक
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एक मज़मून : शायरी में "ज़म का पहलू "

शायरी में ’ज़म(खोट) का पहलू’ ---सरवर आलम राज़ ’सरवर’(नोट : स्रोत -यह लेख इन्टरनेट साईट "उर्दू अन्ज़ुमन.काम से लिया गया है।जो उर्दू स्क्रिप्ट में लिखा हुआ है इसके मूल लेखक जनाब ’सरवर आलम राज़ ’सरवर’ साहिब है । यहाँ पर मैने हिंदीदाँ दोस्तों की सहूलियत के लिए
 
आनन्द पाठक
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एक ग़ज़ल :गुरूर-ए-हुस्न के मंज़र ...

[पिछली बार इस साईट पर एक ग़ज़ल " शौक़ है उनको मुस्कराने का......" चस्पा की थी .इस पर कुछ अहलेकारीं (पाठक गण) ने गुज़ारिश की कि राक़िम-उल-हरूफ़ (लेखक) का एक मुख़्तसर तार्रुफ़ (संक्षिप्त परिचय) भी पेश किया जाय तो रवा (उचित) होगा.इसी के मद्द-ए-नज़र उनकी एक
 
आनन्द पाठक
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जनाब 'सरवर' की गज़लें : ग़ज़ल 07

ग़ज़ल ०७ यूँ अहले-दिल में मेरा इलाही ! शुमार हो मेरी जबीं पे नक़्श-ए-कफ़-ए-पा-ए यार हो इतना असर तो तुझ में ग़मे-यादे-यार हो मैं बे-सुकूँ इधर वो उधर बे-क़रार हो ! शाम-ए-ख़िज़ाँ बा-रंगे-जमाल-ए-बहार हो गर ज़िन्दगी पे अपनी कोई इख़्तियार हो दामन है चाक मेरा,गिरेबाँ भी
 
आनन्द पाठक
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जनाब 'सरवर' की गज़लें : ग़ज़ल 06

ग़ज़ल ०६ मिरे जब भी क़रीब आई बहुत है ये दुनिया मैने ठुकराई बहुत है ! मै समझौता तो कर लूँ ज़िन्दगी से मगर ज़ालिम यह हरजाई बहुत है ! तुम्हें सरशारी-ए-मंज़िल मुबारक हमें ये आबला-पाई बहुत है ! कहाँ मैं और कहाँ मेरी तमन्ना मगर यह दिल ! कि सौदाई बहुत है बला से गर
 
आनन्द पाठक
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एक ग़ज़ल :शौक़ है उन को मुस्कराने का..

एक ग़ज़लशौक़ है उन को मुस्कराने कानीम-जानों को आजमाने का तेरी आँखों से बर्क़ कहती हैदर्स दे बिजलियाँ गिराने का हर जगह अब है जुस्तजू मेरीसिलसिला है मुझे मिटाने का इससे बेहतर है क़त्ल ही कर देफ़ायदा क्या मुझे सताने का जब क़दम कू-ए-यार में बहकेलुत्फ़ आया
 
आनन्द पाठक
Jan 16 2010 02:34 PM
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जनाब ’सरवर’ की गज़लें : ग़ज़ल 05

ग़ज़ल ०५ दिल को यूँ बहला रखा है दर्द का नाम दवा रखा है ! आओ प्यार की बातें कर लें इन बातों में क्या रखा है ! झिलमिल-झिलमिल करती आँखें जैसे एक दिया रखा है ! अक़्ल ने अपनी मजबूरी का थक कर नाम ख़ुदा रखा है ! मेरी सूरत देखते क्या हो ? सामने आईना रखा है !
 
आनन्द पाठक
Jan 12 2010 03:49 PM
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जनाब सरवर की ग़ज़ल 04

ग़ज़ल ०४ दिल दुखाए कभी ,जाँ जलाए कभी, हर तरह आज़माए तो मैं क्या करूँ ? मैं उसे याद करता रहूँ हर घड़ी , वो मुझे भूल जाए तो मैं क्या करूँ ? हाले-दिल गर कहूँ मैं तो किस से कहूँ,और ज़बाँ बन्द रखूँ तो क्यों कर जियूँ ? यह शबे-इम्तिहां और यह सोज़े-दुरूं ,खिरमने-दिल
 
आनन्द पाठक
Jan 09 2010 12:20 PM
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एक ज़मीन तीन शायर : ’ग़ालिब’ ’दाग़’ और ’अमीर’ मिनाई

एक ज़मीन तीन शायर : ’ग़ालिब’ ’दाग़’ और ’अमीर’ मिनाई -सरवर आलम राज़ ’सरवर’ हम सब मिर्ज़ा ’ग़ालिब’ की मशहूर ग़ज़ल " ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता’ से बाख़ूबी वाक़िफ़ हैं.न सिर्फ़ इस को सैकड़ो बार पढ़ चुके है बल्कि कितने ही गुलू-कारों ने अपनी आवाज़ के जादू से
 
आनन्द पाठक
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जनाब सरवर की गज़लें

ग़ज़ल ०३ दिल ही दिल में डरता हूँ कुछ तुझे ना हो जाए वरना राह-ए-उल्फ़त में जाए जान तो जाए मेरी कम नसीबी का हाल पूछते क्या हो जैसे अपने ही घर में राह कोई खो जाए गर तुम्हे तकल्लुफ़ है मेरे पास आने में ख़्वाब में चले आओ यूँ ही बात हो जाए झूठ मुस्कराए क्या आओ मिल
 
आनन्द पाठक
Jan 03 2010 05:50 PM
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दिलचस्प अदाबी बातें ( उर्दू की रोचक साहित्यिक बातें) भाग २/२

दिलचस्प अदाबी बातें ( उर्दू की रोचक साहित्यिक बातें) भाग २/२ ----सरवर आलम राज़ ’सरवर"[नोट : यह लेख मोहतरम जनाब सरवर आलम राज़ ’सरवर’ द्वारा रोमन उर्दू में लिखा गया है जो उनकी साईट www.sarwarraz.com से लिया गया है .जिसका सारा श्रेय सरवर साहब को और उनकी मेहनत
 
आनन्द पाठक
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दिलचस्प अदाबी बातें ( उर्दू की रोचक साहित्यिक बातें) भाग १/२

[नोट : यह लेख मोहतरम जनाब सरवर आलम राज़ द्वारा रोमन उर्दू में लिखा गया है जो उनकी साईट www.sarwarraz.comसे साभार लिया गया है .जिसका सारा श्रेय सरवर साहब को और उनकी मेहनत को जाता है .यहाँ पर मात्र उसका हिन्दी में तहरीरे नकल (ट्रान्सलिटरेशन) किया गया है तथा
 
आनन्द पाठक
Dec 29 2009 08:52 PM
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इस ब्लाग का मकसद......

इस ब्लोग का मक़्सद इस ब्लोग का मक़्सद उर्दू को हिन्दी में सीखने/सीखाने का या हिन्दी को उर्दू में सीखने/सीखाने का कत्तइ नहीं है और ना ही अभी उर्दू अदब को हिन्दी में तर्जुमा(अनुवाद) करने का .इस साइट का मक्सद फ़कत इतना है कि उर्दू अदब में आजकल जो लिखा/पढ़ा जा
 
आनन्द पाठक
Dec 29 2009 02:40 PM
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जनाब सरवर साहब की ग़ज़ल

ग़ज़ल ०२ बात ऐसी हुई है क्या साहेब ? हो गए आप क्यों ख़फ़ा साहेब? कुछ तो कहिए कहाँ कि ये आखिर लग गई आप को हवा साहेब ? ख़ामशी और ऐसी खामोशी ! कब मुहब्बत में है रवा साहेब ? हाय यह कैसी बे-नियाज़ी है ? रंगे-हस्ती बिखर गया साहेब क्या कोई मुझसे बद गुमानी है ? तौबा
 
आनन्द पाठक
Dec 26 2009 02:39 PM
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जनाब सरवर साहब की गज़लें

ग़ज़ल ०१ मंज़िले-दर्द से गुज़र आए आज अपने किए को भर आए ! था क़ियामत निगाह का मिलना आँख से दिल में वह उतर आए ! आज याद आई उसकी यूँ जैसे सुबह का भूला शाम घर आए ! ना-तवानी से ना-तवानी है ग़म उठाते हुए भी डर आए ! हम अगर काम से गये तो क्या ? आप तो अपना काम कर आए !
 
आनन्द पाठक
Dec 26 2009 02:36 PM