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नयी प्रविष्टी लिखी
29 May 2010
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सबसे बेहतर मेहतर

पुरी के जगन्नाथ शबर आदिवासियों के पास थे । पुरी के राजा ने उनसे कहा कि वे जगन्नाथ को उन्हें दे दें। साबरों ने इन्कार कर दिया । पुरी की राजा का एक मन्त्री शबर लोगों के राज में जा कर बसा , वहाँ की राज-कन्या से ब्याह रचाया और तब जगन्नाथजी को माँग कर [...]
 
Aflatoon अफ़लातून
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लछमिनिया : एक बहादुर नारी को प्रणाम

मुश्किल से छ: बरस का नत्थू अपना पट्टी-खड़िया भरा बस्ता छोड़कर पाठशाला से निकल पड़ा । अपने बाप के गाँव से करीब २०-२२ किलोमीटर दूर ननिहाल के लिए,पैदल,निपट अकेले । कुछ दिनों पहले उसके नाना बहुत चिरौरी-मिन्नत के बाद उसे और उसकी माँ को नत्थू के मामा चुन्नू के
 
Aflatoon अफ़लातून
टैग: समता
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ज्ञानजी की पोस्ट के सकारात्मक परिणाम भी हैं

ज्ञानदत्त जी की पोस्ट का जिसे नकारात्मक फल माना जाएगा उसके भी सकारात्मक पहलू हैं । जातिवाद जैसी भोंड़ी-विचारहीन गिरोहबन्दियाँ नंगा नाच करने लगीं । इसके अलावा इन नकारात्मक परिणामों के मुकाबले हिन्दी ब्लॉगाजगत की प्रतिभा भी प्रकट हुई – तार्किक आलोचना
 
Aflatoon अफ़लातून
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ग़रीबों का पैसा राष्ट्रमंडल खेलों के नाम?-क्रिस मॉरिस, बीबीसी

- क्रिस मॉरिस बीबीसी के दक्षिण एशिया संवाददाता सूचना का अधिकार क़ानून के तहत पाई गई आधिकारिक जानकारी आधार पर तैयार एक रिपोर्ट के मुताबिक ग़रीबी उन्मूलन की योजनाओं से करोड़ों रुपए की धनराशि दिल्ली में होने वाले राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन में लगाई जा रही
 
Aflatoon अफ़लातून
टैग: खेल
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भारतीय डाक विभाग ट्वि्टर पर

दो सरकारी महकमों के प्रति बचपन से बहुत ही आकर्षण रहा है – रेल और डाक । आकर्षण अभी भी है। हांलाकि इन दो महान सेवाओं पर कई आक्रमण शुरु हो गये हैं । काशी के राजघाट किले स्थित साधना केन्द्र परिसर में मेरा शैशव बीता । इस परिसर की दो तरफ़ गंगा-वरुणा बहती
 
Aflatoon अफ़लातून
टैग: रेल
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ब्लॉगवाणी में ब्लॉग खोजें

सिरिल की टीम का बनाया ब्लॉग -प्रविष्टी संकलक – ब्लॉगवाणी मुझे पसंद है । अपने चिट्ठों पर पहुंचने वाले कई पाठकों को ब्लॉगवाणी से ही पधारा हुआ पाता हूँ । अद्यतन प्रविष्टियाँ तो ब्लॉगवाणी पर दिखती ही हैं । किसी ब्लॉग-विशेष को ब्लॉगवाणी पर आप कैसे खोजते
 
Aflatoon अफ़लातून
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हमें नहीं चाहिए शिक्षा का ऐसा अधिकार / श्यामबहादुर ’ नम्र ’

हमे नहीं चाहिए शिक्षा का ऐसा अधिकार, जो गैर-जरूरी बातें जबरन सिखाये । हमारी जरूरतों के अनुसार सीखने पर पाबन्दी लगाये, हमें नहीं चाहिए ऐसा स्कूल जहाँ जाकर जीवन के हुनर जाँए भूल। हमें नहीं चाहिए ऐसी किताब जिसमें न मिलें हमारे सवालों के जवाब हम क्यों पढ़ें
 
Aflatoon अफ़लातून
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देश की माटी ,देश का जल/रवीन्द्रनाथ ठाकुर/अनु. भवानीप्रसाद मिश्र

देश की माटी देश का जल हवा देश की देश के फल सरस बनें प्रभु सरस बने देश के घर और देश के घाट देश के वन और देश के बाट सरल बनें प्रभु सरल प्रभु देश के तन और देश के मन देश के घर के भाई -बहन विमल बनें प्रभु विमल बनें - [...]
 
Aflatoon अफ़लातून
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’लोकसंघर्ष’ के सुमन से ’nice’ से अलग टीप हासिल करने का श्रेय

’ लोकसंघर्ष ’ के सुमन द्वारा ’nice’ की टिप्पणी दिया जाना हिन्दी चिट्ठेकारी की एक वृहत चर्चित परिघटना है । मुझे अच्छी तरह याद है जब सुमन की विस्तृत टीपें हासिल हुआ करती थी । इसके बाद जो कुछ भी हुआ हो सुमन का ’nice’ – सत्याग्रह शुरु हुआ
 
Aflatoon अफ़लातून
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क्या नर्मदा तालाबों और गटर में बदल जाएगी ? नर्मदा घाटी की 20,000 साल पुरानी सभ्यता, संस्कृति को मिटाने पर कौन तुला है ?

‘‘हे नर्मदा मैया! जिस जमीन को तू हर साल अपने आंचल में समेट कर नया उर्वर जीवन देती रही है, बिजलीघर लग जाने के बाद, तेरी यही नियामत राख के पहाड़ो से बांझ हो जाएगी। तेरे भक्तों को बीमार करके जीते-जी मार डालेगी। तेरी कोख में लगने वाले इस दानवी बिजलीघर की राख
 
अफ़लातून
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एक थाना जहाँ शहीदे आज़म भगत सिंह की तस्वीर लगी है

सरकारी दफ़्तरों , अदालतों और पुलिस थानों में आम तौर पर गाँधीजी की तसवीर लगी होती है । देश की राजधानी के प्रमुख थानों में एक – संसद मार्ग थाने स्थित सहायक पुलिस कमीश्नर के दफ़्तर में शहीदे आज़म भगत सिंह की तसवीर देख कर सुखद अचरज हुआ । विद्यार्थी युवजन
 
अफ़लातून
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Feb 25 2010 05:00 PM
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कोंकण-केरलम-आसमान / स्लाईड्स

‘ मातृभूमि ’ केरल का एक प्रमुख दैनिक है । केरल के नौ शहरों के अलावा यह मुम्बई , चेन्नै , बंगलूरू और दिल्ली से भी छपता है । ७५ वर्ष पूर्व महात्मा गांधी अपने केरल प्रवास के दौरान इस अखबार के दफ़्तर में आये थे । इस स्मृति को अखबार वर्ष पर्यन्त भिन्न
 
अफ़लातून
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आज क्या है ?

माघ पूर्णिमा के दिन सन्त रविदास की जयन्ती मनाई जाती है । किसी अन्य कवि के लिए उसके जन्म स्थान में, जनम दिन पर इतनी बड़ी और शानदार शोभा यात्रा निकलती हो इसकी जानकारी मुझे नहीं है । बहरहाल , उस दिन लोगों के दिलों में सन्त कवि की जन्म तिथि को जमाने के लिए
 
अफ़लातून
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एक नयी खेल नीति : अशोक सेक्सरिया

हमारे-जैसे गरीब देश में खेलों का स्वरूप यह होना चाहिए कि उनमें प्रतियोगिता का तत्त्व कम-से-कम रहें, संगीत और नृत्य के तत्त्व अधिक रहें , कम-से-कम उपकरण हों और ऐसी सहजता हो कि अधिकाधिक लोग खेलने की ओर प्रवृत्त हों । इस बारे में गंभीरता से सोचना आवश्यक है
 
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एक नयी खेल नीति : अशोक सेक्सरिया

हमारे-जैसे गरीब देश में खेलों का स्वरूप यह होना चाहिए कि उनमें प्रतियोगिता का तत्त्व कम-से-कम रहें, संगीत और नृत्य के तत्त्व अधिक रहें , कम-से-कम उपकरण हों और ऐसी सहजता हो कि अधिकाधिक लोग खेलने की ओर प्रवृत्त हों । इस बारे में गंभीरता से सोचना आवश्यक है
 
अफ़लातून
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साम्यवादी रूस और खेल : अशोक सेक्सरिया

अन्तरराष्ट्रीय खेलकूद में कम्युनिस्ट देशों की अभूतपूर्व सफलता , हमारी सरकार को उनकी भी नकल करने को प्रोत्साहित करती है ( जैसे पटियाला , बंग्लोर , ग्वालियर , राई , पूना के राष्ट्रीय खेल संस्थान जो रूस के राष्ट्रीय खेल स्कूलों के ही भारतीय खेल संस्करण हैं
 
अफ़लातून
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सरकार और खेल : अशोक सेक्सरिया

१९८२ के एशियाई खेल , १९५२ में साढ़े छ: लाख रु. की लागत से आयोजित प्रथम एशियाई खेलों की ही परिणति हैं । प्रथम एशियाई खेलों द्वारा अंगरेजों के राज में खेलों का जो ढाँचा बना था उसे ज्यों-का-त्यों स्वीकार कर लिया गया । खेलों के बारे में आजाद देश में कोई नीति
 
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खेल और व्यापार : अशोक सेक्सरिया

प्राय: सभी देशों में सरकार , उद्योग , जनसंचार के माध्यम ( मीडिया ) और सेना ने प्रतियोगात्मक खेलों के प्रति जनमानस में जबरदस्त आकर्षण पैदा करने की कोशिश की है । अगर हम एशियाई खेलों के आयोजन के सिलसिले में इन चारों की भूमिका के बारे में सोचने की कोशिश करें
 
अफ़लातून
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हिटलर और खेल : अशोक सेक्सरिया

पिछले भाग से आगे : १९ नवम्बर से एशियाई खेलों के नाम पर जो अश्लीलता होने जा रही है , उसमें कहीं भी वह खेल नहीं होगा जिसकी हमने ऊपर चर्चा की । इनमें तमगे बटेंगे , राष्ट्रगानों की धुनें बजेंगी और हारने का मातम व जीतने की बेहयाई होगी। ऐसे में एशियाई खेलों को
 
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क्या एशियाई खेल वास्तव में खेल हैं ? – अशोक सेक्सरिया

एशियाई खेलों को लेकर देश भर में जब भयंकर उन्माद फैलाया जा रहा है, तब यह प्रश्न उठाना कि यह खेल वास्तव में खेल हैं भी कि नहीं – मूर्खता लगता है । मूर्खता के डर से आदमी सोचना बंद कर देता है और उस पागलपन में शामिल हो जाता है जो सरकार , कम्पनियां [...]
 
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अल्लामा इकबाल : बच्चों के लिए (६) : एक मकड़ा और मक्खी

इक दिन किसी मक्खी से यह कहने लगा मकड़ा इस राह से होता है गुजर रोज तुम्हारा लेकिन मेरी कुटिया की न जगी कभी किस्मत भूले से कभी तुमने यहां पाँव न रखा गैरों से न मिली तो कोई बात नहीं है अपनों से मगर चाहिए यूं खिंच के न रहना आओ जो मेरे घर में , तो इज्जत है यह
 
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अल्लामा इकबाल : बच्चों के लिए (५) : शहद की मक्खी

इस फूल पे बैठी , कभी उस फूल पे बैठी बतलाओ तो, क्या ढूँढ़ती है शहद की मक्खी ? क्यों आती है , क्या काम है गुलजार में उसका ? ये बात जो समझाओ तो समझें तुम्हे दाना चहकारते फिरते हैं जो गुलशन में परिन्दे क्या शहद की मक्खी की मुलाकात है उनसे ? आशिक है ये कुमरी
 
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शैशव पर हावी धर्म , न्याय, कट्टरपंथ और गूगल

इस्लाम में धर्मान्तरण कैसे करें ? धर्मान्तरण करके मुसलिम बनने हेतु चैट द्वारा मदद लें” एक शानदार खबर के शीर्षक के ठीक नीचे उपर्युक्त इश्तेहार दिया हुआ है । विज्ञापन एक संस्था का है और यह विज्ञापन गूगल द्वारा प्रसारित है । गूगल ने धर्म , धर्म कब
 
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ई-मेल से नव वर्ष की शुभ कामना देने वालों को एक सुझाव

नए साल की शुभ कामना वाले ईमेल आने शुरु हो गये हैं । इन पत्रों में अक्सर आप पायेंगे कि To अथवा Cc की फील्ड में थोक में पते मौजूद होते हैं । भेजने वाले ने अपनी सम्पर्क सूची से इन्हें चुना होगा । आपने भले इन ई-पतों को न चुना हो आप आलस्यवश इन्हीं [...]
 
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अल्लामा इकबाल : बच्चों के लिए (४) : एक पहाड़ और गिलहरी

राल्फ वाल्डो एमर्सन ( १८०३ - १८८२ ) द्वारा अंग्रेजीमें लिखी एक प्रसिद्ध कविता ( फ़ेबल ) का अल्लामा इक़बाल द्वारा किया गया यह तर्जुमा है । मुझे उम्मीद जानने वाले बच्चे इसे सीखेंगे और याद रखेंगे । ] कोई पहाड़ यह कहता था एक गिलहरी से तुझे हो शर्म तो पानी म
 
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मोहन और महादेव : बापू की गोद में (१२)

बापू के पास आने के बाद इक्कीस वर्षों में काका ने दो बार छुट्टी ली थी । पहली बार टाइफाइड हो जाने पर और दूसरी बार ब्लडप्रेशर ( रक्तचाप ) बढ़ जाने पर । काका के पिताजी का देहान्त हुआ , तब भी काका का काम जारी ही था । इक्कीस साल के बाद [...]
 
अफ़लातून
टैग: gandhi
Dec 03 2009 01:21 AM
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अल्लामा इकबाल : बच्चों के लिए (३) : हमदर्दी

टहनी पे किसी शजर* की तनहा बुलबुल था कोई उदास बैठा कहता था की रात सर पे आई उड़ने चुगने में दिन गुज़ारा पहुँचूँ किसी तरह आशियाँ* तक हर चीज़ पे छा गया अन्धेरा सुनकर बुलबुल की आहो ज़ारी* जुगनू कोई पास ही से बोला हाज़िर हूँ मदद को जानो-दिल से कीड़ा हूँ अगरचे
 
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अल्लामा इकबाल : बच्चो के लिए (2) : परिंदे की फ़रियाद

बचपन में स्कूल में अल्लामा इकबाल की तीन कवितायें सीखी थीं | 'जुगनू' काफी पहले दे चुका हूँ , इसी चिट्ठे पर | 'बच्चे की दुआ ' को आगाज़ में प्रस्तुत करूंगा , हालांकि तरन्नुम में जो क्लिप मिली है उसकी तर्ज जुदा है | आज यहाँ पेश है 'परिंदे
 
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अरविन्द चतुर्वेद का स्वागत करें

हिन्दी के वरिष्ट पत्रकार और कवि अरविन्द चतुर्वेद ने अपना चिट्ठा बनाया है , जनपद । अपने लम्बे साहित्यिक जीवन से चुनी हुई ढेर सारी कविताओं को उन्होंने एक ही दिन में दनादन अलग – अलग पोस्ट के रूप में प्रकाशित कर दिया है । आप सबसे निवेदन है कि अरविन
 
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एक लघु कहानी / अफ़लातून

हालात ने उसे पेशेवर भिखारी बना दिया होगा । उमर करीब पाँच- छ: साल। पेशे को अपनाने में दु:ख या संकोच होने की गुंजाइश ही नहीं छोड़ी थी उसकी कच्ची उमर ने । माँगने के कष्ट की शायद कल्पना ही न रही हो उसे और माँग कर न पाना भी उसके लिए उतना ही सामान्य [...]
 
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मधु कोड़ा जैसों से भी क्यों हो मरहूम मेरा स्कूल ?

परसों मैं अपने स्कूल के मित्र-मिलन में अपने स्कूल गया था । वहाँ से लौट कर जब न रहा गया तब यह लिखा । ] “मेरा नाती बहुत तेज और हाजिर जवाब है । कुछ भी पूछो तो उसके पास तुरन्त एक जवाब रहता है । तब तुम्हारी याद आती है और मैं अपनी नाती [...]
 
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काले बादल : केरल की मीनाक्षी पय्याडा की कविता

मीनाक्षी पय्याडा के माता - पिता दोनों शुद्ध मलयाली हैं , यानी केरलवासी । उसकी माँ , केरल के कन्नूर जिले में केन्द्रीय विद्यालय में शिक्षिका है इसलिए मीनाक्षी को अपने स्कूल ( केन्द्रीय विद्यालय) में हिन्दी पढ़ने का मौका मिला। मीनाक्षी को अब तक किसी हिन
 
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विस्थापन के डर से सहमी हैं जंगल की बेटियाँ/ बाबा मायाराम

घने जंगल के बीच बसे एक गांव की सुमन 12 वीं कक्षा में पढ़ रही है। वह बोरी अभयारण्य के अंदर के काकड़ी गांव की है। पढने के लिए केसला आई है, जो मध्यप्रदेश के हो्शंगाबाद जिले का एक विकासखंड मुख्यालय है। यहां वह एक गर्ल्स शॉस्टल में रहकर पढ़ाई कर रही है। लेकि
 
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Oct 20 2009 09:10 PM
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गुणाकर मुले नहीं रहे

गुणाकर मुले १३ अक्टूबर को गुजर गये । बचपन से हम सब ने जिन्हें हिन्दी के प्रमुख विज्ञान लेख के तौर पर पढ़ा है उनकी मृत्यु की खबर सूचना क्रान्ति के तहत शायद इतनी बड़ी खबर नहीं बनती कि उनके सभी प्रशंसक जान पायें । एक तकनीकी संस्थान में हिन्दी अधिकारी जिन्
 
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चिपलूणकर और सलीम ख़ान का मेरे ब्लॉग पर मेल

१९९२ के दौर में वाराणसी के तीन भिन्न – भिन्न विचारधाराओं से जुड़े़ तीन समूहों ने महसूस किया था कि साम्प्रदायिकता के बारे में एक समझदारी बना कर साथ – साथ लोगों के बीच जाना होगा । समझदारी बनाने के क्रम में हमने तीन लम्बे सत्रों में चर्चा की
 
अफ़लातून
Oct 14 2009 07:39 PM
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सांप्रदायिकता : हम क्या करें ? क्या न करें

साम्प्रदायिकता उभाड़ने वाली किसी भी दुष्प्रवृत्ति के शिकार हम खुद न हों , और समाज में साम्प्रदायिकता उभाड़ने वाली कोशिशों के खिलाफ़ खड़े हों , फिर चाहे ऐसी कोशिश हिन्दुओं के द्वारा हो या मुसलमानों के द्वारा हो या अन्य किसी भी धर्म को मानने वालों के द्वार
 
अफ़लातून
Oct 14 2009 07:39 PM
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साम्प्रदायिकता क्या है? उसके खतरे क्या हैं ?

साम्प्रदायिकता है – अपनी पूजा-पाठ-उपासना-विधियों , खान-पान,रहन-सहन के तौर-तरीकों , जाति-नस्ल आदि की भिन्नताओं को ही धर्म का आधार मानना तथा अपनी मान्यता वाले धर्म को सर्वश्रेष्ठ और दूसरी मान्यता वाले धर्मों को निकृष्ट समझना , उनके प्रति नफरत , द्वेष-भ
 
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पुष्पा भारतीजी कहानी का एक पहलू यह भी है

आपातकाल की औपचारिक घोषणा के पहले भी सत्ता प्रतिष्ठान द्वारा पत्र-पत्रिकाओं पर नकेल कसना शुरु हो चुका था । सेन्सरशिप न होने के बावजूद सरकारी विज्ञापन और अखबारी कागज के कोटे आदि के द्वारा यह अंकुश रखा जाता । इसी दौर का एक प्रसंग बता रहा हूँ । धर्मवीर भ
 
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सफरनामा ३ : हैदराबाद – पुणे

हैदराबाद – पुणे रेल मार्ग पर यह मेरा पहला सफ़र था , इसलिए लाजमी तौर पर मन में थोड़ा उत्साह भी था | गाड़ी रात की थी इसलिए सुबह सिर्फ शोलापुर से पुणे का रेल मार्ग देख पाया | हैंडलूम की [...]
 
अफ़लातून