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इन्द्रधनुष

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31 Dec 2009
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Food for Thought – दिमाग (का) खाना

सच है कि जिन्दगी शतरंज की बिसात नही जहाँ हर कदम चलने से पहले आगे और पीछे की सौ संभावित चालों के बारे में सोंचा जाये…लेकिन जिन्दगी कटी पतंग भी तो नही कि बस हवाओं से सहारे उडे और किसी पेड पर उलझ जाये? - २/३ साल पहले IIFM में सुने एक व्याख्यान से
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दैनिक पठन खुराक

अपनी रोज की पठन खुराक - अखबार – टाइम्स आफ इंडिया – कागजी प्रारूप- पूरा नही पढा जाता- सरसरी निगाह ही डाल पाते है। गूगल रीडर पर चुनिन्दा हिन्दी-अंग्रेजी चिट्ठे जिनकी फीड सदस्यता मैने ले रखी है। दैनिक भास्कर- इंटरनेट संस्करण- विशेष रूप से जय
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आतंक का अनुभव

दुःख,क्षोभ,गुस्सा,निराशा,हताशा…सब कुछ मन में एक साथ गड्डमगड्ड होते चले जाते हैं। जब बीते साल हैदराबाद में बम धमाके हुए थे तब सच में बहली बार आतंकवाद को इतने करीब से महसूस किया था। मुम्बई में पिछले तीन दिन से चल रहे घटनाक्रम ने उसे अहसास को और ग
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सफर की कतरनें

दिवाली पर ९ दिन के लिये घर जाना हुआ। रिजर्वेशन कन्फर्म नही हो पाया था, सो जाते समय तो जनरल डब्बे में बैठ कर गया। बहुत सालों बाद ट्रेन के जनरल डब्बे में बैठने का मौका लगा। हैदराबाद से भोपाल तक का रात भर का सफर था और ट्रेन में दिवाली की भीड का अंदाजा त
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हरिओम पंवार – मैं घायल घाटी के दिल की धडकन गाने निकला हूं।

हरिओम पवांर को मैने पहली बार १९९६-९७ के आसपास सुना था। वे वीर रस के कवि हैं। हम ११-१२ वीं कक्षा में थे और हमारे अंग्रेजी के अध्यापक श्री ए पी सिंह के पास इनकी गाई हुई कविताओं की कैसेट थी। “मैं घायल घाटी के दिल की धडकन गाने निकला हूँ”। १२
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रेडिफ के लिये क्रिकेट बनाम खेल

समाचार एवं सूचना साइट रेडिफ ने हाल ही में अपने कलेवर की झाड-पोंछ की है। हालांकि मेक-अप, पाउडर और लीपापोती ही ज्यादा है…कंटेंट के नाम पर अभी भी वही उलूल-लजुलूल स्लाइड शो होते हैं। पर मुखपृष्ठ पर अब ज्यादा भीड-भाड नही दिखाई देती, बस चुनिंदा आइकन और
Jul 24 2009 05:47 PM
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चार साल

सुबह से दिमाग में कुछ खटक रहा था कि आज कुछ विशेष दिन है, पर समझ नही आ रहा था क्या? अभी ऐसे ही वर्डप्रेस खोल लिया तो ध्यान आया कि आज अपने इस चिट्ठे की चौथी सालगिरह है। लिखने के हिसाब से यह साल काफी सुस्त बीता है। हालांकि कई अन्य मोर्चों पर काफी क्रांत
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अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता(!) - NDTV द्वारा एक ब्लागर से पोस्ट डिलीट करवाया जाना

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अलंबरदार NDTV और उनकी एक प्रिय चेहरे की एक हरकत की खबर अभी हाल ही में अंग्रेजी ब्लागमंडल में घूमते हुए मिली जहाँ एक ब्लागर को कानूनी कार्यवाही के सम्मन के जरिये अपनी पोस्ट हटाने और सार्वजनिक रूप से माफीनामा लिखने के लिये म
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रेल के स्लीपर डब्बों में ‘अतिरिक्त सीट’ पर एक सर्वेक्षण

कुछ दिन पहले सफर की कतरनें लिखते समय भारतीय रेले के स्लीपर क्लास डब्बों में साइड में तीसरी बर्थ घुसा देने से हुई परेशानी पर लिखा था…। कुछ अन्य लोगों ने भी इससे हुई परेशानी का जिक्र किया था। सागर भाई ने भी अपनी एक पोस्ट में इसका जिक्र किया था। र
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किताबों का भविष्य!

कल उन्मुक्त जी की इस चिट्ठी पर बडी दिलचस्प चर्चा पढने को मिली। एक तो वो दिल्ली में उनकी पसंदीदा किताबों की दुकान बुकवार्म बन्द होने से दुःखी थे और दूसरे अन्य किताबों की दुकानों पर सही माहौल ना होने को लेकर भी व्यथित थे। पढने का चलन कम होने के अलावा,ट