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आओ बात करें .......!

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31 Mar 2010
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अब पढ़ना होगा......!!!!

(जैसे आप रोटी खाते हैं......बोलने की आज़ादी रखते हैं........अब पढ़ना भी पढ़ेगा.....ये कानून लागू हो रहा है....आज से. बस सोचा तो..कुछ कह बैठा.... )_____________________________________________________________________________आज हमारी खबर बड़ी
 
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बलात्कार.....एक छोटी सी बात!!!

बलात्कार....खूब करो....जब चाहे...तब करो....टेन्सन की कोई जरुरत नहीं. कानून क्या कर लेगा?? पहली लाइन पढ़कर ही आपने गलियाँ देना शुरू कर दिया होगा....कुछ ने तो मेरे चित्र पर जूते मार भी दिए होंगे........महिलाओं के हक-हकुकों के स्यंभू ठेकेदार NGO वाले तो चल
 
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इस बच्चन 'भाई' से डरना जरुरी है...........!!!

अमिताभ बच्चन कभी गरियाते थे....अब डरा रहे हैं.....सीधे सीधे कहूँ तो औकात बता रहे हैं....वो भी उसको, जिसकी वाकई बाज़ार में कोई हैसियत है. देश के सबसे बड़े मीडिया समूह के मालिकों की हैसियत नाप कर रख दी...."बच्चन घराने" के मालिक बच्चन साहब ने. उनको धमका दिया
 
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Mar 06 2010 08:15 PM
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आओ प्यार की बात करें........................

आओ प्यार की बात करें........................प्यार एक हसरत हैप्यार एक जियारत हैप्यार एक इवादत हैप्यार एक सदाव्रत हैआओ प्यार की बात करें........................प्यार एक आस हैप्यार एक विश्वास हैप्यार एक सांस हैप्यार एक अहसास हैआओ प्यार की बात
 
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Feb 12 2010 10:29 PM
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जमाखोर की बात

अहसासों की जमाखोरी की ऐसे लत सी पड़ गई है.....................................भंवरे की धुन पर इठलाने की जैसे आदत सी पड़ गई है.पगडंडियों की भूलभुलैया से गुजर जाने हिम्मत सी बंध गई है.रिश्तों को निभाने की जैसे रवायत सी बन गई है. लम्हों को बीत जाने देने की
 
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पांच पंक्तियों की बातचीत

नजरिया कुछ बात करने को मजबूर कर रहा है............"परिधि की हर त्रिज्या के पारविकास के लक्ष्य अपरम्पार विचार का हो ऐसा विस्तारआसमां की गहराई में हो साकारक्षितिज पर वो 'अव्यक्त' विचार-सार"
 
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बात 'जीवन-कला' की.....

एक हफ्ते से ज्यादा हो गया, रूबरू हुए.......बातें कुलबुला रही हैं.....कुछ कहना चाह रहीं हैं..मुझसे-आपसे..!! सोच रहा था की क्या कहूँ...क्या छोड़ दूँ... लेकिन इस द्विविधा का इलाज तो सालों पहले कबीरदास जी कर गए.... "बलिहारी गुरु आपकी, गोविन्द दियो बताये" . तो
 
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जीवन की बात

चलिए तो बात शुरू करते हैं.........सालों से सोच रहा था की ब्लॉग लिखूंगा पर लगा की टीवी में रहते रहते लिखवाटीपन से कब के दूर हो चुके है....लिखने की हिम्मत नहीं हुई....फिर सोचा की बात तो कर ही सकते है....बात तो हमारे काम और जीवन दोनों का अकाट्य सच है....यूँ
 
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