लोकगीतों में माँ का दुलार,पिता का प्यार, सब कुछ तो था। विड़म्बना वश आज लोकगीत बहुत कम बनने और बजने लगे हैं, लोकगीत हमारी संस्कृति के रंगों और त्योहार की उमंग लिए, हमेशा से हमारे जीवन में मौजूद रहे,हमारी खु़शियों, हमारे ग़मों को हर बार शब्द देते रहे। किसी