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तेरे सुर और मेरे गीत

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16 Jun 2010
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कैफ़ी आज़मी

"आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है... आज की रात न फ़ुटपाथ पर नींद आएगी...सब उठो..मैं भी उठूँ.... तुम भी उठो ...तुम भी उठो ...कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जाएगी..."(कैफ़ी आज़मी)कैफ़ी आज़मी की कुछ खास नज़मों में से एक ...
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अठन्नी में बजाई है बिस्मिल्ला ख़ान ने शहनाई

एक मंदिर में केवल आठ आने में शहनाई बजाने वाले उस्ताद बिस्मिला ख़ान की शहनाई की तान से ही पूरे देश की सुबह होती थी। आकाशवाणी और दूरदर्शन पर अल सुबह बजने वाली मंगल ध्वनि के लिए उन्होंने विशेष एलपी तैयार कराया था। पेंगुइन द्वारा प्रकाशित यतीन्द्र मिश्र की
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तेरे सुर और मेरे गीत

आज  आपके लिए कजरी न जाने कहाँ से हाथ लग गयी थी । सोचा कि आपके साथ भी बाँट दी जाएकजरी / विकास जु़त्शी  |
Mar 21 2010 04:21 AM
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उन्‍होंने दुल्हिन कहा और कहा, ‘मेरे अनंत बेटे-बेटियां हैं’

17 MARCH 2010 बिंध्‍यवासिनी देवी : स्नेह और संगीत का दान देनेवाली जननी♦ मीना श्रीवास्तवबिंध्‍यवासिनी जी मेरे जेहन में उन दिनों से बसी हैं, जब मैं बहुत छोटी उम्र की थी। मैं बचपन से उनको रेडियो पर लोकगीत गाते हुए सुनती रही हूं। उन दिनों आकाशवाणी पटना से
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मुकुल शिवपुत्र / mukul shivputra

मुकुल शिवपुत्र जी से जुड़ा कोई अन्य लेख,लिंक,जानकारी आप बाँटना चाहें तो आपका स्वागत है (श्री मुकुल शिवपुत्र का चित्र) मुकुल शिवपुत्र का जन्म सन1956 में हुआ। पिता शिवपुत्र सिद्धरमैया कोमकली यानी पं.कुमार गंधर्व ने उन्हें छोटी उम्र में ही हिंदुस्तानी
Mar 01 2010 08:52 AM
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तेरे सुर और मेरे गीत

गणतंत्र के दिवस के इस अवसर पर अपने शहीद सैनिकों को श्रदांजलिजो समर मे हो गए अमर मै उनकी याद मेंगा रही हूँ आज श्रद्धागीत धन्यवाद मेंलौट कर न आएँगे विजय दिलाने वाले वीरमेरे गीत अंजली मेंउनके लिए नयन नीरसंग फूल-पान के,रंग हैं निशान केशूर वीर आन के...विजय के
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मालवा की मिट्टी से जुड़ा शास्त्रीय गायक

शिवपुत्र सिद्धरामैया कोमकाली यानी हमारे कुमार जी और बाक़ी सब के कुमार गंधर्व ।वे जब इंदौर के छोटी लाइन के रेलवे स्टेशन पर उतरे तो चौबीस बरस को थे । कर्नाटक के धारवाड़ में 8 अप्रेल 1924 को जन्में और पुणे में प्रोफेसर देवधर और अंजनी बाई मालपेकर से संगीत की
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लिखो अपना विचार: मीडिया ख़बर की "ख़बर" : जागो मोहन प्यारे

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लोक गीत

लोकगीतों में माँ का दुलार,पिता का प्यार, सब कुछ तो था। विड़म्बना वश आज लोकगीत बहुत कम बनने और बजने लगे हैं, लोकगीत हमारी संस्कृति के रंगों और त्योहार की उमंग लिए, हमेशा से हमारे जीवन में मौजूद रहे,हमारी खु़शियों, हमारे ग़मों को हर बार शब्द देते रहे। किसी
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मधुशाला

आज आइये इस अमर "मधुशाला" की ओर रुख़ किया जाए,और जी भर के इसका रस पान किया जाए ।